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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अष्टपदी 17 · सत: शाश्वत सत्य

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 17 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 8 मिनट

अष्टपदी 17

सत: शाश्वत सत्य
ये वो अष्टपदी है जिसका श्लोक बाबा श्रीचंद जी ने सुनाया था। “आदि सचु, जुगादि सचु” गुरु नानक देव जी का श्लोक है, जो जपुजी साहिब में भी आता है। ये अष्टपदी “सत” (सत्य) के स्वरूप पर ध्यान केंद्रित करती है।
श्लोक
आदि सचु जुगादि सचु ॥
है भि सचु नानक होसी भि सचु ॥1॥
आदि (शुरू) में सत्य, युगादि (युगों के शुरू) में सत्य। अभी भी सत्य, नानक कहते हैं, आगे भी सत्य रहेगा। ये जपुजी साहिब का मूल मंत्र है, और बाबा श्रीचंद जी ने जब गुरु अर्जन देव जी को ये सुनाया, तो गुरु जी ने इसे 17वीं अष्टपदी के शीर्ष पर रख दिया। ये चार शब्दों में अनंतता का बयान है: शुरू में सच, युगों में सच, अभी सच, हमेशा सच।

पउड़ी 1

चरन सति सति परसनहार ॥ पूजा सति सति सेवदार ॥
दरसनु सति सति पेखनहार ॥ नामु सति सति धिआवनहार ॥
आपि सति सति सभ धारी ॥ आपे गुण आपे गुणकारी ॥
सबदु सति सति प्रभु बकता ॥ सुरति सति सति जसु सुनता ॥
बुझनहार कउ सति सभ होइ ॥ नानक सति सति प्रभु सोइ ॥1॥

ये पउड़ी “सति” (सत्य) शब्द को हर पंक्ति में दोहराती है, एक विशिष्ट लय बनाते हुए:

चरण सत्य, उन्हें छूने वाला सत्य। पूजा सत्य, सेवादार सत्य। दर्शन सत्य, देखने वाला सत्य। नाम सत्य, ध्यान करने वाला सत्य। वो ख़ुद सत्य, सबको धारण करने वाला सत्य। शबद (वाणी) सत्य, बोलने वाला प्रभु सत्य। सुरति (चेतना) सत्य, यश सुनने वाला सत्य।

“बुझनहार कउ सति सभ होइ”: जो समझ ले, उसके लिए सब कुछ सत्य हो जाता है। ये गहरी बात है: जब तक नहीं समझा, सब मिथ्या (झूठा) दिखता है (जैसा पाँचवीं अष्टपदी में बताया)। जब समझ आ जाए, तो वही सब सत्य हो जाता है।

पउड़ी 2

सति सरूपु रिदै जिनि मानिआ ॥ करन करावन तिनि मूलु पछानिआ ॥
जा कै रिदै बिस्वासु प्रभ आइआ ॥ ततु गिआनु तिसु मनि प्रगटाइआ ॥
भै ते निरभउ होइ बसाना ॥ जिस ते उपजिआ तिसु माहि समाना ॥
बसतु माहि ले बसतु गडाई ॥ ता कउ भिंन न कहना जाई ॥
बूझै बूझनहारु बिबेक ॥ नाराइन मिले नानक एक ॥2॥

जिसने सत्य-स्वरूप को हृदय में माना, उसने मूल (जड़, स्रोत) पहचान लिया। जिसके हृदय में प्रभु का विश्वास आया, उसके मन में तत्व-ज्ञान प्रकट हुआ। भय से निर्भय हो गया। जिससे उत्पन्न हुआ, उसी में समा गया।

“बसतु माहि ले बसतु गडाई, ता कउ भिंन न कहना जाई”: वस्तु (आत्मा) को वस्तु (परमात्मा) में गाड़ दिया (मिला दिया), अब उसे अलग कहा ही नहीं जा सकता। ये ग्यारहवीं अष्टपदी के “जल महि जलु” (पानी में पानी) वाले रूपक जैसा ही है, लेकिन एक और कोण से।

