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अष्टपदी 7 · साध-संगत की महिमा

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 7 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 8 मिनट

अष्टपदी 7

साध-संगत की महिमा
सुखमनी साहिब में “साध” (संत) और “संगत” (सत्संग) बार-बार आते हैं। सातवीं अष्टपदी पूरी तरह इसी विषय को समर्पित है: संत की संगत क्या बदल सकती है?
शीर्षक “जिनके संग बैठते हैं, वैसे ही बन जाते हैं”: शोर भरी सड़क के किनारे पेड़ के नीचे हारमोनियम, तबला और चाय के साथ कीर्तन करती एक संगत

श्लोक

अगम अगाधि पारब्रहमु सोइ ॥
जो जो कहै सु मुकता होइ ॥
सुनि मीता नानकु बिनवंता ॥ साध जना की अचरज कथा ॥1॥
वो पारब्रह्म अगम (पहुँच से परे) और अगाध (गहराई से परे) है। जो-जो उसे कहे (जपे), वो मुक्त हो जाता है। सुनो मित्रो, नानक विनती करता है: संत जनों की अचरज (आश्चर्यजनक) कथा सुनो। “अचरज कथा” कहकर गुरु जी जिज्ञासा जगाते हैं: आगे जो बताएँगे, वो चमत्कारी है।

पउड़ी 1

साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥ साधसंगि मलु सगली खोत ॥
साध कै संगि मिटै अभिमानु ॥ साध कै संगि प्रगटै सुगिआनु ॥
साध कै संगि बुझै प्रभु नेरा ॥ साधसंगि सभु होत निबेरा ॥
साध कै संगि पाए नाम रतनु ॥ साध कै संगि एक ऊपरि जतनु ॥
साध की महिमा बरनै कउनु प्रानी ॥ नानक साध की सोभा प्रभ माहि समानी ॥1॥

“साध कै संगि” से हर पंक्ति शुरू होती है, और हर पंक्ति एक अलग फ़ायदा बताती है: संत की संगत से चेहरा उजला (रोशन) होता है। सारा मैल धुलता है। अभिमान मिटता है। सुज्ञान (सच्चा ज्ञान) प्रकट होता है। प्रभु पास लगने लगता है। सारे मामले सुलझ जाते हैं। नाम-रत्न मिलता है। और बस एक (ईश्वर) पर ध्यान लगता है।

“साध की सोभा प्रभ माहि समानी”: संत की शोभा प्रभु में ही समाई हुई है, यानी संत और प्रभु में कोई फ़र्क़ नहीं। संत प्रभु का दर्पण है।

पउड़ी 2

साध कै संगि अगोचरु मिलै ॥ साध कै संगि सदा परफुलै ॥
साध कै संगि आवहि बसि पंचा ॥ साधसंगि अंम्रित रसु भुंचा ॥
साधसंगि होइ सभ की रेन ॥ साध कै संगि मनोहर बैन ॥
साध कै संगि न कतहूं धावै ॥ साधसंगि असथिति मनु पावै ॥
साध कै संगि माइआ ते भिंन ॥ साधसंगि नानक प्रभ सुप्रसंन ॥2॥

संत की संगत से अगोचर (इंद्रियों से परे) ईश्वर मिलता है। सदा खिले रहते हैं। पाँच (विकार: काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) वश में आ जाते हैं। अमृत रस चखने को मिलता है। सबके चरणों की धूल बन जाते हैं। मनोहर (सुंदर) बोल बोलने लगते हैं। मन कहीं नहीं भटकता। मन को स्थिरता (असथिति) मिलती है। माया से अलग हो जाते हैं। और प्रभु प्रसन्न हो जाता है।

“आवहि बसि पंचा” पर ध्यान दें: पाँच विकार वश में आ जाते हैं। गुरु जी ये नहीं कह रहे कि विकार मर जाते हैं, कह रहे हैं कि वो “बसि” (क़ाबू में) आ जाते हैं। वो रहते हैं, लेकिन अब आपके ग़ुलाम हैं, आप उनके नहीं।

