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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अष्टपदी 15 · गुरु का आसरा

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 15 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 8 मिनट

अष्टपदी 15

गुरु का आसरा
चौदहवीं अष्टपदी ने कहा कि इंसानों का सहारा छोड़ो। पंद्रहवीं अष्टपदी बताती है कि असली सहारा कौन है: गुरु और ईश्वर। ये अष्टपदी गुरु की भूमिका को विस्तार से समझाती है।
Shelter Is a Presence

श्लोक

सरब कला भरपूर प्रभ बिरथा जाननहार ॥
जा कै सिमरनि उधरीऐ नानक तिसु बलिहार ॥1॥
सब कलाओं से भरपूर प्रभु सबके दिल की जानने वाला है। जिसके सिमरन से उद्धार होता है, नानक उस पर बलिहारी है। “बिरथा जाननहार” (दिल की बात जानने वाला) बड़ा तसल्ली देने वाला शब्द है।वो पहले से जानता है।

पउड़ी 1

टूटी गाढनहार गोुपाल ॥ सरब जीआ आपे प्रतिपाल ॥
सगल की चिंता जिसु मन माहि ॥ तिस ते बिरथा कोई नाहि ॥
रे मन मेरे सदा हरि जापि ॥ अबिनासी प्रभु आपे आपि ॥
आपन कीआ कछू न होइ ॥ जे सउ प्रानी लोचै कोइ ॥
तिसु बिनु नाही तेरै किछु काम ॥ गति नानक जपि एक हरि नाम ॥1॥

“टूटी गाढनहार गोुपाल”: टूटी हुई चीज़ों को जोड़ने वाला (गाँठने वाला) गोपाल (ईश्वर) है। ये पहली पंक्ति ही बड़ी तसल्ली देती है। ज़िंदगी में बहुत कुछ टूटता है: रिश्ते, सेहत, उम्मीदें, भरोसा। गुरु जी कहते हैं कि जोड़ने वाला एक ही है। “सरब जीआ आपे प्रतिपाल”: सब जीवों का वो ख़ुद पालन करता है।

“सगल की चिंता जिसु मन माहि, तिस ते बिरथा कोई नाहि”: जिसके मन में सबकी चिंता है, उससे कोई व्यर्थ (बेकार, अनदेखा) नहीं। हर इंसान, हर जीव, उसकी चिंता में शामिल है।

“आपन कीआ कछू न होइ, जे सउ प्रानी लोचै कोइ”: अपने किए कुछ नहीं होता, चाहे सौ बार प्राणी चाहे। “तिसु बिनु नाही तेरै किछु काम”: उसके बिना आपके कुछ काम नहीं।

पउड़ी 2

रूपवंतु होइ नाही मोहै ॥ प्रभ की जोति सगल घट सोहै ॥
धनवंता होइ किआ को गरबै ॥ जा सभु किछु तिस का दीआ दरबै ॥
अति सूरा जे कोऊ कहावै ॥ प्रभ की कला बिना कह धावै ॥
जे को होइ बहै दातारु ॥ तिसु देनहारु जानै गावारु ॥
जिसु गुर प्रसादि तूटै हउ रोगु ॥ नानक सो जनु सदा अरोगु ॥2॥

गुरु जी चार तरह के गर्व को तोड़ते हैं: रूपवान हो तो मोह मत करो, प्रभु की ज्योति हर शरीर में सोहती (शोभती) है। धनवान हो तो गर्व किस बात का, सब कुछ उसी का दिया हुआ है। बड़ा वीर (सूरा) कहलाओ, प्रभु की कला (शक्ति) के बिना कहाँ दौड़ोगे? बड़ा दानी बनो, तो जानो कि असली देने वाला वो है, आप तो बस माध्यम हैं।

“जिसु गुर प्रसादि तूटै हउ रोगु, नानक सो जनु सदा अरोगु”: गुरु की कृपा से जिसका “हउ रोगु” (अहंकार का रोग) टूटे, वो सदा निरोग (अरोगु) है। गुरु जी अहंकार को “रोग” कह रहे हैं। ये बीमारी है, और इसका इलाज गुरु के पास है।

पउड़ी 3

जिउ मंदर कउ थामै थंमनु ॥ तिउ गुर का सबदु मनहि असथंमनु ॥
जिउ पाखाणु नाव चड़ि तरै ॥ प्राणी गुर चरण लगतु निसतरै ॥
जिउ अंधकार दीपक परगासु ॥ गुर दरसनु देखि मनि होइ बिगासु ॥
जिउ महा उदिआन महि मारगु पावै ॥ तिउ साधू संगि मिलि जोति प्रगटावै ॥ तिन संतन की बाछउ धूरि ॥
नानक की हरि लोचा पूरि ॥3॥

ये पउड़ी चार सुंदर उपमाओं पर बनी है:

जैसे मंदिर को खंभा (थंमनु) थामता है, वैसे गुरु का शबद मन को थामता (आधार देता) है। जैसे पत्थर नाव पर चढ़कर तैर जाता है (अकेला डूबता, लेकिन नाव पर तैरता है), वैसे प्राणी गुरु के चरणों में लगकर तर जाता है। जैसे अँधेरे में दीपक प्रकाश करता है, वैसे गुरु का दर्शन मन में प्रकाश करता है। जैसे महा जंगल (उदिआन) में रास्ता मिल जाए, वैसे साधू की संगत में ज्योति प्रकट होती है।

ये चारों उपमाएँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी से हैं: खंभा, नाव, दीपक, जंगल का रास्ता। गुरु जी जटिल आध्यात्मिक सत्य को बिल्कुल सरल चित्रों में समझाते हैं।

