लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अष्टपदी 1 · सिमरन की महिमा

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 1 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 10 मिनट

अष्टपदी 1

सिमरन की महिमा
नाम-सिमरन (ईश्वर के नाम का स्मरण) पूरी सुखमनी साहिब की नींव है। पहली अष्टपदी इसी नींव को रखती है।
शीर्षक “शान्ति याद की जाती है, ढूँढी नहीं जाती”: भीड़ भरी मेट्रो में फ़ोन में डूबे यात्रियों के बीच आँखें मूँदे शान्त खड़ी एक युवती

श्लोक

आदि गुरए नमह ॥
जुगादि गुरए नमह ॥
सतिगुरए नमह ॥
स्री गुरदेवए नमह ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी पूरी रचना की शुरुआत चार नमस्कार से करते हैं। ये चार नमस्कार उस एक अकाल पुरख (पुरख यानी पुरुष = ईश्वर) के चार रूपों को प्रणाम हैं: जो आदि-काल से गुरु है, जो युगों-युगों से गुरु है, जो सत्य-स्वरूप गुरु है, और जो दिव्य प्रकाश वाला गुरु है। कुछ विद्वान इसे पहले चार गुरु साहिबान के प्रति प्रणाम मानते हैं। लेकिन गुरु अर्जन देव जी की दृष्टि में गुरु और ईश्वर में भेद नहीं। जो ज्योति सब गुरुओं में प्रकाशित है, वो एक ही अकाल पुरख की ज्योति है।
रहाउ: यानी केंद्रीय भाव
सुखमनी सुख अम्रित प्रभ नामु ॥
भगत जना कै मनि बिसरामु ॥ रहाउ ॥
ये “रहाउ” पंक्ति पूरी सुखमनी साहिब की चाबी है। जैसे किसी गीत में कोई पंक्ति बार-बार लौटती है, वैसे ही ये भाव पूरी रचना में गूँजता रहेगा। गुरु जी कहते हैं: सुखमनी यानी मन की शान्ति, सुख-अमृत, ये सब प्रभु के नाम में है। और ये नाम भक्तजनों के मन में बसता है, ठहरता है। शान्ति बाहर नहीं मिलती, वो अंदर पहले से मौजूद है। बस परतें हटानी हैं।

पउड़ी 1

सिमरउ सिमरि सिमरि सुखु पावउ ॥ कलि कलेस तन माहि मिटावउ ॥
सिमरउ जासु बिसुंभर एकै ॥ नामु जपत अगनत अनेकै ॥
बेद पुरान सिंम्रिति सुधाख्यर ॥ कीने राम नाम इक आख्यर ॥
किनका एक जिसु जीअ बसावै ॥ ता की महिमा गनी न आवै ॥
कांखी एकै दरस तुहारो ॥ नानक उन संगि मोहि उधारो ॥1॥

पहली पंक्ति में गुरु जी “सिमरउ” तीन बार दोहराते हैं। ये दोहराव बिना वजह नहीं। जैसे कोई माँ बच्चे को कहती है “पढ़, पढ़, पढ़”, उसमें ज़ोर है, तड़प है। सिमरन एक बार का काम होता तो दोहराने की क्या ज़रूरत, ये असल में जीने का तरीक़ा है। “सिमरन” का मतलब सिर्फ़ माला फेरना समझ लेना अधूरा है, असली अर्थ है याद रखना, उस चेतना में डूब जाना।

“बिसुंभर” संस्कृत के “विश्वम्भर” से आया है, जो पूरे विश्व को धारण करता है। उसका नाम अनगिनत लोग जपते हैं, चाहे कोई “राम” कहे, कोई “अल्लाह”, कोई “वाहेगुरु”, सब उसी एक को पुकार रहे हैं।

“बेद पुरान सिम्रिति सुधाखर, कीने राम नाम इक आखर”: हज़ारों पन्ने, सैकड़ों ग्रंथ, युगों का ज्ञान, इन सबने मिलकर बस एक बात कही है: राम का नाम लो। जैसे एक बड़ा पेड़ एक छोटे-से बीज से निकलता है, वैसे ही सारा ज्ञान एक नाम से निकलता है।

