अष्टपदी 2

श्लोक
सरणि तुम॑ारी आइओ नानक के प्रभ साथ ॥1॥
पउड़ी 1
पउड़ी 2
“सगल स्रिसटि को राजा दुखीआ”: सारी सृष्टि का राजा भी दुखी है। अगर राजा भी दुखी है, तो दुख का इलाज पैसे, ताक़त, या रुतबे में नहीं। “अनिक माइआ रंग तिख न बुझावै”: माया के अनगिनत रंग-तमाशे प्यास नहीं बुझाते। ये नमकीन पानी पीने जैसा है: जितना पीओ, उतनी और लगती है।
“जिह मारगि इहु जात इकेला”: जिस रास्ते पर इंसान अकेला जाता है (मृत्यु का रास्ता), वहाँ भी नाम साथ चलता है। एक व्यापारी के पास बहुत सारा सोना था। नदी में बाढ़ आ गई और नाव डूबने लगी। नाव वाले ने कहा, “सोना फेंको, वरना डूब जाएँगे।” व्यापारी ने सोना पकड़े रखा और डूब गया। दूसरा आदमी, जिसके पास कुछ नहीं था सिवाय ईश्वर के नाम के, वो तैरकर पार हो गया। जिस रास्ते पर सब कुछ छूट जाता है, वहाँ सिर्फ़ नाम काम आता है।
पउड़ी 3
लाखों-करोड़ों प्रयत्नों से छुटकारा नहीं मिलता, लेकिन नाम जपने से पार हो जाते हैं। “तत्काल उधारै”: “तत्काल” (फ़ौरन), देर नहीं लगती।
“हउ मैला मलु कबहु न धोवै”: अहंकार (“हउ”) का मैल कभी नहीं धुलता, किसी भी बाहरी तरीक़े से। तीर्थ में नहाने से नहीं, उपवास करने से नहीं, दान देने से नहीं। सिर्फ़ नाम करोड़ों पापों को धो देता है। और ये नाम मिलता है “साध कै संगि”, संत की संगत में।
पउड़ी 4
“जिह मारग के गने जाहि न कोसा, हरि का नामु ऊहा संगि तोसा”: जिस राह के कोस गिने न जा सकें, वहाँ हरि का नाम ही साथ की रसद है। ज़िंदगी का सफ़र लंबा है, गिनती से बाहर, और गुरु जी कहते हैं कि इस सफ़र में जो पूँजी साथ जाती है वो नाम है।
“जिह पैडै महा अंध गुबारा, हरि का नामु संगि उजीआरा”: जिस रास्ते पर घोर अँधेरा हो, वहाँ नाम ही रोशनी है। “जहा पंथि तेरा को न सिञानू”: जहाँ कोई पहचान वाला न हो, वहाँ नाम ही पहचानने वाला साथी है।
“जह महा भइआन तपति बहु घाम, तह हरि के नाम की तुम ऊपरि छाम”: जहाँ भयानक तपन और धूप हो, वहाँ नाम की छाया सिर पर है। “जहा त्रिखा मन तुझु आकरखै, तह नानक हरि हरि अंम्रितु बरखै”: जहाँ माया की प्यास मन को खींचे, वहाँ हरि नाम का अमृत बरसता है। रसद, रोशनी, साथी, छाया, बरखा, पाँच ज़रूरतें, एक ही सामान।
पउड़ी 5
“भगत जना की बरतनि नामु”: भक्तों की बरतन (दैनिक उपयोग की चीज़) नाम है। जैसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बरतन ज़रूरी हैं, वैसे ही भक्तों के लिए नाम रोज़ की ज़रूरत है। “हरि हरि अउखधु साध कमाति”: नाम वो औषधि (दवाई) है जो संतों की कमाई है। “पारब्रहमि जन कीनो दान”: ये दान ईश्वर ने ख़ुद दिया है, कोई ख़ुद कमाकर नहीं लाता।
पउड़ी 6
नाम ही मुक्ति है, नाम ही तृप्ति है, नाम ही रूप-रंग है, नाम ही शोभा है, नाम ही भोग और योग दोनों है। इंसान जो कुछ भी ढूँढता है, चाहे भौतिक सुख हो या आत्मिक मुक्ति, वो सब एक ही जगह मिलता है: नाम में। ये दो अलग दुनियाएँ नहीं हैं, ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
पउड़ी 7
“ओति पोति जन हरि रसि राते”: ताने-बाने की तरह भक्त हरि के रस में रँगे हैं। जैसे कपड़े में ताना और बाना अलग नहीं किए जा सकते, वैसे ही भक्त और नाम को अलग नहीं किया जा सकता। “हरि का भगतु प्रगट नही छपै”: ये अंदरूनी बदलाव इतना गहरा होता है कि बाहर दिखने लगता है। जैसे सुबह का सूरज चाहे भी छिपना चाहे तो नहीं छिप सकता।
“नानक जन संगि केते तरे”: ऐसे भक्तों की संगत में और भी कितने ही तर जाते हैं। सिमरन व्यक्तिगत होने के साथ-साथ दूसरों को भी पार लगाता है।
पउड़ी 8
“पारजातु इहु हरि को नाम”: हरि का नाम पारिजात वृक्ष है, वो पौराणिक कल्प-वृक्ष जो हर इच्छा पूरी करता है। “कामधेन हरि हरि गुण गाम”: हरि के गुण गाना कामधेनु (इच्छा-पूरक गाय) है।
“नामु सुनत दरद दुख लथा”: नाम सुनते ही दर्द और दुख उतर जाते हैं। “सुनत” (सुनते ही) पर ध्यान दें: सिर्फ़ सुनने मात्र से ही असर शुरू हो जाता है। “नाम तुलि कछु अवरु न होइ”: नाम की तुलना में और कुछ भी नहीं।
ये दूसरी अष्टपदी का निष्कर्ष है। ज़िंदगी के हर अँधेरे कोने में, हर कठिन मोड़ पर, जब सब छूट जाता है, तब भी नाम साथ रहता है। पारिजात वृक्ष और कामधेनु की उपमा से स्पष्ट किया कि नाम में सब कुछ है।
गुरु जी एक-एक करके उन जगहों को गिनाते हैं जहाँ इंसान बिल्कुल अकेला होता है। जहाँ माता, पिता, बेटा, दोस्त, भाई कोई नहीं होता, वहाँ नाम ही साथी है। जहाँ यमराज के भयानक दूत घेर लेते हैं, वहाँ भी सिर्फ़ नाम साथ चलता है। जहाँ मुश्किल बहुत भारी हो, वहाँ नाम पल-भर में बचाव कर देता है।
“अनिक पुनहचरन करत नही तरै”: अनगिनत प्रायश्चित करने से भी पार नहीं होता, लेकिन “हरि को नामु कोटि पाप परहरै”: नाम करोड़ों पापों को दूर कर देता है। बाहरी प्रायश्चित की सीमा है, नाम की शक्ति असीम है।