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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अष्टपदी 19 · माया की नश्वरता

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 19 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 7 मिनट

अष्टपदी 19

माया की नश्वरता
अठारहवीं अष्टपदी ने गुरु-सिख का रिश्ता बताया। उन्नीसवीं अष्टपदी एक बार फिर माया की नश्वरता पर लौटती है, लेकिन अब गहराई और है: भक्ति के बिना सब कुछ “छार” (राख) है।
“कल का ख़ज़ाना, आज का कबाड़”: फ़ोन पर किसी नई चीज़ के बिक जाने की सूचना देखता एक युवक, पास में पुराने डिब्बों, जूतों और पुराने फ़ोन का ढेर

श्लोक

साथि न चालै बिनु भजन बिखिआ सगली छारु ॥
हरि हरि नामु कमावना नानक इहु धनु सारु ॥1॥
भजन के बिना (कुछ) साथ नहीं चलता, विषय-विकार सब राख (छारु) हैं। हरि हरि नाम कमाना, नानक कहते हैं, यही असली धन (सार) है। “छारु” (राख) शब्द बहुत तीखा है। राख वो होती है जो जलने के बाद बचती है। गुरु जी कह रहे हैं कि माया जल चुकी है, बस राख है।

पउड़ी 1

संत जना मिलि करहु बीचारु ॥ एकु सिमरि नाम आधारु ॥
अवरि उपाव सभि मीत बिसारहु ॥ चरन कमल रिद महि उरि धारहु ॥
करन कारन सो प्रभु समरथु ॥ द्रिड़ु करि गहहु नामु हरि वथु ॥
इहु धनु संचहु होवहु भगवंत ॥ संत जना का निरमल मंत ॥
एक आस राखहु मन माहि ॥ सरब रोग नानक मिटि जाहि ॥1॥

गुरु जी सीधे निर्देश देते हैं: संत जनों से मिलकर विचार करो। एक (ईश्वर) को सिमरो, नाम का आधार रखो। बाक़ी सारे उपाय और मित्रों को बिसारो। चरण-कमल हृदय में धारो। नाम हरि की “वथु” (वस्तु, सामान) है, उसे दृढ़ता से पकड़ो। ये धन इकट्ठा करो, भगवंत बनो। ये संत जनों का निर्मल मंत्र है। एक ही आशा मन में रखो, सारे रोग मिट जाएँगे।

“इहु धनु संचहु होवहु भगवंत”: ये धन जमा करो और भगवंत (भगवान वाले, ईश्वर से जुड़े) बनो। “संचहु” (जमा करो) शब्द ध्यान देने लायक़ है। गुरु जी धन-संचय की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन धन नाम है।

पउड़ी 2

जिसु धन कउ चारि कुंट उठि धावहि ॥ सो धनु हरि सेवा ते पावहि ॥
जिसु सुख कउ नित बाछहि मीत ॥ सो सुखु साधू संगि परीति ॥
जिसु सोभा कउ करहि भली करनी ॥ सा सोभा भजु हरि की सरनी ॥
अनिक उपावी रोगु न जाइ ॥ रोगु मिटै हरि अवखधु लाइ ॥
सरब निधान महि हरि नामु निधानु ॥ जपि नानक दरगहि परवानु ॥2॥

जिस धन के लिए चारों कोनों में दौड़ते हैं, वो हरि की सेवा से मिलता है। जिस सुख को रोज़ चाहते हैं मित्रो, वो साधसंगत में प्रीति से मिलता है। जिस शोभा के लिए अच्छे काम करते हैं, वो हरि की शरण में मिलती है। अनगिनत उपायों से रोग नहीं जाता, हरि की औषधि लगाओ तो मिटता है। सारे ख़ज़ानों में हरि नाम सबसे बड़ा ख़ज़ाना है। जपो, दरगाह में परवान (स्वीकार) होंगे।

पउड़ी 3

मनु परबोधहु हरि कै नाइ ॥ दह दिसि धावत आवै ठाइ ॥
ता कउ बिघनु न लागै कोइ ॥ जा कै रिदै बसै हरि सोइ ॥
कलि ताती ठांढा हरि नाउ ॥ सिमरि सिमरि सदा सुख पाउ ॥
भउ बिनसै पूरन होइ आस ॥ भगति भाइ आतम परगास ॥
तितु घरि जाइ बसै अबिनासी ॥ कहु नानक काटी जम फासी ॥3॥

मन को हरि के नाम से जगाओ। दसों दिशाओं में भागता मन ठिकाने आ जाता है। जिसके हृदय में हरि बसे, उसे कोई विघ्न नहीं लगता। कलियुग की तपिश में खड़ा है हरि का नाम (शीतलता का स्रोत)। भय मिटता है, आशा पूरी होती है, भक्ति-भाव से आत्मा में प्रकाश होता है। उस घर (ठिकाने, अवस्था) में अविनाशी बसता है। नानक कहते हैं, जम (मृत्यु) की फाँसी कट गई।

पउड़ी 4

ततु बीचारु कहै जनु साचा ॥ जनमि मरै सो काचो काचा ॥
आवा गवनु मिटै प्रभ सेव ॥ आपु तिआगि सरनि गुरदेव ॥
इउ रतन जनम का होइ उधारु ॥ हरि हरि सिमरि प्रान आधारु ॥
अनिक उपाव न छूटनहारे ॥ सिंम्रिति सासत बेद बीचारे ॥
हरि की भगति करहु मनु लाइ ॥ मनि बंछत नानक फल पाइ ॥4॥

