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त्रिपुरा रहस्य

जनक की सभा में अष्टावक्र: जानने का नया प्रश्न

चुना हुआ पुनर्कथनपढ़ने में लगभग 14 मिनट4 पत्र

त्रिपुरा रहस्य · ज्ञानखण्ड

अष्टावक्र सभा में विजयी होते हैं। फिर एक तपस्विनी ऐसा प्रश्न रखती हैं जिसका उत्तर केवल विजय से नहीं मिलता।

सभा की पहली जीत

परशुराम ने दत्तात्रेय से कहा, “भगवन्, आपने जो समझाया, उस पर मैंने गहराई से विचार किया है। चैतन्य ही सबका आधार है, यह मेरी समझ में आ गया। पर आप यह भी कहते हैं कि वह जानने से परे है, क्योंकि वह स्वयं शुद्ध ज्ञान है। जो ज्ञान से परे हो, उसे पाया कैसे जाए? और उसे पाए बिना लक्ष्य सधता नहीं। लक्ष्य मुक्ति है; उसका स्वरूप क्या है? जीते-जी मुक्त हुआ जा सकता है तो मुक्त पुरुष का जीवन कैसे चलता है? ज्ञानी तो अनेक तरह के दिखते हैं: कोई कर्म में लगे हैं, कोई शास्त्र पढ़ाते हैं, कोई देवता पूजते हैं, कोई समाधि में डूबे रहते हैं, कोई कठोर व्रत से देह सुखाते हैं, कोई न्यायपूर्वक राज्य चलाते हैं, कोई दूसरे मतों से शास्त्रार्थ करते हैं, कोई अनजान बनकर रहते हैं, और कोई-कोई निन्दनीय काम भी करते दिखते हैं; फिर भी सब ज्ञानी कहलाते हैं। मुक्ति एक है तो जीवन में इतना भेद क्यों? या ज्ञान और मुक्ति की भी श्रेणियाँ हैं? कृपा करके यह सब समझाइए; आप ही मेरे एकमात्र गुरु हैं।”

दत्तात्रेय इन प्रश्नों से प्रसन्न हुए। “भार्गव, आप अब सही खोज की ओर मुड़े हैं; यह ईश्वर की कृपा है, क्योंकि बिना कृपा के कोई कुछ सार्थक नहीं पाता। आपने चैतन्य का स्वरूप ठीक समझा है, पर उसका अनुभव नहीं किया है। किसी वस्तु के गुण जान लेना, और स्वयं वस्तु का अनुभव न होना, न जानने जैसा ही है। आत्मा का सच्चा अनुभव वह है जहाँ ‘मैं हूँ’ का भान भी नहीं रहता; उसके बाद संसार कहाँ टिकेगा? सुनी-सुनाई जानकारी सपने की याद से बेहतर नहीं। सपने में मिला खज़ाना जैसे किसी काम का नहीं, वैसे ही दूसरे से मिला ज्ञान। मैं इसे एक बहुत पुराने प्रसंग से समझाता हूँ।”

विदेह देश में जनक राज्य करते थे, बुद्धिमान, इस लोक और परलोक दोनों के जानकार। एक बार उन्होंने यज्ञ के विधान से उस देवी की आराधना की जो आत्मा के रूप में सबके भीतर है। अवसर पर ब्राह्मण, पण्डित, तपस्वी, तार्किक, वेदज्ञ और यज्ञ के अधिकारी सब जुटे। उसी समय जल के देवता वरुण भी वैसा ही यज्ञ करना चाहते थे, पर योग्य विद्वानों ने उनका निमन्त्रण स्वीकार नहीं किया; जनक उनका यथोचित आदर करते थे, और वे जनक से प्रसन्न थे।

तब वरुण के पुत्र आए, जो बड़े वादी थे। जनक के ब्राह्मण अतिथियों को फँसाने के लिए उन्होंने ब्राह्मण का वेश धरा। राजसभा में प्रवेश करके उन्होंने राजा को विधिवत् आशीर्वाद दिया और सबके सामने कहा, “राजन्, आपकी सभा वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिए। यह कमल भरे सुन्दर सरोवर जैसी लगती है जिसे कौओं और बगुलों जैसे पक्षियों ने उजाड़ रखा है; इन अयोग्य लोगों की भीड़ के बिना यह अधिक अच्छी होती। मुझे यहाँ एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं दिखता जो इस महान सभा का वैसा आभूषण हो जैसा कमल के सरोवर का हंस। ईश्वर आपका भला करे। इन मूर्खों की भीड़ से मुझे कुछ लेना-देना नहीं।”