पउड़ी 3

ठाकुर का सेवकु आगिआकारी ॥ ठाकुर का सेवकु सदा पूजारी ॥
ठाकुर के सेवक कै मनि परतीति ॥ ठाकुर के सेवक की निरमल रीति ॥
ठाकुर कउ सेवकु जानै संगि ॥ प्रभ का सेवकु नाम कै रंगि ॥
सेवक कउ प्रभ पालनहारा ॥ सेवक की राखै निरंकारा ॥
सो सेवकु जिसु दइआ प्रभु धारै ॥ नानक सो सेवकु सासि सासि समारै ॥3॥

ठाकुर (मालिक) का सेवक आज्ञाकारी है, सदा पूजारी है। सेवक के मन में प्रतीति (विश्वास), उसकी रीति निर्मल। सेवक ठाकुर को संग (साथ) जानता है, नाम के रंग में रँगा है। प्रभु सेवक का पालन करता है, निरंकार रक्षा करता है। जिस पर दया करे, वो सेवक, नानक उसे साँस-साँस याद करता है।

पउड़ी 4

अपुने जन का परदा ढाकै ॥ अपने सेवक की सरपर राखै ॥
अपने दास कउ देइ वडाई ॥ अपने सेवक कउ नामु जपाई ॥
अपने सेवक की आपि पति राखै ॥ ता की गति मिति कोइ न लाखै ॥
प्रभ के सेवक कउ को न पहूचै ॥ प्रभ के सेवक ऊच ते ऊचे ॥
जो प्रभि अपनी सेवा लाइआ ॥ नानक सो सेवकु दह दिसि प्रगटाइआ ॥4॥

अपने भक्त का पर्दा (दोष) ढक लेता है। ज़रूर रक्षा करता है। बड़ाई और नाम जपवाता है। सेवक की पत (इज़्ज़त) ख़ुद रखता है। प्रभु के सेवक को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकता, वो ऊँचे-से-ऊँचा है। जिसे प्रभु ने अपनी सेवा में लगाया, उसे दसों दिशाओं में प्रकट किया।

पउड़ी 5

नीकी कीरी महि कल राखै ॥ भसम करै लसकर कोटि लाखै ॥
जिस का सासु न काढत आपि ॥ ता कउ राखत दे करि हाथ ॥
मानस जतन करत बहु भाति ॥ तिस के करतब बिरथे जाति ॥
मारै न राखै अवरु न कोइ ॥ सरब जीआ का राखा सोइ ॥
काहे सोच करहि रे प्राणी ॥ जपि नानक प्रभ अलख विडाणी ॥5॥

“नीकी कीरी महि कल राखै, भसम करै लसकर कोटि लाखै”: छोटी-सी चींटी में शक्ति रखता है, और करोड़ों-लाखों की फ़ौज को भस्म कर देता है। ये ईश्वर की विचित्र शक्ति है: वो कमज़ोर को ताक़तवर और ताक़तवर को कमज़ोर बना सकता है। जिसकी साँस ख़ुद न निकाले, उसकी हाथ देकर रक्षा करता है। इंसान के उपाय व्यर्थ। मारने-बचाने वाला और कोई नहीं। “काहे सोच करहि रे प्राणी”: हे प्राणी, क्यों चिंता करता है?

पउड़ी 6

बारं बार बार प्रभु जपीऐ ॥ पी अंम्रितु इहु मनु तनु ध्रपीऐ ॥
नाम रतनु जिनि गुरमुखि पाइआ ॥ तिसु किछु अवरु नाही द्रिसटाइआ ॥
नामु धनु नामो रूपु रंगु ॥ नामो सुखु हरि नाम का संगु ॥
नाम रसि जो जन त्रिपताने ॥ मन तन नामहि नामि समाने ॥
ऊठत बैठत सोवत नाम ॥ कहु नानक जन कै सद काम ॥6॥

