अष्टपदी 21
श्लोक
आपन कीआ नानका आपे ही फिरि जापि ॥1॥
“सरगुन निरगुन निरंकार सुंन समाधी आपि”: सगुण भी वो आप है, निर्गुण भी, निरंकार भी, और शून्य समाधि में टिका हुआ भी वो ही है। “आपन कीआ नानका आपे ही फिरि जापि”: नानक कहते हैं, ये सब उसने आप रचा और जीवों में बैठकर आप ही फिर उसे जप रहा है। ये श्लोक इक्कीसवीं अष्टपदी की चाबी है। आगे जो प्रश्न आते हैं, जब केवल वो था तब पाप पुण्य कहाँ थे, बंधन मुक्ति किसकी थी, उनका उत्तर यहीं रख दिया गया है, रूप वाला और रूप से परे, दोनों वही एक।
पउड़ी 1
पउड़ी 2
जब प्रभु केवल (अकेला) स्वामी था, तब बंधन-मुक्ति किसकी गिनती? जब एक ही हरि अगम, अपार था, तब नरक-स्वर्ग-अवतार कहाँ? जब निर्गुण प्रभु सहज स्वभाव में था, तब शिव-शक्ति कहाँ? जब ख़ुद अपनी ज्योति ख़ुद धारण करता, तब कौन निडर, कौन किससे डरता? ये सब सवाल “जब-तब” की लय पर हैं, और हर सवाल का जवाब एक ही है: जब सिर्फ़ “वो” था, तो ये सारे द्वंद्व थे ही नहीं।
पउड़ी 3
“अबिनासी सुख आपन आसन, तह जनम मरन कहु कहा बिनासन”: जब अविनाशी प्रभु अपने सुख में, अपने ही आसन पर टिका था, तब बताइए, जन्म, मरण और विनाश कहाँ थे?
“जब पूरन करता प्रभु सोइ, तब जम की त्रास कहहु किसु होइ”: जब पूर्ण कर्ता प्रभु आप ही था, तब यम का भय किसे होता? “जब अबिगत अगोचर प्रभ एका, तब चित्र गुपत किसु पूछत लेखा”: जब अदृश्य, अगोचर प्रभु एक ही था, तब चित्रगुप्त किससे लेखा पूछते? “जब नाथ निरंजन अगोचर अगाधे, तब कउन छुटे कउन बंधन बाधे”: जब माया से रहित, अथाह नाथ ही था, तब कौन छूटा था और कौन बँधा था?
“आपन आप आप ही अचरजा, नानक आपन रूप आप ही उपरजा”: वो आप ही आप है, आश्चर्यरूप, नानक कहते हैं, अपना रूप उसने आप ही उपजाया। बंधन और मुक्ति, पाप और लेखा, ये सब बाद की बातें हैं। जो पहले था, वो अब भी है।
पउड़ी 4
“जह निरमल पुरखु पुरख पति होता, तह बिनु मैलु कहहु किआ धोता”: जहाँ पुरुषों का पति निर्मल पुरुष आप ही था, वहाँ मैल थी ही नहीं, तो बताइए, धोया क्या जाता? “जह निरंजन निरंकार निरबान, तह कउन कउ मान कउन अभिमान”: जहाँ निरंजन, निरंकार, निर्वाण प्रभु ही था, वहाँ मान किसे और अभिमान किसे?
“जह सरूप केवल जगदीस, तह छल छिद्र लगत कहु कीस”: जहाँ केवल जगदीश का ही स्वरूप था, वहाँ छल और छिद्र किसे लगते? “जह जोति सरूपी जोति संगि समावै, तह किसहि भूख कवनु त्रिपतावै”: जब ज्योतिस्वरूप प्रभु ज्योति में ही समाया था, तब भूख किसे थी और तृप्त कौन था?
“करन करावन करनैहारु, नानक करते का नाहि सुमारु”: वो करने वाला, कराने वाला, सब कुछ करने में समर्थ है, नानक कहते हैं, कर्ता का कोई अनुमान नहीं। मैल, अभिमान, छल, भूख, ये सब हमारे हैं। उसके पास इनमें से कुछ नहीं, और इसीलिए हम उसे माप नहीं सकते।
पउड़ी 5
“जब अपनी सोभा आपन संगि बनाई, तब कवन माइ बाप मित्र सुत भाई”: जब प्रभु ने अपनी शोभा अपने ही साथ बनाई थी, तब माँ, बाप, मित्र, पुत्र, भाई कौन थे? “जह सरब कला आपहि परबीन, तह बेद कतेब कहा कोऊ चीन”: जहाँ वो सारी कलाओं में आप ही प्रवीण था, वहाँ वेद और कतेब कौन विचारता था?
“जब आपन आपु आपि उरि धारै, तउ सगन अपसगन कहा बीचारै”: जब वो अपने आपको आप ही हृदय में धारे बैठा था, तब शगुन और अपशगुन कौन विचारता? “जह आपन ऊच आपन आपि नेरा, तह कउन ठाकुरु कउनु कहीऐ चेरा”: जहाँ वो आप ही ऊँचा और आप ही निकट था, वहाँ ठाकुर किसे कहें और चेला किसे?
