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भगीरथ: सर्वत्याग से गंगावतरण तक

कथा · 37

भगीरथ: सर्वत्याग से गंगावतरण तक

भगीरथ अपने गुरु से आत्मस्वरूप का विवेचन सुनकर स्वीकार करते हैं कि उनकी समझ अभी स्थिर नहीं हुई है। गुरु त्रितल उन्हें धन, राज्य, प्रतिष्ठा और देह और मन के अभिमान तक छोड़ने का मार्ग दिखाते हैं। इसी साधना से वे अधिकार को स्वामित्व के बिना ग्रहण करने और गंगा के अवतरण के लिए अनेक वर्षों तक उपासना करने योग्य बनते हैं।

समृद्धि के भीतर उठा प्रश्न

वसिष्ठ ने श्रीराम के सामने भगीरथ को ऐसे राजा के रूप में रखा, जिनकी आन्तरिक शान्ति ने एक अत्यन्त कठिन कार्य को सम्भव किया। उनकी आरम्भिक प्रभुता समुद्रों सहित सारी पृथ्वी पर प्रतिष्ठित थी। वे प्रजा की रक्षा करते, आक्रमणकारियों को रोकते, योग्य लोगों का सम्मान करते और याचकों को उनकी आवश्यकता के अनुसार देते थे। अनुकूल और प्रतिकूल घटनाओं के बीच उनका व्यवहार सन्तुलित रहता था।

गंगा का पृथ्वी पर अवतरण आगे चलकर उनके नाम की सबसे बड़ी पहचान बना। उस उपलब्धि से पहले वसिष्ठ ने वह प्रश्न बताया, जो युवा भगीरथ के मन में राजसी समृद्धि के बीच उठा था।

राजा ने देखा कि एक दिन के बाद दूसरा दिन आता है। प्रभात और रात्रि लौटते हैं। लोग देते, लेते, खाते, काम करते, इच्छा करते और फिर उसी क्रम में लग जाते हैं। सफल कर्म भी किसी अगली वस्तु की चाह या उसके छिन जाने की आशंका को जन्म देता है।

भगीरथ ने विचार किया कि जिस उपलब्धि के बाद फिर किसी दूसरी उपलब्धि की आवश्यकता बनी रहे, वह अन्तिम कल्याण कैसे दे सकती है। इसी व्यवस्था के भीतर वृद्धावस्था और मृत्यु उपस्थित थीं। उनसे ध्यान हटाने वाले भोगों का प्रभाव भी क्षणिक था।

वे अपने गुरु त्रितल के पास गए और प्रश्न रखा। उन्होंने पूछा, “वृद्धावस्था, मृत्यु, आसक्ति और मोह का दुःख कैसे समाप्त होता है? बार-बार नष्ट हो जाने वाले सुखों के रिक्त परिणाम से मन को कौन मुक्त कर सकता है?”

त्रितल ने आत्मा को सदा उपस्थित, अविनाशी और वस्तुओं के जन्म तथा क्षय से अछूता बताया। प्रत्यक्ष ज्ञान उस गाँठ को खोलता है, जो चैतन्य को जड़ शरीर, सम्पत्ति और पद से बाँध देती है। ज्ञाता और ज्ञेय का भ्रम दूर होने पर संशय शान्त होने लगता है।

भगीरथ ने ध्यान से सुना। उन्होंने कहा, “मैं समझता हूँ कि शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन और बुद्धि सभी चैतन्य में जाने जाते हैं। यह निश्चय मुझमें है, फिर भी मैं, जो इतनी भूलों से भरा हूँ, वही चैतन्य कैसे हूँ? और यदि वही हूँ, तो वह मुझमें उतना प्रत्यक्ष क्यों नहीं है? चित्त का यह विक्षेप कैसे समाप्त हो?”

