उपसंहार
समापन · श्लोक 58 से 62
राम का आख़िरी वचन। यह विद्या किसे सौंपी जाए, और किसे कभी नहीं।

अब राम अपनी बात समेट रहे हैं। पूरा ब्रह्म–विज्ञान कह चुकने के बाद वे लक्ष्मण की ओर मुड़ते हैं, और स्वर में एक चेतावनी आ जाती है। यह परम-रहस्य है, बेटा, इसे हर किसी के हाथ में नहीं रखा जाता। जिसके भीतर श्रद्धा हो और जिसका हृदय भक्ति से भरा हो, ऐसे ही पात्र को यह विद्या सौंपी जाती है।
श्लोक 58
यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं तावन्मदाराधनतत्परो भवेत्।
श्रद्धालुरत्यूर्जितभक्तिलक्षणो यस्तस्य दृश्योऽहमहर्निशं हृदि॥58॥
फिर राम इस उपदेश की महिमा खोल देते हैं। यह श्रुति का सार है, बेटा, इसे निश्चय कर के हमने आपसे कहा है। जो बुद्धिमान इस पर विचार करता है, वह क्षण भर में पाप-राशियों से छूट जाता है। और इसके आगे वे एक सीधी बात रख देते हैं – हे भाई, यह सारा जगत जो दिख रहा है, माया ही है। इसे मन से छोड़ दीजिए, हमारे भाव में मन को शुद्ध कर लीजिए, तब आप सुखी, आनन्द-स्वरूप और सब रोग-शोक से परे हो जाएँगे।
श्लोक 59 · 60
रहस्यमेतच्छ्रुतिसारसङ्ग्रहं मया विनिश्चित्य तवोदितं प्रिय।
यस्त्वेतदालोचयतीह बुद्धिमान् स मुच्यते पातकराशिभिः क्षणात्॥59॥
भ्रातर्यदीदं परिदृश्यते जगन्मायैव सर्वं परिहृत्य चेतसा।
मद्भावनाभावितशुद्धमानसः सुखी भवानन्दमयो निरामयः॥60॥
फिर राम भक्त की महिमा कह देते हैं। जो हमें भजता है, चाहे निर्गुण रूप में जो गुणों से परे है, या कभी सगुण रूप में, उसका स्पर्श ही पवित्र कर देता है। राम कहते हैं, हम अपने चरणों की धूलि से जिसे छू लें, वह तीनों लोकों को वैसे ही पावन कर देता है जैसे सूर्य अपने प्रकाश से। और इसी के साथ कथा अपने छोर पर आती है। यह जो सम्पूर्ण विज्ञान है, श्रुति का एक ही सार, उसे वेदान्त–वेद के अधिकार से स्वयं राम ने ही गाया है। जो श्रद्धा से, गुरु-भक्ति में रंग कर इसे पढ़ता है, और जिसकी राम के वचनों में भक्ति है, वह राम के ही रूप को पा लेता है। यहाँ ज्ञान और भक्ति, दोनों एक साथ चलते हैं, एक के बिना दूसरा अधूरा है। एक प्रश्न, एक उत्तर, और शिष्य के सामने मुक्ति का द्वार खुल गया।
श्लोक 61 · 62
यः सेवते मामगुणं गुणात्परं हृदा कदा वा यदि वा गुणात्मकम्।
सोऽहं स्वपादाञ्चितरेणुभिः स्पृशन् पुनाति लोकत्रितयं यथा रविः॥61॥
विज्ञानमेतदखिलं श्रुतिसारमेकं वेदान्तवेदचरणेन मयैव गीतम्।
यः श्रद्धया परिपठेद्गुरुभक्तियुक्तो मद्रूपमेति यदि मद्वचनेषु भक्तिः॥62॥