“बिसमन बिसम रहे बिसमाद, नानक अपनी गति जानहु आपि”: उसकी गति खोजने वाले विस्मय में विस्मित होकर रह गए, नानक कहते हैं, हे प्रभु, अपनी गति आप ही जानते हैं। सब प्रश्न विस्मय पर पहुँचते हैं, और विस्मय अरदास पर।
पउड़ी 6
“जह अछल अछेद अभेद समाइआ, ऊहा किसहि बिआपत माइआ”: जहाँ अछल, अछेद, अभेद प्रभु अपने में समाया था, वहाँ माया किसे व्यापती? “आपस कउ आपहि आदेसु, तिहु गुण का नाही परवेसु”: वो अपने आपको आप ही नमस्कार करता है, तीन गुणों का वहाँ प्रवेश नहीं।
“जह एकहि एक एक भगवंता, तह कउनु अचिंतु किसु लागै चिंता”: जहाँ एक ही एक भगवंत था, वहाँ कौन निश्चिंत था और चिंता किसे लगती? “जह आपन आपु आपि पतीआरा, तह कउनु कथै कउनु सुननैहारा”: जहाँ वो अपने आपको आप ही पतीजाने वाला था, वहाँ कहने वाला कौन था और सुनने वाला कौन?
“बहु बेअंत ऊच ते ऊचा, नानक आपस कउ आपहि पहूचा”: वो अत्यंत बेअंत है, ऊँचे से ऊँचा, नानक कहते हैं, अपने आप तक वो आप ही पहुँचता है। हम उस तक कैसे पहुँचें, ये प्रश्न ही यहाँ बदल जाता है। जो वहाँ पहुँचा हुआ है, वो वही है।
पउड़ी 7
“जह आपि रचिओ परपंचु अकारु, तिहु गुण महि कीनो बिसथारु”: जब प्रभु ने आप ही ये प्रपंच और आकार रचा, तब तीन गुणों में विस्तार किया। “पापु पुंनु तह भई कहावत, कोऊ नरक कोऊ सुरग बंछावत”: तब पाप और पुण्य की बात चल पड़ी, कोई नरक का भागी हुआ, कोई स्वर्ग का चाहने वाला।
“आल जाल माइआ जंजाल, हउमै मोह भरम भै भार”: घर के धंधे, माया के जंजाल, अहंकार, मोह, भ्रम, भय का भार। “दूख सूख मान अपमान, अनिक प्रकार कीओ बख्यान”: दुख, सुख, मान, अपमान, अनेक प्रकार की बातें कही जाने लगीं।
“आपन खेलु आपि करि देखै, खेलु संकोचै तउ नानक एकै”: अपना खेल आप रचकर आप ही देखता है, और जब खेल समेटता है, नानक कहते हैं, तब फिर एक ही रह जाता है। खेल के बीच में रहते हुए हमें खेल का पूरा नक़्शा नहीं दिखता। रचने वाला उसे शुरू से अंत तक देखता है।
पउड़ी 8
“जह अबिगतु भगतु तह आपि, जह पसरै पासारु संत परतापि”: जहाँ अदृश्य प्रभु है वहाँ उसका भक्त है, और जहाँ भक्त है वहाँ वो आप है, ये पसारा संतों के प्रताप के लिए पसरा है। “दुहू पाख का आपहि धनी, उन की सोभा उनहू बनी”: दोनों पक्षों का मालिक वो आप ही है, उसकी शोभा उसी को शोभा देती है।
“आपहि कउतक करै अनद चोज, आपहि रस भोगन निरजोग”: आप ही कौतुक और आनंद के चोज करता है, आप ही रस भोगता है और आप ही निर्लेप है। “जिसु भावै तिसु आपन नाइ लावै, जिसु भावै तिसु खेल खिलावै”: जिसे चाहे उसे अपने नाम में लगाता है, जिसे चाहे उसे खेल खिलाता है।
“बेसुमार अथाह अगनत अतोलै, जिउ बुलावहु तिउ नानक दास बोलै”: हे बेशुमार, अथाह, अगणित, अतोल प्रभु, जैसे आप बुलवाते हैं वैसे ही, नानक कहते हैं, दास बोलता है। इक्कीसवीं अष्टपदी में जो इतने प्रश्न पूछे गए, उनका उत्तर यही आख़िरी पंक्ति है।
गुरु जी सृष्टि से पहले की अवस्था की कल्पना करवाते हैं:
जब कोई आकार (दृश्य जगत) नहीं दिखता था, तब पाप-पुण्य कहाँ से होते? जब वो अपनी शून्य-समाधि में था, तब बैर-विरोध किसके साथ? जब उसका न वर्ण (रंग) था, न चिह्न (पहचान), तब हर्ष-शोक किसे होता? जब वो ख़ुद ही पारब्रह्म था (और कुछ नहीं था), तब मोह किसे, भ्रम किसका?
“आपन खेलु आपि वरतीजा”: अपना खेल ख़ुद ही खेल रहा है। “करनैहारु न दूजा”: करने वाला दूसरा कोई नहीं। ये सृष्टि-पूर्व की शून्य अवस्था का चित्र है, जहाँ सिर्फ़ “वो” था, और कुछ नहीं। अच्छा-बुरा, सुख-दुख, कोई द्वंद्व नहीं उठा था, चारों ओर शून्य पसरा हुआ था।