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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अष्टपदी 20 · याचना और समर्पण

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 20 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 7 मिनट

अष्टपदी 20

याचना और समर्पण
बीसवीं अष्टपदी पूरी सुखमनी साहिब की सबसे भावुक अष्टपदी है। गुरु जी याचक बनकर ईश्वर से माँगते हैं, और जो माँगते हैं वो नाम, भक्ति, और संत-संगत है।

श्लोक

फिरत फिरत प्रभ आइआ परिआ तउ सरनाइ ॥
नानक की प्रभ बेनती अपनी भगती लाइ ॥1॥
भटकते-भटकते, हे प्रभु, (आख़िरकार) आपकी शरण में आ पड़ा। नानक की प्रभु से विनती: अपनी भक्ति में लगा ले। “फिरत फिरत” (भटकते-भटकते) में पूरे जीवन की यात्रा समा गई। इतना भटका, इतनी जगह ढूँढा, आख़िर में आपके दरवाज़े पर आ गिरा। ये समर्पण का क्षण है।

पउड़ी 1

जाचक जनु जाचै प्रभ दानु ॥ करि किरपा देवहु हरि नामु ॥
साध जना की मागउ धूरि ॥ पारब्रहम मेरी सरधा पूरि ॥
सदा सदा प्रभ के गुन गावउ ॥ सासि सासि प्रभ तुमहि धिआवउ ॥
चरन कमल सिउ लागै प्रीति ॥ भगति करउ प्रभ की नित नीति ॥
एक ओट एको आधारु ॥ नानकु मागै नामु प्रभ सारु ॥1॥

“जाचक जनु जाचै प्रभ दानु”: याचक (माँगने वाला) जन प्रभु से दान माँचता है। “करि किरपा देवहु हरि नामु”: कृपा करके हरि नाम दो। “साध जना की मागउ धूरि”: संत जनों की (चरणों की) धूल माँगता हूँ। “पारब्रहम मेरी सरधा पूरि”: हे पारब्रह्म, मेरी श्रद्धा पूरी करो।

गुरु जी क्या माँग रहे हैं: नाम, संतों की धूल, गुण गाने का मौक़ा, चरण-कमल से प्रीत, भक्ति। ये सब “अंदरूनी” चीज़ें हैं। कोई बाहरी सुख नहीं माँगा, कोई धन नहीं, कोई सत्ता नहीं।

पउड़ी 2

प्रभ की द्रिसटि महा सुखु होइ ॥ हरि रसु पावै बिरला कोइ ॥
जिन चाखिआ से जन त्रिपताने ॥ पूरन पुरख नही डोलाने ॥
सुभर भरे प्रेम रस रंगि ॥ उपजै चाउ साध कै संगि ॥
परे सरनि आन सभ तिआगि ॥ अंतरि प्रगास अनदिनु लिव लागि ॥
बडभागी जपिआ प्रभु सोइ ॥ नानक नामि रते सुखु होइ ॥2॥

प्रभु की दृष्टि से महासुख होता है। हरि-रस कोई विरला पाता है। जिन्होंने चखा, वो तृप्त हो गए, पूर्ण पुरुष, कभी नहीं डोलते। प्रेम-रस-रंग में लबालब (सुभर) भरे हैं। साधू की संगत में चाव (उत्साह) उपजता है। और सब छोड़कर शरण में आ गए। अंदर प्रकाश है, दिन-रात लिव (ध्यान) लगी रहती है। बड़भागी ने उस प्रभु को जपा, नाम में रँगे हुओं को सुख मिलता है।

पउड़ी 3

सेवक की मनसा पूरी भई ॥ सतिगुर ते निरमल मति लई ॥
जन कउ प्रभु होइओ दइआलु ॥ सेवकु कीनो सदा निहालु ॥
बंधन काटि मुकति जनु भइआ ॥ जनम मरन दूखु भ्रमु गइआ ॥
इछ पुनी सरधा सभ पूरी ॥ रवि रहिआ सद संगि हजूरी ॥
जिस का सा तिनि लीआ मिलाइ ॥ नानक भगती नामि समाइ ॥3॥

सेवक की मनोकामना पूरी हुई। सतगुरु से निर्मल बुद्धि ली। प्रभु दयालु हुआ, सेवक को सदा निहाल (प्रसन्न) किया। बंधन काटकर मुक्त हो गया। जन्म-मरण का दुख और भ्रम चला गया। इच्छा पूरी, श्रद्धा पूरी। सदा संग (साथ) हज़ूर (पास) रहता है। जिसे अपनाना था, उसे मिला लिया। नानक कहते हैं, भक्ति और नाम में समा गया।

पउड़ी 4

सो किउ बिसरै जि घाल न भानै ॥ सो किउ बिसरै जि कीआ जानै ॥
सो किउ बिसरै जिनि सभु किछु दीआ ॥ सो किउ बिसरै जि जीवन जीआ ॥
सो किउ बिसरै जि अगनि महि राखै ॥ गुर प्रसादि को बिरला लाखै ॥
सो किउ बिसरै जि बिखु ते काढै ॥ जनम जनम का टूटा गाढै ॥
गुरि पूरै ततु इहै बुझाइआ ॥ प्रभु अपना नानक जन धिआइआ ॥4॥

ये पउड़ी “सो किउ बिसरै” (उसे कैसे भूलें?) की लय पर चलती है, और हर पंक्ति एक वजह देती है:

उसे कैसे भूलें जो (भक्त की) मेहनत को अस्वीकार नहीं करता? जो किए हुए को जानता है? जिसने सब कुछ दिया? जो जीवन का जीवन है? जिसने (गर्भ की) अग्नि में रक्षा की? जो विष (ज़हर, विकार) से निकालता है? जो जन्मों-जन्मों के टूटे हुए (रिश्ते, कर्म) जोड़ता (गाढ़ता) है?

