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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अष्टपदी 10 · सृष्टि की विशालता

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 10 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 8 मिनट

अष्टपदी 10

सृष्टि की विशालता
दसवीं अष्टपदी ब्रह्मांड की विशालता का एक चक्कर लगाती है। “कई कोटि” (करोड़ों) से हर पंक्ति शुरू होती है। ये गुरु जी का अपना ब्रह्माण्ड-ध्यान है, ईश्वर कितना बड़ा है, इसका अंदाज़ा लगाने का प्रयास।
“आप उससे बाहर नहीं”: छत पर दूरबीन के पास बैठे पिता और पुत्र, तारों भरे आकाश में चमकती आकाशगंगा की ओर इशारा करता बच्चा

श्लोक

उसतति करहि अनेक जन अंतु न पारावार ॥
नानक रचना प्रभि रची बहु बिधि अनिक प्रकार ॥1॥
Ustati karahi anek jan ant na paaraavaar. Naanak rachna prabh rachee bahu bidh anik prakaar.
अनेक जन (लोग) स्तुति करते हैं, लेकिन उसका अंत नहीं, पार नहीं। नानक कहते हैं, प्रभु ने अनेक विधियों और अनेक प्रकार से रचना रची है। ये श्लोक पूरी दसवीं अष्टपदी का सूत्र है: रचना इतनी विशाल है कि कोई गिन नहीं सकता।

पउड़ी 1

कई कोटि होए पूजारी ॥ कई कोटि आचार बिउहारी ॥
कई कोटि भए तीरथ वासी ॥ कई कोटि बन भ्रमहि उदासी ॥
कई कोटि बेद के स्रोते ॥ कई कोटि तपीसुर होते ॥
कई कोटि आतम धिआनु धारहि ॥ कई कोटि कबि काबि बीचारहि ॥
कई कोटि नवतन नाम धिआवहि ॥ नानक करते का अंतु न पावहि ॥1॥

“कई कोटि” (करोड़ों) की लय शुरू होती है। करोड़ों पूजारी हैं। करोड़ों आचार-व्यवहार वाले हैं। करोड़ों तीर्थवासी हैं। करोड़ों वन में भ्रमण करने वाले संन्यासी हैं। करोड़ों वेद के श्रोता हैं। करोड़ों तपस्वी हैं। करोड़ों आत्म-ध्यान धारते हैं। करोड़ों कवि काव्य-विचार करते हैं। करोड़ों नित-नये नाम ध्याते हैं।

“नानक करते का अंतु न पावहि”: लेकिन नानक कहते हैं, कर्ता (ईश्वर) का अंत कोई नहीं पाता। इतने सारे लोग, इतने तरीक़ों से, इतनी साधना करते हैं, फिर भी वो अनंत रहता है। ये विनम्रता का पाठ है: आप कितना भी कर लो, वो आपसे बड़ा रहेगा।

पउड़ी 2

कई कोटि भए अभिमानी ॥ कई कोटि अंध अगिआनी ॥
कई कोटि किरपन कठोर ॥ कई कोटि अभिग आतम निकोर ॥
कई कोटि पर दरब कउ हिरहि ॥ कई कोटि पर दूखना करहि ॥
कई कोटि माइआ स्रम माहि ॥ कई कोटि परदेस भ्रमाहि ॥
जितु जितु लावहु तितु तितु लगना ॥ नानक करते की जानै करता रचना ॥2॥

पहली पउड़ी में भक्तों की गिनती थी, अब विपरीत दिशा: करोड़ों अभिमानी हैं। करोड़ों अंधे अज्ञानी हैं। करोड़ों कृपण (कंजूस) और कठोर हैं। करोड़ों निर्दय हैं। करोड़ों पराया धन चुराते हैं। करोड़ों दूसरों को दुख देते हैं। करोड़ों माया के श्रम (मेहनत) में फँसे हैं। करोड़ों परदेश में भटकते हैं।

गुरु जी भेद नहीं कर रहे। वो कह रहे हैं: ये सब भी ईश्वर की रचना है। भक्त भी, पापी भी, सब उसी के बनाए हैं। “जितु जितु लावहु तितु तितु लगना”: जिधर लगाए, उधर लगते हैं। “नानक करते कि जानै करता रचना”: कर्ता की रचना कर्ता ही जानता है। हम न्याय करने की स्थिति में नहीं हैं।

