अष्टपदी 20
श्लोक
नानक की प्रभ बेनती अपनी भगती लाइ ॥1॥
पउड़ी 1
पउड़ी 2
प्रभु की दृष्टि से महासुख होता है। हरि-रस कोई विरला पाता है। जिन्होंने चखा, वो तृप्त हो गए, पूर्ण पुरुष, कभी नहीं डोलते। प्रेम-रस-रंग में लबालब (सुभर) भरे हैं। साधू की संगत में चाव (उत्साह) उपजता है। और सब छोड़कर शरण में आ गए। अंदर प्रकाश है, दिन-रात लिव (ध्यान) लगी रहती है। बड़भागी ने उस प्रभु को जपा, नाम में रँगे हुओं को सुख मिलता है।
पउड़ी 3
सेवक की मनोकामना पूरी हुई। सतगुरु से निर्मल बुद्धि ली। प्रभु दयालु हुआ, सेवक को सदा निहाल (प्रसन्न) किया। बंधन काटकर मुक्त हो गया। जन्म-मरण का दुख और भ्रम चला गया। इच्छा पूरी, श्रद्धा पूरी। सदा संग (साथ) हज़ूर (पास) रहता है। जिसे अपनाना था, उसे मिला लिया। नानक कहते हैं, भक्ति और नाम में समा गया।
पउड़ी 4
ये पउड़ी “सो किउ बिसरै” (उसे कैसे भूलें?) की लय पर चलती है, और हर पंक्ति एक वजह देती है:
उसे कैसे भूलें जो (भक्त की) मेहनत को अस्वीकार नहीं करता? जो किए हुए को जानता है? जिसने सब कुछ दिया? जो जीवन का जीवन है? जिसने (गर्भ की) अग्नि में रक्षा की? जो विष (ज़हर, विकार) से निकालता है? जो जन्मों-जन्मों के टूटे हुए (रिश्ते, कर्म) जोड़ता (गाढ़ता) है?
“गुरि पूरै ततु इहै बुझाइआ”: पूरे गुरु ने यही तत्व समझाया। “प्रभु अपना नानक जन धिआइआ”: नानक के जन ने अपना प्रभु ध्याया।
पउड़ी 5
“साजन संत करहु इहु कामु, आन तिआगि जपहु हरि नामु”: मित्रो, संतो, ये काम करो, और सब छोड़कर हरि नाम जपो। “सिमरि सिमरि सिमरि सुख पावहु”: सिमर-सिमर-सिमर सुख पाओ। ये “सिमरि” तीन बार, पहली अष्टपदी की प्रतिध्वनि। “आपि जपहु अवरह नामु जपावहु”: ख़ुद जपो, दूसरों को जपवाओ। “भगति भाइ तरीऐ संसारु, बिनु भगती तनु होसी छारु”: भक्ति-भाव से संसार तरो, भक्ति के बिना शरीर राख हो जाएगा। “छारु” (राख) वही शब्द है जो श्लोक में आया था। सारे दुखों का नाश होता है। गुणों के ख़ज़ाने (गुणतासु) का नाम जपो।
पउड़ी 6
प्रीत उपजी, प्रेम-रस का चाव उठा। मन-तन में यही मक़सद है। आँखों से दर्शन देखकर सुख, मन खिलता है संत के चरण धोकर। भक्तों के मन-तन में रंग चढ़ा है, कोई विरला ही संगत पाता है। “एक बसतु दीजै करि मइआ”: एक वस्तु (नाम) दो कृपा करके। उसकी उपमा कही नहीं जा सकती, सबमें समाया हुआ है।
पउड़ी 7
ईश्वर के नामों की माला: बख़्शने वाला, दीनों पर दयालु, भक्ति-वत्सल, सदा कृपालु, अनाथों का नाथ, गोबिंद, गोपाल, सबका पालनहार, आदि-पुरुष, कारण-करतार, भक्तों के प्राणों का आधार। जो जपे, पुनीत हो जाए। “हम निरगुनीआर नीच अजान”: हम गुणहीन, नीच, अज्ञानी। आपकी शरण में, हे पुरुष भगवान।
पउड़ी 8
सारे बैकुंठ, मुक्ति, मोक्ष, एक पल हरि के गुण गाने से मिल जाते हैं। अनेक राज, भोग, बड़ाई, ये सब तब हैं जब हरि के नाम की कथा मन को भाई। जीभ हरि-हरि नित्य जपती रहे। भली करनी, शोभा, धनवंत, ये तब जब हृदय में पूरे गुरु का मंत्र बसा हो। “साधसंगि प्रभ देहु निवासु, सबल सूख नानक परगासु”: साधसंगत में निवास दो, सारे सुख प्रकाश हो जाएँगे।
“जाचक जनु जाचै प्रभ दानु”: याचक (माँगने वाला) जन प्रभु से दान माँचता है। “करि किरपा देवहु हरि नामु”: कृपा करके हरि नाम दो। “साध जना की मागउ धूरि”: संत जनों की (चरणों की) धूल माँगता हूँ। “पारब्रहम मेरी सरधा पूरि”: हे पारब्रह्म, मेरी श्रद्धा पूरी करो।
गुरु जी क्या माँग रहे हैं: नाम, संतों की धूल, गुण गाने का मौक़ा, चरण-कमल से प्रीत, भक्ति। ये सब “अंदरूनी” चीज़ें हैं। कोई बाहरी सुख नहीं माँगा, कोई धन नहीं, कोई सत्ता नहीं।