लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अष्टपदी 3 · बाहरी कर्मकांड की सीमा

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 3 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 10 मिनट

अष्टपदी 3

बाहरी कर्मकांड की सीमा
पहली दो अष्टपदियों ने नाम की महिमा बताई। अब तीसरी अष्टपदी में गुरु जी एक कठोर सत्य सामने रखते हैं: बाहरी धार्मिक क्रियाओं से, बिना अंदरूनी बदलाव के, कुछ नहीं होता।
अगर आप रोज़ meditation करें, प्राणायाम करें, पूजा पाठ करें, तीर्थ यात्रा करें - अगर अंदर से बदलाव नहीं ं, तो कोई फायदा नहीं होंगे इन सब activities का।

श्लोक

बहु सासत्र बहु सिम्रिती पेखे सरब ढढोलि ॥
पूजसि नाही हरि हरे नानक नाम अमोल ॥1॥
बहुत शास्त्र देखे, बहुत स्मृतियाँ छान मारीं, सब खँगाल डाला, लेकिन हरि के अमूल्य नाम की बराबरी कुछ नहीं कर सकता। ये श्लोक पूरी तीसरी अष्टपदी का सार है: बाहरी ज्ञान और कर्मकांड की एक सीमा है। असली चीज़ नाम है।

पउड़ी 1

जाप ताप गिआन सभि धिआन ॥ खट सासत्र सिम्रिति वखिआन ॥
जोग अभिआस करम ध्रम किरिआ ॥ सगल तिआगि बन मधे फिरिआ ॥
अनिक प्रकार कीए बहु जतना ॥ पुंन दान होमे बहु रतना ॥
सरीरु कटाइ होमै करि राती ॥ वरत नेम करै बहु भाती ॥
नही तुलि राम नाम बीचार ॥ नानक गुरमुखि नामु जपीऐ इक बार ॥1॥

गुरु जी एक लंबी सूची गिनाते हैं: जाप, तप, ज्ञान, ध्यान, छह शास्त्रों का अध्ययन, स्मृतियों की व्याख्या, योगाभ्यास, कर्मकांड, सब कुछ त्यागकर जंगल में भटकना, दान-पुण्य, हवन, शरीर को कष्ट देना, व्रत-नियम। ये सब कर लो, सब।

और फिर एक पंक्ति में सब उलट देते हैं: “नही तुलि राम नाम बीचार”, इन सबकी तुलना राम नाम के विचार (चिंतन) से नहीं। “नानक गुरमुखि नामु जपीऐ इक बार”: गुरमुख बनकर एक बार भी नाम जप लो, तो वो सब कुछ से ज़्यादा है।

ये बात सुनने में सरल लगती है, लेकिन इसकी गहराई बहुत है। गुरु जी कर्मकांड के ख़िलाफ़ नहीं हैं, वो कह रहे हैं कि बिना अंदरूनी प्रेम और चेतना के ये सब खोखले हैं। जैसे बिना पानी के बादल गरजता तो है, लेकिन फ़सल नहीं उगती।

पउड़ी 2

नउ खंड प्रिथमी फिरै चिरु जीवै ॥ महा उदासु तपीसरु थीवै ॥
अगनि माहि होमत परान ॥ कनिक अस्व हैवर भूमि दान ॥
निउली करम करै बहु आसन ॥ जैन मारग संजम अति साधन ॥
निमख निमख करि सरीरु कटावै ॥ तउ भी हउमै मैलु न जावै ॥
हरि के नाम समसरि कछु नाहि ॥ नानक गुरमुखि नामु जपत गति पाहि ॥2॥

गुरु जी और आगे जाते हैं: चाहे नौ खंड पृथ्वी घूम लो, चिरंजीवी बन जाएँ, महान उदासी (संन्यासी) बन जाएँ, अग्नि में प्राण होम कर दो, सोना, घोड़े, ज़मीन दान कर दो, जैन मार्ग के संयम और कठिन साधन कर लो, पल-पल शरीर कटवाते रहो।

“तउ भी हउमै मैलु न जावै”: फिर भी अहंकार का मैल नहीं जाता। ये तीखी बात है। गुरु जी कह रहे हैं कि ये सारी कठिन तपस्या भी अहंकार के मैल को नहीं धो सकती। क्यों? क्योंकि बहुत बार ये तपस्या ख़ुद अहंकार का कारण बन जाती है: “मैंने इतना कठिन व्रत रखा, मैंने इतना दान दिया, मैंने इतनी तपस्या की।” ये “मैंने” ही तो अहंकार है।

पउड़ी 3

मन कामना तीरथ देह छुटै ॥ गरबु गुमानु न मन ते हुटै ॥
सोच करै दिनसु अरु राति ॥ मन की मैलु न तन ते जाति ॥
इसु देही कउ बहु साधना करै ॥ मन ते कबहू न बिखिआ टरै ॥
जलि धोवै बहु देह अनीति ॥ सुध कहा होइ काची भीति ॥
मन हरि के नाम की महिमा ऊच ॥ नानक नामि उधरे पतित बहु मूच ॥3॥

