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अष्टपदी 13 · संतों की निंदा का फल

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 13 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 9 मिनट

अष्टपदी 13

संतों की निंदा का फल
बारहवीं अष्टपदी में अहंकार पर वार किया। तेरहवीं अष्टपदी अहंकार के एक ख़ास रूप को लेती है: संतों की निंदा। ये सुखमनी साहिब की सबसे कड़ी अष्टपदी है।

श्लोक

संत सरनि जो जनु परै सो जनु उधरनहार ॥
संत की निंदा नानका बहुरि बहुरि अवतार ॥1॥
जो जन संत की शरण में पड़े, वो उद्धार पाने वाला है। संत की निंदा करने वाला, नानक कहते हैं, बार-बार जन्म-मरण में पड़ता है। दो पंक्तियों में दो रास्ते: संत की शरण = मुक्ति। संत की निंदा = बार-बार जन्म।

पउड़ी 1

संत कै दूखनि आरजा घटै ॥ संत कै दूखनि जम ते नही छुटै ॥
संत कै दूखनि सुखु सभु जाइ ॥ संत कै दूखनि नरक महि पाइ ॥
संत कै दूखनि मति होइ मलीन ॥ संत कै दूखनि सोभा ते हीन ॥
संत के हते कउ रखै न कोइ ॥ संत कै दूखनि थान भ्रसटु होइ ॥
संत क्रिपाल क्रिपा जे करै ॥ नानक संतसंगि निंदकु भी तरै ॥1॥

“संत कै दूखनि” (संत को दुख देने से) की लय से हर पंक्ति शुरू होती है: आयु घटती है। यम से छुटकारा नहीं। सारा सुख चला जाता है। नरक में पड़ता है। बुद्धि मलिन (गंदी) हो जाती है। शोभा से हीन हो जाता है। संत को मारने वाले को कोई नहीं बचाता। स्थान भ्रष्ट हो जाता है।

लेकिन अंत में एक उम्मीद की किरण: “संत क्रिपाल क्रिपा जे करै, नानक संतसंगि निंदकु भी तरै”: अगर कृपालु संत कृपा करे, तो संत-संगत में निंदक भी तर जाता है। संत की कृपा इतनी विशाल है कि वो अपने निंदक को भी तार सकती है।

पउड़ी 2

संत के दूखन ते मुखु भवै ॥ संतन कै दूखनि काग जिउ लवै ॥
संतन कै दूखनि सरप जोनि पाइ ॥ संत कै दूखनि त्रिगद जोनि किरमाइ ॥
संतन कै दूखनि त्रिसना महि जलै ॥ संत कै दूखनि सभु को छलै ॥
संत कै दूखनि तेजु सभु जाइ ॥ संत कै दूखनि नीचु नीचाइ ॥
संत दोखी का थाउ को नाहि ॥ नानक संत भावै ता ओइ भी गति पाहि ॥2॥

संत की निंदा के और परिणाम: मुँह फिर जाता है (बदनामी)। कौवे जैसा बोलने लगता है (कर्कश, अशुभ)। सर्प-योनि पाता है। कीड़े-मकोड़ों की योनि मिलती है। तृष्णा में जलता है। सबको छलता है। तेज (ओज, प्रभाव) सब चला जाता है। नीच से नीच हो जाता है। संत-द्रोही को कोई स्थान नहीं।

फिर वही उम्मीद: “नानक संत भावै ता ओइ भी गति पाहि”: अगर संत को भाए (संत चाहें), तो वो भी गति (मुक्ति) पा सकते हैं। गुरु जी बार-बार ये दरवाज़ा खुला रख रहे हैं: चाहे कितना भी पतन हो, संत की कृपा से उद्धार संभव है।

पउड़ी 3

संत का निंदकु महा अतताई ॥ संत का निंदकु खिनु टिकनु न पाई ॥
संत का निंदकु महा हतिआरा ॥ संत का निंदकु परमेसुरि मारा ॥
संत का निंदकु राज ते हीनु ॥ संत का निंदकु दुखीआ अरु दीनु ॥
संत के निंदक कउ सरब रोग ॥ संत के निंदक कउ सदा बिजोग ॥
संत की निंदा दोख महि दोखु ॥ नानक संत भावै ता उस का भी होइ मोखु ॥3॥