इस अपमान पर पूरी सभा एक साथ उठ खड़ी हुई। क्रोध में सबने कहा, “ढोंगी ब्राह्मण! यहाँ सबका अपमान करने का साहस कैसे हुआ? ऐसी कौन-सी विद्या आपके पास है जो हममें नहीं? दुष्ट, आप तो केवल डींग मारने वाले हैं! जब तक हम पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध न कर दें, यहाँ से जा नहीं सकते। यहाँ संसार भर के बड़े पण्डित जुटे हैं। क्या आप अपनी विद्या से इन सबको दबा लेंगे? बताइए, किस विषय में आप अपने को हमसे अधिक निपुण समझते हैं?”

वरुण के पुत्र ने शर्त रखी। “मैं क्षण भर में आप सबको वाद में हरा दूँगा, पर एक शर्त पर: मैं हारूँ तो आप मुझे समुद्र में फेंक दें, और आप हारें तो मैं आपको एक-एक करके समुद्र में डालूँ। शर्त स्वीकार हो तो वाद आरम्भ करें।” सभा ने शर्त मान ली, और वाद पूरी गम्भीरता से शुरू हुआ। प्रतिपक्षी के छल भरे तर्कों के आगे पण्डित जल्दी ही हारने लगे, और सैकड़ों की संख्या में समुद्र में डुबोए गए। वरुण के सेवक डूबे हुए पण्डितों को उठाकर अपने स्वामी के यज्ञ में ले गए, जहाँ उनका ऐसा आदर हुआ कि वे प्रसन्न हो गए।

डूबने वालों में कहोल भी थे। उनके पुत्र अष्टावक्र ने पिता का हाल सुना और दौड़े हुए जनक की सभा में आए। उन्होंने उस छल-निपुण वादी को चुनौती दी। इस बार वेशधारी हारे, और उस युवा ने उन्हें सीधे समुद्र का दण्ड सुनाया। तब वरुण के पुत्र ने सभा में अपना वेश उतार फेंका और समुद्र में डुबोए गए सब पुरुषों को लौटा दिया। कहोल के पुत्र अब अभिमान से फूल उठे और भरी सभा में उद्धत व्यवहार करने लगे। उस युवक के सामने पण्डितों को अपमान सहना पड़ा।

उसी समय उनके बीच एक तपस्विनी प्रकट हुईं। आहत सभा ने सहारे की आशा से उनकी ओर देखा, और उन्होंने उस आशा को बल दिया। जटाएँ बँधी हुईं, तपस्वी के वस्त्र, और मुख पर एक मनोहर आभा। राजा ने उनका बड़ा सम्मान किया। उन्होंने मीठे पर दृढ़ स्वर में कहा, “बच्चे, कहोल के पुत्र! आप सचमुच बड़े गुणी हैं; वरुण के पुत्र को वाद में हराकर आपने इन ब्राह्मणों को छुड़ाया है। मैं आपसे एक छोटा-सा प्रश्न पूछना चाहती हूँ। उत्तर सीधा दीजिए, स्पष्ट और बिना कुछ छिपाए। वह कौन-सी अवस्था है जिसे पाकर सब ओर से अमरता मिलती है, जिसे जानकर सब सन्देह और अनिश्चय मिट जाते हैं, और जिसमें स्थित होने पर सारी इच्छाएँ विलीन हो जाती हैं? यदि आपने उस असीम अवस्था का अनुभव किया है, तो मुझे सीधे बताइए।”