पउड़ी 3

साधसंगि दुसमन सभि मीत ॥ साधू कै संगि महा पुनीत ॥
साधसंगि किस सिउ नही बैरु ॥ साध कै संगि न बीगा पैरु ॥
साध कै संगि नाही को मंदा ॥ साधसंगि जाने परमानंदा ॥
साध कै संगि नाही हउ तापु ॥ साध कै संगि तजै सभु आपु ॥
आपे जानै साध बडाई ॥ नानक साध प्रभू बनि आई ॥3॥

संत की संगत से दुश्मन भी मित्र हो जाते हैं। महा पवित्र हो जाते हैं। किसी से बैर नहीं रहता। पैर भटकता (बीगा) नहीं। कोई बुरा नहीं दिखता। परमानंद का अनुभव होता है। किसी तरह का ताप (कष्ट) नहीं रहता। और सारा “आपु” (अहंकार, मैं-पन) छूट जाता है।

“नानक साध प्रभू बिनु नाई”: संत और प्रभु में कोई अंतर नहीं। ये गहरा वक्तव्य है। गुरु जी सीधे कह रहे हैं: संत प्रभु ही है। जो संत से मिला, वो प्रभु से मिला।

लोहे को पारस पत्थर छू ले, तो लोहा सोना बन जाता है। लेकिन लोहे ने कोई मेहनत नहीं की, बस पारस के “संग” (संपर्क) में आया। ठीक वैसे ही, संत की संगत में बैठने मात्र से बदलाव शुरू हो जाता है। आपको कोई विशेष योग्यता नहीं चाहिए, बस संगत में बैठो।

पउड़ी 4

साध कै संगि न कबहू धावै ॥ साध कै संगि सदा सुखु पावै ॥
साधसंगि बसतु अगोचर लहै ॥ साधू कै संगि अजरु सहै ॥
साध कै संगि बसै थानि ऊचै ॥ साधू कै संगि महलि पहूचै ॥
साध कै संगि द्रिड़ै सभि धरम ॥ साध कै संगि केवल पारब्रहम ॥
साध कै संगि पाए नाम निधान ॥ नानक साधू कै कुरबान ॥4॥

मन भटकना बंद करता है। सदा सुख पाता है। अगोचर (अदृश्य) वस्तु (ईश्वर) प्राप्त होती है। जो सहन नहीं हो सकता (“अजरु”), वो सहन होने लगता है। ऊँचे स्थान पर बसता है। महल (ईश्वर के दरबार) तक पहुँचता है। सारे धर्म दृढ़ होते हैं। केवल पारब्रह्म दिखता है। नाम-निधान (नाम का ख़ज़ाना) मिलता है।

“नानक साधू कै कुरबान”: नानक संत पर कुर्बान है। हर पउड़ी के अंत में गुरु जी संतों पर बलिहारी जाते हैं,असली भाव है।

पउड़ी 5

साध कै संगि सभ कुल उधारै ॥ साधसंगि साजन मीत कुटंब निसतारै ॥
साधू कै संगि सो धनु पावै ॥ जिसु धन ते सभु को वरसावै ॥
साधसंगि धरम राइ करे सेवा ॥ साध कै संगि सोभा सुरदेवा ॥
साधू कै संगि पाप पलाइन ॥ साधसंगि अंम्रित गुन गाइन ॥
साध कै संगि स्रब थान गंमि ॥ नानक साध कै संगि सफल जनंम ॥5॥

आपका पूरा कुल (वंश) उधर जाता है। साजन, मित्र, परिवार सब तरते हैं। ऐसा धन मिलता है जिससे सबको बरसा सको (बाँट सको)। धर्मराज तक सेवा करता है। देवताओं जैसी शोभा मिलती है। पाप भाग जाते हैं। अमृत गुण गाने को मिलते हैं। सारे स्थान (लोक) सुलभ हो जाते हैं।

