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अंग 99

अंग
99
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जीइ समाली ता सभु दुखु लथा ॥
चिंता रोगु गई हउ पीड़ा आपि करे प्रतिपाला जीउ ॥2॥
बारिक वांगी हउ सभ किछु मंगा ॥
देदे तोटि नाही प्रभ रंगा ॥
पैरी पै पै बहुतु मनाई दीन दइआल गोपाला जीउ ॥3॥
हउ बलिहारी सतिगुर पूरे ॥
जिनि बंधन काटे सगले मेरे ॥
हिरदै नामु दे निरमल कीए नानक रंगि रसाला जीउ ॥4॥8॥15॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (उसकी मेहर से) जब मैं (परमात्मा का नाम अपने) हृदय में बसाता हूँ तो मेरा सारा दुख दूर हो जाता है। (मेरे अंदर से) चिंता का रोग दूर हो जाता है, मेरा अहंकार रूपी दुख दूर हो जाता है। (चिंता, अहं आदि से) परमात्मा स्वयं ही मेरी रक्षा करता है।2। (गुरू की मति ले के परमात्मा के दर से) मैं नादान बालक की तरह हरेक चीज मांगता हूँ। वह सदा मुझे (मेरी मुंह मांगी चीजें) देता रहता है, और प्रभू की दी हुई चीजों से मुझे कभी कोई कमी नहीं आती। वह परमात्मा दीनों पर दया करने वाला है। सृष्टि के जीवों की पालना करने वाला है, मैं उसके चरणों में गिर गिर के सदा उसको मनाता रहता हूँ।3। मैं पूरे सतिगुरू से कुर्बान जाता हूँ, उसने मेरे सारे माया के बंधन तोड़ दिए हैं। हे नानक ! गुरू ने जिनके हृदय में परमात्मा का नाम दे के, पवित्र जीवन वाला बना दिया है, वह प्रभू के प्रेम में लीन हो के आत्मिक आनंद का घर बन जाते हैं।4।8।15।
माझ महला 5 ॥
लाल गोपाल दइआल रंगीले ॥
गहिर गंभीर बेअंत गोविंदे ॥
ऊच अथाह बेअंत सुआमी सिमरि सिमरि हउ जीवां जीउ ॥1॥
दुख भंजन निधान अमोले ॥
निरभउ निरवैर अथाह अतोले ॥
अकाल मूरति अजूनी संभौ मन सिमरत ठंढा थीवां जीउ ॥2॥
सदा संगी हरि रंग गोपाला ॥
ऊच नीच करे प्रतिपाला ॥
नामु रसाइणु मनु त्रिपताइणु गुरमुखि अंम्रितु पीवां जीउ ॥3॥
दुखि सुखि पिआरे तुधु धिआई ॥
एह सुमति गुरू ते पाई ॥
नानक की धर तूंहै ठाकुर हरि रंगि पारि परीवां जीउ ॥4॥9॥16॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे प्यारे प्रभू ! हे सृष्टि के रखवाले ! हे दया के घर ! हे आनंद के श्रोत ! हे गहरे और बड़े जिगरे वाले ! हे बेअंत गोबिंद ! हे सबसे ऊँचे अथाह और बेअंत प्रभू ! हे स्वामी ! (आपकी मेहर से आपका नाम) सिमर सिमर के मैं आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ।11 हे (जीवों के) दुखों के नाश करने वाले ! हे कीमती पदार्थों के खजाने ! हे निडर निर्वैर अथाह और अतोल प्रभू ! आपकी हस्ती मौत से रहित है, आप योनियों में नहीं आता, और अपने आप से ही प्रगट होता है। (आपका नाम) मन में सिमर सिमर के मैं शांत चित्त हैं जाता हूँ।2। परमात्मा (अपनी) सृष्टि की पालणा करने वाला है, सदा सभ जीवों के अंग-संग रहता है और सब सुख देने वाला है। (जगत में) उच्च कहलाने वाले और नीच कहलाने वाले सभी जीवों की पालना करता है। परमात्मा का नाम सब रसों का श्रोत है (जीवों के) मन को (माया की तृष्णा से) तृप्त करने वाला है। गुरू की शरण पड़ कर आत्मिक जीवन देने वाले उस नाम रस को मैं पीता रहता हूँ।3। हे प्यारे प्रभू ! दुख में (फंसा होऊँ, चाहे) सुख में (बस रहा होऊं), मैं सदा आपको ही ध्याता हूँ (आपका ही ध्यान धरता हूँ) – ये अच्छी अक्ल मैंने (अपने) गुरू से ली है। हे सबके पालणहार ! नानक का आसरा आप ही है। (हे भाई !) परमात्मा के प्रेम रंग में (लीन हो के ही) मैं (संसार समुंदर से) पार लांघ सकता हूँ।4।9।16।
माझ महला 5 ॥
धंनु सु वेला जितु मै सतिगुरु मिलिआ ॥
सफलु दरसनु नेत्र पेखत तरिआ ॥
धंनु मूरत चसे पल घड़ीआ धंनि सु ओइ संजोगा जीउ ॥1॥
उदमु करत मनु निरमलु होआ ॥
हरि मारगि चलत भ्रमु सगला खोइआ ॥