संत का निंदक महा अत्याचारी है। उसे पल-भर भी टिकने की जगह नहीं मिलती। वो महा हत्यारा है (क्योंकि निंदा एक तरह की हत्या है, किसी की इज़्ज़त और भावना की हत्या)। परमेश्वर ने ख़ुद उसे मारा है। वो राज से हीन, दुखी और दीन है। उसे सारे रोग लगते हैं, सदा वियोग (बिछड़ना) रहता है। संत की निंदा सारे दोषों में गंभीर दोष है। लेकिन फिर वही दरवाज़ा: “नानक संत भावै ता उस का भी होइ मोखु”, अगर संत चाहे, तो उसे भी मोक्ष मिल सकता है।

पउड़ी 4

संत का दोखी सदा अपवितु ॥ संत का दोखी किसै का नही मितु ॥
संत के दोखी कउ डानु लागै ॥ संत के दोखी कउ सभ तिआगै ॥
संत का दोखी महा अहंकारी ॥ संत का दोखी सदा बिकारी ॥
संत का दोखी जनमै मरै ॥ संत की दूखना सुख ते टरै ॥
संत के दोखी कउ नाही ठाउ ॥ नानक संत भावै ता लए मिलाइ ॥4॥

संत का दोषी सदा अपवित्र है। किसी का मित्र नहीं। सबकी डाँट (डानु) खाता है। सब उसे त्याग देते हैं। वो महा अहंकारी है, सदा विकारी है। जन्मता-मरता रहता है। संत को दुख देने से सुख से दूर हो जाता है। उसे कोई ठिकाना नहीं। लेकिन अगर संत चाहे, तो मिला ले।

गुरु जी “निंदक” और “दोखी” दोनों शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं। “निंदक” वो जो पीठ पीछे बुराई करे, “दोखी” वो जो सामने दुश्मनी करे। दोनों का अंजाम एक है।

पउड़ी 5

संत का दोखी अध बीच ते टूटै ॥ संत का दोखी कितै काजि न पहूचै ॥
संत के दोखी कउ उदिआन भ्रमाईऐ ॥ संत का दोखी उझड़ि पाईऐ ॥
संत का दोखी अंतर ते थोथा ॥ जिउ सास बिना मिरतक की लोथा ॥
संत के दोखी की जड़ किछु नाहि ॥ आपन बीजि आपे ही खाहि ॥
संत के दोखी कउ अवरु न राखनहारु ॥ नानक संत भावै ता लए उबारि ॥5॥

“अध बीच ते टूटै”: बीच रास्ते से टूट जाता है (कोई काम पूरा नहीं होता)। किसी काम में नहीं पहुँचता (सफल नहीं होता)। जंगलों (उदिआन) में भटकाया जाता है। उलटे रास्ते (उझड़ि) पर डाल दिया जाता है। “अंतर ते थोथा, जिउ सास बिना मिरतक कि लोथा”: अंदर से खोखला है, जैसे बिना साँस के मुर्दे का शव। ये उपमा बहुत कड़ी है: निंदक ज़िंदा दिखता है, लेकिन अंदर से मुर्दा है।

“आपन बीजि आपे ही खाहि”: अपना बोया हुआ ख़ुद ही खाता है। ये कर्म-सिद्धांत है: जो बोओगे, वो काटोगे।

पउड़ी 6

संत का दोखी इउ बिललाइ ॥ जिउ जल बिहून मछुली तड़फड़ाइ ॥
संत का दोखी भूखा नही राजै ॥ जिउ पावकु ईधनि नही ध्रापै ॥
संत का दोखी छुटै इकेला ॥ जिउ बूआड़ु तिलु खेत माहि दुहेला ॥
संत का दोखी धरम ते रहत ॥ संत का दोखी सद मिथिआ कहत ॥
किरतु निंदक का धुरि ही पइआ ॥ नानक जो तिसु भावै सोई थिआ ॥6॥

