कैसे बनता है यह पुस्तकालय
नीचे उस काम का ब्योरा है जो पढ़ने वाले को दिखाई नहीं देता। किस पोथी से कौन-सी कथा उठाई गई, किसने उसे जाँचा, और जहाँ चूक हुई वहाँ क्या किया गया। एक पुस्तकालय पर भरोसा तभी बनता है जब वह अपनी विधि भी सामने रख दे।
गिनती
इस समय यहाँ 3,028 पन्ने हैं: 2,340 हिन्दी में और 688 अंग्रेज़ी में, 58 संग्रहों में बँटे हुए। चित्र 2,716 हैं।
ग्रंथ कहाँ से आते हैं
हर संग्रह के नीचे उसका स्रोत नाम सहित दर्ज रहता है। रामचरितमानस गीता प्रेस के संस्करण से लिया गया है, और पद्य के पीछे पोद्दार जी की टीका रहती है। गुरबाणी श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अंगों से ली जाती है, पंक्ति-क्रमांक मिलाकर। उपनिषद् किसी एक भाष्यकार के सार से नहीं, मूल पाठ से बनाए गए हैं। जहाँ दो पाठ अलग मिलते हैं, दोनों दर्ज होते हैं, और यह भी लिखा जाता है कि हमने किसे चुना और क्यों।
एक पन्ना कैसे बनता है
पहले मूल पाठ पढ़ा जाता है, पन्ना-दर-पन्ना। फिर उसे प्रसंगों में बाँटा जाता है। फिर वह कथा की तरह लिखा जाता है, इस तरह कि पढ़ने वाला बहता चला जाए, पर घटनाएँ, नाम, संख्याएँ और क्रम वही रहें जो स्रोत में हैं। अन्त में पन्ना जाँच से गुज़रता है। जो जाँच में अटक जाए वह प्रकाशित नहीं होता।
क्या-क्या जाँचा जाता है
गुरबाणी का हर पन्ना प्रकाशन से पहले प्रामाणिक पंक्तियों से मिलाया जाता है, ताकि कोई पंक्ति छूटे नहीं और कोई बाहर से जुड़ न जाए। उपनिषद् के पन्नों पर उद्धरण मूल से मिलाए जाते हैं। एक अलग जाँच केवल अनुनासिक के लिए है, क्योंकि ईशावास्यमिदँ और ईशावास्यमिदं एक नहीं हैं, और वैदिक पंक्ति में यह अन्तर सजावट नहीं है। जहाँ अंग्रेज़ी पन्ने का स्वर बदला जाता है, वहाँ एक जाँच यह देखती है कि नाम और संख्याएँ वैसी की वैसी रहें।
जहाँ भूल होती है
भूलें होती हैं। हुई हैं। सुखमनी साहिब के कई पउड़ी कभी गलत छपे थे, और एक पंक्ति ऐसी जुड़ गई थी जो गुरबाणी की थी ही नहीं। जपजी साहिब अधूरा छपता था। ये ठीक किए गए, चुपचाप नहीं। जो भी सुधारा गया वह सुधार-पत्र में दर्ज है, तारीख़ के साथ, और वह पन्ना अब बाईस हज़ार शब्दों से बड़ा है। किसी पुस्तकालय की सबसे भरोसे वाली चीज़ उसकी शुद्ध सूची नहीं होती, उसकी भूल-सूची होती है।
चित्र कैसे बनते हैं
प्रेरणा राजा रवि वर्मा की तैल-परम्परा से है। बनते ये आज के औज़ारों से हैं, एक बँधी हुई शैली में, केवल इसी पुस्तकालय के लिए। फिर हर चित्र कथा के पाठ से मिलाया जाता है: कौन खड़ा है, वेश क्या है, हाथ में क्या है, प्रसंग कहाँ का है। जो नहीं मिलता वह दोबारा बनता है। कुछ और देखने हों तो चित्रों की बात पर मिलेंगे।
जो अभी बाकी है
बहुत कुछ। आदि ग्रंथ अभी देवनागरी लिप्यन्तरण में है, गुरमुखी मूल के बिना। रामचरितमानस का अंग्रेज़ी संस्करण नहीं बना। कई पुराण अभी अधूरे हैं, और कुछ शुरू ही नहीं हुए। पाठ का स्वर-पाठ कहीं नहीं है। यह सूची छोटी नहीं हो रही, क्योंकि जैसे-जैसे काम बढ़ता है वैसे-वैसे यह दिखता है कि और क्या-क्या होना चाहिए।
कुछ गलत मिले तो सुधार-पत्र देखिए, और लिख भेजिए। जो सुधरेगा वह भी वहीं दर्ज होगा।