उत्तर में बची हुई गाँठ

कहोल के पुत्र ने पूरे आत्मविश्वास से उत्तर दिया। “मैं उसे जानता हूँ। सुनिए। संसार में ऐसा कुछ नहीं जो मुझे ज्ञात न हो। मैंने सारे शास्त्र बड़े यत्न से पढ़े हैं। आप जो पूछती हैं, वह विश्व का आदि और प्रधान कारण है; स्वयं आदि, मध्य और अन्त से रहित, देश और काल से अछूता। वह शुद्ध, अखण्ड, एक चैतन्य है। सारा संसार उसमें वैसे ही प्रकट होता है जैसे दर्पण में कोई नगर। यही वह पार की अवस्था है। उसे पाकर मनुष्य अमर होता है; सन्देह और अनिश्चय के लिए वहाँ जगह नहीं, क्योंकि अनगिनत प्रतिबिम्बों को देख लेने पर अज्ञान का कारण नहीं बचता; और इच्छा के लिए भी जगह नहीं, क्योंकि तब पार का अनुभव हो चुका होता है। वह अज्ञेय भी है, क्योंकि उसके सिवा उसे जानने वाला कोई नहीं। तपस्विनी, शास्त्रों में जो सत्य है, वह मैंने आपको कह दिया।”

अष्टावक्र चुप हुए तो तपस्विनी फिर बोलीं। “युवा ऋषि, आपने जो कहा, ठीक कहा; सब इसे मानते हैं। पर मैं आपके उत्तर के उस अंश की ओर ध्यान दिलाती हूँ जहाँ आपने इसे अज्ञेय माना, क्योंकि चैतन्य के बाहर कोई जानने वाला नहीं; और साथ ही कहा कि इसका ज्ञान अमरता और पूर्णता देता है। इन दो बातों का मेल कैसे बैठे? या तो मानिए कि चैतन्य अज्ञेय है, आपको ज्ञात नहीं, और इस तरह उसका न होना स्वीकार कीजिए; या कहिए कि वह है, और आप उसे जानते हैं, तब वह अज्ञेय नहीं रहा। साफ़ है कि आप शास्त्रों से बटोरी हुई सुनी-सुनाई बात कह रहे हैं। आपने उसका अनुभव नहीं किया, इसलिए यह ज्ञान आपका अपना नहीं। सोचिए, आपके शब्दों का अर्थ यह निकलता है कि आपको प्रतिबिम्बों का तो अपना ज्ञान है, पर दर्पण का नहीं। यह कैसे हो सकता है? अब बताइए, राजा जनक और उनकी सभा के सामने इस टालमटोल पर आपको लज्जा नहीं आती?”

इस फटकार पर अष्टावक्र कुछ देर बोल न सके। अपमान और लज्जा से उनका सिर झुक गया, और वे वहीं सोचते रहे। पर उन्हें कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं सूझा। तब उन्होंने पूरी नम्रता से कहा, “तपस्विनी, सच है, आपके प्रश्न का उत्तर मुझे नहीं मिलता। मैं शिष्य होकर आपकी शरण में हूँ। कृपया बताइए कि शास्त्र के ये दो वचन कैसे मिलते हैं। पर इतना विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने जानबूझकर झूठ नहीं कहा; मैं जानता हूँ कि झूठ बोलने वाले के सारे पुण्य उसके झूठ से कट जाते हैं और वह अयोग्य ठहरता है।”

अष्टावक्र की सच्चाई से तपस्विनी प्रसन्न हुईं और पूरी सभा के सुनते हुए बोलीं। “बच्चे, बहुत लोग इस उत्तम सत्य से अनजान रहकर भ्रम में जीते हैं। सूखे वाद-विवाद से कोई सत्य तक नहीं पहुँचता; वह चारों ओर से सुरक्षित है। यहाँ जितने लोग जुटे हैं, उनमें राजा और मेरे सिवा किसी ने सत्य का अनुभव नहीं किया। यह चर्चा का विषय नहीं है। तीखे से तीखा तर्क उसके पास तक जा सकता है, उसे पा नहीं सकता। तर्क और पैनी बुद्धि उस पर असर नहीं करते; गुरु की सेवा और ईश्वर की कृपा से उसका अनुभव होता है। ऋषि के पुत्र, ध्यान से सुनिए, क्योंकि समझाने पर भी यह समझ में कठिनाई से आता है। इसे हज़ार बार सुन लेना व्यर्थ है, जब तक एकाग्र मन से आत्मा की खोज करके सुनी हुई बात को स्वयं परख न लिया जाए। जैसे कोई राजकुमार गले में पड़ी मोतियों की माला को चोरी गई समझ बैठे, तो दूसरों के कहने से नहीं मानता; अपने ही हाथ से उसे गले में छूकर तभी विश्वास करता है। वैसे ही मनुष्य कितना भी चतुर हो, दूसरों के उपदेश मात्र से अपने को नहीं जान सकता, जब तक स्वयं अनुभव न करे। और मन बाहर की ओर लगा रहे तो वह अनुभव कभी नहीं होता।”