उनकी स्वीकारोक्ति से संवाद की दिशा बदल गई। राजा को कोई और सुन्दर सिद्धान्त नहीं चाहिए था। वे जानना चाहते थे कि समझा हुआ सत्य जीवन और आचरण का स्थिर आधार कैसे बने।

त्रितल ने बची हुई सीमा दिखाई

त्रितल ने उन्हें एकान्त, निरन्तर आत्मविचार और प्रिय अथवा अप्रिय घटना आने पर समता का अभ्यास करने को कहा। वस्तुओं और सम्बन्धों से अधिकार-बुद्धि हटानी थी तथा विवेक को दुर्बल करने वाली संगति से दूर रहना था।

मुख्य काम “मैं” और “मेरा” की भावना से जुड़ा था। भगीरथ ने पूछा कि पर्वत पर जमे पुराने वृक्ष जैसी गहरी अहंवृत्ति कैसे हटेगी। त्रितल ने उत्तर दिया कि आत्मा की बार-बार पहचान, नियमित अभ्यास और इच्छा का त्याग उसकी जड़ों को क्षीण करेगा।

फिर गुरु ने शिक्षा को जीवन की ठोस स्थितियों से जोड़ा। लोकसम्मान की चिन्ता अभी राजा की पहचान की रक्षा कर रही थी। त्रितल ने कहा कि जब तक हम अपनी दरिद्रता की लज्जा और दूसरों के तिरस्कार के भय के इस दुखदायी कारागार को तोड़ने का साहस नहीं जुटाते, तब तक अहंकार का ही राज रहता है। दरिद्रता संसारी के लिए लज्जा है और संत के लिए आभूषण।

त्रितल ने राज्य और धन छोड़ने का निर्देश दिया। राजा कहलाने की माँग समाप्त करनी थी। शत्रुओं के बीच दरिद्र और शक्तिहीन होकर, भिक्षा पर जीते हुए भी, उन्हें मन के गर्व और देह के अभिमान से रहित रहना था।

इस शिक्षा की परीक्षा प्रत्यक्ष आचरण में होनी थी। भगीरथ को अधिकार के बिना पूर्व प्रजा के सामने जाना था, राजपद की सुरक्षा के बिना शत्रुओं के बीच खड़ा होना था और राजकोष के सहारे के बिना भूख का सामना करना था। प्रत्येक स्थिति दिखाती कि पुरानी स्वामित्व-बुद्धि अभी कितनी सक्रिय है।

गुरु के मुख से यह उपदेश सुनकर भगीरथ ने अपना निश्चय कर लिया और कुछ दिन उसकी योजना बनाने में लगाए। उचित अवसर आने पर उन्होंने अग्निष्टोम यज्ञ आरम्भ किया और उसे सम्पूर्ण दान का माध्यम बनाया।

तीन दिनों में सम्पूर्ण दान

उन्होंने अपनी गौएँ, भूमि, घोड़े, रत्न और अपार धन, पात्र और अपात्र का विचार किए बिना, द्विजों और बन्धुओं को दे दिए। तीन दिनों तक वे खुले हाथ देते रहे, यहाँ तक कि उनके पास प्राण और अस्थियों के सिवा कुछ न बचा।

उन्होंने श्रेष्ठ वस्तुएँ भविष्य में अपना पद लौटाने के लिए सुरक्षित नहीं रखीं। दान तब तक चलता रहा, जब तक कोष, वाहन, पशुधन, अलंकार और राजचिह्न सब चले नहीं गए। फिर उन्होंने अपना विशाल राज्य तिनके की तरह पड़ोसी शत्रुओं को सौंप दिया, जिससे प्रजा और नागरिक बहुत दुखी हुए।

शत्रु ने उनके प्रदेश और राजमहल पर अधिकार कर लिया। तब केवल अधोवस्त्र बाँधे भगीरथ राजसी साधन, सेवक और दान की हुई वस्तुओं पर दावा किए बिना राज्य से बाहर निकलते हैं।

वे दूर के वनों और गाँवों में घूमे, जहाँ कोई उनका मुख नहीं पहचानता था। अनाम जीवन में वह आदर समाप्त हो गया, जो युवावस्था से उनके आगे चलता आया था। भोजन, आश्रय और मार्ग अब आदेश देकर प्राप्त नहीं किए जा सकते थे।