“संत का दोखी इउ बिललाइ, जिउ जल बिहून मछुली तड़फड़ाइ”: संत का निंदक ऐसे बिलखता है जैसे बिना पानी मछली तड़पती है। “संत का दोखी भूखा नही राजै, जिउ पावकु ईधनि नही ध्रापै”: निंदक भूखा रहता है, तृप्त नहीं होता, जैसे आग ईंधन से नहीं भरती।

“संत का दोखी छुटै इकेला, जिउ बूआड़ु तिलु खेत माहि दुहेला”: निंदक अकेला छूट जाता है, जैसे अंदर से जला तिल का पौधा खेत में दुखी पड़ा रहता है। “संत का दोखी धरम ते रहत, संत का दोखी सद मिथिआ कहत”: निंदक धर्म से रहित है और सदा झूठ बोलता है।

“किरतु निंदक का धुरि ही पइआ, नानक जो तिसु भावै सोई थिआ”: निंदक का ये स्वभाव उसके अपने किए से आरंभ से ही बना है, नानक कहते हैं, जो उसे भाता है वही होता है। अंत में गुरु जी क्रोध नहीं करते, दशा बताकर बात प्रभु की रज़ा पर छोड़ देते हैं।

पउड़ी 7

संत का दोखी बिगड़ रूपु होइ जाइ ॥ संत के दोखी कउ दरगह मिलै सजाइ ॥
संत का दोखी सदा सहकाईऐ ॥ संत का दोखी न मरै न जीवाईऐ ॥
संत के दोखी की पुजै न आसा ॥ संत का दोखी उठि चलै निरासा ॥
संत कै दोखि न त्रिसटै कोइ ॥ जैसा भावै तैसा कोई होइ ॥
पइआ किरतु न मेटै कोइ ॥ नानक जानै सचा सोइ ॥7॥

निंदक का रूप बिगड़ जाता है (भीतर की कुरूपता बाहर आती है)। दरगाह में सज़ा मिलती है। सदा शक (सहकाईऐ, संदेह) में रहता है। न ठीक से मरता है, न ठीक से जीता (एक तरह की त्रिशंकु अवस्था)। उसकी आशा पूरी नहीं होती। निराश उठकर चला जाता है। संत-दोषी पर कोई भरोसा (त्रिसटै) नहीं करता।

“पइआ किरतु न मेटै कोइ”: लिखा हुआ कर्म कोई नहीं मिटाता। “नानक जानै सचा सोइ”: सच्चा (ईश्वर) ही जानता है। एक बात समझने लायक़ है: गुरु जी “संत” से किसी ख़ास इंसान का मतलब नहीं ले रहे। “संत” वो हर इंसान है जिसमें ईश्वर बसता है। और “निंदा” का दायरा गाली-गलौज से कहीं बड़ा है: इसमें पीठ पीछे बुराई करना, अच्छाई को नकारना, और रास्ते में अड़चन डालना भी आता है।

पउड़ी 8

सभ घट तिस के ओहु करनैहारु ॥ सदा सदा तिस कउ नमसकारु ॥
प्रभ की उसतति करहु दिनु राति ॥ तिसहि धिआवहु सासि गिरासि ॥
सभु कछु वरतै तिस का कीआ ॥ जैसा करे तैसा को थीआ ॥
अपना खेलु आपि करनैहारु ॥ दूसर कउनु कहै बीचारु ॥
जिस नो क्रिपा करै तिसु आपन नामु देइ ॥ बडभागी नानक जन सेइ ॥8॥13॥

सारे शरीर उसके हैं, वो ही करने वाला है। सदा उसे नमस्कार। दिन-रात उसकी स्तुति करो। साँस-ग्रास (साँस लेते, खाना खाते) उसे ध्याओ। सब कुछ उसका किया हुआ चल रहा है। जैसा करे, वैसा कोई बनता है। अपना खेल ख़ुद ही खेल रहा है, दूसरा कौन विचार करे? जिसे कृपा करे, उसे अपना नाम दे। ऐसे बड़भागी जन धन्य हैं।