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शुकदेव का जन्म और वैराग्य

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यह कथा एक आश्रम की उस घड़ी से आरम्भ होती है जब महर्षि व्यास हवन के लिए अरणि मथ रहे थे। उसी समय घृताची नाम की एक अप्सरा उनके सामने से निकली। उस असितापांगी सुन्दरी को देखकर व्यासजी असमंजस में पड़ गए और सोचने लगे कि यह देवकन्या तो मेरे योग्य नहीं। अप्सरा भी उन्हें विचलित देखकर डर गयी कि कहीं ये शाप न दे दें, और शुकी का रूप धरकर उड़ गयी। उसे पक्षी के रूप में देखते ही व्यासजी के मन में विस्मय भर आया। बड़ी धीरता से मन को रोकने पर भी वे उस चंचल मन को वश में न कर सके, और मथते-मथते उनका तेज उसी अरणि पर जा पड़ा। उस अरणि से उन्हीं के समान मनोहर रूप वाला एक बालक प्रकट हुआ, मानो हवन में घृताहुति पड़ने से अग्नि दीप्त हो उठी हो।

गंगा स्वयं आकर उस शिशु को अपने जल से नहलाने लगीं, आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई, देवताओं ने दुन्दुभियाँ बजायीं और अप्सराएँ नाच उठीं। विश्वावसु, नारद और तुम्बुरु जैसे गन्धर्वराज उसके जन्म पर गान करने लगे, तथा आकाश से दिव्य दण्ड, कमण्डलु और कृष्ण मृगचर्म उतर आए। शुकी के रूप को देखकर ही व्यासजी ने उस बालक का नाम शुक रख दिया। बालक क्षण भर में बड़ा हो गया, और विद्या-विधान के ज्ञाता व्यासजी ने उसका उपनयन संस्कार किया। सारे वेद अपने रहस्यों सहित उसके सामने वैसे ही उपस्थित हो गए जैसे वे उसके पिता में विद्यमान थे। बृहस्पति को आचार्य मानकर शुकदेव ने गुरुकुल में ब्रह्मचर्य का पालन किया, समस्त वेद और धर्मशास्त्र पढ़े, और गुरुदक्षिणा देकर पिता के पास लौट आए।

विवाह से इनकार

लौटे हुए पुत्र को व्यासजी ने प्रेम से गले लगाया, उसका मस्तक सूँघा, और कुछ दिनों बाद उसके विवाह की बात छेड़ दी। वे बोले कि हे पुत्र, आप अब विवाह कर लीजिए और गृहस्थ बनकर देवताओं तथा पितरों का यजन कीजिए; अपुत्र की कोई गति नहीं होती, इसलिए मुझे ऋण से मुक्त कीजिए। किन्तु विरक्त शुकदेव ने हाथ जोड़कर कहा कि हे पिताजी, मुझ शिष्य को आप तत्त्वज्ञान का उपदेश दीजिए। इस मनुष्यलोक में विपत्तिरहित सुख है ही कहाँ? स्त्री को पाकर मैं उसी के वश में हो जाऊँगा; परतन्त्र होकर भला कौन-सा सुख मिलेगा? लोहे या काठ के बन्धन से तो मनुष्य कभी छूट भी जाता है, पर पुत्र और स्त्री के बन्धन से कभी नहीं छूटता। यह देह विष्ठा और मूत्र से भरी रहती है, और वैसा ही स्त्री का शरीर भी; भला कौन विवेकी इससे प्रीति करना चाहेगा? मैं अयोनिज हूँ, फिर योनिजन्य सुख में मेरी बुद्धि कैसे लगे? इसलिए मुझे वह ज्ञान दीजिए जो इस संसाररूपी सर्प के भय से मेरी रक्षा करे।

