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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अष्टपदी 9 · सच्चे सेवक के लक्षण

सुखमनी साहिब · अष्टपदी 9 (24 में से) · पढ़ने में लगभग 8 मिनट

अष्टपदी 9

सच्चे सेवक के लक्षण
आठवीं अष्टपदी में ब्रह्मज्ञानी का चित्र खींचा। नवीं अष्टपदी ज़मीन पर उतरती है: रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सच्चा सेवक (भक्त) कैसा होता है? उसकी इंद्रियाँ कैसे काम करती हैं?
शीर्षक “बिना नाम की सेवा”: लंगर की रसोई में मुस्कुराते हुए बर्तन माँजती एक स्त्री, पास से देखती एक बच्ची, और पीछे देगें चढ़ाते सेवादार

श्लोक

उरि धारै जो अंतरि नामु ॥
सरब मै पेखै भगवानु ॥
निमख निमख ठाकुर नमसकारै ॥
नानक ओहु अपरसु सगल निसतारै ॥1॥
जो हृदय में नाम धारण करता है, सब में भगवान देखता है, पल-पल ठाकुर को नमस्कार करता है, नानक कहते हैं, वो अपरस (अछूता, विकारों से अछूता) सबका उद्धार करता है।

पउड़ी 1

मिथिआ नाही रसना परस ॥ मन महि प्रीति निरंजन दरस ॥
पर त्रिअ रूपु न पेखै नेत्र ॥ साध की टहल संतसंगि हेत ॥
करन न सुनै काहू की निंदा ॥ सभ ते जानै आपस कउ मंदा ॥
गुर प्रसादि बिखिआ परहरै ॥ मन की बासना मन ते टरै ॥
इंद्री जित पंच दोख ते रहत ॥ नानक कोटि मधे को ऐसा अपरस ॥1॥

गुरु जी इंद्रियों को एक-एक करके लेते हैं और बताते हैं कि सच्चे सेवक की इंद्रियाँ कैसे काम करती हैं:

जीभ (रसना) झूठ नहीं बोलती। मन में निरंजन (निर्मल ईश्वर) के दर्शन की प्रीत है। आँखें (नेत्र) पराई स्त्री/पुरुष का रूप नहीं देखतीं। संतों की सेवा और सत्संग से प्रेम है। कान किसी की निंदा नहीं सुनते। सबसे अपने आप को कमतर (मंदा) जानता है। गुरु की कृपा से विषय-विकार छोड़ देता है। मन की वासना मन से ही टरती (हटती) है।

“इंद्री जित पंच दोख ते रहत”: इंद्रियों को जीत लिया, पाँच दोषों से मुक्त है। “नानक कोटि मधे को ऐसा अपरस”: करोड़ों में कोई एक ऐसा अपरस (विकारों से अछूता) होता है।

पउड़ी 2

बैसनो सो जिसु ऊपरि सुप्रसंन ॥ बिसन की माइआ ते होइ भिंन ॥
करम करत होवै निहकरम ॥ तिसु बैसनो का निरमल धरम ॥
काहू फल की इछा नही बाछै ॥ केवल भगति कीरतन संगि राचै ॥
मन तन अंतरि सिमरन गोपाल ॥ सभ ऊपरि होवत किरपाल ॥
आपि द्रिड़ै अवरह नामु जपावै ॥ नानक ओहु बैसनो परम गति पावै ॥2॥

“बैसनो” (वैष्णव, भक्त) वो है जिस पर ईश्वर प्रसन्न है और जो माया से अलग है। “करम करत होवै निहकरम”: कर्म करते हुए भी निष्कर्म है। ये गीता का भी केंद्रीय विचार है: काम करो, लेकिन फल की चिंता मत करो। गुरु जी इसे अपने शब्दों में कहते हैं।

“काहू फल की इछा नही बाछै”: किसी फल की इच्छा नहीं रखता। “केवल भगति कीरतन संगि राचै”: केवल भक्ति और कीर्तन में रचा रहता है। “आपि द्रिड़ै अवरह नामु जपावै”: ख़ुद जपता है और दूसरों को भी जपवाता है। सच्चा भक्त सिर्फ़ अपने लिए नहीं जपता, वो दूसरों को भी जोड़ता है।