“बारं बार बार प्रभु जपीऐ, पी अंम्रितु इहु मनु तनु ध्रपीऐ”: बार बार, हर बार प्रभु को जपें, अमृत पीकर इस मन और तन को तृप्त करें। “नाम रतनु जिनि गुरमुखि पाइआ, तिसु किछु अवरु नाही द्रिसटाइआ”: जिस गुरमुख ने नाम का रत्न पा लिया, उसे और कुछ दिखता ही नहीं।

“नामु धनु नामो रूपु रंगु, नामो सुखु हरि नाम का संगु”: नाम ही धन है, नाम ही रूप और रंग, नाम ही सुख, और हरि नाम का ही संग। जहाँ जहाँ संसार धन, सौंदर्य, सुख और संगत रखता है, वहाँ गुरमुख नाम रखता है।

“नाम रसि जो जन त्रिपताने, मन तन नामहि नामि समाने”: जो जन नाम के रस में तृप्त हुए, उनके मन तन नाम में ही समा गए। “ऊठत बैठत सोवत नाम, कहु नानक जन कै सद काम”: उठते, बैठते, सोते नाम, नानक कहते हैं, यही जन का सदा का काम है।

पउड़ी 7

बोलहु जसु जिहबा दिनु राति ॥ प्रभि अपनै जन कीनी दाति ॥
करहि भगति आतम कै चाइ ॥ प्रभ अपने सिउ रहहि समाइ ॥
जो होआ होवत सो जानै ॥ प्रभ अपने का हुकमु पछानै ॥
तिस की महिमा कउन बखानउ ॥ तिस का गुनु कहि एक न जानउ ॥
आठ पहर प्रभ बसहि हजूरे ॥ कहु नानक सेई जन पूरे ॥7॥

“बोलहु जसु जिहबा दिनु राति, प्रभि अपनै जन कीनी दाति”: दिन रात जिह्वा से यश बोलिए, प्रभु ने अपने जन को यही दात दी है। “करहि भगति आतम कै चाइ, प्रभ अपने सिउ रहहि समाइ”: वे भीतर के चाव से भक्ति करते हैं और अपने प्रभु में समाए रहते हैं।

“जो होआ होवत सो जानै, प्रभ अपने का हुकमु पछानै”: जो हुआ और जो हो रहा है, उसे वो रज़ा में जानता है, अपने प्रभु का हुक्म पहचानता है। “तिस की महिमा कउन बखानउ, तिस का गुनु कहि एक न जानउ”: ऐसे जन की कौन सी महिमा हम बखानें, उसका एक गुण भी कहना नहीं जानते।

“आठ पहर प्रभ बसहि हजूरे, कहु नानक सेई जन पूरे”: जो आठ पहर प्रभु की हज़ूरी में बसते हैं, नानक कहते हैं, वही जन पूरे हैं। पूरा होना यहाँ किसी सिद्धि से नहीं, हर पहर हज़ूरी में रहने से है।

पउड़ी 8

मन मेरे तिन की ओट लेहि ॥ मनु तनु अपना तिन जन देहि ॥
जिनि जनि अपना प्रभू पछाता ॥ सो जनु सरब थोक का दाता ॥
तिस की सरनि सरब सुख पावहि ॥ तिस कै दरसि सभ पाप मिटावहि ॥
अवर सिआनप सगली छाडु ॥ तिसु जन की तू सेवा लागु ॥
आवनु जानु न होवी तेरा ॥ नानक तिसु जन के पूजहु सद पैरा ॥8॥17॥

हे मेरे मन, उन (संतों) का आसरा ले। मन-तन उन जनों को दे दे। जिस जन ने अपने प्रभु को पहचाना, वो सारी चीज़ों का दाता है। उसकी शरण में सारे सुख, उसके दर्शन से सारे पाप मिटते हैं। और सारी चतुराई छोड़कर उसकी सेवा में लगो। “आवनु जानु न होवी तेरा”: आपका आना-जाना (जन्म-मरण) नहीं रहेगा। “नानक तिसु जन के पूजहु सद पैरा”: ऐसे जन के सदा पैर पूजो।