अष्टपदी 22
श्लोक
नानक एको पसरिआ दूजा कह द्रिसटार ॥1॥
पउड़ी 1
“आपि कथै आपि सुननैहारु, आपहि एकु आपि बिसथारु”: वो आप ही कहता है, आप ही सुनने वाला है, आप ही एक है और आप ही विस्तार। बाईसवीं अष्टपदी का पहला वाक्य ही पिछली अष्टपदी के प्रश्न का उत्तर है, कहने वाला और सुनने वाला, दोनों वही। “जा तिसु भावै ता स्रिसटि उपाए, आपनै भाणै लए समाए”: जब उसे भाता है तब सृष्टि उपजाता है, अपने भाणे में उसे समेट लेता है।
“तुम ते भिंन नही किछु होइ, आपन सूति सभु जगतु परोइ”: आपसे भिन्न कुछ नहीं होता, अपने सूत्र में सारा जगत पिरोया हुआ है। “जा कउ प्रभ जीउ आपि बुझाए, सचु नामु सोई जनु पाए”: जिसे प्रभु जी आप समझाते हैं, वही जन सच्चा नाम पाता है।
“सो समदरसी तत का बेता, नानक सगल स्रिसटि का जेता”: वो समदर्शी है, तत्व का जानने वाला है, नानक कहते हैं, वो सारी सृष्टि का विजेता है। जीतना यहाँ किसी से लड़कर नहीं, सबको एक नज़र से देखकर होता है।
पउड़ी 2
“जीअ जंत्र सभ ता कै हाथ, दीन दइआल अनाथ को नाथु”: सारे जीव जंतु उसके हाथ में हैं, वो दीनों पर दयालु है, अनाथों का नाथ है। “जिसु राखै तिसु कोइ न मारै, सो मूआ जिसु मनहु बिसारै”: जिसे वो रखता है उसे कोई मार नहीं सकता, मरा हुआ वो है जिसे वो मन से बिसार दे।
“तिसु तजि अवर कहा को जाइ, सभ सिरि एकु निरंजन राइ”: उसे छोड़कर और कहाँ कोई जाए, सबके सिर पर एक निरंजन राजा है। “जीअ की जुगति जा कै सभ हाथि, अंतरि बाहरि जानहु साथि”: जीवों की जीने की युक्ति जिसके हाथ में है, उसे भीतर बाहर अपने साथ जानिए।
“गुन निधान बेअंत अपार, नानक दास सदा बलिहार”: वो गुणों का निधान है, बेअंत है, अपार है, नानक कहते हैं, दास उस पर सदा बलिहार जाता है। जो सब कुछ हाथ में रखता है, उसके आगे बलिहार होना ही एक बचा हुआ काम है।
पउड़ी 3
“पूरन पूरि रहे दइआल, सभ ऊपरि होवत किरपाल”: दयालु प्रभु हर जगह पूर्ण रूप से भरे हुए हैं, सब पर कृपा करते हैं। “अपने करतब जानै आपि, अंतरजामी रहिओ बिआपि”: अपने करतब वो आप ही जानता है, अंतर्यामी होकर सब में व्यापा हुआ है। “प्रतिपालै जीअन बहु भाति, जो जो रचिओ सु तिसहि धिआति”: जीवों को अनेक भाँति पालता है, जिसे जिसे रचा वो उसी को ध्याता है।
“जिसु भावै तिसु लए मिलाइ, भगति करहि हरि के गुण गाइ”: जिसे वो चाहता है उसे मिला लेता है, वे हरि के गुण गाकर भक्ति करते हैं। भक्ति यहाँ कारण नहीं, फल है। पहले वो मिलाता है, फिर गुण गाए जाते हैं।
“मन अंतरि बिस्वासु करि मानिआ, करनहारु नानक इकु जानिआ”: जिसने मन के भीतर विश्वास धारकर उसे माना, नानक कहते हैं, उसने एक कर्ता को जान लिया। विश्वास और जानना यहाँ दो बातें नहीं रहीं। जिसने मन से माना, उसने ही जाना।
पउड़ी 4
“जनु लागा हरि एकै नाइ, तिस की आस न बिरथी जाइ”: जो जन एक हरि के नाम में लगा है, उसकी आस कभी व्यर्थ नहीं जाती। “सेवक कउ सेवा बनि आई, हुकमु बूझि परम पदु पाई”: सेवक को सेवा ही फबती है, हुक्म समझकर वो परम पद पाता है।
“इस ते ऊपरि नही बीचारु, जा कै मनि बसिआ निरंकारु”: जिसके मन में निरंकार बस गया, उसे इससे ऊपर कोई और विचार नहीं सूझता। “बंधन तोरि भए निरवैर, अनदिनु पूजहि गुर के पैर”: बंधन तोड़कर वे निर्वैर हो गए, रात दिन गुरु के चरण पूजते हैं। बंधन टूटने का पहला लक्षण यहाँ बताया गया है, वैर का छूट जाना।
“इह लोक सुखीए परलोक सुहेले, नानक हरि प्रभि आपहि मेले”: वे इस लोक में सुखी हैं और परलोक में सुखी, नानक कहते हैं, हरि प्रभु ने उन्हें आप ही मिला लिया है। दोनों लोक एक साथ सुधरते हैं, और वो भी अपने बल से नहीं, उसके मिलाने से।
पउड़ी 5