“नानक साध कै संगि सफल जनंम”: संत की संगत से जन्म सफल हो जाता है। “सफल जनंम” (सफल जन्म), ये दो शब्द पूरी ज़िंदगी का लेखा-जोखा समेट लेते हैं।

पउड़ी 6

साध कै संगि नही कछु घाल ॥ दरसनु भेटत होत निहाल ॥
साध कै संगि कलूखत हरै ॥ साध कै संगि नरक परहरै ॥
साध कै संगि ईहा ऊहा सुहेला ॥ साधसंगि बिछुरत हरि मेला ॥
जो इछै सोई फलु पावै ॥ साध कै संगि न बिरथा जावै ॥
पारब्रहमु साध रिद बसै ॥ नानक उधरै साध सुनि रसै ॥6॥

“नही कछु घाल”: कोई मेहनत नहीं लगती, बस दर्शन (भेटत) करते ही निहाल (आनंदित) हो जाता है। कलंक (कलूखत) हटते हैं। नरक छूटता है। इधर और उधर (इस जन्म और अगले) दोनों जगह सुखी। बिछड़ा हुआ हरि से मिलन हो जाता है। जो इच्छा हो, वो फल मिलता है। संत की संगत में कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।

“पारब्रहमु साध रिद बसै”: पारब्रह्म संत के हृदय में बसता है। “नानक उधरै साध सुनि रसै”: नानक कहते हैं, संत की बात सुनकर, उसके रस में डूबकर, उद्धार होता है।

पउड़ी 7

साध कै संगि सुनउ हरि नाउ ॥ साधसंगि हरि के गुन गाउ ॥
साध कै संगि न मन ते बिसरै ॥ साधसंगि सरपर निसतरै ॥
साध कै संगि लगै प्रभु मीठा ॥ साधू कै संगि घटि घटि डीठा ॥
साधसंगि भए आगिआकारी ॥ साधसंगि गति भई हमारी ॥
साध कै संगि मिटे सभि रोग ॥ नानक साध भेटे संजोग ॥7॥

संत की संगत में हरि का नाम सुनो, हरि के गुण गाओ, मन से नहीं बिसरता (भूलता), ज़रूर (सरपर) पार होते हैं, प्रभु मीठा लगने लगता है, हर हृदय में दिखने लगता है, आज्ञाकारी बन जाते हैं, गति (मुक्ति) मिलती है, और सारे रोग मिटते हैं।

“नानक साध भेटे संजोग”: संत से मिलना संयोग (किस्मत, भाग्य) से होता है। संत की संगत ढूँढने से नहीं मिलती, ये ईश्वर की मेहर है कि आपका रास्ता किसी संत से मिलवा दे।

पउड़ी 8

साध की महिमा बेद न जानहि ॥ जेता सुनहि तेता बखिआनहि ॥
साध की उपमा तिहु गुण ते दूरि ॥ साध की उपमा रही भरपूरि ॥
साध की सोभा का नाही अंत ॥ साध की सोभा सदा बेअंत ॥
साध की सोभा ऊच ते ऊची ॥ साध की सोभा मूच ते मूची ॥
साध की सोभा साध बनि आई ॥ नानक साध प्रभ भेदु न भाई ॥8॥7॥

सातवीं अष्टपदी का समापन। “साध की महिमा बेद न जानहि”: संत की महिमा वेद भी नहीं जानते। “साध की उपमा तिहु गुण ते दूरि”: संत की उपमा तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) से परे है। “साध की सोभा ऊच ते ऊची, मूच ते मूची”: ऊँचे से ऊँची, बड़ी से बड़ी।

“नानक साध प्रभ भेदु न भाई”: संत और प्रभु में कोई भेद (फ़र्क़) नहीं। ये सातवीं अष्टपदी का मुख्य बिंदु है, वही बात जो तीसरी पउड़ी में कही थी, अब पूरे ज़ोर से दोहराई: संत प्रभु का ही रूप है।