यात्रा के साथ प्रबल इच्छाएँ शान्त होने लगीं। भगीरथ ने देखा कि साधारण व्यवस्था से शरीर का निर्वाह हो सकता है और राजसी सम्मान खोने से वह चेतना कम नहीं होती, जिसमें खोना जाना जाता है।

घूमते हुए वे अपनी पुरानी राजधानी में लौट आए। अब शत्रु राजा वहाँ शासन करता था और जिन लोगों ने कभी भगीरथ को सिंहासन पर देखा था, उन्होंने उन्हें भिक्षुक के रूप में नगर में आते देखा।

उन्होंने घरों, नागरिकों और मन्त्रियों के यहाँ क्रम से भिक्षा माँगी। लोगों ने उन्हें पहचानकर सम्मान दिया। राज करने वाला शत्रु स्वयं उनसे मिलने आया और राज्य फिर ग्रहण करने की प्रार्थना की। भगीरथ ने केवल उस दिन का भोजन स्वीकार किया। कुछ दिन बाद वे नगर से फिर चले गए।

इस घटना ने लोकसम्मान से सम्बन्धित त्रितल की शिक्षा को व्यवहार में स्पष्ट किया। भगीरथ उन लोगों के बीच खड़े हो सके, जो उनका राजपद याद करते थे। उन्होंने उनका स्नेह ग्रहण किया और पुरानी पहचान को फिर स्थापित करने के लिए उसका उपयोग किए बिना आगे बढ़ गए।

गुरु के साथ यात्रा

कुछ समय बाद भगीरथ को त्रितल मिले। गुरु और शिष्य ने परस्पर सम्मान से अभिवादन किया और अधिकारपूर्ण दूरी बनाए बिना साथ यात्रा आरम्भ की। वे पर्वतों, वनों, गाँवों और नगरों से होकर घूमते रहे।

दोनों शरीर को पुराने अभ्यास और शेष प्रारब्ध के अनुसार चलने देते थे। उसे अनन्त समय तक सुरक्षित रखने की विशेष चेष्टा नहीं करते थे और समय से पहले छोड़ने का प्रयत्न भी नहीं करते थे। उनकी यात्रा ने शिक्षा को प्रतिदिन की स्थितियों में जाँचने का अवसर दिया।

धन और सम्पत्ति, घोड़े और पशुधन, यहाँ तक कि अणिमा से आरम्भ होने वाली आठ योगसिद्धियाँ भी उनके सन्तोष के आगे सड़े तिनकों जैसी थीं।

भगीरथ और त्रितल ने इन सबको उसी शान्ति से देखा, जिससे वे साधारण सुविधा को देखते थे। वे शक्ति और इन्द्रियसुख को बढ़ा सकते थे। भगीरथ के आरम्भिक प्रश्न का अन्तिम कल्याण उनमें उपलब्ध नहीं था।

यात्रा करते हुए वे एक दूसरे राज्य में पहुँचे, जहाँ राजा की सन्तान नहीं थी और उसकी मृत्यु हो चुकी थी। मन्त्री तथा नागरिक व्यवस्था सँभालने योग्य व्यक्ति की खोज कर रहे थे।

उन्होंने भगीरथ को भिक्षा माँगते हुए पाया। लोगों ने उन्हें राजा भगीरथ के रूप में पहचाना और अपनी सेना के साथ उन्हें राजा बनाने ले गए। विधिपूर्वक अभिषेक करके रिक्त सिंहासन पर बैठा दिया।

भगीरथ ने पहले अपना राज्य स्वयं छोड़ा था। यह दूसरा राज्य बिना माँगे उनके सामने आया। उन्होंने इसे व्यक्तिगत लाभ या पुराने नुकसान की भरपाई माने बिना लोक-रक्षा का दायित्व समझकर स्वीकार किया।

दो राज्यों की वापसी

कुछ समय बाद भगीरथ के पहले राज्य पर जिसे शासन मिला था, उसकी मृत्यु हो गई। उनके पुराने राज्य की प्रजा आदरपूर्वक उनके पास आई। उन्होंने अपने पुराने राजा से लौटकर उनकी रक्षा करने की प्रार्थना की।

