दुरमति बिनसी कुबुधि अभागी ॥
सच घरि बैसि रहे गुण गाए नानक बिनसे कूरा जीउ ॥4॥11॥18॥
विसरु नाही एवड दाते ॥
करि किरपा भगतन संगि राते ॥
दिनसु रैणि जिउ तुधु धिआई एहु दानु मोहि करणा जीउ ॥1॥
माटी अंधी सुरति समाई ॥
सभ किछु दीआ भलीआ जाई ॥
अनद बिनोद चोज तमासे तुधु भावै सो होणा जीउ ॥2॥
जिस दा दिता सभु किछु लैणा ॥
छतीह अंम्रित भोजनु खाणा ॥
सेज सुखाली सीतलु पवणा सहज केल रंग करणा जीउ ॥3॥
सा बुधि दीजै जितु विसरहि नाही ॥
सा मति दीजै जितु तुधु धिआई ॥
सास सास तेरे गुण गावा ओट नानक गुर चरणा जीउ ॥4॥12॥19॥
सिफति सालाहणु तेरा हुकमु रजाई ॥
सो गिआनु धिआनु जो तुधु भाई ॥
सोई जपु जो प्रभ जीउ भावै भाणै पूर गिआना जीउ ॥1॥
अंम्रितु नामु तेरा सोई गावै ॥ जो साहिब तेरै मनि भावै ॥
तूं संतन का संत तुमारे संत साहिब मनु माना जीउ ॥2॥
तूं संतन की करहि प्रतिपाला ॥
संत खेलहि तुम संगि गोपाला ॥
अपुने संत तुधु खरे पिआरे तू संतन के प्राना जीउ ॥3॥
उन संतन कै मेरा मनु कुरबाने ॥
जिन तूं जाता जो तुधु मनि भाने ॥
तिन कै संगि सदा सुखु पाइआ हरि रस नानक त्रिपति अघाना जीउ ॥4॥13॥20॥
तूं जलनिधि हम मीन तुमारे ॥
तेरा नामु बूंद हम चात्रिक तिखहारे ॥
तुमरी आस पिआसा तुमरी तुम ही संगि मनु लीना जीउ ॥1॥
जिउ बारिकु पी खीरु अघावै ॥
जिउ निरधनु धनु देखि सुखु पावै ॥
त्रिखावंत जलु पीवत ठंढा तिउ हरि संगि इहु मनु भीना जीउ ॥2॥
जिउ अंधिआरै दीपकु परगासा ॥
भरता चितवत पूरन आसा ॥
मिलि प्रीतम जिउ होत अनंदा तिउ हरि रंगि मनु रंगीना जीउ ॥3॥
संतन मो कउ हरि मारगि पाइआ ॥
साध क्रिपालि हरि संगि गिझाइआ ॥
हरि हमरा हम हरि के दासे नानक सबदु गुरू सचु दीना जीउ ॥4॥14॥21॥
अंम्रित नामु सदा निरमलीआ ॥
सुखदाई दूख बिडारन हरीआ ॥
अवरि साद चखि सगले देखे मन हरि रसु सभ ते मीठा जीउ ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जब से) आपके संत जनों की धूड़ मेरे माथे पे लगी है, मेरी दुर-मति का नाश हो गया है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।