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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1001 · मारू

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अंग
1001
मारू
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  1. मूड़े तै मन ते रामु बिसारिओ ॥
  2. चरन कमल प्रभ राखे चीति ॥
  3. प्रान सुखदाता जीअ सुखदाता तुम काहे बिसारिओ अगिआनथ ॥
  4. गुपतु करता संगि सो प्रभु डहकावए मनुखाइ ॥

मूड़े तै मन ते रामु बिसारिओ ॥

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मूड़े तै मन ते रामु बिसारिओ ॥
लूणु खाइ करहि हरामखोरी पेखत नैन बिदारिओ ॥1॥ रहाउ ॥
असाध रोगु उपजिओ तन भीतरि टरत न काहू टारिओ ॥
प्रभ बिसरत महा दुखु पाइओ इहु नानक ततु बीचारिओ ॥2॥8॥

हिन्दी अर्थ: हे मूर्ख ! आपने परमात्मा को अपने मन से भुला दिया है। परमात्मा का सब कुछ दिया खा के बड़ी बेशर्मी के साथ आप हरामखोरी कर रहे हैं। 1। रहाउ। हे मूर्ख ! (जब हरामखोरी का यह) असाध रोग शरीर में पैदा होता है। किसी भी और तरीके से दूर करने से यह दूर नहीं होता। हे नानक ! (कह-) संत जनों ने ये भेद समझा है कि परमात्मा को भुला के मनुष्य बड़ा दुख सहता है। 2। 8।

चरन कमल प्रभ राखे चीति ॥

मारू महला 5 ॥
चरन कमल प्रभ राखे चीति ॥
हरि गुण गावह नीता नीत ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोऊ ॥
आदि मधि अंति है सोऊ ॥1॥
संतन की ओट आपे आपि ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै वसि है सगल संसारु ॥
आपे आपि आपि निरंकारु ॥
नानक गहिओ साचा सोइ ॥
सुखु पाइआ फिरि दूखु न होइ ॥2॥9॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! संत जनों ने प्रभू के सुंदर चरण (सदा अपने) चित्त में बसाए होते हैं। वह सदा ही परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाते हैं परमात्मा के बिना उन्हें और कोई सहारा नहीं दिखता (जो सदा कायम रह सके। संत जनों को विश्वास है कि) वह परमात्मा ही जगत के आरम्भ में। मध्य में और जगत के अंत में कायम रहने वाला है। 1। हे भाई ! परमात्मा ही (संत जनों का) आसरा है। 1। रहाउ। जिसमें सारा जगत है। जो निरंकार सदा स्वयं ही स्वयं है। हे नानक ! (कह-) (संत जनों ने) उस सदा कायम रहने वाले को अपने हृदय में बसाया हुआ है। वह सदा आत्मिक आनंद भोगते हैं। उन्हें कोई दुख छू नहीं सकता। 2। 9।

प्रान सुखदाता जीअ सुखदाता तुम काहे बिसारिओ अगिआनथ ॥

मारू महला 5 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रान सुखदाता जीअ सुखदाता तुम काहे बिसारिओ अगिआनथ ॥
होछा मदु चाखि होए तुम बावर दुलभ जनमु अकारथ ॥1॥
रे नर ऐसी करहि इआनथ ॥
तजि सारंगधर भ्रमि तू भूला मोहि लपटिओ दासी संगि सानथ ॥1॥ रहाउ ॥
धरणीधरु तिआगि नीच कुल सेवहि हउ हउ करत बिहावथ ॥
फोकट करम करहि अगिआनी मनमुखि अंध कहावथ ॥2॥
सति होता असति करि मानिआ जो बिनसत सो निहचलु जानथ ॥
पर की कउ अपनी करि पकरी ऐसे भूल भुलानथ ॥3॥
खत्री ब्राहमण सूद वैस सभ एकै नामि तरानथ ॥
गुरु नानकु उपदेसु कहतु है जो सुनै सो पारि परानथ ॥4॥1॥10॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5 घरु 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे अज्ञानी ! आपने क्यों उस परमात्मा को भुला दिया है जो प्राणों का दाता है। सारे सुखों को देने वाला है और सारे जीवों का सुखदाता है। जल्दी खत्म हो जाने वाले (होछे) नशे चख के आप पागल होते जा रहे हैं। आपका कीमती जनम व्यर्थ जा रहा है। 1। हे मनुष्य ! आप बहुत ही बुरी बुद्धिहीनता कर रहे हैं कि आप धरती के आसरे प्रभू को छोड़ के भटकन में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़े हुए हैं। माया के मोह से चिपके हुए हैं और माया-दासी के साथ बना रहे हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! धरती के आसरे प्रभू को त्याग के आप नीच कुल वाली माया-दासी की सेवा कर रहे हैं। (इस माया के कारण) 'मैं मैं' करते हुए आपकी उम्र बीत रही है। हे मन के मुरीद मूर्ख ! आप फोके कर्म कर रहे हैं। (आँखों के होते हुए भी) आप (आत्मिक जीवन की ओर से) अंधे कहलवा रहे हैं। 2। हे भाई ! जो परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। आप उसकी हस्ती ही नहीं मानते। जो यह नाशवंत जगत है इसको आप अटल समझते हैं। जिस माया ने अवश्य पराई हो जाना है इसको आप अपनी समझ के जफी मार के बैठे हैं। कैसी आश्चर्यजनक भूल में आप भूले हुए हैं !। 3। हे भाई ! खत्री, ब्राहमण, शूद्र, वैश्य (किसी भी वर्ण के जीव हों) सारे एक हरी-नाम से ही संसार-सागर से पार होते हैं। जो उपदेश गुरू नानक करता है इसको जो मनुष्य सुनता है वह संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। 4। 1। 10।

