अष्टपदी 23
श्लोक
हरि किरपा ते संत भेटिआ नानक मनि परगासु ॥1॥
पउड़ी 1
“संतसंगि अंतरि प्रभु डीठा, नामु प्रभू का लागा मीठा”: संतों की संगत में जिसने अपने भीतर प्रभु को देखा, उसे प्रभु का नाम मीठा लगने लगा। “सगल समिग्री एकसु घट माहि, अनिक रंग नाना द्रिसटाहि”: सारी सामग्री उसे एक ही में दिखती है, और उसी एक से अनेक रंग तमाशे निकलते दिखते हैं।
“नउ निधि अंम्रितु प्रभ का नामु, देही महि इस का बिस्रामु”: प्रभु का नाम नौ निधियाँ है, अमृत है, और इसका ठिकाना इसी देह में है। खज़ाना बाहर नहीं है, इसी शरीर में उसका विश्राम है। “सुंन समाधि अनहत तह नाद, कहनु न जाई अचरज बिसमाद”: वहाँ शून्य समाधि है, अनहद नाद है, ऐसा आश्चर्य और विस्मय जो कहा नहीं जा सकता।
“तिनि देखिआ जिसु आपि दिखाए, नानक तिसु जन सोझी पाए”: उसने ही देखा जिसे प्रभु आप दिखाता है, नानक कहते हैं, उसी जन को समझ मिलती है। देखना भी हमारा किया हुआ नहीं। आँख हमारी, दिखाने वाला वो।
पउड़ी 2
“सो अंतरि सो बाहरि अनंत, घटि घटि बिआपि रहिआ भगवंत”: वो अनंत भीतर भी है, बाहर भी, घट घट में भगवंत व्यापा हुआ है। “धरनि माहि आकास पइआल, सरब लोक पूरन प्रतिपाल”: धरती में, आकाश में, पाताल में, सारे लोकों में वो पूर्ण है और सबका पालन करता है। “बनि तिनि परबति है पारब्रहमु, जैसी आगिआ तैसा करमु”: वन में, तिनके में, पर्वत में पारब्रह्म है, जैसी उसकी आज्ञा वैसा ही जीव का कर्म।
“पउण पाणी बैसंतर माहि, चारि कुंट दह दिसे समाहि”: पवन में, पानी में, अग्नि में, चारों कोनों और दसों दिशाओं में वो समाया है।
“तिस ते भिंन नही को ठाउ, गुर प्रसादि नानक सुखु पाउ”: उससे भिन्न कोई ठौर नहीं, नानक कहते हैं, गुरु की कृपा से इसका सुख पाइए। जानकारी और सुख में फ़र्क़ है। वो हर जगह है, ये पढ़ लेना जानकारी है, इसका सुख पाना गुरु की कृपा से होता है।
पउड़ी 3
“बेद पुरान सिंम्रिति महि देखु, ससीअर सूर नख्यत्र महि एकु”: वेद, पुराण, स्मृति में उसी को देखिए, चंद्र, सूर्य, नक्षत्रों में भी वही एक है। “बाणी प्रभ की सभु को बोलै, आपि अडोलु न कबहू डोलै”: हर कोई प्रभु की ही वाणी बोलता है, पर वो आप अडोल है, कभी डोलता नहीं।
“सरब कला करि खेलै खेल, मोलि न पाईऐ गुणह अमोल”: सारी कलाएँ रचकर खेल खेलता है, किसी मोल से नहीं मिलता, उसके गुण अमोल हैं। “सरब जोति महि जा की जोति, धारि रहिओ सुआमी ओति पोति”: सारी ज्योतियों में जिसकी ज्योति है, वो स्वामी ताने बाने की तरह सबको धारे हुए है।
“गुर परसादि भरम का नासु, नानक तिन महि एहु बिसासु”: गुरु की कृपा से जिनका भ्रम नष्ट हुआ, नानक कहते हैं, उनके भीतर ही ये विश्वास बनता है। विश्वास पहले नहीं आता, भ्रम पहले जाता है, फिर जो जगह ख़ाली होती है वहाँ विश्वास बसता है।
पउड़ी 4
“संत जना का पेखनु सभु ब्रहम, संत जना कै हिरदै सभि धरम”: संत जन जहाँ देखते हैं ब्रह्म ही देखते हैं, उनके हृदय में सारे विचार धर्म के ही उठते हैं। “संत जना सुनहि सुभ बचन, सरब बिआपी राम संगि रचन”: संत जन शुभ वचन ही सुनते हैं, सर्वव्यापी राम के संग रचे रहते हैं।
“जिनि जाता तिस की इह रहत, सति बचन साधू सभि कहत”: जिसने उसे जान लिया उसकी रहनी यही हो जाती है, साधु सदा सच्चे वचन कहता है। “जो जो होइ सोई सुखु मानै, करन करावनहारु प्रभु जानै”: जो जो होता है उसे ही सुख मानता है, करने और कराने वाला प्रभु को ही जानता है।
“अंतरि बसे बाहरि भी ओही, नानक दरसनु देखि सभ मोही”: भीतर वही बसता है, बाहर भी वही है, नानक कहते हैं, उसका दर्शन देखकर सारी सृष्टि मोहित है। संत का देखना और सृष्टि का मोहित होना, दोनों एक ही दर्शन के दो सिरे हैं।