पउड़ी 3

भगउती भगवंत भगति का रंगु ॥ सगल तिआगै दुसट का संगु ॥
मन ते बिनसै सगला भरमु ॥ करि पूजै सगल पारब्रहमु ॥
साधसंगि पापा मलु खोवै ॥ तिसु भगउती की मति ऊतम होवै ॥
भगवंत की टहल करै नित नीति ॥ मनु तनु अरपै बिसन परीति ॥
हरि के चरन हिरदै बसावै ॥ नानक ऐसा भगउती भगवंत कउ पावै ॥3॥

“भगउती” (भगवती, देवी का उपासक, या यहाँ शक्ति-भक्त) वो है जिसमें भगवंत की भक्ति का रंग चढ़ा है। दुष्टों की संगत छोड़ दी है। मन से सारा भ्रम मिट गया है। सारे पारब्रह्म की पूजा करता है (किसी एक देवता की नहीं, सबमें एक को देखता है)।

साधसंगत में पापों का मैल धोता है। भगवंत की टहल (सेवा) नित्य-नियम से करता है। मन-तन अर्पित कर देता है। हरि के चरण हृदय में बसाता है। ऐसा भक्त भगवंत को पाता है।

पउड़ी 4

सो पंडितु जो मनु परबोधै ॥ राम नामु आतम महि सोधै ॥
राम नाम सारु रसु पीवै ॥ उसु पंडित कै उपदेसि जगु जीवै ॥
हरि की कथा हिरदै बसावै ॥ सो पंडितु फिरि जोनि न आवै ॥
बेद पुरान सिम्रिति बूझै मूल ॥ सूखम महि जानै असथूलु ॥
चहु वरना कउ दे उपदेसु ॥ नानक उसु पंडित कउ सदा अदेसु ॥4॥

अब गुरु जी “पंडित” (विद्वान) की परिभाषा बदलते हैं। असली पंडित वो नहीं जिसने बहुत किताबें पढ़ी हैं। असली पंडित वो है जो मन को परबोधे (जगाए, समझाए)। जो राम नाम को अपनी आत्मा में खोजे। जो नाम-रस पीए। जिसके उपदेश से जगत जीवित हो। जो हरि की कथा हृदय में बसाए। जो फिर जन्म-मरण के चक्र में न आए।

“सूखम महि जानै असथूलु”: सूक्ष्म में स्थूल को जाने, यानी छोटी-से-छोटी चीज़ में उस विशाल सत्य को देखे। “चहु वरना कउ दे उपदेसु”: चारों वर्णों को उपदेश दे, यानी भेदभाव न करे, सबको सिखाए।

पउड़ी 5

बीज मंत्रु सरब को गिआनु ॥ चहु वरना महि जपै कोऊ नामु ॥
जो जो जपै तिस की गति होइ ॥ साधसंगि पावै जनु कोइ ॥
करि किरपा अंतरि उर धारै ॥ पसु प्रेत मुघद पाथर कउ तारै ॥
सरब रोग का अउखदु नामु ॥ कलिआण रूप मंगल गुण गाम ॥
काहू जुगति कितै न पाईऐ धरमि ॥ नानक तिसु मिलै जिसु लिखिआ धुरि करमि ॥5॥

“बीज मंत्रु सरब को गिआनु”: बीज-मंत्र (मूल मंत्र) सबका ज्ञान है, सबके लिए उपलब्ध है। “चहु वरना महि जपै कोऊ नामु”: चारों वर्णों में से कोई भी नाम जप सकता है। ये बड़ी महत्वपूर्ण बात है।सबका है।

“पसु प्रेत मुघद पाथर कउ तारै”: पशु, प्रेत, मूर्ख, पत्थर तक को तार देता है। “सरब रोग का अउखदु नामु”: सारे रोगों की औषधि नाम है। “काहू जुगति कितै न पाईऐ धरमि”: किसी युक्ति (तरीक़े) या किसी धर्म (कर्मकांड) से नहीं पाया जाता। “नानक तिसु मिलै जिसु लिखिआ धुरि करमि”: जिसकी तक़दीर में शुरू से (धुर से) लिखा है, उसे मिलता है।