“साधसंगि मिलि करहु अनंद, गुन गावहु प्रभ परमानंद”: साधसंगत में मिलकर आनंद कीजिए, परमानंद प्रभु के गुण गाइए। इस पउड़ी में हर पंक्ति एक निमंत्रण है, कीजिए, गाइए, विचारिए, देखिए, बसाइए। “राम नाम ततु करहु बीचारु, द्रुलभ देह का करहु उधारु”: राम नाम के तत्व का विचार कीजिए, इस दुर्लभ देह का उद्धार कीजिए। देह दुर्लभ है, कठिनाई से मिली है, और गुरु जी उसे बचाने की बात कर रहे हैं, सजाने की नहीं।
“अंम्रित बचन हरि के गुन गाउ, प्रान तरन का इहै सुआउ”: हरि के गुण गाइए जो अमृत वचन हैं, प्राणों को तारने का यही उपाय है। “आठ पहर प्रभ पेखहु नेरा, मिटै अगिआनु बिनसै अंधेरा”: आठ पहर प्रभु को निकट देखिए, अज्ञान मिटेगा, अँधेरा नष्ट होगा।
“सुनि उपदेसु हिरदै बसावहु, मन इछे नानक फल पावहु”: उपदेश सुनकर हृदय में बसाइए, नानक कहते हैं, मनचाहे फल पाइए। सुनना और बसाना दो अलग काम हैं। सुना बहुत जाता है, बसाया कम।
पउड़ी 6
“हलतु पलतु दुइ लेहु सवारि, राम नामु अंतरि उरि धारि”: लोक और परलोक दोनों सँवार लीजिए, राम नाम भीतर हृदय में धारिए। “पूरे गुर की पूरी दीखिआ, जिसु मनि बसै तिसु साचु परीखिआ”: पूरे गुरु की दीक्षा भी पूरी होती है, जिसके मन में वो बसे उसे सच्चे प्रभु की पहचान हो जाती है। “मनि तनि नामु जपहु लिव लाइ, दूखु दरदु मन ते भउ जाइ”: मन और तन से लिव लगाकर नाम जपिए, दुख, दर्द और मन का भय चला जाएगा।
“सचु वापारु करहु वापारी, दरगह निबहै खेप तुमारी”: हे व्यापारी, सच्चा व्यापार कीजिए, तो आपकी खेप दरगाह में निभ जाएगी। सौदा नाम का हो तो दरगाह में बिकता है, बाकी सब वहाँ चलता नहीं।
“एका टेक रखहु मन माहि, नानक बहुरि न आवहि जाहि”: मन में एक ही टेक रखिए, नानक कहते हैं, फिर आना जाना नहीं रहेगा। एक टेक, यानी एक ही आसरा। दो आसरे रखने वाला किसी एक पर पूरा नहीं टिकता।
पउड़ी 7
“तिस ते दूरि कहा को जाइ, उबरै राखनहारु धिआइ”: उससे दूर कोई कहाँ जा सकता है, बचता वही है जो रखने वाले को ध्याता है। “निरभउ जपै सगल भउ मिटै, प्रभ किरपा ते प्राणी छुटै”: जो निर्भय को जपता है उसके सारे भय मिट जाते हैं, प्रभु की कृपा से प्राणी छूट जाता है।
“जिसु प्रभु राखै तिसु नाही दूख, नामु जपत मनि होवत सूख”: जिसे प्रभु रखता है उसे दुख नहीं, नाम जपने से मन में सुख होता है। “चिंता जाइ मिटै अहंकारु, तिसु जन कउ कोइ न पहुचनहारु”: चिंता जाती है, अहंकार मिटता है, उस जन तक कोई पहुँच नहीं सकता। चिंता और अहंकार एक ही पंक्ति में गए हैं। अहंकार जितना, चिंता उतनी।
“सिर ऊपरि ठाढा गुरु सूरा, नानक ता के कारज पूरा”: जिसके सिर पर सूरमा गुरु खड़ा है, नानक कहते हैं, उसके कार्य पूरे होते हैं। गुरु यहाँ रक्षक की तरह खड़ा है, बैठा नहीं, खड़ा, सिर के ऊपर।
पउड़ी 8
“मति पूरी अंम्रितु जा की द्रिसटि, दरसनु पेखत उधरत स्रिसटि”: जिसकी मति पूरी है और जिसकी दृष्टि से अमृत बरसता है, उसका दर्शन देखकर सृष्टि का उद्धार होता है। “चरन कमल जा के अनूप, सफल दरसनु सुंदर हरि रूप”: जिसके कमल चरण अनुपम हैं, उस हरि का रूप सुंदर है और दर्शन फल देने वाला। “धंनु सेवा सेवकु परवानु, अंतरजामी पुरखु प्रधानु”: उसकी सेवा धन्य है, सेवक परवान होता है, वो अंतर्यामी पुरुष सबसे प्रधान है।
“जिसु मनि बसै सु होत निहालु, ता कै निकटि न आवत कालु”: जिसके मन में वो बसता है वो निहाल हो जाता है, उसके निकट काल नहीं आता। जो खिला हुआ है, उसे मृत्यु का डर नहीं छूता।
“अमर भए अमरा पदु पाइआ, साधसंगि नानक हरि धिआइआ”: वे अमर हो गए, अमर पद पाया, नानक कहते हैं, जिन्होंने साधसंगत में हरि को ध्याया। बाईसवीं अष्टपदी इसी पर बंद होती है, अमर पद, और उसका रास्ता साधसंगत से होकर जाता है।
ये श्लोक सवाल पूछता है: जब कुछ दिखता ही नहीं था, तब ये (सृष्टि) कहाँ से उपजी? ये कहाँ जाएगी? माया का जाल कहाँ था? वो (ईश्वर) अपने आप को ख़ुद क्या जानता? अपने रंग (इच्छा) में ख़ुद ही चलता था। न कोई बुरा, न कोई भला। ये प्रश्न पूछने का ही अपने-आप में एक साधना है: इन सवालों पर ध्यान लगाना मन को शून्य की तरफ़ ले जाता है।