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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अष्टपदी 18 · सतगुरु और सिख

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 18 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 9 मिनट

अष्टपदी 18

सतगुरु और सिख
अठारहवीं अष्टपदी सतगुरु और सिख (शिष्य) के रिश्ते को गहराई से खोलती है। ये रिश्ता कैसा होना चाहिए, गुरु क्या करता है, सिख को क्या करना चाहिए, इसका पूरा नक़्शा यहाँ है।

श्लोक

सति पुरखु जिनि जानिआ सतिगुरु तिस का नाउ ॥
तिस कै संगि सिखु उधरै नानक हरि गुन गाउ ॥1॥
जिसने सत्य-पुरुष (ईश्वर) को जान लिया, सतगुरु उसी का नाम है। उसकी संगत में सिख (शिष्य) उधर जाता है। नानक कहते हैं, हरि के गुण गाओ। ये श्लोक “सतगुरु” की परिभाषा देता है: सतगुरु वो है जिसने सत्य-पुरुष को जान लिया है। डिग्री, पद, या वंश से नहीं, अनुभव से।

पउड़ी 1

सतिगुरु सिख की करै प्रतिपाल ॥ सेवक कउ गुरु सदा दइआल ॥
सिख की गुरु दुरमति मलु हिरै ॥ गुर बचनी हरि नामु उचरै ॥
सतिगुरु सिख के बंधन काटै ॥ गुर का सिखु बिकार ते हाटै ॥
सतिगुरु सिख कउ नाम धनु देइ ॥ गुर का सिखु वडभागी हे ॥
सतिगुरु सिख का हलतु पलतु सवारै ॥ नानक सतिगुरु सिख कउ जीअ नालि समारै ॥1॥

ये पउड़ी गुरु-सिख के रिश्ते का blueprint है:

सतगुरु सिख की प्रतिपाल (पालन-पोषण) करता है। सेवक पर सदा दयालु है। सिख की दुर्मति (बुरी बुद्धि) का मैल हरता (धोता) है। गुरु के वचनों से हरि नाम उच्चारण होता है। सतगुरु सिख के बंधन काटता है। गुरु का सिख विकारों से हटता (दूर होता) है। सतगुरु सिख को नाम-धन देता है। गुरु का सिख बड़भागी है।

“सतिगुरु सिख का हलतु पलतु सवारै”: सतगुरु सिख का इहलोक (हलतु) और परलोक (पलतु) दोनों सँवारता है। “जीअ नालि समारै”: जीव के साथ (नालि) याद रखता है, यानी कभी नहीं भूलता।

पउड़ी 2

गुर कै ग्रिहि सेवकु जो रहै ॥ गुर की आगिआ मन महि सहै ॥
आपस कउ करि कछु न जनावै ॥ हरि हरि नामु रिदै सद धिआवै ॥
मनु बेचै सतिगुर कै पासि ॥ तिसु सेवक के कारज रासि ॥
सेवा करत होइ निहकामी ॥ तिस कउ होत परापति सुआमी ॥
अपनी क्रिपा जिसु आपि करेइ ॥ नानक सो सेवकु गुर की मति लेइ ॥2॥

“गुर कै ग्रिहि सेवकु जो रहै, गुर की आगिआ मन महि सहै”: जो सेवक गुरु के घर में रहता है और गुरु की आज्ञा मन में सहता है। यहाँ “सहै” शब्द ध्यान देने योग्य है, आज्ञा केवल सुनी नहीं जाती, सही जाती है, जब मन उसके विरुद्ध हो तब भी। “आपस कउ करि कछु न जनावै, हरि हरि नामु रिदै सद धिआवै”: अपने आपको कुछ नहीं जताता, हृदय में सदा हरि नाम ध्याता है।

“मनु बेचै सतिगुर कै पासि, तिसु सेवक के कारज रासि”: जो अपना मन सतगुरु के पास बेच देता है, उस सेवक के कार्य सिद्ध होते हैं। “सेवा करत होइ निहकामी, तिस कउ होत परापति सुआमी”: सेवा करते हुए जो निष्काम रहता है, उसे स्वामी की प्राप्ति होती है।

“अपनी क्रिपा जिसु आपि करेइ, नानक सो सेवकु गुर की मति लेइ”: जिस पर प्रभु आप कृपा करता है, नानक कहते हैं, वही सेवक गुरु की मति लेता है।