“गुरि पूरै ततु इहै बुझाइआ”: पूरे गुरु ने यही तत्व समझाया। “प्रभु अपना नानक जन धिआइआ”: नानक के जन ने अपना प्रभु ध्याया।

पउड़ी 5

साजन संत करहु इहु कामु ॥ आन तिआगि जपहु हरि नामु ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुख पावहु ॥ आपि जपहु अवरह नामु जपावहु ॥
भगति भाइ तरीऐ संसारु ॥ बिनु भगती तनु होसी छारु ॥
सरब कलिआण सूख निधि नामु ॥ बूडत जात पाए बिस्रामु ॥
सगल दूख का होवत नासु ॥ नानक नामु जपहु गुनतासु ॥5॥

“साजन संत करहु इहु कामु, आन तिआगि जपहु हरि नामु”: मित्रो, संतो, ये काम करो, और सब छोड़कर हरि नाम जपो। “सिमरि सिमरि सिमरि सुख पावहु”: सिमर-सिमर-सिमर सुख पाओ। ये “सिमरि” तीन बार, पहली अष्टपदी की प्रतिध्वनि। “आपि जपहु अवरह नामु जपावहु”: ख़ुद जपो, दूसरों को जपवाओ। “भगति भाइ तरीऐ संसारु, बिनु भगती तनु होसी छारु”: भक्ति-भाव से संसार तरो, भक्ति के बिना शरीर राख हो जाएगा। “छारु” (राख) वही शब्द है जो श्लोक में आया था। सारे दुखों का नाश होता है। गुणों के ख़ज़ाने (गुणतासु) का नाम जपो।

पउड़ी 6

उपजी प्रीति प्रेम रसु चाउ ॥ मन तन अंतरि इही सुआउ ॥
नेत्रहु पेखि दरसु सुखु होइ ॥ मनु बिगसै साध चरन धोइ ॥
भगत जना कै मनि तनि रंगु ॥ बिरला कोऊ पावै संगु ॥
एक बसतु दीजै करि मइआ ॥ गुर प्रसादि नामु जपि लइआ ॥
ता की उपमा कही न जाइ ॥ नानक रहिआ सरब समाइ ॥6॥

प्रीत उपजी, प्रेम-रस का चाव उठा। मन-तन में यही मक़सद है। आँखों से दर्शन देखकर सुख, मन खिलता है संत के चरण धोकर। भक्तों के मन-तन में रंग चढ़ा है, कोई विरला ही संगत पाता है। “एक बसतु दीजै करि मइआ”: एक वस्तु (नाम) दो कृपा करके। उसकी उपमा कही नहीं जा सकती, सबमें समाया हुआ है।

पउड़ी 7

प्रभ बखसंद दीन दइआल ॥ भगति वछल सदा किरपाल ॥
अनाथ नाथ गोबिंद गुपाल ॥ सरब घटा करत प्रतिपाल ॥
आदि पुरख कारण करतार ॥ भगत जना के प्रान अधार ॥
जो जो जपै सु होइ पुनीत ॥ भगति भाइ लावै मन हीत ॥
हम निरगुनीआर नीच अजान ॥ नानक तुमरी सरनि पुरख भगवान ॥7॥

ईश्वर के नामों की माला: बख़्शने वाला, दीनों पर दयालु, भक्ति-वत्सल, सदा कृपालु, अनाथों का नाथ, गोबिंद, गोपाल, सबका पालनहार, आदि-पुरुष, कारण-करतार, भक्तों के प्राणों का आधार। जो जपे, पुनीत हो जाए। “हम निरगुनीआर नीच अजान”: हम गुणहीन, नीच, अज्ञानी। आपकी शरण में, हे पुरुष भगवान।

पउड़ी 8

सरब बैकुंठ मुकति मोख पाए ॥ एक निमख हरि के गुन गाए ॥
अनिक राज भोग बडिआई ॥ हरि के नाम की कथा मनि भाई ॥
बहु भोजन कापर संगीत ॥ रसना जपती हरि हरि नीत ॥
भली सु करनी सोभा धनवंत ॥ हिरदै बसे पूरन गुर मंत ॥
साधसंगि प्रभ देहु निवास ॥ सरब सूख नानक परगास ॥8॥20॥

सारे बैकुंठ, मुक्ति, मोक्ष, एक पल हरि के गुण गाने से मिल जाते हैं। अनेक राज, भोग, बड़ाई, ये सब तब हैं जब हरि के नाम की कथा मन को भाई। जीभ हरि-हरि नित्य जपती रहे। भली करनी, शोभा, धनवंत, ये तब जब हृदय में पूरे गुरु का मंत्र बसा हो। “साधसंगि प्रभ देहु निवासु, सबल सूख नानक परगासु”: साधसंगत में निवास दो, सारे सुख प्रकाश हो जाएँगे।