“ततु बीचारु कहै जनु साचा”: तत्व-विचार (मूल सत्य का चिंतन) सच्चा जन कहता है। “जनमि मरै सो काचो काचा”: जो जन्मता-मरता रहे, वो कच्चे-से-कच्चा है (अपक्व, अधूरा)। आवा-गवन प्रभु की सेवा से मिटता है। अपना आप त्यागकर गुरुदेव की शरण लो। ऐसे ही इस रत्न-जन्म (बहुमूल्य मनुष्य शरीर) का उद्धार होता है। हरि सिमरन ही प्राणों का आधार है।

“अनिक उपाव न छूटनहारे, सिंम्रिति सासत बेद बीचारे”: अनगिनत उपाय, स्मृतियाँ, शास्त्र, वेद विचारने से भी छुटकारा नहीं। हरि की भक्ति मन लगाकर करो, मन की इच्छा का फल मिलेगा।

पउड़ी 5

संगि न चालसि तेरै धना ॥ तूं किआ लपटावहि मूरख मना ॥
सुत मीत कुटंब अरु बनिता ॥ इन ते कहहु तुम कवन सनाथा ॥
राज रंग माइआ बिसथार ॥ इन ते कहहु कवन छुटकार ॥
असु हसती रथ असवारी ॥ झूठा डंफु झूठु पासारी ॥
जिनि दीए तिसु बुझै न बिगाना ॥ नामु बिसारि नानक पछुताना ॥5॥

“संगि न चालसि तेरै धना”: आपका धन आपके साथ नहीं चलेगा। “तूं किआ लपटावहि मूरख मना”: हे मूर्ख मन, आप क्यों लिपट रहा है? बेटे, मित्र, परिवार, पत्नी, इनसे क्या सहारा? राज, रंग, माया का विस्तार, इनसे कौन-सा छुटकारा? घोड़े, हाथी, रथ, सवारी, झूठा दिखावा, झूठा पसारा। “जिनि दीए तिसु बुझै न बिगाना”: जिसने ये सब दिए, उसे अनजान (बिगाना) नहीं पहचानता। “नामु बिसारि नानक पछुताना”: नाम बिसारकर पछताता है।

पउड़ी 6

गुर की मति तूं लेहि इआने ॥ भगति बिना बहु डूबे सिआने ॥
हरि की भगति करहु मन मीत ॥ निरमल होइ तुम॑ारो चीत ॥
चरन कमल राखहु मन माहि ॥ जनम जनम के किलबिख जाहि ॥
आपि जपहु अवरा नामु जपावहु ॥ सुनत कहत रहत गति पावहु ॥
सार भूत सति हरि को नाउ ॥ सहजि सुभाइ नानक गुन गाउ ॥6॥

“गुर की मति तूं लेहि इआने”: हे अज्ञानी, गुरु की बुद्धि ले। “भगति बिना बहु डूबे सिआने”: भक्ति के बिना बड़े-बड़े सयाने डूब गए। हरि की भक्ति करो, चित्त निर्मल होंगे। चरण-कमल मन में रखो, जन्मों-जन्मों के पाप जाएँगे। ख़ुद जपो, दूसरों को जपवाओ। सुनते, कहते, रहते (जीवन जीते) गति (मुक्ति) पाएँगे। “सार भूत सति हरि को नाउ”: सारतत्व, सच, हरि का नाम है। सहज स्वभाव से गुण गाओ।

पउड़ी 7

गुन गावत तेरी उतरसि मैलु ॥ बिनसि जाइ हउमै बिखु फैलु ॥
होहि अचिंतु बसै सुख नालि ॥ सासि ग्रासि हरि नामु समालि ॥
छाडि सिआनप सगली मना ॥ साधसंगि पावहि सचु धना ॥
हरि पूंजी संचि करहु बिउहारु ॥ ईहा सुखु दरगह जैकारु ॥
सरब निरंतरि एको देखु ॥ कहु नानक जा कै मसतकि लेखु ॥7॥

गुण गाते-गाते मैल उतरेगा। अहंकार-विष का फैलाव नष्ट होंगे। अचिंत (चिंता-मुक्त) होकर सुख के साथ बसोगे। साँस-ग्रास हरि नाम सँभालो। “छाडि सिआनप सगली मना”: हे मन, सारी चतुराई छोड़। साधसंगत में सच्चा धन पाएँगे। हरि की पूँजी इकट्ठी करो और व्यापार करो। इधर (इस जन्म में) सुख, दरगाह में जयकार (विजय)। सबके अंदर एक ही को देखो। नानक कहते हैं, जिसके माथे पर लेख (तक़दीर) हो (वो ही ये देख पाता है)।

पउड़ी 8

एको जपि एको सालाहि ॥ एकु सिमरि एको मन आहि ॥
एकस के गुन गाउ अनंत ॥ मनि तनि जापि एक भगवंत ॥
एको एकु एकु हरि आपि ॥ पूरन पूरि रहिओ प्रभु बिआपि ॥
अनिक बिसथार एक ते भए ॥ एकु अराधि पराछत गए ॥
मन तन अंतरि एकु प्रभु राता ॥ गुर प्रसादि नानक इकु जाता ॥8॥19॥

उन्नीसवीं अष्टपदी का समापन “एक” शब्द की आवृत्ति से होता है: एक को जपो, एक की प्रशंसा करो, एक को सिमरो, एक ही मन में रखो। एक के अनंत गुण गाओ। मन-तन से एक भगवंत जपो। एक ही एक, हरि ख़ुद, पूर्ण रूप से व्याप्त। अनेक विस्तार एक से हुए, एक की आराधना से सारे बंधन गए। मन-तन में एक ही प्रभु रचा-बसा। गुरु की कृपा से नानक ने एक ही को जाना। ये “एक” का जाप पूरी उन्नीसवीं अष्टपदी का निचोड़ है: सब अनेकता एक से निकली है, एक में ही लौटती है।