पउड़ी 3

बीस बिसवे गुर का मनु मानै ॥ सो सेवकु परमेसुर की गति जानै ॥
सो सतिगुरु जिसु रिदै हरि नाउ ॥ अनिक बार गुर कउ बलि जाउ ॥
सरब निधान जीअ का दाता ॥ आठ पहर पारब्रहम रंगि राता ॥
ब्रहम महि जनु जन महि पारब्रहमु ॥ एकहि आपि नही कछु भरमु ॥
सहस सिआनप लइआ न जाईऐ ॥ नानक ऐसा गुरु बडभागी पाईऐ ॥3॥

“बीस बिसवे गुर का मनु मानै”: बीस बिसवे (सौ प्रतिशत, पूरी तरह) गुरु का मन माने (गुरु पर पूरा भरोसा हो)। “सो सेवकु परमेसुर की गति जानै”: वो सेवक परमेश्वर की गति (अवस्था) जानता है।

“ब्रहम महि जनु जन महि पारब्रहमु”: ब्रह्म में जन (भक्त) है, जन में पारब्रह्म है। “एकहि आपि नही कछु भरमु”: एक ही है, कोई भ्रम नहीं। ये अद्वैत (non-duality) का फिर से दोहराव: गुरु, सिख, और ईश्वर, तीनों अलग नहीं हैं।

“सहस सिआनप लइआ न जाईऐ”: हज़ार चतुराइयों से (गुरु) पाया नहीं जा सकता। “नानक ऐसा गुरु बडभागी पाईऐ”: ऐसा गुरु बड़े भाग्य से मिलता है।

पउड़ी 4

सफल दरसनु पेखत पुनीत ॥ परसत चरन गति निरमल रीति ॥
भेटत संगि राम गुन रवे ॥ पारब्रहम की दरगह गवे ॥
सुनि करि बचन करन आघाने ॥ मनि संतोखु आतम पतीआने ॥
पूरा गुरु अख्यओ जा का मंत्र ॥ अंम्रित द्रिसटि पेखै होइ संत ॥
गुण बिअंत कीमति नही पाइ ॥ नानक जिसु भावै तिसु लए मिलाइ ॥4॥

“सफल दरसनु पेखत पुनीत, परसत चरन गति निरमल रीति”: गुरु का दर्शन सफल है, देखने से पवित्र होते हैं, चरण छूने से ऊँची गति और निर्मल रहनी मिलती है। “भेटत संगि राम गुन रवे, पारब्रहम की दरगह गवे”: उसकी संगत मिलने से राम के गुण गाए जाते हैं और पारब्रह्म की दरगाह तक पहुँच होती है।

“सुनि करि बचन करन आघाने, मनि संतोखु आतम पतीआने”: उसके वचन सुनकर कान तृप्त हो जाते हैं, मन में संतोष आता है, आत्मा पतीज जाती है। कान सुनते ही रहते हैं, भरते कभी नहीं, पर गुरु के वचन से भर जाते हैं।

“पूरा गुरु अख्यओ जा का मंत्र, अंम्रित द्रिसटि पेखै होइ संत”: गुरु पूरा है और उसका मंत्र अटल, जिसे वो अमृत दृष्टि से देखता है वो संत हो जाता है। “गुण बिअंत कीमति नही पाइ, नानक जिसु भावै तिसु लए मिलाइ”: उसके गुण अनंत हैं, कीमत नहीं पड़ती, नानक कहते हैं, जो प्रभु को भाता है उसे गुरु से मिला लेता है।

पउड़ी 5

जिहबा एक उसतति अनेक ॥ सति पुरख पूरन बिबेक ॥ काहू बोल न पहुचत प्रानी ॥
अगम अगोचर प्रभ निरबानी ॥ निराहार निरवैर सुखदाई ॥
ता की कीमति किनै न पाई ॥ अनिक भगत बंदन नित करहि ॥
चरन कमल हिरदै सिमरहि ॥ सद बलिहारी सतिगुर अपने ॥
नानक जिसु प्रसादि ऐसा प्रभु जपने ॥5॥

“जिहबा एक उसतति अनेक, सति पुरख पूरन बिबेक”: जिह्वा एक है और स्तुति अनेक, वो सत्य पुरुष है, पूर्ण विवेक वाला। “काहू बोल न पहुचत प्रानी, अगम अगोचर प्रभ निरबानी”: किसी बोल से प्राणी वहाँ नहीं पहुँचता, प्रभु अगम है, इंद्रियों से परे, वासना से रहित।