गुपतु करता संगि सो प्रभु डहकावए मनुखाइ ॥

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मारू महला 5 ॥
गुपतु करता संगि सो प्रभु डहकावए मनुखाइ ॥
बिसारि हरि जीउ बिखै भोगहि तपत थंम गलि लाइ ॥1॥
रे नर काइ पर ग्रिहि जाइ ॥
कुचल कठोर कामि गरधभ तुम नही सुनिओ धरम राइ ॥1॥ रहाउ ॥
बिकार पाथर गलहि बाधे निंद पोट सिराइ ॥
महा सागरु समुदु लंघना पारि न परना जाइ ॥2॥
कामि क्रोधि लोभि मोहि बिआपिओ नेत्र रखे फिराइ ॥
सीसु उठावन न कबहू मिलई महा दुतर माइ ॥3॥
सूरु मुकता ससी मुकता ब्रहम गिआनी अलिपाइ ॥
सुभावत जैसे बैसंतर अलिपत सदा निरमलाइ ॥4॥
जिसु करमु खुलिआ तिसु लहिआ पड़दा जिनि गुर पहि मंनिआ सुभाइ ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ (हे भाई ! मनुष्य) छुप के (विकार) करता है। (पर देखने वाला) वह प्रभू (हर वक्त इसके) साथ होता है (विकारी मनुष्य प्रभू को ठग नहीं सकता। ये तो) मनुष्यों को ही ठगता है। हे भाई ! परमात्मा को बिसार के विकारों की आग में जल-जल के आप विषय भोगते रहते हैं। 1। हे मनुष्य ! पराए घर में जा के ऐसे (बुरे कर्म करते हैं।) हे गंदे ! हे पत्थर दिल ! हे विषयी ! हे गधे मूर्ख ! क्या आपने धर्मराज (का नाम कभी) नहीं सुना। 1। रहाउ। हे भाई ! विकारों के पत्थर (आपके) गले से बँधे पड़े हैं। निंदा की पोटली (आपके) सिर पर है। बड़ा संसार-समुंद्र (है जिसमें से) गुजरना है (इतने भार से इसमें से) पार नहीं लांघा जा सकता। 2। हे भाई ! (आप) काम-क्रोध-लोभ-मोह में फँसे हुए हैं। आपने परमात्मा की ओर से आँखें फेर रखी हैं। (इन विकारों की तरफ से आपको) कभी भी सिर उठाना नहीं मिलता। (आपके आगे) माया का बड़ा समुंद्र है जिसमें से पार लांघना बहुत मुश्किल है। 3। जो मनुष्य प्रभू के साथ गहरी सांझ डाले रखता है वह माया से इस प्रकार से निर्लिप रहता है जैसे सूरज (अच्छे-बुरे हरेक जगह अपनी रौशनी दे के) मैल आदि से साफ है। जैसे चंद्रमा भी (इसी तरह) पवित्र है। ब्रहम से जान-पहचान रखने वाला इस तरह सुंदर लगता है जैसे (हरेक किस्म की मैल को जला के भी) आग (मैल से) निर्लिप है और सदा निर्मल है। 4। हे भाई ! जिस मनुष्य के भाग्य जाग उठते हैं। जिसने गुरू की शरण में रह के प्रेम से रज़ा को मान लिया उसकी (आँखों से माया के मोह) का पर्दा उतर जाता है।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1001 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1001 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।