पउड़ी 3

कई कोटि सिध जती जोगी ॥ कई कोटि राजे रस भोगी ॥
कई कोटि पंखी सरप उपाए ॥ कई कोटि पाथर बिरख निपजाए ॥
कई कोटि पवण पाणी बैसंतर ॥ कई कोटि देस भू मंडल ॥
कई कोटि ससीअर सूर नख्यत्र ॥ कई कोटि देव दानव इंद्र सिरि छत्र ॥
सगल समग्री अपनै सूति धारै ॥ नानक जिसु जिसु भावै तिसु तिसु निसतारै ॥3॥

अब सृष्टि का विस्तार: करोड़ों सिद्ध, जती, योगी। करोड़ों राजा, रस-भोगी। करोड़ों पक्षी, सर्प। करोड़ों पत्थर, वृक्ष। करोड़ों वायु, जल, अग्नि। करोड़ों देश, भू-मंडल। करोड़ों चंद्रमा, सूर्य, नक्षत्र। करोड़ों देव, दानव, इंद्र।

ये गुरबाणी की ब्रह्माण्ड-दृष्टि है। 1602 के आसपास, यूरोप में गैलिलियो की दूरबीन बनने से कई वर्ष पहले, गुरु अर्जन देव जी “कई कोटि ससीअर सूर नख्यत्र” (करोड़ों चंद्रमा, सूर्य, तारे) कह रहे थे।

“सगल समग्री अपनै सूति धारै”: सारी सामग्री अपने सूत (धागे) में धारण किए हुए है। ये वही माला-मोती वाला रूपक है जो चौथी अष्टपदी में आया था। एक धागा, करोड़ों मोती।

पउड़ी 4

कई कोटि राजस तामस सातक ॥ कई कोटि बेद पुरान सिम्रिति अरु सासत ॥
कई कोटि कीए रतन समुद ॥ कई कोटि नाना प्रकार जंत ॥
कई कोटि कीए चिर जीवे ॥ कई कोटि गिरी मेर सुवरन थीवे ॥
कई कोटि जख्य किंनर पिसाच ॥ कई कोटि भूत प्रेत सूकर म्रिगाच ॥
सभ ते नेरै सभहू ते दूरि ॥ नानक आपि अलिपतु रहिआ भरपूरि ॥4॥

करोड़ों राजस, तामस, सात्विक गुण। करोड़ों वेद, पुराण, स्मृति, शास्त्र। करोड़ों रत्न-समुद्र। करोड़ों प्रकार के जंतु। करोड़ों चिरंजीवी (बहुत लंबा जीने वाले)। करोड़ों पर्वत, मेरु, सुवर्णमय। करोड़ों यक्षकिन्नर, पिशाच। करोड़ों भूत, प्रेत, सूकर (सुअर), म्रिगाच (शिकारी जानवर)।

“सभ ते नेरै सभहू ते दूरि”: सबसे पास, सबसे दूर। “नानक आपि अलिपतु रहिआ भरपूरि”: ख़ुद अलिप्त (निर्लेप) रहता हुआ भरपूर (सर्वव्यापक) है। ये विरोधाभास है: वो हर चीज़ में भरा है लेकिन किसी चीज़ से लिपटा नहीं। जैसे आकाश हर जगह है लेकिन किसी चीज़ से चिपकता नहीं।

पउड़ी 5

कई कोटि पाताल के वासी ॥ कई कोटि नरक सुरग निवासी ॥
कई कोटि जनमहि जीवहि मरहि ॥ कई कोटि बहु जोनी फिरहि ॥
कई कोटि बैठत ही खाहि ॥ कई कोटि घालहि थकि पाहि ॥
कई कोटि कीए धनवंत ॥ कई कोटि माइआ महि चिंत ॥
जह जह भाणा तह तह राखे ॥ नानक सभु किछु प्रभ कै हाथे ॥5॥

करोड़ों पाताल (निचले लोकों) के निवासी। करोड़ों नरक-स्वर्ग के निवासी। करोड़ों जन्मते, जीते, मरते हैं। करोड़ों योनियों में घूमते हैं। करोड़ों बैठे-बैठे खाते हैं (बिना मेहनत)। करोड़ों मेहनत करके थककर पाते हैं। करोड़ों धनवंत बनाए। करोड़ों माया में चिंतित हैं।

“जह जह भाणा तह तह राखे”: जहाँ-जहाँ चाहा, वहाँ-वहाँ रखा। “नानक सभु किछु प्रभ कै हाथे”: सब कुछ प्रभु के हाथ में है। ये एक ही वाक्य पूरी दसवीं अष्टपदी का सार है।

