इस पृष्ठ पर
चुना हुआ कथा-पाठ
एक राजकुमार बंदियों को छुड़ाने जाता है। काम पूरा होने पर वह एक और प्रश्न पूछता है: पहाड़ के भीतर वे रहे कहाँ थे?
युद्ध से बात नहीं बनी
दत्तात्रेय, परशुराम को एक ऐसी यात्रा सुनाते हैं जिसमें लौटने वाला व्यक्ति घर पहुँचकर भी पहले की दुनिया नहीं पाता। वंग देश के राजा सुषेण ने अश्वमेध का आयोजन किया था। यज्ञ का घोड़ा राजकुमारों और सेना की रक्षा में आगे बढ़ रहा था। ऋषि गण के आश्रम के निकट पहुँचकर दल ने समाधिस्थ मुनि को प्रणाम नहीं किया। उनके पुत्र को यह अपमान लगा। उसने घोड़ा रोक लिया। युद्ध हुआ और ऋषिपुत्र घोड़े तथा बंदी राजकुमारों को लेकर एक पहाड़ के भीतर चला गया।
जो सैनिक बचकर लौटे, उनसे समाचार सुनकर सुषेण ने अपने छोटे भाई महासेन को भेजा। इस बार काम केवल सेना जुटाने का नहीं था। महासेन को ऋषि से विनयपूर्वक बात करनी थी, जिससे बंदी छूटें और यज्ञ पूरा हो सके। वे आश्रम पहुँचे और समाधिस्थ ऋषि के सामने सम्मान से ठहरे रहे। ऋषिपुत्र ने उनका व्यवहार देखकर उनकी इच्छा पूछी। महासेन अपने प्रयोजन के लिए पिता से ही निवेदन करना चाहते थे।
कथा में ऋषिपुत्र अपनी योगशक्ति से पिता को समाधि से लौटा लाता है। गण सारी बात समझते हैं और पुत्र को डाँटते हैं: क्रोध तप को बिगाड़ता है; राजा की रक्षा में ही तपस्वियों का जीवन निर्विघ्न चलता है। घोड़ा और राजकुमार लौटा दिए जाते हैं। पहली समस्या यहीं सुलझ सकती थी। मगर महासेन ने वह दृश्य देखा था जिसे उनका मन छोड़ नहीं पा रहा था। पहाड़ के भीतर इतनी जगह आई कहाँ से?
जिस द्वार से शरीर न जा सका
गण बताते हैं कि उनका पुत्र राज्य करना चाहता था। योग के अभ्यास से उसने पहाड़ के भीतर अपना एक लोक रच लिया। महासेन उसे देखना चाहते हैं। ऋषि अनुमति देते हैं और पुत्र को साथ भेजते हैं। पर महासेन पहाड़ में प्रवेश नहीं कर पाते। उनके सामने वही ठोस शिला है।
ऋषिपुत्र उन्हें भीतर ले जाता है; पाठ इस प्रवेश को सूक्ष्म शरीर और योगशक्ति की भाषा में कहता है। भीतर महासेन को कोई छोटा कक्ष नहीं मिलता। उनके सामने आकाश है, तारे हैं, पर्वत, नदियाँ और अनेक लोक हैं। वे भयभीत होकर अपने मार्गदर्शक से साथ न छोड़ने की प्रार्थना करते हैं। उसकी सहायता से वे इस विशाल दृश्य को देखते हैं। छोटा समझा हुआ पहाड़ अब किसी संसार की सीमा नहीं बता पा रहा था।
लौटने पर समय का प्रश्न
यात्रा के बाद बाहर आते ही महासेन देखते हैं कि लोग, नदी के मार्ग और बस्तियाँ बदल गए हैं। जिस भीतर के लोक में एक दिन बीता, कथा के अनुसार बाहर बहुत लंबा काल बीत चुका था। उनका पुराना राजपरिवार अब स्मृति का विषय था। वंश आगे चल चुके थे, राजधानियाँ बदल चुकी थीं। महासेन इस समाचार से अभिभूत होकर मूर्छित हो जाते हैं।
ऋषिपुत्र उन्हें जगाकर समय और अनुभव का अंतर समझाता है। आगे की शिक्षा में स्वप्न, जागरण और चेतना के दृष्टान्त आते हैं। दत्तात्रेय इस कथा को जगत् की प्रतीति पर अपने तर्क के भीतर रखते हैं। अन्त में महासेन उस शिक्षा पर मनन करते हैं, उनका मोह घटता है और कथा उन्हें आत्मज्ञान में स्थिर होते हुए विदा करती है।
पढ़ते हुए एक प्रश्न
यहाँ का काल-अंतर पुराणकथा का विधान है; उसे आधुनिक भौतिकी का प्रमाण मानकर पढ़ना आवश्यक नहीं। पाठकीय मनन के लिए इतना प्रश्न पर्याप्त है: किसी परिचित जगह को समझते समय हम उसमें क्या-क्या पहले से स्थिर मान लेते हैं? महासेन की जिज्ञासा एक बंदीगृह का पता पूछने से आरम्भ हुई थी। लौटते समय वह देखने वाले के अपने संसार तक पहुँच गई।
आधार-संस्करण और पाठ
आधार-संस्करण: त्रिपुरारहस्य, ज्ञानखण्ड, श्रीनिवासभट्ट की तात्पर्यदीपिका सहित संस्कृत पाठ।
इस कथा का पाठ: ज्ञानखण्ड 12.1 से 96; 13.1 से 36; 14.93 से 97
इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए प्रसंग का स्वतंत्र कथा-गद्य और अलग चिह्नित पाठकीय मनन; श्लोकानुसार अनुवाद नहीं।
सीमाएँ और पाठ-भेद: मूल प्रसंग अध्याय 12 से 14 तक चलता है। यहाँ अध्याय 12 का यात्रा-क्रम, अध्याय 13 के आरम्भ का प्रत्यागमन और अध्याय 14 का समापन लिया गया है; बीच की पूरी दार्शनिक विवेचना संक्षिप्त है। संस्कृत 12.95 की काल-संख्या में अर्बुद शब्द है; तात्पर्यदीपिका उसे द्वादशार्बुदवर्ष कहती है, जबकि रमणानन्द के अंग्रेज़ी अनुवाद में बारह हज़ार वर्ष आते हैं। इस महत्वपूर्ण संख्या-भेद के कारण कथा में कोई निश्चित संख्या नहीं दी गई है। काल-अंतर पाठ का कथन है, वैज्ञानिक दावा नहीं।
तुलना के पाठ: तात्पर्यदीपिका सहित संस्कृत ज्ञानखण्ड (ज्ञानखण्ड 12.1 से 96; 13.1 से 36; 14.93 से 97); रमणानन्द सरस्वती, श्री रमणाश्रमम्, 2006 (अध्याय 12 से 14, छपे पृष्ठ 99 से 126)।