पउड़ी 4

मन मूरख काहे बिललाईऐ ॥ पुरब लिखे का लिखिआ पाईऐ ॥
दूख सूख प्रभ देवनहारु ॥ अवर तिआगि तू तिसहि चितारु ॥
जो कछु करै सोई सुखु मानु ॥ भूला काहे फिरहि अजान ॥
कउन बसतु आई तेरै संग ॥ लपटि रहिओ रसि लोभी पतंग ॥
राम नाम जपि हिरदे माहि ॥ नानक पति सेती घरि जाहि ॥4॥

“मन मूरख काहे बिललाईऐ”: हे मूर्ख मन, क्यों बिलखता है? तक़दीर में जो लिखा है, वो पाएँगे। दुख-सुख देने वाला प्रभु है, और सब छोड़कर उसी को याद कर। “कउन बसतु आई तेरै संग”: कौन-सी चीज़ आपके साथ आई है (जन्म के वक़्त)? “लपटि रहिओ रसि लोभी पतंग”: लोभी पतंगे की तरह रस में लिपटा है (जैसे पतंगा रोशनी पर जलता है)। राम नाम हृदय में जपो, इज़्ज़त से घर (ईश्वर के दरबार) जाएँगे।

पउड़ी 5

जिसु वखर कउ लैनि तू आइआ ॥ राम नामु संतन घरि पाइआ ॥
तजि अभिमानु लेहु मन मोलि ॥ राम नामु हिरदे महि तोलि ॥ लादि खेप संतह संगि चालु ॥
अवर तिआगि बिखिआ जंजाल ॥ धंनि धंनि कहै सभु कोइ ॥
मुख ऊजल हरि दरगह सोइ ॥ इहु वापारु विरला वापारै ॥
नानक ता कै सद बलिहारै ॥5॥

“जिसु वखर कउ लैनि तू आइआ”: जिस माल (वखर) को लेने आप (इस दुनिया में) आया है, वो राम नाम है, संतों के घर मिलता है। “तजि अभिमानु लेहु मन मोलि”: अभिमान छोड़, मन को “मोल” (दाम) दे, यानी गुरु को बेच दे। “लादि खेपु संतह संगि चालु”: खेप (माल) लादकर संतों के संग चलो। “इहु वापारु विरला वापारै”: ये व्यापार कोई विरला ही करता है। ये पूरी पउड़ी व्यापारिक भाषा में है: वखर, मोल, लादि, खेपु, वापारु। गुरु जी कहते हैं कि ज़िंदगी एक बाज़ार है, और सबसे अच्छा सौदा नाम है।

पउड़ी 6

चरन साध के धोइ धोइ पीउ ॥ अरपि साध कउ अपना जीउ ॥
साध की धूरि करहु इसनानु ॥ साध ऊपरि जाईऐ कुरबानु ॥
साध सेवा वडभागी पाईऐ ॥ साधसंगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
अनिक बिघन ते साधू राखै ॥ हरि गुन गाइ अंम्रित रसु चाखै ॥
ओट गही संतह दरि आइआ ॥ सरब सूख नानक तिह पाइआ ॥6॥

संतों के चरण धो-धोकर पीओ। अपना प्राण संत को अर्पित करो। संत की धूल से स्नान करो। संत पर कुर्बान जाएँ। संत की सेवा बड़े भाग्य से मिलती है। साधसंगत में हरि कीर्तन गाओ। अनेक विघ्नों से संत रक्षा करते हैं। हरि गुण गाकर अमृत-रस चखो। संतों के दर में आ गिरे, सारे सुख पा लिए।

पउड़ी 7

मिरतक कउ जीवालनहार ॥ भूखे कउ देवत अधार ॥
सरब निधान जा की द्रिसटी माहि ॥ पुरब लिखे का लहणा पाहि ॥
सभु किछु तिस का ओहु करनै जोगु ॥ तिसु बिनु दूसर होआ न होगु ॥
जपि जन सदा सदा दिनु रैणी ॥ सभ ते ऊच निरमल इह करणी ॥
करि किरपा जिस कउ नामु दीआ ॥ नानक सो जनु निरमलु थीआ ॥7॥

मुर्दे को जिलाने वाला, भूखे को सहारा देने वाला। सब ख़ज़ाने जिसकी दृष्टि में हैं। पूर्व लिखा लहना (पाना) पाते हैं। सब कुछ उसका, वो ही करने योग्य, उसके बिना कुछ न हुआ, न होंगे। दिन-रात सदा जपो, ये सबसे ऊँची, निर्मल करनी है। कृपा करके जिसे नाम दिया, वो निर्मल हो गया।

पउड़ी 8

जा कै मनि गुर की परतीति ॥ तिसु जन आवै हरि प्रभु चीति ॥
भगतु भगतु सुनीऐ तिहु लोइ ॥ जा कै हिरदै एको होइ ॥
सचु करणी सचु ता की रहत ॥ सचु हिरदै सति मुखि कहत ॥
साची द्रिसटि साचा आकारु ॥ सचु वरतै साचा पासारु ॥
पारब्रहमु जिनि सचु करि जाता ॥ नानक सो जनु सचि समाता ॥8॥15॥

जिसके मन में गुरु की प्रतीति (विश्वास) है, उसे हरि प्रभु याद आता है। तीनों लोकों में “भगत-भगत” सुनाई देता है (सब उसे भक्त कहते हैं)। जिसके हृदय में एक ही (ईश्वर) बसे। सच्ची करनी, सच्ची रहत, हृदय में सत्य, मुँह से सत्य। सच्ची दृष्टि, सच्चा आकार, सत्य चल रहा है, सच्चा पसारा। “पारब्रहमु जिनि सचु करि जाता, नानक सो जनु सचि समाता”: जिसने पारब्रह्म को सच मानकर जाना, वो सत्य में समा गया।