पउड़ी 6

कई कोटि भए बैरागी ॥ राम नाम संगि तिनि लिव लागी ॥
कई कोटि प्रभ कउ खोजंते ॥ आतम महि पारब्रहमु लहंते ॥
कई कोटि दरसन प्रभ पिआस ॥ तिन कउ मिलिओ प्रभु अबिनास ॥
कई कोटि मागहि सतसंगु ॥ पारब्रहम तिन लागा रंगु ॥
जिन कउ होए आपि सुप्रसंन ॥ नानक ते जन सदा धनि धंनि ॥6॥

अब सकारात्मक दिशा: करोड़ों वैरागी हुए, जिनकी लिव राम नाम में लगी। करोड़ों प्रभु को खोजते हैं, आत्मा में ही पारब्रह्म को पाते हैं। करोड़ों दर्शन के प्यासे हैं, उन्हें अविनाशी प्रभु मिला। करोड़ों सत्संग माँगते हैं, उन पर पारब्रह्म का रंग चढ़ा।

“आतम महि पारब्रहमु लहंते”: आत्मा में ही पारब्रह्म को पाते हैं। बाहर नहीं, अंदर। ये बात बार-बार आती है। “नानक ते जन सदा धनि धंनि”: ऐसे जन सदा धन्य-धन्य हैं।

पउड़ी 7

कई कोटि खाणी अरु खंड ॥ कई कोटि अकास ब्रहमंड ॥
कई कोटि होए अवतार ॥ कई जुगति कीनो बिसथार ॥
कई बार पसरिओ पासार ॥ सदा सदा इकु एकंकार ॥
कई कोटि कीने बहु भाति ॥ प्रभ ते होए प्रभ माहि समाति ॥
ता का अंतु न जानै कोइ ॥ आपे आपि नानक प्रभु सोइ ॥7॥

“कई कोटि खाणी अरु खंड, कई कोटि अकास ब्रहमंड”: करोड़ों जीव खानियों और खंडों में, करोड़ों आकाश और ब्रह्मांड। “कई कोटि होए अवतार, कई जुगति कीनो बिसथार”: करोड़ों प्राणी पैदा हुए, कई युक्तियों से प्रभु ने विस्तार किया।

“कई बार पसरिओ पासार, सदा सदा इकु एकंकार”: कई बार ये पसारा पसरा, और सदा सदा वो एक ही एकंकार रहा। ये पंक्ति पूरी गिनती को उलट देती है। करोड़ों बार सृष्टि हुई, पर बनाने वाला हर बार एक ही रहा, न बढ़ा, न घटा।

“कई कोटि कीने बहु भाति, प्रभ ते होए प्रभ माहि समाति”: कई भाँति के करोड़ों जीव बनाए, जो प्रभु से हुए और प्रभु में ही समा गए। “ता का अंतु न जानै कोइ, आपे आपि नानक प्रभु सोइ”: उसका अंत कोई नहीं जानता, नानक कहते हैं, वो प्रभु आप ही आप है। लहर समुद्र से उठती है, समुद्र में लौटती है, समुद्र गिना नहीं जाता।

पउड़ी 8

कई कोटि पारब्रहम के दास ॥ तिन होवत आतम परगास ॥
कई कोटि तत के बेते ॥ सदा निहारहि एको नेत्रे ॥
कई कोटि नाम रसु पीवहि ॥ अमर भए सद सद ही जीवहि ॥
कई कोटि नाम गुन गावहि ॥ आतम रसि सुखि सहजि समावहि ॥
अपुने जन कउ सासि सासि समारे ॥ नानक ओइ परमेसुर के पिआरे ॥8॥10॥

दसवीं अष्टपदी का समापन। करोड़ों पारब्रह्म के दास हैं, जिनकी आत्मा में प्रकाश है। करोड़ों तत्व के जानने वाले हैं, जो सदा एक ही को देखते हैं। करोड़ों नाम-रस पीते हैं, अमर हो गए, सदा-सदा जीते हैं। करोड़ों नाम-गुण गाते हैं, आत्म-रस में सुख-सहज समा जाते हैं।

“अपुने जन कउ सासि सासि समारे”: अपने जनों (भक्तों) को साँस-साँस याद रखता है। “नानक ओइ परमेसुर के पिआरे”: वो परमेश्वर के प्यारे हैं। ये आख़िरी पंक्ति तसल्ली देती है: करोड़ों की भीड़ में भी, ईश्वर अपने हर एक भक्त को साँस-साँस याद रखता है। आप भीड़ में गुम नहीं हैं।