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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अष्टपदी 5 · कृतघ्नता और भूलना

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 5 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 9 मिनट

अष्टपदी 5

कृतघ्नता और भूलना
चौथी अष्टपदी ने ईश्वर के उपकार गिनाए। पाँचवीं अष्टपदी और गहरी जाती है: इंसान उस देने वाले को छोड़कर दूसरों के पीछे क्यों भागता है? ये कृतघ्नता का विश्लेषण है।

श्लोक

देनहारु प्रभ छोडि कै लागहि आन सुआइ ॥
नानक कहू न सीझई बिनु नावै पति जाइ ॥1॥
देने वाले प्रभु को छोड़कर और (दूसरे) स्वादों (सुखों) के पीछे लग गए। नानक कहते हैं, बिना नाम के कहीं सफलता नहीं मिलती, और इज़्ज़त चली जाती है।

पउड़ी 1

दस बसतू ले पाछै पावै ॥ एक बसतु कारनि बिखोटि गवावै ॥
एक भी न देइ दस भी हिरि लेइ ॥ तउ मूड़ा कहु कहा करेइ ॥
जिसु ठाकुर सिउ नाही चारा ॥ ता कउ कीजै सद नमसकारा ॥
जा कै मनि लागा प्रभु मीठा ॥ सरब सूख ताहू मनि वूठा ॥
जिसु जन अपना हुकमु मनाइआ ॥ सरब थोक नानक तिनि पाइआ ॥1॥

ये पउड़ी एक व्यापारिक उदाहरण से शुरू होती है: “दस बसतू ले पाछै पावै, एक बसतु कारनि बिखोटि गवावै”: ईश्वर दस वस्तुएँ देता है, इंसान उन्हें पीछे (बेक़दर) रख देता है, और एक वस्तु (जो ईश्वर ने नहीं दी) के लिए सब कुछ गँवा देता है। “एक भी न दए दस भी हिरि लए”: वो एक भी नहीं देता (ईश्वर को), और ईश्वर दसों भी वापस ले ले, तो मूर्ख क्या करेगा?

ये बात हर इंसान पर लागू है। हमारे पास जो कुछ भी है, सेहत, परिवार, बुद्धि, ये सब उसका दिया हुआ है। लेकिन हम उन चीज़ों के पीछे भागते हैं जो हमारे पास नहीं हैं, और जो हैं उनकी क़दर नहीं करते।

“जा कै मनि लागा प्रभु मीठा, सरब सूख ताहू मनि वूठा”: जिसके मन को प्रभु मीठा लगने लगा, उसके मन में सारे सुख बरस पड़ते हैं।

पउड़ी 2

अगनत साहु अपनी दे रासि ॥ खात पीत बरतै अनद उलासि ॥
अपुनी अमान कछु बहुरि साहु लेइ ॥ अगिआनी मनि रोसु करेइ ॥
अपनी परतीति आप ही खोवै ॥ बहुरि उस का बिस्वासु न होवै ॥
जिस की बसतु तिसु आगै राखै ॥ प्रभ की आगिआ मानै माथै ॥
उस ते चउगुन करै निहालु ॥ नानक साहिबु सदा दइआलु ॥2॥

गुरु जी एक साहूकार (बैंकर) की उपमा देते हैं: “अगनत साहु अपनी दे रासि”: अनंत साहूकार (ईश्वर) अपनी पूँजी देता है। “खात पीत बरतै अनद उलासि”: इंसान खाता है, पीता है, इस्तेमाल करता है, आनंद मनाता है। “अपुनी अमान कछु बहुरि साहु लेइ”: अपनी अमानत (जो उसने दी थी) कुछ वापस ले ले, तो “अगिआनी मनि रोसु करेइ”: अज्ञानी मन में ग़ुस्सा करता है।

ये गहरी बात है। जब कोई हमसे छिन जाता है, कोई चीज़ खो जाती है, सेहत बिगड़ती है, तो हम ग़ुस्सा करते हैं ईश्वर पर। लेकिन गुरु जी कहते हैं: ये सब उसकी अमानत थी, उसने दी थी, उसे वापस लेने का हक़ है।

“जिस की बसतु तिसु आगै राखै”: जिसकी वस्तु है, उसके सामने रख दे (समर्पण कर दे)। “उस ते चउगुन करै निहालु”: वो चौगुना कर देता है, और निहाल (प्रसन्न) करता है। ये शर्त है: पहले समर्पण करो, फिर चौगुना मिलेगा।

पउड़ी 3

अनिक भाति माइआ के हेत ॥ सरपर होवत जानु अनेत ॥ बिरख की छाइआ सिउ रंगु लावै ॥
ओह बिनसै उहु मनि पछुतावै ॥ जो दीसै सो चालनहारु ॥
लपटि रहिओ तह अंध अंधारु ॥ बटाऊ सिउ जो लावै नेह ॥
ता कउ हाथि न आवै केह ॥ मन हरि के नाम की प्रीति सुखदाई ॥
करि किरपा नानक आपि लए लाई ॥3॥

