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अंग 100

अंग
100
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रेनु संतन की मेरै मुखि लागी ॥
दुरमति बिनसी कुबुधि अभागी ॥
सच घरि बैसि रहे गुण गाए नानक बिनसे कूरा जीउ ॥4॥11॥18॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (जब से) आपके संत जनों की धूड़ मेरे माथे पे लगी है, मेरी दुर-मति का नाश हो गया है। मेरी कुमति दूर हो चुकी है। हे नानक ! (कह) जो लोग सदा स्थिर प्रभू के चरणों में टिके रहते हैं और प्रभू के गुण गाते हैं, उनके (अंदर से माया के मोह वाले) झूठे संस्कार नाश हो जाते हैं।4।11।18।
माझ महला 5 ॥
विसरु नाही एवड दाते ॥
करि किरपा भगतन संगि राते ॥
दिनसु रैणि जिउ तुधु धिआई एहु दानु मोहि करणा जीउ ॥1॥
माटी अंधी सुरति समाई ॥
सभ किछु दीआ भलीआ जाई ॥
अनद बिनोद चोज तमासे तुधु भावै सो होणा जीउ ॥2॥
जिस दा दिता सभु किछु लैणा ॥
छतीह अंम्रित भोजनु खाणा ॥
सेज सुखाली सीतलु पवणा सहज केल रंग करणा जीउ ॥3॥
सा बुधि दीजै जितु विसरहि नाही ॥
सा मति दीजै जितु तुधु धिआई ॥
सास सास तेरे गुण गावा ओट नानक गुर चरणा जीउ ॥4॥12॥19॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे इतने बड़े दातार ! (हे बेअंत दातें देने वाले प्रभू !)मैं आपको कभी ना भुलाऊं। हे भक्तों से प्यार करने वाले प्रभू ! (मेरे पर) कृपा कर, मुझे ये दान दे कि जैसे हो सके मैं दिन रात आपके चरणों का ध्यान धरता रहूँ।1। हे प्रभू ! (हमारे इस) जड़ शरीर में तूने चेतनंता डाल दी है, तूने (हम जीवों को) सब कुछ दिया हुआ है, अच्छी जगहें दी हुईं हैं। हे प्रभू ! (आपके पैदा किए जीव कई तरह की) खुशियां खेल तमाशे कर रहे हैं। ये सब कुछ जो हैं रहा है आपकी रजा के मुताबिक हैं रहा है।2। (हे भाई !) जिस परमात्मा का दिया हुआ सब कुछ हमें मिल रहा है (जिसकी मेहर से) अनेकों किस्मों का खाना हम खा रहे हैं। (आराम करने के लिए) सुखदायक चारपाई बिस्तरे हमें मिले हुए है। ठण्डी हवा हम ले रहे हैं, और बेफिक्री के कई खेल तमाशे हम करते हैं (उसे कभी विसारना नहीं चाहिए)।3। हे प्रभू ! मुझे ऐसी बुद्धि दे, जिसकी बरकति से मैं आपको कभी ना भुलाऊँ। मुझे वही मति दे, ता कि मैं तूझे सिमरता रहूँ। हे नानक ! (कह) मुझे गुरू के चरणों का आसरा दे, ता कि मैं हरेक सांस के साथ आपके गुण गाता रहूँ।4।12।19।
माझ महला 5 ॥
सिफति सालाहणु तेरा हुकमु रजाई ॥
सो गिआनु धिआनु जो तुधु भाई ॥
सोई जपु जो प्रभ जीउ भावै भाणै पूर गिआना जीउ ॥1॥
अंम्रितु नामु तेरा सोई गावै ॥ जो साहिब तेरै मनि भावै ॥
तूं संतन का संत तुमारे संत साहिब मनु माना जीउ ॥2॥
तूं संतन की करहि प्रतिपाला ॥
संत खेलहि तुम संगि गोपाला ॥
अपुने संत तुधु खरे पिआरे तू संतन के प्राना जीउ ॥3॥
उन संतन कै मेरा मनु कुरबाने ॥
जिन तूं जाता जो तुधु मनि भाने ॥
तिन कै संगि सदा सुखु पाइआ हरि रस नानक त्रिपति अघाना जीउ ॥4॥13॥20॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे रजा के मालिक प्रभू ! आपका हुकम (सिर माथे पर मानना) आपकी सिफत-सालाह ही है। जो आपको ठीक लगता है (उसमें अपनी भलाई जानना) यही असल ज्ञान है असल समाधि है। (हे भाई !) जो कुछ प्रभू जी को भाता है (उसे परवान करना ही) असल जप है। परमात्मा के भाणे में चलना ही असल ज्ञान है।1। हे मालिक प्रभू ! आत्मिक जीवन देने वाला आपका नाम वही मनुष्य गा सकता है, जो आपके मन में (आपको) प्यारा लगता है। हे साहिब ! आप ही संतों का (सहारा) है। संत आपके आसरे जीते हैं। आपके संतों का मन सदा आपके (चरणों में) जुड़ा रहता है।