अंग
99
माझ
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जीइ समाली ता सभु दुखु लथा ॥
जीइ समाली ता सभु दुखु लथा ॥
चिंता रोगु गई हउ पीड़ा आपि करे प्रतिपाला जीउ ॥2॥
बारिक वांगी हउ सभ किछु मंगा ॥
देदे तोटि नाही प्रभ रंगा ॥
पैरी पै पै बहुतु मनाई दीन दइआल गोपाला जीउ ॥3॥
हउ बलिहारी सतिगुर पूरे ॥
जिनि बंधन काटे सगले मेरे ॥
हिरदै नामु दे निरमल कीए नानक रंगि रसाला जीउ ॥4॥8॥15॥
चिंता रोगु गई हउ पीड़ा आपि करे प्रतिपाला जीउ ॥2॥
बारिक वांगी हउ सभ किछु मंगा ॥
देदे तोटि नाही प्रभ रंगा ॥
पैरी पै पै बहुतु मनाई दीन दइआल गोपाला जीउ ॥3॥
हउ बलिहारी सतिगुर पूरे ॥
जिनि बंधन काटे सगले मेरे ॥
हिरदै नामु दे निरमल कीए नानक रंगि रसाला जीउ ॥4॥8॥15॥
हिन्दी अर्थ: (उसकी मेहर से) जब मैं (परमात्मा का नाम अपने) हृदय में बसाता हूँ तो मेरा सारा दुख दूर हो जाता है। (मेरे अंदर से) चिंता का रोग दूर हो जाता है, मेरा अहंकार रूपी दुख दूर हो जाता है। (चिंता, अहं आदि से) परमात्मा स्वयं ही मेरी रक्षा करता है।2। (गुरू की मति ले के परमात्मा के दर से) मैं नादान बालक की तरह हरेक चीज मांगता हूँ। वह सदा मुझे (मेरी मुंह मांगी चीजें) देता रहता है, और प्रभू की दी हुई चीजों से मुझे कभी कोई कमी नहीं आती। वह परमात्मा दीनों पर दया करने वाला है। सृष्टि के जीवों की पालना करने वाला है, मैं उसके चरणों में गिर गिर के सदा उसको मनाता रहता हूँ।3। मैं पूरे सतिगुरू से कुर्बान जाता हूँ, उसने मेरे सारे माया के बंधन तोड़ दिए हैं। हे नानक ! गुरू ने जिनके हृदय में परमात्मा का नाम दे के, पवित्र जीवन वाला बना दिया है, वह प्रभू के प्रेम में लीन हो के आत्मिक आनंद का घर बन जाते हैं।4।8।15।
लाल गोपाल दइआल रंगीले ॥
माझ महला 5 ॥
लाल गोपाल दइआल रंगीले ॥
गहिर गंभीर बेअंत गोविंदे ॥
ऊच अथाह बेअंत सुआमी सिमरि सिमरि हउ जीवां जीउ ॥1॥
दुख भंजन निधान अमोले ॥
निरभउ निरवैर अथाह अतोले ॥
अकाल मूरति अजूनी संभौ मन सिमरत ठंढा थीवां जीउ ॥2॥
सदा संगी हरि रंग गोपाला ॥
ऊच नीच करे प्रतिपाला ॥
नामु रसाइणु मनु त्रिपताइणु गुरमुखि अंम्रितु पीवां जीउ ॥3॥
दुखि सुखि पिआरे तुधु धिआई ॥
एह सुमति गुरू ते पाई ॥
नानक की धर तूंहै ठाकुर हरि रंगि पारि परीवां जीउ ॥4॥9॥16॥
लाल गोपाल दइआल रंगीले ॥
गहिर गंभीर बेअंत गोविंदे ॥
ऊच अथाह बेअंत सुआमी सिमरि सिमरि हउ जीवां जीउ ॥1॥
दुख भंजन निधान अमोले ॥
निरभउ निरवैर अथाह अतोले ॥
अकाल मूरति अजूनी संभौ मन सिमरत ठंढा थीवां जीउ ॥2॥
सदा संगी हरि रंग गोपाला ॥
ऊच नीच करे प्रतिपाला ॥
नामु रसाइणु मनु त्रिपताइणु गुरमुखि अंम्रितु पीवां जीउ ॥3॥
दुखि सुखि पिआरे तुधु धिआई ॥
एह सुमति गुरू ते पाई ॥