“दीपक चारों ओर सब कुछ प्रकाशित करता है, पर अपने को या दूसरे दीपक को नहीं; वह अपने-आप जलता है, उसे किसी और प्रकाश की ज़रूरत नहीं। सूर्य के प्रकाश में वस्तुएँ दिखती हैं, उन्हें दिखाने के लिए और कोई उजाला नहीं चाहिए। प्रकाश को प्रकाशित करने की ज़रूरत नहीं होती; तो क्या इसलिए कहेंगे कि वह ज्ञात नहीं, या है ही नहीं? दीपक और वस्तुएँ जड़ हैं, अपने को नहीं जान सकतीं, फिर भी उनके होने और दिखने में सन्देह नहीं; यानी वे अपने प्रकाश से प्रकट हैं। तो जो आत्मा सबको समेटे हुए है, उसके विषय में आप मन को भीतर मोड़कर क्यों नहीं खोजते कि वह चेतन है या अचेतन? वह चैतन्य निरपेक्ष है, जागने, सपने और नींद, तीनों अवस्थाओं से परे; सारा विश्व उसी में है और उसी से प्रकट है। उसके प्रकाश के बिना कुछ भी पकड़ में नहीं आता। चैतन्य न हो तो आपको कुछ दिखेगा? नींद में ‘कुछ नहीं दिखा’ कहने के लिए भी चैतन्य का प्रकाश चाहिए; नींद के उस अनजानेपन का जो पता आपको है, वह चैतन्य के कारण ही है। उसका प्रकाश शाश्वत है, यह आप अनुमान से मानते हैं; तो अब बारीकी से देखिए कि वह प्रकाश अपना है या नहीं। इस खोज में हर कोई गिर जाता है, चाहे कितना पढ़ा-लिखा हो, क्योंकि मन भीतर नहीं मुड़ता, बेचैन होकर बाहर भागता रहता है। जब तक विचार उठते हैं, मन भीतर नहीं मुड़ा; और जब तक मन भीतर नहीं, आत्मा का अनुभव नहीं। भीतर मुड़ने का अर्थ है इच्छा का न रहना; इच्छाएँ छोड़े बिना मन भीतर कैसे टिकेगा?”

“इसलिए वैराग्य धारण कीजिए और आत्मा के रूप में स्थित रहिए। यह स्थिति सहज है; विचारों के थमने और खोज के रुकने पर वह अपने-आप होती है। उससे बाहर आने पर अपनी उस अवस्था को फिर से देखिए; तब आप सब जान लेंगे, और यह भी कि वह एक ही साथ ज्ञेय और अज्ञेय कैसे है। इस तरह अज्ञेय को जानकर मनुष्य सदा के लिए अमरता में रहता है। मेरी बात पूरी हुई। आपको प्रणाम। विदा। पर आप मेरे शब्द अभी नहीं समझे, क्योंकि यह सत्य आपने पहली बार सुना है। ये राजा, जो मनुष्यों में सबसे ज्ञानी हैं, आपको समझा सकते हैं। इनसे फिर पूछिए; ये आपके सन्देह मिटा देंगे।”

उनका कहना पूरा हुआ तो राजा और पूरी सभा ने उनका सम्मान किया। उसी क्षण वे हवा में घुल गईं और मनुष्यों की आँखों से ओझल हो गईं। दत्तात्रेय ने कहा, “राम, आत्मानुभव की विधि मैंने आपको कह दी।”