“मन कामना तीरथ देह छुटै”: मन में कामना (इच्छा) रखकर तीर्थ जाएँ तो शरीर भले ही छूटे (थक जाए), लेकिन गर्व और अभिमान मन से नहीं हटता। “सोच करै दिनसु अरु राति”: दिन-रात शुद्धि करो (स्नान, शौच, सफ़ाई), मन का मैल तन से नहीं जाता।

“जलि धोवै बहु देह अनीति, सुध कहा होइ काची भीति”: पानी से शरीर को बार-बार धोओ, कच्ची दीवार कहाँ शुद्ध होगी? ये सटीक उपमा है। कच्ची मिट्टी की दीवार को जितना पानी डालो, वो और गलती है, मज़बूत नहीं होती। ठीक वैसे ही, बाहरी शुद्धि से मन का मैल और फैलता है, क्योंकि इंसान सोचता है “मैं तो शुद्ध हो गया” और ये सोच ख़ुद मैल है।

“नानक नामि उधरे पतित बहु मूच”: नाम से बहुत-से पतित (गिरे हुए, पापी) उधर गए हैं। ये आशा की बात है: गुरु जी कह रहे हैं कि चाहे आप कितने ही गिरे हैं, नाम आपको उठा सकता है।

पउड़ी 4

बहुतु सिआणप जम का भउ बिआपै ॥ अनिक जतन करि त्रिसन ना ध्रापै ॥
भेख अनेक अगनि नही बुझै ॥ कोटि उपाव दरगह नही सिझै ॥
छूटसि नाही ऊभ पइआलि ॥ मोहि बिआपहि माइआ जालि ॥
अवर करतूति सगली जमु डानै ॥ गोविंद भजन बिनु तिलु नही मानै ॥
हरि का नामु जपत दुखु जाइ ॥ नानक बोलै सहजि सुभाइ ॥4॥

“बहुतु सिआणप जम का भउ बिआपै”: बहुत चतुराई करने पर भी यम का भय लगा रहता है। “भेख अनेक अगनि नही बुझै”: अनेक वेष (भेष) बदलने से अंदर की अग्नि (तृष्णा, विकार) नहीं बुझती। कोई साधु का वेष ले ले, कोई संन्यासी बन जाए, लेकिन अंदर अगर वही आग जल रही है तो कपड़े बदलने से क्या होंगे?

“अवर करतूति सगली जमु डानै, गोविंद भजन बिनु तिलु नही मानै”: बाक़ी सारे काम यम डाँटता है (स्वीकार नहीं करता)। गोविंद के भजन के बिना तिल-भर भी नहीं मानता। ये ऐसा है जैसे कोई परीक्षा में ग़लत विषय की कॉपी भर ले, बहुत मेहनत की, लेकिन सवाल का जवाब तो दिया ही नहीं।

“नानक बोलै सहजि सुभाए”: नानक सहज स्वभाव से (बिना किसी दिखावे के, सरलता से) कहते हैं: नाम जपो, दुख जाएगा।

पउड़ी 5

चारि पदारथ जे को मागै ॥ साध जना की सेवा लागै ॥
जे को आपुना दूखु मिटावै ॥ हरि हरि नामु रिदै सद गावै ॥
जे को अपुनी सोभा लोरै ॥ साधसंगि इह हउमै छोरै ॥
जे को जनम मरण ते डरै ॥ साध जना की सरनी परै ॥
जिसु जन कउ प्रभ दरस पिआसा ॥ नानक ता कै बलि बलि जासा ॥5॥

अब गुरु जी सीधे-सीधे बताते हैं कि अगर आपको ये चाहिए, तो ये करो:

अगर चार पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) चाहिए, तो साध जनों की सेवा करो। अगर अपना दुख मिटाना है, तो हरि का नाम गाओ। अगर अपनी शोभा (इज़्ज़त) चाहते हैं, तो साधसंगत में अहंकार छोड़ो। अगर जन्म-मरण से डरते हैं, तो संतों की शरण में जाएँ।

हर जवाब में या तो “नाम” है या “साध जना की सेवा/संगत” है। गुरु जी बार-बार इन्हीं दो बातों पर लौटते हैं। और अंत में: “जिसु जन कउ प्रभ दरस पिआसा, नानक ता कै बलि बलि जासा”: जो प्रभु के दर्शन का प्यासा है, नानक उस पर बलिहारी जाते हैं।

पउड़ी 6

सगल पुरख महि पुरखु प्रधानु ॥ साधसंगि जा का मिटै अभिमानु ॥
आपस कउ जो जाणै नीचा ॥ सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा ॥
जा का मनु होइ सगल की रीना ॥ हरि हरि नामु तिनि घटि घटि चीना ॥
मन अपुने ते बुरा मिटाना ॥ पेखै सगल स्रिसटि साजना ॥
सूख दूख जन सम द्रिसटेता ॥ नानक पाप पुंन नही लेपा ॥6॥