गुरु जी दो सुंदर उपमाएँ देते हैं:

“बिरख की छाइआ सिउ रंगु लावै”: पेड़ की छाँव से प्यार कर ले, लेकिन शाम को छाँव चली जाएगी, और मन पछताएगा। छाँव अस्थायी है। ज़िंदगी के सारे सुख ऐसे ही हैं: सुबह की छाँव शाम को नहीं रहती।

“बटाऊ सिउ जो लावै नेह”: राहगीर (बटाऊ, मुसाफ़िर) से जो प्यार कर ले, उसके हाथ कुछ नहीं आता। राहगीर आता है, थोड़ी देर रुकता है, और चला जाता है। ये दुनिया के सारे रिश्तों का रूपक है: सब राहगीर हैं, कोई हमेशा नहीं रहता। सिर्फ़ नाम शाश्वत है।

पउड़ी 4

मिथिआ तनु धनु कुटंबु सबाइआ ॥ मिथिआ हउमै ममता माइआ ॥
मिथिआ राज जोबन धन माल ॥ मिथिआ काम क्रोध बिकराल ॥
मिथिआ रथ हसती अस्व बसत्रा ॥ मिथिआ रंग संगि माइआ पेखि हसता ॥
मिथिआ ध्रोह मोह अभिमानु ॥ मिथिआ आपस ऊपरि करत गुमानु ॥
असथिरु भगति साध की सरन ॥ नानक जपि जपि जीवै हरि के चरन ॥4॥

ये “मिथिआ” (मिथ्या, झूठा, नश्वर) पउड़ी सुखमनी साहिब की प्रसिद्ध पउड़ियों में से है। गुरु जी एक-एक करके सब कुछ “मिथिआ” बताते हैं:

शरीर मिथ्या। धन मिथ्या। परिवार मिथ्या। अहंकार मिथ्या। ममता मिथ्या। राज, जवानी, संपत्ति मिथ्या। काम-क्रोध मिथ्या। रथ, हाथी, घोड़े, कपड़े मिथ्या। द्रोह, मोह, अभिमान मिथ्या।

और फिर एक पंक्ति में सब उलट देते हैं: “असथिरु भगति साध की सरन”: स्थिर (शाश्वत) सिर्फ़ भक्ति है और साधू की शरण है। बाक़ी सब बहता पानी है, सिर्फ़ भक्ति चट्टान है।

ध्यान दें: गुरु जी ये नहीं कह रहे कि शरीर, धन, परिवार “बुरे” हैं। वो कह रहे हैं कि ये “मिथिआ” (अस्थायी, नश्वर) हैं। इनसे लगाव रखना वैसा ही है जैसे बर्फ़ के टुकड़े को हमेशा के लिए पकड़ रखना चाहो। वो पिघलेगा। इस सत्य को स्वीकार करना ही ज्ञान है।

पउड़ी 5

मिथिआ स्रवन पर निंदा सुनहि ॥ मिथिआ हसत पर दरब कउ हिरहि ॥
मिथिआ नेत्र पेखत पर त्रिअ रूपाद ॥ मिथिआ रसना भोजन अन स्वाद ॥
मिथिआ चरन पर बिकार कउ धावहि ॥ मिथिआ मन पर लोभ लुभावहि ॥
मिथिआ तन नही परउपकारा ॥ मिथिआ बासु लेत बिकारा ॥
बिनु बूझे मिथिआ सभ भए ॥ सफल देह नानक हरि हरि नाम लए ॥5॥

अब गुरु जी शरीर के हर अंग को “मिथिआ” बताते हैं, लेकिन शर्त के साथ: जब वो ग़लत काम में लगें, तब मिथ्या हैं।

कान मिथ्या जब दूसरों की निंदा सुनें। हाथ मिथ्या जब दूसरे का धन चुराएँ। आँखें मिथ्या जब पराई स्त्री/पुरुष के रूप देखें। जीभ मिथ्या जब ग़ैर-ज़रूरी स्वादों में लिपटी रहे। पैर मिथ्या जब विकार की तरफ़ दौड़ें। मन मिथ्या जब दूसरों के लोभ में फँसे। शरीर मिथ्या जब परोपकार न करे। नाक मिथ्या जब विकारों की गंध ले।

“सफल देह नानक हरि हरि नाम लए”: शरीर तब सफल होता है जब हरि हरि नाम लिया जाए। यानी ये सारे अंग मिथ्या नहीं हैं, ये तब मिथ्या बनते हैं जब इनका इस्तेमाल ग़लत हो। सही इस्तेमाल करो तो ये सफल हैं।

