अष्टपदी 12

श्लोक
बडे बडे अहंकारीआ नानक गरबि गले ॥1॥
पउड़ी 1
पउड़ी 2
“धनवंता होइ करि गरबावै, त्रिण समानि कछु संगि न जावै”: धनवान बनकर गर्व करता है, लेकिन तिनके (त्रिण) जितना भी साथ नहीं जाता। ये सीधी बात है: आप कितना भी कमा लो, मरने के बाद एक पैसा भी साथ नहीं जाएगा।
“बहु लसकर मानुख ऊपरि करे आस”: बड़ी-बड़ी फ़ौजें, इंसानों पर आस लगाता है। “पल भीतरि ता का होइ बिनास”: पल भर में सब नष्ट। “सभ ते आप जानै बलवंतु, खिन महि होइ जाइ भसमंतु”: ख़ुद को सबसे बलवान जानता है, पल भर में भस्म (राख) हो जाता है।
“गुर प्रसादि जा का मिटै अभिमानु, सो जनु नानक दरगह परवानु”: गुरु की कृपा से जिसका अभिमान मिटे, वो दरगाह में परवान (स्वीकार) है।
पउड़ी 3
“कोटि करम करै हउ धारे, स्रमु पावै सगले बिरथारे”: करोड़ों कर्म करे, लेकिन अगर “हउ” (अहंकार) धारे हुए है, तो सारी मेहनत बेकार है। ये बड़ी कड़वी दवाई है। इंसान सोचता है “मैंने इतना किया” और वो “मैंने” ही सारा काम बर्बाद कर देता है।
“आपस कउ जो भला कहावै, तिसहि भलाई निकटि न आवै”: जो अपने आप को भला कहलवाए, उसके पास भलाई आती ही नहीं। और इसके विपरीत: “सबल की रेन जा का मनु होइ, कहु नानक ता की निरमल सोइ”: जिसका मन सबके चरणों की धूल (रेन) बन जाए, उसकी शोभा (सोइ) निर्मल है। फल से लदा हुआ पेड़ झुक जाता है। खाली पेड़ अकड़ा खड़ा रहता है। जो इंसान गुणों से भरा है, वो झुका हुआ दिखता है। जो खाली है, वो अकड़ दिखाता है। गुरु जी कहते हैं: झुकना भरे होने की निशानी है।
पउड़ी 4
ये पउड़ी “जब लगु” (जब तक) की लय पर चलती है, हर पंक्ति एक शर्त बताती है:
जब तक जाने “मुझसे कुछ होता है”, तब तक सुख नहीं। जब तक जाने “मैं कुछ करता हूँ”, तब तक गर्भ-योनि में घूमता रहता है। जब तक किसी को बैरी और किसी को मित्र माने, तब तक चित्त अस्थिर है। जब तक माया के मोह में मग्न है, तब तक धर्मराज सज़ा देता है।
“प्रभ किरपा ते बंधन तूटै, गुर प्रसादि नानक हउ छूटै”: प्रभु की कृपा से बंधन टूटते हैं, गुरु की कृपा से “हउ” (मैं-पन, अहंकार) छूटता है। बंधन प्रभु की कृपा से टूटते हैं, अहंकार गुरु की कृपा से। गुरु का काम विशेष रूप से अहंकार तोड़ना है।
पउड़ी 5
“सहस खटे लख कउ उठि धावै”: हज़ार कमाए तो लाख के लिए दौड़ पड़ता है। “त्रिपति न आवै”: तृप्ति नहीं आती। ये आज की उपभोक्ता-संस्कृति का बिल्कुल सटीक वर्णन है, चार सौ साल पहले लिखा हुआ। नया फ़ोन लिया, तो अगले मॉडल की इच्छा। बड़ा घर लिया, तो और बड़े का सपना।
“बिना संतोख नही कोऊ राजै”: बिना संतोष के कोई राज़ी (संतुष्ट) नहीं। “सुपन मनोरथ ब्रिंथे सभ काजै”: सपने जैसी इच्छाओं में सारे काम व्यर्थ चले जाते हैं।
