अष्टपदी 6
श्लोक
नानक प्रभ सरणागती करि प्रसादु गुरदेव ॥1॥
पउड़ी 1
पउड़ी 2
जिसकी कृपा से रेशमी (पाट-पटंबर) कपड़े पहनता है, उसे छोड़कर और किसमें लुभाता है? जिसकी कृपा से सुख की सेज पर सोता है, आठ पहर उसका यश गा। जिसकी कृपा से सब आपको मान देते हैं, उसका यश मुँह से बखान। जिसकी कृपा से आपका धर्म (जीवन-व्यवस्था) क़ायम है, सदा केवल पारब्रह्म को ध्या।
“नानक पति सेती घरि जावहि”: नानक कहते हैं, इज़्ज़त के साथ घर (ईश्वर के दरबार) जाएँगे। “पति सेती” (इज़्ज़त के साथ) बड़ा ख़ूबसूरत शब्द है। ये “घर” ईश्वर का दरबार है, और वहाँ इज़्ज़त से पहुँचने का रास्ता कृतज्ञता है।
पउड़ी 3
जिसकी कृपा से निरोग सोने जैसा शरीर मिला, उस राम स्नेही में लिव लगा। जिसकी कृपा से आपकी इज़्ज़त (ओला, ढक्कन, छिपाव) क़ायम है, हरि का यश कहकर मन में सुख पा। जिसकी कृपा से आपके सगल छिद्र (कमियाँ, दोष) ढक दिए गए, उस ठाकुर की शरण में पड़। जिसकी कृपा से आपको कोई नहीं पहुँच सकता (कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकता), साँस-साँस उस ऊँचे प्रभु को सिमर।
“जिह प्रसादि पाई द्रुलभ देह”: जिसकी कृपा से ये दुर्लभ (बहुत मुश्किल से मिलने वाला) मनुष्य शरीर पाया, उसकी भक्ति कर। “द्रुलभ देह” पर ज़ोर है: गुरु जी कहते हैं ये शरीर आसानी से नहीं मिलता, ये बड़ा वरदान है, इसे बर्बाद मत करो।
पउड़ी 4
जिसकी कृपा से आभूषण (गहने) पहनते हैं, उसे सिमरने में आलस क्यों? जिसकी कृपा से घोड़ों, हाथियों की सवारी है, उस प्रभु को कभी मत बिसारो। जिसकी कृपा से बाग़, ज़मीन, धन है, उसे अपने मन में प्रोई (पिरोकर) रखो। जिसने आपकी मन की बनत (रचना, सजावट) बनाई, उठते-बैठते उसे ध्या।
“ईहा ऊहा नानक तेरी रखै”: इधर भी (इस लोक में) और उधर भी (परलोक में) वो आपकी रक्षा करेगा। ये वायदा है: अगर आप उसे याद रखे, तो वो दोनों जहानों में आपकी रक्षा करेगा।
पउड़ी 5
जिसकी कृपा से पुण्य-दान करता है, उसे आठ पहर ध्या। जिसकी कृपा से आपका आचार-व्यवहार अच्छा है, उसे साँस-साँस याद कर। जिसकी कृपा से सुंदर रूप मिला, उस अनूप (अनुपम, बेमिसाल) प्रभु को सिमर। जिसकी कृपा से अच्छी जाति (कुल, हैसियत) मिली, उसे दिन-रात सिमर। जिसकी कृपा से आपकी पत (इज़्ज़त) क़ायम है, गुरु की कृपा से उसका यश कह।
गुरु जी ने “जाति” (कुल) को भी ईश्वर की कृपा बताया। अक्सर लोग अपनी जाति पर गर्व करते हैं जैसे ये उनकी अपनी कमाई हो। गुरु जी कहते हैं: ये भी उसकी देन है, गर्व की कोई जगह नहीं।
पउड़ी 6
