अष्टपदी 11

श्लोक
नानक तिसु बलिहारणै जलि थलि महीअलि सोइ ॥1॥
पउड़ी 1
पउड़ी 2
“प्रभ भावै” (अगर प्रभु को भाए) से हर पंक्ति शुरू होती है: प्रभु चाहे तो इंसान को मनुष्य-गति (ऊँची अवस्था) दे दे। प्रभु चाहे तो पत्थर भी तैरा दे। प्रभु चाहे तो बिना साँस के भी रखे। प्रभु चाहे तो हरि-गुण बोलवा दे। प्रभु चाहे तो पतित (गिरे हुए) का उद्धार कर दे।
“दुहा सिरिआ का आपि सुआमी”: दोनों छोरों (सृष्टि और प्रलय, जन्म और मृत्यु, सुख और दुख) का वो ख़ुद मालिक है। “खेलै बिगसै अंतरजामी”: खेलता है और प्रसन्न होता है, वो अंतर्यामी। “नानक द्रिसटी अवरु न आवै”: नानक की दृष्टि में दूसरा कोई नहीं आता।
पउड़ी 3
“कहु मानुख ते किआ होइ आवै”: कहो, इंसान से क्या हैं सकता है? ये सवाल कड़ा है। गुरु जी कह रहे हैं: इंसान अपने बल पर कुछ नहीं कर सकता।
“अनजानत बिखिआ महि रचै”: अनजाने में (बिना समझे) विषय-विकारों में रचा (फँसा) रहता है। “जे जानत आपन आप बचै”: अगर जान ले (सच्चाई पहचान ले), तो अपने आप बच जाए। ये बड़ी उम्मीद की बात है: ज्ञान ही मुक्ति है। “भरमे भूला दह दिसि धावै, निमख माहि चारि कुंट फिरि आवै”: भ्रम में भटका हुआ दसों दिशाओं में दौड़ता है, पल भर में चारों कोनों में घूम आता है। मन की बेचैनी का इससे अच्छा वर्णन शायद ही कोई हो।
पउड़ी 4
“खिन महि नीच कीट कउ राज”: पल भर में नीच कीट (कीड़े) को राज दे दे। “पारब्रहम गरीब निवाज”: पारब्रह्म ग़रीबों को नवाज़ने वाला (इज़्ज़त देने वाला) है। “जा का द्रिसटि कछू न आवै, तिसु ततकाल दह दिस प्रगटावै”: जिसकी दृष्टि में कुछ नहीं आता (जो बिल्कुल अदृश्य, अनजान है), उसे तत्काल दसों दिशाओं में प्रसिद्ध कर दे।
ये बात उन सब लोगों के लिए है जो सोचते हैं “मैं कुछ नहीं हूँ, मेरी कोई क़ीमत नहीं।” गुरु जी कहते हैं: ईश्वर चाहे तो एक पल में आपको कीड़े से राजा बना सकता है। आपकी हैसियत आप नहीं तय करते, वो तय करता है।
पउड़ी 5
“इस का बलु नाही इसु हाथ”: इसका (जीव का) बल नहीं, इसके हाथ में (कुछ) नहीं। ये कठोर सत्य है। “आगिआकारी बपुरा जीउ”: बेचारा जीव आज्ञाकारी (ईश्वर की आज्ञा का पालक) है। “बपुरा” (बेचारा) शब्द में करुणा है, गुरु जी जीव पर दया कर रहे हैं।
कभी ऊँचे में, कभी नीचे में बसता है। कभी शोक, कभी हर्ष। कभी निंदा-चिंता के व्यवहार। कभी ऊपर आकाश, कभी पाताल। कभी ब्रह्म-विचार का ज्ञाता। ये ज़िंदगी का चित्र है: ऊपर-नीचे, ख़ुशी-ग़म, ज्ञान-अज्ञान, सब बदलता रहता है। “नानक आपि मिलावणहार”: मिलाने वाला वो ख़ुद है।
पउड़ी 6
कभी नृत्य (नाच-गाना) करता है। कभी दिन-रात सोता रहता है। कभी भयंकर क्रोध में। कभी सबके चरणों की धूल। कभी बड़ा राजा बनता है। कभी नीच भिखारी का रूप। कभी बदनामी में। कभी “भला-भला” कहलाता है।