पउड़ी 5
“आपि सति कीआ सभु सति, तिसु प्रभ ते सगली उतपति”: वो आप सत्य है और जो कुछ उसने किया वो सब सत्य है, उसी प्रभु से सारी उत्पत्ति हुई। सृष्टि को यहाँ भ्रम या धोखा नहीं कहा गया, उसे सत्य कहा गया है, क्योंकि रचने वाला सत्य है। “तिसु भावै ता करे बिसथारु, तिसु भावै ता एकंकारु”: उसे भाए तो विस्तार करता है, उसे भाए तो फिर एक ही एकंकार रह जाता है।
“अनिक कला लखी नह जाइ, जिसु भावै तिसु लए मिलाइ”: उसकी अनेक कलाएँ लखी नहीं जा सकतीं, जिसे वो चाहता है उसे मिला लेता है। “कवन निकटि कवन कहीऐ दूरि, आपे आपि आप भरपूरि”: किसे निकट कहें और किसे दूर, वो आप ही आप हर जगह भरपूर है।
“अंतरगति जिसु आपि जनाए, नानक तिसु जन आपि बुझाए”: जिसे वो आप भीतर की अवस्था जनाता है, नानक कहते हैं, उसी जन को आप ही समझाता है।
पउड़ी 6
“सरब भूत आपि वरतारा, सरब नैन आपि पेखनहारा”: सारे जीवों में वो आप ही बरत रहा है, सारी आँखों से वो आप ही देख रहा है। जो आँख ये पंक्ति पढ़ रही है, उसमें से भी देखने वाला वही है। “सगल समग्री जा का तना, आपन जसु आप ही सुना”: सारी सामग्री जिसका शरीर है, वो अपना यश आप ही सुन रहा है।
“आवन जानु इकु खेलु बनाइआ, आगिआकारी कीनी माइआ”: आना जाना उसने एक खेल बनाया है, और माया को आज्ञाकारी बनाया है। “सभ कै मधि अलिपतो रहै, जो किछु कहणा सु आपे कहै”: सबके बीच में रहकर भी अलिप्त रहता है, जो कुछ कहना है वो आप ही कहता है।
“आगिआ आवै आगिआ जाइ, नानक जा भावै ता लए समाइ”: आज्ञा में जीव आता है, आज्ञा में जाता है, नानक कहते हैं, जब उसे भाता है तब अपने में समा लेता है। जन्म और मृत्यु, दोनों के आगे एक ही शब्द लगा है, आज्ञा।
पउड़ी 7
“इस ते होइ सु नाही बुरा, ओरै कहहु किनै कछु करा”: जो उससे होता है वो बुरा नहीं होता, और उसके बिना बताइए, किसने कुछ कर दिखाया? “आपि भला करतूति अति नीकी, आपे जानै अपने जी की”: वो आप भला है, उसकी करतूत भी अति नीकी है, अपने जी की बात वो आप ही जानता है।
“आपि साचु धारी सभ साचु, ओति पोति आपन संगि राचु”: वो आप सत्य है और उसकी धारी हुई सारी रचना सत्य है, ताने बाने की तरह उसने उसे अपने साथ रचा है। “ता की गति मिति कही न जाइ, दूसर होइ त सोझी पाइ”: उसकी गति और माप कही नहीं जा सकती, कोई दूसरा होता तो समझ पाता। मापने के लिए मापने वाला बाहर खड़ा होना चाहिए, और उससे बाहर कुछ नहीं।
“तिस का कीआ सभु परवानु, गुर प्रसादि नानक इहु जानु”: उसका किया सब स्वीकार है, नानक कहते हैं, गुरु की कृपा से यही जानिए।
पउड़ी 8
“जो जानै तिसु सदा सुखु होइ, आपि मिलाइ लए प्रभु सोइ”: जो उसे जान लेता है उसे सदा सुख होता है, वो प्रभु उसे आप मिला लेता है। “ओहु धनवंतु कुलवंतु पतिवंतु, जीवन मुकति जिसु रिदै भगवंतु”: वो धनवान है, कुलवान है, प्रतिष्ठित है, जिसके हृदय में भगवंत है वो जीवित ही मुक्त है।
“धंनु धंनु धंनु जनु आइआ, जिसु प्रसादि सभु जगतु तराइआ”: धन्य, धन्य, धन्य है उस जन का आना, जिसकी कृपा से सारा जगत तर जाता है। “जन आवन का इहै सुआउ, जन कै संगि चिति आवै नाउ”: जन के आने का यही प्रयोजन है कि उसकी संगत में नाम चित्त में आए।
“आपि मुकतु मुकतु करै संसारु, नानक तिसु जन कउ सदा नमसकारु”: वो आप मुक्त है और संसार को भी मुक्त करता है, नानक कहते हैं, उस जन को सदा नमस्कार है। तेईसवीं अष्टपदी ऐसे जन के आगे नमस्कार पर समाप्त होती है, जिसके भीतर वो व्यापकता दिख गई।
ये श्लोक सारे गुण आपके हैं, मेरा कोई गुण नहीं। गुण के बिना भक्ति नहीं होती। गुरु जी ख़ुद को गुणहीन कहते हैं, और ये कहकर गुणों की पराकाष्ठा दिखाते हैं।