“निराहार निरवैर सुखदाई, ता की कीमति किनै न पाई”: उसे किसी आहार की ज़रूरत नहीं, वो वैर से रहित है, सुख देने वाला है, उसकी कीमत किसी ने नहीं पाई। “अनिक भगत बंदन नित करहि, चरन कमल हिरदै सिमरहि”: अनेक भक्त नित्य उसे नमन करते हैं, उसके कमल चरणों को हृदय में सिमरते हैं।

“सद बलिहारी सतिगुर अपने, नानक जिसु प्रसादि ऐसा प्रभु जपने”: अपने सतगुरु पर सदा बलिहार, नानक कहते हैं, जिसकी कृपा से ऐसा प्रभु जपा जाता है। पउड़ी प्रभु की महिमा से शुरू होती है और गुरु के आभार पर समाप्त, क्योंकि अगम तक जो ले गया, वो गुरु है।

पउड़ी 6

इहु हरि रसु पावै जनु कोइ ॥ अंम्रितु पीवै अमरु सो होइ ॥
उसु पुरख का नाही कदे बिनास ॥ जा कै मनि प्रगटे गुनतास ॥ आठ पहर हरि का नामु लेइ ॥
सचु उपदेसु सेवक कउ देइ ॥ मोह माइआ कै संगि न लेपु ॥
मन महि राखै हरि हरि एकु ॥ अंधकार दीपक परगासे ॥
नानक भरम मोह दुख तह ते नासे ॥6॥

“इहु हरि रसु पावै जनु कोइ, अंम्रितु पीवै अमरु सो होइ”: कोई विरला जन ही ये हरि रस पाता है, जो अमृत पीता है वो अमर हो जाता है। “उसु पुरख का नाही कदे बिनास, जा कै मनि प्रगटे गुनतास”: जिसके मन में गुणों का खज़ाना प्रकट हो गया, उस पुरुष का कभी नाश नहीं होता।

“आठ पहर हरि का नामु लेइ, सचु उपदेसु सेवक कउ देइ”: वो आठ पहर हरि का नाम लेता है और सेवक को यही सच्चा उपदेश देता है। “मोह माइआ कै संगि न लेपु, मन महि राखै हरि हरि एकु”: माया के मोह से उसे लेप नहीं लगता, मन में एक हरि को ही रखता है।

“अंधकार दीपक परगासे, नानक भरम मोह दुख तह ते नासे”: नाम के दीपक से अँधेरे में प्रकाश हो जाता है, नानक कहते हैं, तब भ्रम और मोह के दुख नष्ट हो जाते हैं। दीया जले तो अँधेरे से लड़ना नहीं पड़ता।

पउड़ी 7

तपति माहि ठाढि वरताई ॥ अनदु भइआ दुख नाठे भाई ॥
जनम मरन के मिटे अंदेसे ॥ साधू के पूरन उपदेसे ॥
भउ चूका निरभउ होइ बसे ॥ सगल बिआधि मन ते खै नसे ॥
जिस का सा तिनि किरपा धारी ॥ साधसंगि जपि नामु मुरारी ॥
थिति पाई चूके भ्रम गवन ॥ सुनि नानक हरि हरि जसु स्रवन ॥7॥

तपिश में ठंडक बरसाई। आनंद हुआ, दुख भागे। जन्म-मरण की चिंता मिटी, संतों के पूर्ण उपदेश से। भय गया, निर्भय होकर बसा। सारे रोग मन से नष्ट। जिस पर कृपा धारी, साधसंगत में मुरारी का नाम जपा। स्थिति (ठहराव) पाई, भ्रम और भटकना बंद। कानों से हरि-हरि यश सुनो।

पउड़ी 8

निरगुनु आपि सरगुनु भी ओही ॥ कला धारि जिनि सगली मोही ॥
अपने चरित प्रभि आपि बनाए ॥ अपुनी कीमति आपे पाए ॥
हरि बिनु दूजा नाही कोइ ॥ सरब निरंतरि एको सोइ ॥
ओति पोति रविआ रूप रंग ॥ भए प्रगास साध कै संग ॥
रचि रचना अपनी कल धारी ॥ अनिक बार नानक बलिहारी ॥8॥18॥

निर्गुण ख़ुद, सगुण भी वही। कला धारण करके सारी सृष्टि को मोह लिया। अपनी लीला ख़ुद बनाई, अपनी कीमत ख़ुद जानता है। हरि के बिना दूसरा कोई नहीं, सबके अंदर वही एक। ओत-पोत (ताने-बाने) में, सारे रूप-रंगों में व्याप्त। प्रकाश साधू की संगत में हुआ। रचना रचकर अपनी शक्ति धारी, अनेक बार नानक बलिहारी।