भगीरथ ने पहले उस राज्य को तब अस्वीकार किया था, जब उसकी वापसी पुरानी पहचान की इच्छा पूरी कर सकती थी। अब वही राज्य सार्वजनिक आवश्यकता के रूप में उनके सामने था और वे पहले से एक दूसरे राज्य का अनायास मिला दायित्व निभा रहे थे। उन्होंने पुराना राज्य भी स्वीकार कर लिया।

उनका शासन उन सभी प्रदेशों में फैला, जिन्हें लोगों ने उनकी देखभाल में सौंपा था, और उनकी प्रभुता सात समुद्रों से चिह्नित पृथ्वी पर प्रतिष्ठित हुई। वे सत्य, संयमित वाणी और स्पर्धा से मुक्त होकर राज्य चलाते रहे। राजकीय कर्म फिर आरम्भ हुआ, पर उसकी प्रेरणा में स्वामित्व की बेचैनी नहीं थी।

इसी समय उन्हें अपने पूर्वजों की अधूरी कथा ज्ञात हुई। सगर के वंश के उन राजकुमारों ने समुद्र का तट खोदा था और कपिल मुनि के शाप से धरती के नीचे भस्म हो गए थे।

उनकी मुक्ति के लिए स्वर्ग की गंगा का जल आवश्यक था। इस कार्य में पूर्वजों का दायित्व पृथ्वी, समुद्र और पाताल से जुड़े व्यापक प्रयोजन में बदल गया। भगीरथ ने शासन योग्य मन्त्रियों को सौंपा और अकेले एक निर्जन वन में चले गए।

गंगा के लिए दीर्घ तप

बहुत वर्षों और अनेक वर्षा ऋतुओं तक भगीरथ ने बार-बार ब्रह्मा, शिव और जह्नु की उपासना की। जिस दृढ़ता ने उन्हें दान, अनाम जीवन और फिर शासन तक पहुँचाया था, अब वही शक्ति अपने व्यक्तिगत कल्याण से अधिक व्यापक उद्देश्य में लगी।

उनकी उपासना से गंगा के स्वर्ग से उतरने का मार्ग बना। शिव ने नदी के प्रचण्ड वेग को ग्रहण किया और उनकी धारा पृथ्वी पर समुद्र की ओर चली। इस धारा को स्थापित करने के दीर्घ प्रयत्न में जह्नु की भूमिका भी सम्मिलित थी।

गंगा का जल पाताल से जुड़े पूर्वजों के प्रयोजन तक पहुँचा। कपिल के शाप से भस्म हुए सगरवंशियों को मुक्ति मिली और उनकी गति ब्रह्मलोक की ओर हुई। अगस्त्य के कारण जलहीन हुआ समुद्र भी भर गया।

इस प्रकार कथा में गंगा के तीन मार्ग सामने आते हैं: स्वर्ग, मर्त्यलोक और पाताल। भगीरथ के प्रयत्न ने उनकी पृथ्वी की धारा को स्थापित किया और समुद्र तक पहुँचाया। यह उपलब्धि राजा के निजी पुरस्कार तक सीमित नहीं रही।

त्रितल की शिक्षा अब अपने बताए प्रत्येक परीक्षण से गुजर चुकी थी। भगीरथ धन के बिना रहे, पुरानी प्रजा के बीच भिक्षा माँगी, राज्य की चाही जा सकने वाली वापसी अस्वीकार की, बिना माँगे मिले दो मुकुट स्वीकार किए और पूर्वजों के कर्तव्य के लिए उन्हें फिर मन्त्रियों को सौंप दिया।

उनकी आन्तरिक स्थिरता ने सार्वजनिक कर्म को समाप्त नहीं किया। उसी स्थिरता ने कर्म को फल पर अधिकार की माँग से मुक्त किया। गंगा का अवतरण इस समझ के जीवन में उतरने के बाद हुआ और महान कार्य पूरा होने पर भी राजा की शान्ति बनी रही।