2। हे गोपाल प्रभू ! हे सृष्टि के पालणहार ! आप अपने संतों की सदा रक्षा करता है। आपके चरणों में जुड़े रह के संत आत्मिक आनंद का सुख लेते हैं। आपको अपने संत बहुत प्यारे लेगते हैं, आप संतों की जिंद जान है।3। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) मेरा मन आपके उन संतों से सदा सदके है, जिन्होंने आपको पहचाना है (आपके साथ गहरी सांझ डाली है), जो आपको आपके मन में प्यारे लगते हैं। (जो भाग्यशाली) उनकी संगति में रहते हैं, वे सदा आत्मिक आनंद का सुख पाप्त करते हैं। वे परमात्मा का नाम रस पी के (माया की तृष्णा की ओर से) सदैव तृप्त रहते हैं।4।13।20।
माझ महला 5 ॥
तूं जलनिधि हम मीन तुमारे ॥
तेरा नामु बूंद हम चात्रिक तिखहारे ॥
तुमरी आस पिआसा तुमरी तुम ही संगि मनु लीना जीउ ॥1॥
जिउ बारिकु पी खीरु अघावै ॥
जिउ निरधनु धनु देखि सुखु पावै ॥
त्रिखावंत जलु पीवत ठंढा तिउ हरि संगि इहु मनु भीना जीउ ॥2॥
जिउ अंधिआरै दीपकु परगासा ॥
भरता चितवत पूरन आसा ॥
मिलि प्रीतम जिउ होत अनंदा तिउ हरि रंगि मनु रंगीना जीउ ॥3॥
संतन मो कउ हरि मारगि पाइआ ॥
साध क्रिपालि हरि संगि गिझाइआ ॥
हरि हमरा हम हरि के दासे नानक सबदु गुरू सचु दीना जीउ ॥4॥14॥21॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे प्रभू !) आप (जैसे) समुंद्र है और हम (जीव) आपकी मछलियां हैं। हे प्रभू ! आपका नाम (जैसे, स्वाति नक्षत्र की बरखा की) बूँद है, और हम (जीव, जैसे) प्यासे पपीहे हैं। हे प्रभू ! मुझे आपके मिलाप की आस है मुझे आपके नाम जल की प्यास है (जो आपकी मेहर हैं तो मेरा) मन आपके ही चरणों में जुड़ा रहे।1। जैसे अंजान नादान बालक (अपनी माँ का) दूध पी के तृप्त हैं जाता है, जैसे (कोई) कंगाल मनुष्य (प्राप्त हुआ) धन देख के सुख महिसूस करता है, जैसे कोई प्यासा ठण्डा पानी पी के (खुश होता है), वैसे ही (हे प्रभू ! अगर आपकी कृपा हैं तो) मेरा ये मन आपके चरणों में (आपके नाम जल से) भीग जीए (तो मुझे खुशी हो)।2। जिस प्रकार अंधेरे में दीपक प्रकाश करता है, जिस प्रकार पति से मिलाप की तमन्ना करते करते स्त्री की आस पूरी होती है, और अपने प्रीतम को मिल के उसके हृदय में आनंद पैदा होता है, ठीक उसी प्रकार (जिस पे प्रभू की मेहर हो उसका) मन प्रभू के प्रेम रंग में रंगा जाता है।3। हे नानक ! (कह) संतों ने मुझे परमातमा के (मिलाप के) रास्ते परडाल दिया है। कृपालु गुरू ने मुझे परमात्मा के चरणों में रहने की आदत डाल दी है। अब परमात्मा मेरा (आसरा बन गया है), मैं परमात्मा का (ही) सेवक (बन चुका) हूँ। गुरू ने मुझे सदा स्थिर रहने वाला सिफत-सालाह का शबद बख्श दिया है।4।14।21।
माझ महला 5 ॥
अंम्रित नामु सदा निरमलीआ ॥
सुखदाई दूख बिडारन हरीआ ॥
अवरि साद चखि सगले देखे मन हरि रसु सभ ते मीठा जीउ ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे मन ! उसका नाम आत्मिक जीवन देने वाला ऐसा जल है जो सदा ही साफ रहता है। जो परमात्मा (जीवों को) सुख देने वाला है और (जीवों के) दुख दूर करने की स्मर्था रखता है, हे मन ! (दुनिया के पदार्थों के) सार स्वाद चख के मैंने देख लिए हैं, परमात्मा के नाम का स्वाद और सभी से मीठा है।1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जब से) आपके संत जनों की धूड़ मेरे माथे पे लगी है, मेरी दुर-मति का नाश हो गया है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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