नानक की धर तूंहै ठाकुर हरि रंगि पारि परीवां जीउ ॥4॥9॥16॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे प्यारे प्रभू ! हे सृष्टि के रखवाले ! हे दया के घर ! हे आनंद के श्रोत ! हे गहरे और बड़े जिगरे वाले ! हे बेअंत गोबिंद ! हे सबसे ऊँचे अथाह और बेअंत प्रभू ! हे स्वामी ! (आपकी मेहर से आपका नाम) सिमर सिमर के मैं आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ।11 हे (जीवों के) दुखों के नाश करने वाले ! हे कीमती पदार्थों के खजाने ! हे निडर निर्वैर अथाह और अतोल प्रभू ! आपकी हस्ती मौत से रहित है, आप योनियों में नहीं आते, और अपने आप से ही प्रगट होते हैं। (आपका नाम) मन में सिमर सिमर के मैं शांत चित्त हो जाता हूँ।2। परमात्मा (अपनी) सृष्टि की पालणा करने वाला है, सदा सभ जीवों के अंग-संग रहता है और सब सुख देने वाला है। (जगत में) उच्च कहलाने वाले और नीच कहलाने वाले सभी जीवों की पालना करता है। परमात्मा का नाम सब रसों का श्रोत है (जीवों के) मन को (माया की तृष्णा से) तृप्त करने वाला है। गुरू की शरण पड़ कर आत्मिक जीवन देने वाले उस नाम रस को मैं पीता रहता हूँ।3। हे प्यारे प्रभू ! दुख में (फंसा होऊँ, चाहे) सुख में (बस रहा होऊं), मैं सदा आपको ही ध्याता हूँ (आपका ही ध्यान धरता हूँ) - ये अच्छी अक्ल मैंने (अपने) गुरू से ली है। हे सबके पालणहार ! नानक का आसरा आप ही हैं। (हे भाई !) परमात्मा के प्रेम रंग में (लीन हो के ही) मैं (संसार समुंदर से) पार लांघ सकता हूँ।4।9।16।
धंनु सु वेला जितु मै सतिगुरु मिलिआ ॥
माझ महला 5 ॥
धंनु सु वेला जितु मै सतिगुरु मिलिआ ॥
सफलु दरसनु नेत्र पेखत तरिआ ॥
धंनु मूरत चसे पल घड़ीआ धंनि सु ओइ संजोगा जीउ ॥1॥
उदमु करत मनु निरमलु होआ ॥
हरि मारगि चलत भ्रमु सगला खोइआ ॥
नामु निधानु सतिगुरू सुणाइआ मिटि गए सगले रोगा जीउ ॥2॥
अंतरि बाहरि तेरी बाणी ॥
तुधु आपि कथी तै आपि वखाणी ॥
गुरि कहिआ सभु एको एको अवरु न कोई होइगा जीउ ॥3॥
अंम्रित रसु हरि गुर ते पीआ ॥
हरि पैनणु नामु भोजनु थीआ ॥
नामि रंग नामि चोज तमासे नाउ नानक कीने भोगा जीउ ॥4॥10॥17॥
धंनु सु वेला जितु मै सतिगुरु मिलिआ ॥
सफलु दरसनु नेत्र पेखत तरिआ ॥
धंनु मूरत चसे पल घड़ीआ धंनि सु ओइ संजोगा जीउ ॥1॥
उदमु करत मनु निरमलु होआ ॥
हरि मारगि चलत भ्रमु सगला खोइआ ॥
नामु निधानु सतिगुरू सुणाइआ मिटि गए सगले रोगा जीउ ॥2॥
अंतरि बाहरि तेरी बाणी ॥
तुधु आपि कथी तै आपि वखाणी ॥
गुरि कहिआ सभु एको एको अवरु न कोई होइगा जीउ ॥3॥
अंम्रित रसु हरि गुर ते पीआ ॥
हरि पैनणु नामु भोजनु थीआ ॥
नामि रंग नामि चोज तमासे नाउ नानक कीने भोगा जीउ ॥4॥10॥17॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (मेरी किस्मत से) वह समय भाग्यशाली (साबित हुआ) जिस समय मुझे सतिगुरू मिल गए, (गुरू का) दर्शन (मेरे वास्ते) फल दायक हो गया (क्योंकि इन) आँखों से (गुरू के) दर्शन करते ही मैं (विकारों के समुंदर से) पार लांघ गया। (सो मेरे वास्ते) वह महूरत, वह चसे, वह पल, वह घड़ीयां- वह (गुरू) मिलाप के समय सारे ही सौभाग्यशाली हैं।