जनक अब शिक्षक हैं

परशुराम विस्मय से भर उठे। “भगवन्, यह पुराना प्रसंग अद्भुत है। आगे बताइए, अष्टावक्र ने राजा से क्या पूछा और उन्हें क्या उपदेश मिला। ऐसे सत्यों से भरा यह प्रसंग मैंने पहले नहीं सुना था। मैं इसे पूरा सुनना चाहता हूँ।” दत्तात्रेय ने आगे कहा। तपस्विनी के ओझल होते ही अष्टावक्र ने पण्डितों से घिरे जनक से उनके संक्षिप्त पर गूढ़ उपदेश का पूरा अर्थ माँगा। “विदेहराज, संक्षेप के कारण तपस्विनी का उपदेश मेरी समझ में पूरा नहीं आया। कृपा करके समझाइए, जो अज्ञेय है, उसे मैं जानूँ कैसे?”

जनक ने कुछ चकित होकर उत्तर दिया। “ऋषि के पुत्र, सुनिए। वह न अज्ञेय है, न किसी क्षण अज्ञात रहता है। बताइए, जो सदा अज्ञात ही रहे, उस तक कुशल से कुशल गुरु भी किसी को कैसे ले जाए? गुरु सिखा सकता है, इसका अर्थ है कि वह जानता है कि क्या कह रहा है। यह पार की अवस्था बहुत सरल भी है और लगभग असम्भव भी, इस पर निर्भर है कि मन शान्ति में भीतर मुड़ा है या बेचैनी में बाहर भागता है। जो सदा अज्ञात रहे, वह सिखाया नहीं जा सकता। वेद उसे ‘यह नहीं, यह नहीं’ कहकर परोक्ष रूप से दिखाते हैं; इससे ही सिद्ध है कि यह ज्ञान दूसरों तक पहुँचाया जा सकता है। आप जो कुछ देखते हैं, वह उसी शुद्ध चैतन्य से ज्ञात होता है। अब उस आधारभूत चैतन्य को ध्यान से परखिए, जो वस्तुओं से अलग होकर भी उन सबको प्रकाशित करता है; उसी को सत्य जानिए। जो स्वयं-प्रकाश नहीं, वह चैतन्य की परिधि में आ सकता है, चैतन्य हो नहीं सकता। चैतन्य वह है जिससे वस्तुएँ जानी जाती हैं; वह स्वयं ज्ञान की वस्तु बन जाए तो चैतन्य नहीं रहेगा। जो जाना जाता है, वह जानने वाले से भिन्न ही होगा, नहीं तो वह उसके द्वारा जाना न जा सकता। शुद्ध चैतन्य में अंश नहीं होते; अंश वस्तुओं का लक्षण है, इसीलिए वस्तुएँ आकार लेती हैं। सब कुछ हटाकर उस निरपेक्ष चैतन्य को ध्यान से देखिए। जैसे दर्पण बिम्बों के रंग ले लेता है, वैसे ही वह चैतन्य वस्तुओं के भिन्न-भिन्न आकार धारण करता है, क्योंकि वह उन्हें अपने भीतर रखता है।”

आधार-संस्करण और पाठ

आधार-संस्करण: त्रिपुरारहस्य, ज्ञानखण्ड, श्रीनिवासभट्ट की तात्पर्यदीपिका सहित संस्कृत पाठ।

इस कथा का पाठ: ज्ञानखण्ड 15.1 से 101; 16.1 से 20

इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए प्रसंग का स्वतंत्र कथा-गद्य; श्लोकानुसार अनुवाद नहीं।

सीमाएँ और पाठ-भेद: यह त्रिपुरा रहस्य का प्रसंग है, अलग ग्रंथ अष्टावक्र गीता का कथासार नहीं। यहाँ अध्याय 15 की सभा और अध्याय 16 के आरम्भ का संवाद चुना गया है; अध्याय 16 से 17 की पूरी शिक्षा नहीं।

तुलना के पाठ: तात्पर्यदीपिका सहित संस्कृत ज्ञानखण्ड (ज्ञानखण्ड 15.1 से 101; 16.1 से 20); रमणानंद सरस्वती, श्री रमणाश्रमम्, 2006 (अध्याय 15 से 16, मुद्रित पृष्ठ 127 से 140)।