“जिउ प्रभु राखै तिव ही रहै”: जैसे प्रभु रखे, वैसे ही रहता है। ये समर्पण है। ये “जिउ प्रभु राखै” स्वीकार करना कठिन काम है, क्योंकि इंसान का मन कहता है “मैं अपनी ज़िंदगी चला रहा हूँ।वो चला रहा है। आप सिर्फ़ कठपुतली नहीं हैं, लेकिन डोर उसके हाथ में है।
पउड़ी 7
“कबहू होइ पंडितु करे बख्यानु, कबहू मोनिधारी लावै धिआनु”: कभी वो पंडित बनकर व्याख्यान करता है, कभी मौनधारी बनकर ध्यान लगाता है। “कबहू तट तीरथ इसनान, कबहू सिध साधिक मुखि गिआन”: कभी तीर्थ के तट पर स्नान करता है, कभी सिद्ध और साधक बनकर मुँह से ज्ञान कहता है।
“कबहू कीट हसति पतंग होइ जीआ, अनिक जोनि भरमै भरमीआ”: कभी कीड़ा, हाथी, पतंगा बनकर अनेक योनियों में भरमाया हुआ भटकता है। “नाना रूप जिउ स्वागी दिखावै, जिउ प्रभ भावै तिवै नचावै”: बहुरूपिये की तरह अनेक रूप दिखाता है, जैसे प्रभु को भाता है वैसे नचाता है।
“जो तिसु भावै सोई होइ, नानक दूजा अवरु न कोइ”: जो उसे भाता है वही होता है, नानक कहते हैं, दूसरा और कोई नहीं। पंडित से पतंगे तक एक ही कलाकार के वेश हैं। ये समझ आ जाए तो किसी पर हँसना और किसी से जलना, दोनों छूट जाते हैं।
पउड़ी 8
ग्यारहवीं अष्टपदी का समापन, और ये सुखमनी साहिब के सुंदर समापनों में से है।
“कबहू साधसंगति इहु पावै, उसु असथान ते बहुरि न आवै”: कभी (किसी जन्म में, किसी पल में) ये जीव साधसंगत पा लेता है। उस स्थान (अवस्था) से फिर कभी नहीं लौटता। “अंतरि होइ गिआन परगासु”: अंदर ज्ञान का प्रकाश हो जाता है। “उसु असथान का नही बिनासु”: उस स्थान (अवस्था) का कभी विनाश नहीं होता।
“जिउ जल महि जलु आइ खटाना, तिउ जोती संगि जोति समाना”: जैसे पानी में पानी आकर मिल जाता है (फिर अलग नहीं किया जा सकता), वैसे ही ज्योति (आत्मा) ज्योति (परमात्मा) में समा जाती है। ये मिलन का सुंदर रूपक है। पानी पानी में मिलकर एक हो जाता है, कोई सीमा नहीं रहती, कोई भेद नहीं रहता।
“मिटि गए गवन पाए बिस्राम”: भटकना मिट गया, विश्राम पाया। ये पूरी ग्यारहवीं अष्टपदी का सार है: जब तक हुकम नहीं समझा, भटकना है। जब हुकम समझ आया, विश्राम है।
“करन करावन करनै जोगु”: करने वाला, करवाने वाला, और करने योग्य, सब वो ही है। “जो तिसु भावै सोई होगु”: जो उसे भाए, वही होंगे। ये सुखमनी साहिब का सबसे बुनियादी सिद्धांत है: हुकम।
“खिन महि थापि उथापनहारा”: पल भर में स्थापित करने और उखाड़ने वाला। “हुकमे धारि अधर रहावै”: हुकम से ही धरती को आधार (अधर) के बिना (अंतरिक्ष में) टिकाए रखता है। “हुकमे उपजै हुकमि समावै”: हुकम से उत्पन्न, हुकम में ही समा जाता है। “हुकमे ऊच नीच बिउहार”: ऊँच-नीच का सारा व्यवहार भी हुकम से है।
“करि करि देखै अपनी वडिआई”: करके-करके (रचकर-रचकर) अपनी बड़ाई देखता है। ये बड़ा गहरा है: ईश्वर सृष्टि रचता है और फिर उसे देखकर प्रसन्न होता है, जैसे कोई कलाकार अपनी कृति देखकर।