“किनका एक”: एक ज़र्रा-भर भी अगर कोई इस नाम को दिल में बसा ले, तो उसकी महिमा अनगिनत हो जाती है। गुरु जी ये नहीं कहते कि तपस्वी बनो, जंगलों में जाएँ। कहते हैं, एक कण भी सच्चे दिल से रख लो, काफ़ी है।

पउड़ी का अंत निजी प्रार्थना से होता है: जो आपके दर्शन के लिए तड़पते हैं, उनकी संगत में मुझे भी तार दो। गुरु जी, जो पाँचवें गुरु हैं, ख़ुद कहते हैं “मुझे भी उनकी संगत में रख दो।” जब गुरु ख़ुद याचक (माँगने वाला) बने, तो हमारा अहंकार कहाँ ठहरेगा?

 

पउड़ी 2

सुखमनी सुख अंम्रित प्रभ नामु ॥ भगत जना कै मनि बिस्राम ॥ रहाउ ॥
प्रभ कै सिमरनि गरभि न बसै ॥ प्रभ कै सिमरनि दूखु जमु नसै ॥
प्रभ कै सिमरनि कालु परहरै ॥ प्रभ कै सिमरनि दुसमनु टरै ॥
प्रभ सिमरत कछु बिघनु न लागै ॥ प्रभ कै सिमरनि अनदिनु जागै ॥
प्रभ कै सिमरनि भउ न बिआपै ॥ प्रभ कै सिमरनि दुखु न संतापै ॥
प्रभ का सिमरनु साध कै संगि ॥ सरब निधान नानक हरि रंगि ॥2॥

हर पंक्ति “प्रभ कै सिमरनि” से शुरू होती है, जैसे ढोल पर एक ही ताल बार-बार बजे, और हर बार थोड़ा गहरा उतरे। सिमरन से जन्म-मरण का चक्र टूटता है। दुख और यम का डर भाग जाता है। काल हट जाता है। दुश्मन, बाहर के भी और अंदर के भी (काम, क्रोध, लोभ), दूर हो जाते हैं। कोई विघ्न नहीं लगता। अज्ञान की नींद टूट जाती है। भय नहीं सताता। दुख नहीं तपाता।

और आख़िर में: ये सिमरन साधू की संगत में गहरा होता है। जैसे एक कोयले को अकेला रख दो तो बुझ जाता है, लेकिन दूसरे जलते कोयलों के बीच रखो तो दहकता रहता है। “सरब निधान नानक हरि रंगि”: सारे ख़ज़ाने हरि के प्रेम में हैं।

पउड़ी 3

प्रभ कै सिमरनि रिधि सिधि नउ निधि ॥ प्रभ कै सिमरनि गिआनु धिआनु ततु बुधि ॥
प्रभ कै सिमरनि जप तप पूजा ॥ प्रभ कै सिमरनि बिनसै दूजा ॥
प्रभ कै सिमरनि तीरथ इसनानी ॥ प्रभ कै सिमरनि दरगह मानी ॥
प्रभ कै सिमरनि होइ सु भला ॥ प्रभ कै सिमरनि सुफल फला ॥
से सिमरहि जिन आपि सिमराए ॥ नानक ता कै लागउ पाए ॥3॥

सिमरन में सब कुछ है: ऋद्धि-सिद्धि, नौ निधियाँ, ज्ञान, ध्यान, तत्व-बुद्धि। सिमरन ही जप है, तप है, पूजा है। और सबसे बड़ी बात: “बिनसै दूजा”, द्वैत ख़त्म हो जाता है। ये “दूजा” यहाँ “दूसरा देवता” से कहीं गहरा है, ये वो मन की फाँक है जो कहती है “मैं अलग हूँ, ईश्वर अलग है।”

“से सिमरहि जिन आपि सिमराए”: सिमरन वही करते हैं जिन्हें ख़ुद ईश्वर ने सिमरन करवाया। सिमरन को हम अपनी उपलब्धि समझ बैठते हैं, असल में ये ईश्वर की कृपा है। और नानक ऐसे लोगों के चरणों में झुकते हैं।