नामु निधानु सतिगुरू सुणाइआ मिटि गए सगले रोगा जीउ ॥2॥
अंतरि बाहरि तेरी बाणी ॥
तुधु आपि कथी तै आपि वखाणी ॥
गुरि कहिआ सभु एको एको अवरु न कोई होइगा जीउ ॥3॥
अंम्रित रसु हरि गुर ते पीआ ॥
हरि पैनणु नामु भोजनु थीआ ॥
नामि रंग नामि चोज तमासे नाउ नानक कीने भोगा जीउ ॥4॥10॥17॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (मेरी किस्मत से) वह समय भाग्यशाली (साबित हुआ) जिस समय मुझे सतिगुरू मिल गए, (गुरू का) दर्शन (मेरे वास्ते) फल दायक हो गया (क्योंकि इन) आँखों से (गुरू के) दर्शन करते ही मैं (विकारों के समुंदर से) पार लांघ गया। (सो मेरे वास्ते) वह महूरत, वह चसे, वह पल, वह घड़ीयां- वह (गुरू) मिलाप के समय सारे ही सौभाग्यशाली हैं।1। (गुरू द्वारा बताएकर्म सिमरन के वास्ते) उद्यम करते (मेरा) मन पवित्र हो गया है, (गुरू के द्वारा) प्रभू केरास्ते पर चलते हुए मेरी सारी भटकना समाप्त हो गयी है। गुरू ने मुझे (सारे गुणों का) खजाना प्रभू का नाम सुना दिया है (उसकी बरकति से) मेरे सारे (मानसिक) रोग दूर हो गए हैं। (इस वास्ते अब मुझे) अंदर बाहर (सब जीवों में) आपकी ही बाणी सुनाई दे रही है (हरेक में आप ही बोलता प्रतीत हैं रहा है। मुझे ये दृढ़ हैं गया है कि हरेक जीव में) आप स्वयं ही कथन कर रहा है, आप स्वयं ही व्याख्यान कर रहा है (हे प्रभू !) गुरू ने मुझे बताया है कि हर जगह एक आप ही आप है, आपके बराबर का और कोई भी (ना हुआ है ना है और) ना ही होंगे।3। परमात्मा के नाम रस का स्वाद मुझे गुरू के पास से प्राप्त हुआ है। अब परमात्मा का नाम ही मेरा खाना पीना है और नाम ही मेरा हंडाना है। हे नानक ! (कह) प्रभू नाम में जुड़े रहना ही मेरे वास्ते दुनिया की सारी खुशियां हैं। नाम में जुड़े रहना ही मेरे वास्ते दुनिया के रंग तमाशे हैं। प्रभू नाम में ही मेरे वास्ते दुनिया के भोग विलास हैं।4।10।17।
माझ महला 5 ॥
सगल संतन पहि वसतु इक मांगउ ॥
करउ बिनंती मानु तिआगउ ॥
वारि वारि जाई लख वरीआ देहु संतन की धूरा जीउ ॥1॥
तुम दाते तुम पुरख बिधाते ॥
तुम समरथ सदा सुखदाते ॥
सभ को तुम ही ते वरसावै अउसरु करहु हमारा पूरा जीउ ॥2॥
दरसनि तेरै भवन पुनीता ॥
आतम गड़ु बिखमु तिना ही जीता ॥
तुम दाते तुम पुरख बिधाते तुधु जेवडु अवरु न सूरा जीउ ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे प्रभू !) आपका भजन करने वाले सारे लोगों से मैं आपका नाम पदार्थ ही मांगता हूँ। और (उनके आगे) बिनती करता हूं (कि किसी तरह) मैं (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर सकूँ। हे प्रभू ! मैं लाखों बार (संतों के) सदके कुर्बान जाता हूँ, मुझे अपने संतों की धूड़ बख्श।1। हे प्रभू ! आप सब जीवों को पैदा करने वाला है। आप ही सब में व्यापक है। और, आप ही सब जीवों को दातें देने वाला है। हे प्रभू ! आप सारी ताकतों का मालिक है, आप ही सारे सुख देने वाला है। हरेक जीव आपसे ही मुरादें पाता है (मैं भी आपसे ये मांग मांगता हूँ कि अपने नाम की दाति दे के) मेरा मानस जन्म का समय कामयाब कर।2। हे प्रभू ! (जिन लोगों ने) आपके दर्शन (की बरकति) से अपने शरीर रूपी नगर को पवित्र कर लिया है, उन्होंने इस मुश्किल मन रूपी किले पर विजय प्राप्त की है। हे प्रभू ! आप ही सबको दातें देने वाला है। आप ही सबमें व्यापक है। आप ही सबको पैदा करने वाला है। आपके बराबर का और कोई सूरमा नहीं।3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(उसकी मेहर से) जब मैं (परमात्मा का नाम अपने) हृदय में बसाता हूँ तो मेरा सारा दुख दूर हो जाता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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