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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अष्टपदी 16 · परब्रह्म की अगम्यता

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 16 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 7 मिनट

अष्टपदी 16

परब्रह्म की अगम्यता
सोलहवीं अष्टपदी ईश्वर की अगम्यता (पहुँच से परे होने) पर ध्यान केंद्रित करती है। वो रूप-रेखा-रंग से परे है।प्रेम से जाना जा सकता है।

श्लोक

रूपु न रेख न रंगु किछु त्रिहु गुण ते प्रभ भिंन ॥
तिसहि बुझाए नानका जिसु होवै सुप्रसंन ॥1॥
न रूप, न रेखा, न रंग कुछ, तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) से प्रभु भिन्न (अलग) है। उसे वो ही समझाता है, नानक कहते हैं, जिस पर प्रसन्न हो। ये श्लोक ईश्वर की “नेति-नेति” (ये भी नहीं, वो भी नहीं) परिभाषा है: उसे किसी भी रूप, रंग, या गुण में बाँधा नहीं जा सकता।

पउड़ी 1

अबिनासी प्रभु मन महि राखु ॥ मानुख की तू प्रीति तिआगु ॥
तिस ते परै नाही किछु कोइ ॥ सरब निरंतरि एको सोइ ॥
आपे बीना आपे दाना ॥ गहिर गंभीरु गहीरु सुजाना ॥
पारब्रहम परमेसुर गोबिंद ॥ क्रिपा निधान दइआल बखसंद ॥
साध तेरे की चरनी पाउ ॥ नानक कै मनि इहु अनराउ ॥1॥

“अबिनासी प्रभु मन महि राखु, मानुख की तू प्रीति तिआगु”: अविनाशी प्रभु को मन में रखिए, मनुष्य की प्रीत त्याग दीजिए। यहाँ प्रीत का अर्थ मोह है, वो लगाव जो नाशवान से बाँधता है। “तिस ते परै नाही किछु कोइ, सरब निरंतरि एको सोइ”: उससे परे कुछ भी नहीं, कोई भी नहीं, सबके भीतर वही एक है।

“आपे बीना आपे दाना, गहिर गंभीरु गहीरु सुजाना”: वो आप ही देखने वाला, आप ही जानने वाला है, गहरा, गंभीर, अथाह, सुजान। ये शब्द एक के बाद एक गहराई बढ़ाते हैं, जैसे कोई समुद्र में उतरता जाए। “पारब्रहम परमेसुर गोबिंद, क्रिपा निधान दइआल बखसंद”: पारब्रह्म, परमेश्वर, गोविंद, कृपा के निधान, दयालु, बख़्शने वाले।

“साध तेरे की चरनी पाउ, नानक कै मनि इहु अनराउ”: आपके साधु के चरणों में पड़ूँ, नानक के मन में यही अनुराग है। सोलहवीं अष्टपदी का द्वार यहीं है। पहले नाशवान से मन उठाया, फिर प्रभु के गुण गिने, और अंत में माँगा भी तो क्या, साधु के चरण।

पउड़ी 2

मनसा पूरन सरना जोग ॥ जो करि पाइआ सोई होगु ॥
हरन भरन जा का नेत्र फोरु ॥ तिस का मंत्रु न जानै होरु ॥
अनद रूप मंगल सद जा कै ॥ सरब थोक सुनीअहि घरि ता कै ॥
राज महि राजु जोग महि जोगी ॥ तप महि तपीसरु ग्रिहसत महि भोगी ॥
धिआइ धिआइ भगतह सुखु पाइआ ॥ नानक तिसु पुरख का किनै अंतु न पाइआ ॥2॥

“मनसा पूरन सरना जोग, जो करि पाइआ सोई होगु”: वो मनोकामनाएँ पूरी करने और शरण देने में समर्थ है, जो उसने हाथों में लिख दिया, वही होगा। “हरन भरन जा का नेत्र फोरु, तिस का मंत्रु न जानै होरु”: जिसकी पलक झपकने में जगत का हरना और भरना है, उसका भेद कोई दूसरा नहीं जानता।

“अनद रूप मंगल सद जा कै, सरब थोक सुनीअहि घरि ता कै”: जिसके घर सदा आनंद और मंगल है, जिसके घर सब पदार्थ सुने जाते हैं। “राज महि राजु जोग महि जोगी, तप महि तपीसरु ग्रिहसत महि भोगी”: राजाओं में वही राजा है, योगियों में योगी, तपस्वियों में बड़ा तपस्वी, गृहस्थों में भोगी।

“धिआइ धिआइ भगतह सुखु पाइआ, नानक तिसु पुरख का किनै अंतु न पाइआ”: ध्याकर ध्याकर भक्तों ने सुख पाया, नानक कहते हैं, उस पुरुष का अंत किसी ने नहीं पाया। भक्तों ने अंत नहीं पाया, सुख पाया। शायद यही अंतर भक्त और तर्क करने वाले में है।

पउड़ी 3

जा की लीला की मिति नाहि ॥ सगल देव हारे अवगाहि ॥
पिता का जनमु कि जानै पूतु ॥ सगल परोई अपुनै सूति ॥
सुमति गिआनु धिआनु जिन देइ ॥ जन दास नामु धिआवहि सेइ ॥ तिहु गुण महि जा कउ भरमाए ॥
जनमि मरै फिरि आवै जाए ॥ ऊच नीच तिस के असथान ॥
जैसा जनावै तैसा नानक जान ॥3॥