पउड़ी 4

प्रभ का सिमरनु सभ ते ऊचा ॥ प्रभ कै सिमरनि उधरे मूचा ॥
प्रभ कै सिमरनि त्रिसना बुझै ॥ प्रभ कै सिमरनि सभु किछु सुझै ॥
प्रभ कै सिमरनि नाही जम त्रासा ॥ प्रभ कै सिमरनि पूरन आसा ॥
प्रभ कै सिमरनि मन की मलु जाइ ॥ अंम्रित नामु रिद माहि समाइ ॥
प्रभ जी बसहि साध की रसना ॥ नानक जन का दासनि दसना ॥4॥

सिमरन सबसे ऊँचा है। “त्रिसना बुझै”: तृष्णा बुझ जाती है। ये वो अंदरूनी खालीपन है जो इंसान हर चीज़ से भरने की कोशिश करता है। “मन की मलु जाइ, अंम्रित नामु रिद माहि समाइ”: पहले मैल जाता है, फिर नाम भरता है। जैसे बर्तन पहले साफ़ करो, तब दूध डालो।

“नानक जन का दासनि दसना”: नानक भक्तों के दासों का भी दास है। ये विनम्रता का शिखर है। एक बादशाह के दरबार में सबसे ज़्यादा इज़्ज़त किसकी होती है? जो बादशाह के सबसे क़रीब हो। और बादशाह के सबसे क़रीब वो होता है जो सबसे ज़्यादा झुका हुआ हो: दरबान, सेवक, पानी देने वाला। गुरु जी कहते हैं, मैं भक्तों के सेवकों का भी सेवक बनूँ। ये ऊँचा पद है, नीचे होकर।

पउड़ी 5

प्रभ कउ सिमरहि से धनवंते ॥ प्रभ कउ सिमरहि से पतिवंते ॥
प्रभ कउ सिमरहि से जन परवान ॥ प्रभ कउ सिमरहि से पुरख प्रधान ॥
प्रभ कउ सिमरहि सि बेमुहताजे ॥ प्रभ कउ सिमरहि सि सरब के राजे ॥
प्रभ कउ सिमरहि से सुखवासी ॥ प्रभ कउ सिमरहि सदा अबिनासी ॥
सिमरन ते लागे जिन आपि दइआला ॥ नानक जन की मंगै रवाला ॥5॥

जो प्रभु को सिमरते हैं, वो धनवंत हैं (आत्मिक समृद्धि वाले, बैंक बैलेंस की भाषा में नहीं)। वो इज़्ज़तदार हैं। वो ईश्वर के दरबार में स्वीकार किए हुए हैं। वो किसी के मोहताज नहीं रहते, और इसीलिए “सरब के राजे” कहलाते हैं, क्योंकि जिसे किसी चीज़ की ज़रूरत न रहे, वही असली राजा है। वो सुखी हैं और कभी नष्ट नहीं होने वाले।

और फिर वही बात: सिमरन उन्हीं को मिलता है जिन पर ख़ुद ईश्वर ने दया की। नानक ऐसे जनों के चरणों की धूल माँगते हैं।

 

पउड़ी 6

प्रभ कउ सिमरहि से परउपकारी ॥ प्रभ कउ सिमरहि तिन सद बलिहारी ॥
प्रभ कउ सिमरहि से मुख सुहावे ॥ प्रभ कउ सिमरहि तिन सूखि बिहावै ॥
प्रभ कउ सिमरहि तिन आतमु जीता ॥ प्रभ कउ सिमरहि तिन निरमल रीता ॥
प्रभ कउ सिमरहि तिन अनद घनेरे ॥ प्रभ कउ सिमरहि बसहि हरि नेरे ॥
संत क्रिपा ते अनदिनु जागि ॥ नानक सिमरनु पूरै भागि ॥6॥