“आपस कउ जो जाणै नीचा, सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा”: जो अपने आप को नीचा (छोटा) जाने, वही सबसे ऊँचा गिना जाता है। ये सुखमनी साहिब की प्रसिद्ध पंक्तियों में से है। ये विरोधाभास (paradox) है जो सारे धर्मों में मिलता है: ऊँचाई नीचे होने में है।

“जा का मनु होइ सगल की रीना”: जिसका मन सबके चरणों की धूल (रीना) बन जाए। “मन अपुने ते बुरा मिटाना, पेखै सगल स्रिसटि साजना”: अपने मन से बुराई मिटा ली, अब सारी सृष्टि में उसे सज्जन (अपने) दिखते हैं।

“सूख दूख जन सम द्रिसटेता”: सुख-दुख को समान दृष्टि से देखता है। “पाप पुंन नही लेपा”: पाप-पुण्य का लेप उस पर नहीं लगता। ये कर्म से ऊपर उठने की बात है, जहाँ इंसान करता सब कुछ है लेकिन “मैंने किया” का बोध नहीं रहता। 

गाँव में दो कुएँ थे। एक कुआँ कहता था, “मैं बहुत गहरा हूँ, मेरा पानी बहुत मीठा है।” लोग आते, पानी पीते, लेकिन कुएँ का गर्व बढ़ता जाता। दूसरा कुआँ चुपचाप पानी देता रहता, न कोई दावा, न कोई शोर। धीरे-धीरे पहले कुएँ का पानी कड़वा हो गया और दूसरे का और मीठा। गुरु जी कहते हैं: जो अपने आप को नीचा जाने, वही सबसे ऊँचा है।

पउड़ी 7

निरधन कउ धनु तेरो नाउ ॥ निथावे कउ नाउ तेरा थाउ ॥
निमाने कउ प्रभ तेरो मानु ॥ सगल घटा कउ देवहु दानु ॥
करन करावनहार सुआमी ॥ सगल घटा के अंतरजामी ॥
अपनी गति मिति जानहु आपे ॥ आपन संगि आपि प्रभ राते ॥
तुम॑री उसतति तुम ते होइ ॥ नानक अवरु न जानसि कोइ ॥7॥

ये पउड़ी एक सुंदर प्रार्थना है। “निरधन कउ धनु तेरो नाउ”: निर्धन (ग़रीब) के लिए आपका नाम ही धन है। “निथावे कउ नाउ तेरा थाउ”: बेघर के लिए आपका नाम ही ठिकाना है। “निमाने कउ प्रभ तेरो मानु”: अपमानित के लिए आपका नाम ही सम्मान है।

गुरु जी ने तीन तरह की ग़रीबी बताई: धन की ग़रीबी, ठिकाने की ग़रीबी, और इज़्ज़त की ग़रीबी। और तीनों का इलाज एक ही है: नाम। “तुम॑री उसतति तुम ते होइ”: आपकी स्तुति आपसे ही हैं सकती है। कोई और आपकी पूरी महिमा बयान नहीं कर सकता।

पउड़ी 8

सरब धरम महि स्रेसट धरमु ॥ हरि को नामु जपि निरमल करमु ॥
सगल क्रिआ महि ऊतम किरिआ ॥ साधसंगि दुरमति मलु हिरिआ ॥
सगल उदम महि उदमु भला ॥ हरि का नामु जपहु जीअ सदा ॥
सगल बानी महि अंम्रित बानी ॥ हरि को जसु सुनि रसन बखानी ॥
सगल थान ते ओहु ऊतम थानु ॥ नानक जिह घटि वसै हरि नामु ॥8॥3॥

“सरब धरम महि स्रेसट धरमु, हरि को नामु जपि निरमल करमु”: सारे धर्मों में श्रेष्ठ धर्म यही है कि हरि का नाम जपें और आचरण निर्मल रखें। इस पउड़ी की बनावट देखिए, हर दो पंक्तियों में पहले एक कसौटी रखी जाती है, फिर उस पर सबसे ऊँची चीज़ का नाम लिया जाता है।

“सगल क्रिआ महि ऊतम किरिआ, साधसंगि दुरमति मलु हिरिआ”: सारी क्रियाओं में उत्तम क्रिया वो है जिससे साधसंगत में बुरी मति की मैल धुल जाए। “सगल उदम महि उदमु भला”: सारे उद्यमों में भला उद्यम, सदा हरि का नाम जपना। “सगल बानी महि अंम्रित बानी”: सारी वाणियों में अमृत वाणी वो है जिसमें हरि का यश सुना और जिह्वा से बखाना जाए।

“सगल थान ते ओहु ऊतम थानु, नानक जिह घटि वसै हरि नामु”: सब स्थानों से उत्तम स्थान वो हृदय है जिसमें हरि का नाम बसता है। तीर्थ बाहर ढूँढने की चीज़ नहीं रहे, वो हृदय बन गया जहाँ नाम बसा।