जिसकी लीला की कोई सीमा नहीं, सारे देवता उसे नापने में थक-हारकर बैठ गए। पिता का जन्म पुत्र नहीं जानता (ईश्वर का मूल कोई नहीं जान सकता)। सारी रचना उसके सूत (धागे) में पिरोई है। जिसे सुमति, ज्ञान, ध्यान दिया, वो दास नाम ध्याते हैं। जिसे तीन गुणों में भटकाया, वो जन्मता-मरता, आता-जाता रहता है। ऊँचे-नीचे सब उसके स्थान हैं। जैसा जनवाए (दिखाए), वैसा नानक जानता है।

पउड़ी 4

नाना रूप नाना जा के रंग ॥ नाना भेख करहि इक रंग ॥
नाना बिधि कीनो बिसथारु ॥ प्रभु अबिनासी एकंकारु ॥
नाना चलित करे खिन माहि ॥ पूरि रहिओ पूरनु सभ ठाइ ॥
नाना बिधि करि बनत बनाई ॥ अपनी कीमति आपे पाई ॥
सभ घट तिस के सभ तिस के ठाउ ॥ जपि जपि जीवै नानक हरि नाउ ॥4॥

अनेक रूप, अनेक रंग, अनेक भेष, लेकिन एक ही सार। अनेक विधियों से विस्तार, लेकिन प्रभु अविनाशी एकंकार। पल भर में अनेक लीलाएँ, पूर्ण रूप से हर जगह भरा। अनेक विधियों से बनावट बनाई, अपनी कीमत ख़ुद जानता है। सब शरीर उसके, सब ठिकाने उसके। जप-जपकर जीता है नानक, हरि नाम।

पउड़ी 5

नाम के धारे सगले जंत ॥ नाम के धारे खंड ब्रहमंड ॥
नाम के धारे सिम्रिति बेद पुरान ॥ नाम के धारे सुनन गिआन धिआन ॥
नाम के धारे आगास पाताल ॥ नाम के धारे सगल आकार ॥
नाम के धारे पुरीआ सभ भवन ॥ नाम कै संगि उधरे सुनि स्रवन ॥
करि किरपा जिसु आपनै नामि लाए ॥ नानक चउथे पद महि सो जनु गति पाए ॥5॥

ये “नाम के धारे” पउड़ी पूरी सृष्टि को नाम पर टिका हुआ दिखाती है: जंतु, खंड-ब्रह्मांड, स्मृति-वेद-पुराण, सुनना-ज्ञान-ध्यान, आकाश-पाताल, सारे आकार, सारी पुरियाँ (लोक) और भवन, सब नाम के सहारे। कानों से सुनकर नाम के संग उद्धार। कृपा करके जिसे नाम में लगाए, वो चौथे पद (तुरीयावस्था, सत्-रज-तम से परे) में गति पाता है।

पउड़ी 6

रूपु सति जा का सति असथानु ॥ पुरखु सति केवल परधानु ॥
करतूति सति सति जा की बाणी ॥ सति पुरख सभ माहि समाणी ॥
सति करमु जा की रचना सति ॥ मूलु सति सति उतपति ॥
सति करणी निरमल निरमली ॥ जिसहि बुझाए तिसहि सभ भली ॥
सति नामु प्रभ का सुखदाई ॥ बिस्वासु सति नानक गुर ते पाई ॥6॥

“सति” (सत्य) की लय: रूप सत्य, स्थान सत्य। पुरुष सत्य, केवल प्रधान। करतूत सत्य, बाणी सत्य। सत्य पुरुष सबमें समाया। सत्य करनी निर्मल। जिसे समझाए, उसे सब भली (अच्छी) लगे। सत्य नाम प्रभु का सुखदायी। विश्वास सत्य, नानक गुरु से पाई।

पउड़ी 7

सति बचन साधू उपदेस ॥ सति ते जन जा कै रिदै प्रवेस ॥
सति निरति बूझै जे कोइ ॥ नामु जपत ता की गति होइ ॥
आपि सति कीआ सभु सति ॥ आपे जानै अपनी मिति गति ॥
जिस की स्रिसटि सु करणैहारु ॥ अवर न बूझि करत बीचारु ॥
करते की मिति न जानै कीआ ॥ नानक जो तिसु भावै सो वरतीआ ॥7॥

संतों का उपदेश सत्य-वचन। सत्य वो जन जिसके हृदय में प्रवेश कर गया। सत्य-रीति समझे जो कोई, नाम जपने से उसकी गति हो। वो ख़ुद सत्य, उसका बनाया सब सत्य। अपनी सीमा (मिति) और गति ख़ुद जानता है। जिसकी सृष्टि है, वही करने वाला, दूसरा विचार करने लायक़ नहीं। कर्ता की सीमा रचना नहीं जानती। जो उसे भाए, वो चलता है।

पउड़ी 8

बिसमन बिसम भए बिसमाद ॥ जिनि बूझिआ तिसु आइआ स्वाद ॥
प्रभ कै रंगि राचि जन रहे ॥ गुर कै बचनि पदारथ लहे ॥
ओइ दाते दुख काटनहार ॥ जा कै संगि तरै संसार ॥
जन का सेवकु सो वडभागी ॥ जन कै संगि एक लिव लागी ॥
गुन गोबिद कीरतनु जनु गावै ॥ गुर प्रसादि नानक फलु पावै ॥8॥16॥

विस्मय ही विस्मय, विस्मित हो गए। जिसने समझा, उसे स्वाद आया। प्रभु के रंग में रचे-बसे भक्त, गुरु के वचन से चार पदार्थ पाए। वो दाता हैं, दुख काटने वाले, उनकी संगत में संसार तरता है। भक्तों का सेवक बड़भागी है, उनकी संगत में एक (ईश्वर) की लिव (ध्यान) लगी। गोबिंद के गुण-कीर्तन गाता है, गुरु की कृपा से फल पाता है।