1। (गुरू द्वारा बताएकर्म सिमरन के वास्ते) उद्यम करते (मेरा) मन पवित्र हो गया है, (गुरू के द्वारा) प्रभू केरास्ते पर चलते हुए मेरी सारी भटकना समाप्त हो गयी है। गुरू ने मुझे (सारे गुणों का) खजाना प्रभू का नाम सुना दिया है (उसकी बरकति से) मेरे सारे (मानसिक) रोग दूर हो गए हैं। (इस वास्ते अब मुझे) अंदर बाहर (सब जीवों में) आपकी ही बाणी सुनाई दे रही है (हरेक में आप ही बोलते प्रतीत हो रहे हैं। मुझे ये दृढ़ हो गया है कि हरेक जीव में) आप स्वयं ही कथन कर रहे हैं, आप स्वयं ही व्याख्यान कर रहे हैं (हे प्रभू !) गुरू ने मुझे बताया है कि हर जगह एक आप ही आप हैं, आपके बराबर का और कोई भी (ना हुआ है ना है और) ना ही होगा।3। परमात्मा के नाम रस का स्वाद मुझे गुरू के पास से प्राप्त हुआ है। अब परमात्मा का नाम ही मेरा खाना पीना है और नाम ही मेरा हंडाना है। हे नानक ! (कह) प्रभू नाम में जुड़े रहना ही मेरे वास्ते दुनिया की सारी खुशियां हैं। नाम में जुड़े रहना ही मेरे वास्ते दुनिया के रंग तमाशे हैं। प्रभू नाम में ही मेरे वास्ते दुनिया के भोग विलास हैं।4।10।17।
सगल संतन पहि वसतु इक मांगउ ॥
माझ महला 5 ॥
सगल संतन पहि वसतु इक मांगउ ॥
करउ बिनंती मानु तिआगउ ॥
वारि वारि जाई लख वरीआ देहु संतन की धूरा जीउ ॥1॥
तुम दाते तुम पुरख बिधाते ॥
तुम समरथ सदा सुखदाते ॥
सभ को तुम ही ते वरसावै अउसरु करहु हमारा पूरा जीउ ॥2॥
दरसनि तेरै भवन पुनीता ॥
आतम गड़ु बिखमु तिना ही जीता ॥
तुम दाते तुम पुरख बिधाते तुधु जेवडु अवरु न सूरा जीउ ॥3॥
सगल संतन पहि वसतु इक मांगउ ॥
करउ बिनंती मानु तिआगउ ॥
वारि वारि जाई लख वरीआ देहु संतन की धूरा जीउ ॥1॥
तुम दाते तुम पुरख बिधाते ॥
तुम समरथ सदा सुखदाते ॥
सभ को तुम ही ते वरसावै अउसरु करहु हमारा पूरा जीउ ॥2॥
दरसनि तेरै भवन पुनीता ॥
आतम गड़ु बिखमु तिना ही जीता ॥
तुम दाते तुम पुरख बिधाते तुधु जेवडु अवरु न सूरा जीउ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे प्रभू !) आपका भजन करने वाले सारे लोगों से मैं आपका नाम पदार्थ ही मांगता हूँ। और (उनके आगे) बिनती करता हूं (कि किसी तरह) मैं (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर सकूँ। हे प्रभू ! मैं लाखों बार (संतों के) सदके कुर्बान जाता हूँ, मुझे अपने संतों की धूड़ बख्श।1। हे प्रभू ! आप सब जीवों को पैदा करने वाले हैं। आप ही सब में व्यापक हैं। और, आप ही सब जीवों को दातें देने वाले हैं। हे प्रभू ! आप सारी ताकतों के मालिक हैं, आप ही सारे सुख देने वाले हैं। हरेक जीव आपसे ही मुरादें पाता है (मैं भी आपसे ये मांग मांगता हूँ कि अपने नाम की दाति दे के) मेरा मानस जन्म का समय कामयाब कर।2। हे प्रभू ! (जिन लोगों ने) आपके दर्शन (की बरकति) से अपने शरीर रूपी नगर को पवित्र कर लिया है, उन्होंने इस मुश्किल मन रूपी किले पर विजय प्राप्त की है। हे प्रभू ! आप ही सबको दातें देने वाले हैं। आप ही सबमें व्यापक हैं। आप ही सबको पैदा करने वाले हैं। आपके बराबर का और कोई सूरमा नहीं।3।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।