अब गुरु जी शरीर की इंद्रियों की तरफ़ मुड़ते हैं: जिसकी कृपा से कान संगीत सुनते हैं, आँखें विस्मय (आश्चर्य) देखती हैं, जीभ अमृत-वाणी बोलती है, सुख-सहज से बसते हैं, हाथ-पैर काम करते हैं, सब फल मिलते हैं, परम गति मिलती है, सुख-सहज में समा जाते हैं।
“ऐसा प्रभु तिआगि अवर कत लागहु”: ऐसे प्रभु को छोड़कर और किसमें लग रहे हैं? “गुर प्रसादि नानक मनि जागहु”: गुरु की कृपा से मन में जागो। ये “जागहु” (जागो) बहुत ज़ोरदार आदेश है। गुरु जी कह रहे हैं: आप सो रहे हैं, एक तरह की नींद में हो जहाँ आपको वो दिखता नहीं जो सब दे रहा है। जागो।
पउड़ी 7
जिसकी कृपा से आप संसार में प्रकट (प्रसिद्ध, मौजूद) है, उसे मूल से (बिल्कुल) मत बिसार। जिसकी कृपा से आपका प्रताप (रौब, असर) है, हे मूर्ख मन, उसे जप। जिसकी कृपा से आपके सारे काम पूरे होते हैं, उसे सदा पास (हजूरे) जान। जिसकी कृपा से आप सत्य पाता है, हे मेरे मन, उसमें रच (डूब जा)।
“रे मन मूड़ तू ता कउ जापु”: “रे मूर्ख मन” कहकर गुरु जी मन को सीधे संबोधित करते हैं। ये तकनीक पूरी सुखमनी साहिब में बार-बार आती है: गुरु जी किसी और को उपदेश नहीं दे रहे, वो अपने मन से बात कर रहे हैं। और यही सबसे प्रभावी उपदेश है।
पउड़ी 8
छठी अष्टपदी का समापन एक गहरे सत्य से होता है: “आपि जपाए जपै सो नाउ”: वो ख़ुद जपवाता है, तभी कोई नाम जपता है। “आपि गावाइ”: वो ख़ुद गवाता है, तभी कोई गुण गाता है।जपना और गाना भी उसकी कृपा है।
“सरब निधान प्रभ तेरी मइआ, आपहु कछू न किनहू लइआ”: सारे ख़ज़ाने आपकी मेहर हैं, अपने से किसी ने कुछ नहीं लिया (कमाया)। “जितु जितु लावहु तितु लगहि”: जिधर-जिधर आप लगाए, उधर ही लगते हैं। “नानक इन कै कछू न हाथ”: इनके (जीवों के) हाथ में कुछ नहीं।
ये अंतिम पंक्ति पूर्ण समर्पण है। कुछ भी मेरा नहीं, कुछ भी मेरे वश में नहीं। जो है, जो मिला, जो होंगे, सब उसकी मर्ज़ी से। ये भाव जब मन में बैठ जाए, तो अहंकार का कोई आधार नहीं बचता।
“जिह प्रसादि” की लय यहाँ से शुरू होती है और पूरी अष्टपदी में चलती है। ये एक कृतज्ञता का अभ्यास है, gratitude meditation है।
जिसकी कृपा से आप छत्तीस प्रकार के अमृत (स्वादिष्ट भोजन) खाता है, उस ठाकुर को मन में रख। जिसकी कृपा से शरीर पर सुगंध लगाता है, उसे सिमरकर परम गति पा। जिसकी कृपा से सुख के महल में बसता है, उसे सदा मन में ध्या। जिसकी कृपा से घर-परिवार के संग सुख से रहता है, आठ पहर (24 घंटे) उसे जीभ से सिमर। जिसकी कृपा से रंग, रस, भोग मिलते हैं, उसे सदा ध्याओ।
गुरु जी भोजन, सुगंध, घर, परिवार, भोग, इन सब सांसारिक सुखों को बुरा नहीं कह रहे। ये सब ईश्वर की कृपा हैं। बुराई तब है जब इन्हें भोगते हुए देने वाले को भूल जाएँ।