पउड़ी 6

बिरथी साकत की आरजा ॥ साच बिना कह होवत सूचा ॥
बिरथा नाम बिना तनु अंध ॥ मुखि आवत ता कै दुरगंध ॥
बिनु सिमरन दिनु रैनि ब्रिथा बिहाइ ॥ मेघ बिना जिउ खेती जाइ ॥
गोबिद भजन बिनु ब्रिथे सभ काम ॥ जिउ किरपन के निरारथ दाम ॥
धंनि धंनि ते जन जिह घटि बसिओ हरि नाउ ॥ नानक ता कै बलि बलि जाउ ॥6॥

“बिरथी साकत की आरजा”: ईश्वर से विमुख (साकत) इंसान की ज़िंदगी व्यर्थ है। “बिनु सिमरन दिनु रैनि ब्रिथा बिहाइ, मेघ बिना जिउ खेती जाइ”: बिना सिमरन के दिन-रात ऐसे गुज़रते हैं जैसे बिना बारिश के खेती बर्बाद हो जाती है। ये उपमा सीधी और ताक़तवर है। किसान मेहनत करता है, बीज बोता है, खेत जोतता है, लेकिन अगर बारिश नहीं हुई तो सब बेकार। ठीक वैसे ही, बिना सिमरन के ज़िंदगी की सारी मेहनत सूख जाती है।

“जिउ किरपन के निरारथ दाम”: जैसे कंजूस के पैसे बेकार हैं (न ख़ुद खाए, न किसी को दे), वैसे ही बिना भजन के सारे काम बेकार हैं।

पउड़ी 7

रहत अवर कछु अवर कमावत ॥ मनि नही प्रीति मुखहु गंढ लावत ॥
जाननहार प्रभू परबीन ॥ बाहरि भेख न काहू भीन ॥
अवर उपदेसै आपि न करै ॥ आवत जावत जनमै मरै ॥
जिस कै अंतरि बसै निरंकारु ॥ तिस की सीख तरै संसारु ॥
जो तुम भाने तिन प्रभु जाता ॥ नानक उन जन चरन पराता ॥7॥

“रहत अवर कछु अवर कमावत”: कहता कुछ है, करता कुछ और है। “मनि नही प्रीति मुखहु गंढ लावत”: मन में प्रीत नहीं, मुँह से (झूठी) गाँठ लगाता है (बातें बनाता है)।

ये दोहरेपन (hypocrisy) की सीधी पहचान है। “जाननहार प्रभू परबीन”: लेकिन जानने वाला प्रभु बहुत चतुर है, उसे सब पता है। “बाहरि भेख न काहू भीन”: बाहरी वेश से कोई भी उसे बेवक़ूफ़ नहीं बना सकता।

“अवर उपदेसै आपि न करै”: दूसरों को उपदेश देता है, ख़ुद नहीं करता। ये लाइन हम सबके लिए आईना है। “जिस कै अंतरि बसै निरंकारु, तिस की सीख तरै संसारु”: जिसके अंदर निरंकार बसता है, उसकी सीख से संसार तरता है। सिखाने का हक़ उसे है जो ख़ुद जीता है।

पउड़ी 8

करउ बेनती पारब्रहमु सभु जानै ॥ अपना कीआ आपहि मानै ॥
आपहि आप आपि करत निबेरा ॥ किसै दूरि जनावत किसै बुझावत नेरा ॥
उपाव सिआनप सगल ते रहत ॥ सभु कछु जानै आतम की रहत ॥
जिसु भावै तिसु लए लड़ि लाइ ॥ थान थनंतरि रहिआ समाइ ॥
सो सेवकु जिसु किरपा करी ॥ निमख निमख जपि नानक हरी ॥8॥5॥

पाँचवीं अष्टपदी का समापन। “करउ बेनती पारब्रहमु सभु जानै”: मैं विनती करता हूँ, पारब्रह्म सब जानता है। “आपहि आप आपि करत निबेरा”: वो ख़ुद ही सब फ़ैसले करता है। किसी को दूर दिखाता है, किसी को पास बुलाता है। वो सारे उपायों और चतुराइयों से परे है। वो हर आत्मा की हालत जानता है।

“जिसु भावै तिसु लए लड़ि लाइ”: जो उसे भाए (अच्छा लगे), उसे अपने दामन से लगा ले। “थान थनंतरि रहिआ समाइ”: हर जगह, हर कण में समाया हुआ है।

“निमख निमख जपि नानक हरी”: पल-पल हरि को जपो। ये पाँचवीं अष्टपदी का सार है: कृतघ्न मत बनो, जो मिला है उसकी क़दर करो, और पल-पल उसे याद रखो।