पउड़ी 6

जिस कै मनि पारब्रहम का निवासु ॥ तिस का नामु सति रामदासु ॥
आतम रामु तिसु नदरी आइआ ॥ दास दसंतण भाइ तिनि पाइआ ॥
सदा निकटि निकटि हरि जानु ॥ सो दासु दरगह परवानु ॥
अपुने दास कउ आपि किरपा करै ॥ तिसु दास कउ सभ सोझी परै ॥
सगल संगि आतम उदासु ॥ ऐसी जुगति नानक रामदासु ॥6॥

जिसके मन में पारब्रह्म का निवास है, उसका सच्चा नाम “रामदास” (राम का दास) है। उसने आत्मा-राम को देख लिया है। दास-

दसांतण (दासों के दास) के भाव से उसने पाया है। वो सदा हरि को पास जानता है। वो दरगाह (ईश्वर के दरबार) में मान्य है।

“सगल संगि आतम उदासु”: सबके संग (साथ) रहते हुए भी आत्मा से उदास (विरक्त, अनासक्त) है। ये बड़ी बारीक बात है। उदासी का मतलब दुखी होना नहीं, उदासी का मतलब है लिपटना नहीं। वो सबके साथ है, हँसता है, काम करता है, लेकिन अंदर से चिपकता नहीं।

पउड़ी 7

प्रभ की आगिआ आतम हितावै ॥ जीवन मुकति सोऊ कहावै ॥
तैसा हरखु तैसा उसु सोगु ॥ सदा अनंदु तह नही बिओगु ॥
तैसा सुवरनु तैसी उसु माटी ॥ तैसा अंम्रितु तैसी बिखु खाटी ॥
तैसा मानु तैसा अभिमानु ॥ तैसा रंकु तैसा राजानु ॥
जो वरताए साई जुगति ॥ नानक ओहु पुरखु कहीऐ जीवन मुकति ॥7॥

ये पउड़ी “जीवन मुक्त” (जीते-जी मुक्त) इंसान का वर्णन करती है। “प्रभ की आगिआ आतम हितावै”: प्रभु की आज्ञा को आत्मा का हित (भला) मानता है। वैसा ही हर्ष, वैसा ही शोक (यानी दोनों बराबर)। सदा आनंद, कभी वियोग नहीं। सोना और मिट्टी बराबर। अमृत और ज़हर बराबर। मान और अपमान बराबर। रंक (ग़रीब) और राजा बराबर।

ये “बराबर” होना दरअसल एक गहरी होशियारी की निशानी है। इंसान तब सब कुछ बराबर देखता है जब उसे पता चल जाता है कि सब कुछ एक ही स्रोत से । सोना भी उसी का, मिट्टी भी उसी की। सुख भी उसी का, दुख भी उसी का। तो फ़र्क़ क्या?

“जो वरताए साई जुगति”: जो (ईश्वर) करवाए, वही जीवन-विधि। “नानक ओहु पुरखु कहीऐ जीवन मुकति”: ऐसा पुरुष जीवन-मुक्त कहलाता है।

पउड़ी 8

पारब्रहम के सगले ठाउ ॥ जितु जितु घरि राखै तैसा तिन नाउ ॥
आपे करन करावन जोगु ॥ प्रभ भावै सोई फुनि होगु ॥
पसरिओ आपि होइ अनत तरंग ॥ लखे न जाहि पारब्रहम के रंग ॥
जैसी मति देइ तैसा परगास ॥ पारब्रहमु करता अबिनास ॥
सदा सदा सदा दइआल ॥ सिमरि सिमरि नानक भए निहाल ॥8॥9॥

नवीं अष्टपदी का समापन। पारब्रह्म के सारे स्थान हैं (वो हर जगह है)। जिस-जिस घर (शरीर, जीव) में जैसा रखे, वैसा उसका नाम (स्वभाव) है। वो ख़ुद करने और करवाने योग्य है। जो प्रभु को भाए, वही होंगे। वो अनंत तरंगों में फैला हुआ है। उसके रंग (लीलाएँ) लाखों में भी नहीं देखे जा सकते।

“जैसी मति देइ तैसा परगास”: जैसी बुद्धि देता है, वैसा प्रकाश (समझ) होता है। “सदा सदा सदा दइआल”: सदा, सदा, सदा दयालु है। “सदा” तीन बार, जैसे पहली अष्टपदी में “सिमरउ” तीन बार। गुरु जी जब कोई बात तीन बार कहें, तो वो हृदय में गहरी उतारनी है।