सिमरन करने वाले परोपकारी होते हैं। उनके चेहरे पर नूर आता है (“मुख सुहावे”), वो नूर अंदर की शान्ति से आता है। “आतमु जीता”: उन्होंने अपने आप को जीत लिया है, जो कठिन जीत है। उनकी रीति निर्मल है। उनके पास आनंद के भंडार हैं और वो ईश्वर के पास बसते हैं।

“नानक सिमरनु पूरै भागि”: सिमरन पूरे भाग्य से मिलता है, भाग्य यानी कर्म और कृपा का संगम।

 

पउड़ी 7

प्रभ कै सिमरनि कारज पूरे ॥ प्रभ कै सिमरनि कबहु न झूरे ॥
प्रभ कै सिमरनि हरि गुन बानी ॥ प्रभ कै सिमरनि सहजि समानी ॥
प्रभ कै सिमरनि निहचल आसनु ॥ प्रभ कै सिमरनि कमल बिगासनु ॥
प्रभ कै सिमरनि अनहद झुनकार ॥ सुखु प्रभ सिमरन का अंतु न पार ॥
सिमरहि से जन जिन कउ प्रभ मइआ ॥ नानक तिन जन सरनी पइआ ॥7॥

सिमरन से सारे काम पूरे होते हैं। कभी अफ़सोस नहीं होता। “निहचल आसनु”: मन स्थिर हो जाता है। “कमल बिगासनु”: हृदय-कमल खिल जाता है, चेतना का विकास होता है।

“अनहद झुनकार”: अनहद नाद सुनाई देता है, वो आंतरिक ध्वनि जो गहरे ध्यान में सुनाई देती है, बिना किसी चीज़ को ठोके बजने वाली ध्वनि। कमल कीचड़ में उगता है, लेकिन कीचड़ उसे छूता नहीं। ठीक वैसे ही, सिमरन करने वाला इंसान दुनिया में रहता है, कमाता है, परिवार चलाता है, लेकिन दुनिया का मैल उसके मन को नहीं छूता। फूल खिला हुआ है, पानी के ऊपर, धूप की तरफ़। जड़ें कीचड़ में हैं लेकिन सुगंध आकाश में फैलती है।

पउड़ी 8

हरि सिमरनु करि भगत प्रगटाए ॥ हरि सिमरनि लगि बेद उपाए ॥
हरि सिमरनि भए सिध जती दाते ॥ हरि सिमरनि नीच चहु कुंट जाते ॥
हरि सिमरनि धारी सभ धरना ॥ सिमरि सिमरि हरि कारन करना ॥
हरि सिमरनि कीओ सगल अकारा ॥ हरि सिमरन महि आपि निरंकारा ॥
करि किरपा जिसु आपि बुझाइआ ॥ नानक गुरमुखि हरि सिमरनु तिनि पाइआ ॥8॥1॥

आठवीं पउड़ी पहली अष्टपदी का समापन है। यहाँ गुरु जी एक बड़ा दावा करते हैं: सिमरन personal साधना से कहीं आगे जाकर सृष्टि का मूल सिद्धांत बन जाता है। सिमरन से भगत प्रकट हुए। सिमरन से वेदों की रचना हुई। सिमरन से सिद्ध, जती, और दानी पैदा हुए। सिमरन से नीच लोग चारों दिशाओं में प्रसिद्ध हुए, यानी सिमरन जात-पात नहीं देखता।

“हरि सिमरनि धारी सभ धरना”: सिमरन से सारी धरती धारण की गई। “हरि सिमरनि कीओ सगल अकारा”: सारा संसार सिमरन से ही रचा गया। “हरि सिमरन महि आपि निरंकारा”: सिमरन के अंदर ही निराकार ईश्वर ख़ुद बसता है।

निष्कर्ष: “करि किरपा जिसु आपि बुझाइआ, नानक गुरमुखि हरि सिमरनु तिनि पाइआ”: जिसे ईश्वर ने ख़ुद कृपा करके समझाया, उस गुरमुख ने ही सिमरन पाया।

पहली अष्टपदी का सार: सिमरन सबसे ऊँचा है, सबसे गहरा है, और ये मिलता है गुरु की कृपा से।