“नाम रंगि सभु सुखु होइ, बडभागी किसै परापति होइ”: नाम के रंग में सारा सुख है, लेकिन ये बड़भागी (बड़े भाग्यशाली) को ही प्राप्त होता है।
पउड़ी 6
“करन करावन करनैहारु, इस कै हाथि कहा बीचारु”: करने वाला, करवाने वाला वो ख़ुद है, इसके (जीव के) हाथ में कौन-सा विचार (क्या अधिकार) है? “सभ ते दूरि सभहू कै संगि”: सबसे दूर, सबके संग। ये विरोधाभास बार-बार आता है और हर बार नई गहराई देता है।
“आपहि एक आपहि अनेक”: वो ख़ुद एक है, ख़ुद ही अनेक है। “मरै न बिनसै आवै न जाइ”: न मरता, न नष्ट होता, न आता, न जाता। “नानक सद ही रहिआ समाइ”: सदा ही समाया हुआ है।
पउड़ी 7
ये पउड़ी अद्वैत का शिखर है: वो ख़ुद उपदेश देता है, ख़ुद समझता है। ख़ुद सबके साथ रचा है। ख़ुद ही अपना विस्तार किया। सब कुछ उसका, वो ही करने वाला। उससे अलग (भिंन) कुछ हो ही नहीं सकता। हर जगह वही एक।
“कउतक करै रंग आपार”: अपार (असीम) रंगों के कौतुक (तमाशे, खेल) करता है। “मन महि आपि मन अपुने माहि”: मन में वो है, और मन उसमें है। “नानक कीमति कहनु न जाइ”: कीमत बताई नहीं जा सकती।
पउड़ी 8
बारहवीं अष्टपदी का समापन एक स्तुति से होता है, और हर पंक्ति में एक शब्द तीन बार दोहराया गया है:
“सति सति सति” (सत्य, सत्य, सत्य)। “सचु सचु सचु” (सच, सच, सच)। “भला भला भला” (अच्छा, अच्छा, अच्छा)। “निरमल निरमल निरमल” (शुद्ध, शुद्ध, शुद्ध)। “पवित्र पवित्र पवित्र” (पवित्र, पवित्र, पवित्र)।
ये तीन-बार का दोहराव पहली पउड़ी के “सिमरउ सिमरि सिमरि” की याद दिलाता है। जब गुरु जी किसी बात को तीन बार कहें, वो बात हृदय में उतारनी है। “कोटि मधे किनै बिरलै चीना”: करोड़ों में किसी विरले ने ही पहचाना। ये अष्टपदी अहंकार के विनाश से शुरू हुई और ईश्वर की स्तुति पर समाप्त हुई, क्योंकि जहाँ अहंकार मिटता है, वहाँ स्तुति प्रकट होती है।
गुरु जी एक-एक करके अहंकार के रूप बताते हैं और उनका अंजाम:
जिसके अंदर राज (सत्ता) का अभिमान है, वो नरक का अधिकारी, कुत्ते (सुआनु) जैसा है। जो सोचे “मैं जवान हूँ (जोबनवंतु)”, वो विष्ठा (मल) का कीड़ा बनता है। जो अपने आप को कर्मवंत (कर्मों वाला, पुण्यात्मा) कहलाए, वो जन्म-मरण में भटकता है। जो धन-भूमि पर गुमान करे, वो मूर्ख, अंधा, अज्ञानी है।
ये कड़ी भाषा है। गुरु जी जानबूझकर तीखे शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि अहंकार एक ऐसी बीमारी है जो मीठी दवाई से ठीक नहीं होती। “करि किरपा जिस कै हिरदै गरीबी बसावै”: कृपा करके जिसके हृदय में गरीबी (विनम्रता) बसा दे, वो इधर भी मुक्त, उधर भी सुखी।