पुत्र के इन युक्तिपूर्ण वचनों को सुनकर व्यासजी चिन्ता में पड़ गए और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। फिर उन्होंने समझाया कि घर न तो बन्धनागार है, न बन्धन का कारण; जो मन से मुक्त है, वह गृहस्थ रहते हुए भी मुक्त हो जाता है। न्याय से धन कमाने वाला, अग्निहोत्र करने वाला, सत्यवादी और पवित्र गृहस्थ घर में रहते हुए भी छूट जाता है; वसिष्ठ जैसे आचार्यों ने भी इसी आश्रम का आश्रय लिया था। उन्होंने उदाहरण दिए कि तीन हजार वर्ष तक निराहार तप करने वाले विश्वामित्र भी मेनका को देखकर मोहित हो गए और शकुन्तला उत्पन्न हुई; उनके पिता पराशर भी धीवर की कन्या को देखकर कामबाण से आहत हो गए थे; ब्रह्माजी तक अपनी कन्या को देखकर व्याकुल हो उठे थे। अतः बलवान् इन्द्रियों पर विजय पाने के लिए पहले गृहस्थ बनना चाहिए, फिर वृद्धावस्था में तप। पर शुकदेव फिर भी न माने।

देवीभागवत और मिथिला की राह

तब व्यासजी ने कहा कि हे पुत्र, मेरे रचे इस श्रीमद्देवीभागवत को पढ़िए; बारह स्कन्धों और अठारह हजार श्लोकों वाला यह पवित्र पुराण भगवती के उत्तम चरितों से भरा है और भवसागर से पार करने वाला है। शुकदेव ने उसे विधिवत् पढ़ा, फिर भी उनके चित्त को शान्ति न मिली और वे नारद की भाँति उदासीन-से दिखायी देने लगे। तब व्यासजी बोले कि यदि मेरे उपदेश से आपको शान्ति नहीं मिलती, तो राजा जनक की मिथिलापुरी चले जाइए; वे विदेह राजर्षि जीवन्मुक्त हैं, संसार में रहते हुए भी माया के जाल में नहीं बँधते, वे ही आपके मोह का नाश करेंगे। शुकदेव को इस पर बड़ा सन्देह हुआ कि कोई राज्य करते हुए भी विदेह और जीवन्मुक्त कैसे हो सकता है; यह तो वैसा ही असम्भव जान पड़ता है जैसे किसी वन्ध्या का पुत्र हो। फिर भी अपने सन्देह को मिटाने के लिए वे चल पड़े। लगभग दो वर्ष में सुमेरु और एक वर्ष में हिमालय पार करके वे मिथिला जा पहुँचे, जहाँ की प्रजा सुखी और सदाचारी थी।

नगर के द्वार पर द्वारपाल ने उन्हें रोका और उनका कुल तथा प्रयोजन पूछा। शुकदेव पहले तो स्तम्भ की तरह मौन खड़े रहे, फिर हँसते हुए बोले कि आपके इतना कहने से ही मेरा प्रयोजन पूरा हो गया; मैं विदेहनगर देखने आया था, पर यहाँ तो प्रवेश ही दुर्लभ है। उन्होंने राग-विराग और शत्रु-मित्र का ऐसा शान्त विवेचन किया कि द्वारपाल उन्हें ज्ञानी जानकर भीतर ले गया। राजभवन की वारांगनाएँ नृत्य-गान और कामशास्त्र में निपुण थीं; उस युवा रूपवान् मुनि को देखकर वे मुग्ध हो गयीं, किन्तु जितेन्द्रिय शुद्धात्मा शुकदेव ने उन सबको माता के समान समझा। न वे हर्षित हुए, न खिन्न; रात्रि में सन्ध्योपासना और ध्यान करके वे प्रातः फिर समाधिस्थ हो गए।

राजा जनक का उपदेश

शुकदेव का आना सुनकर पवित्रात्मा राजा जनक अपने पुरोहित और मन्त्रियों सहित उनके पास आए, उन्हें उत्तम आसन देकर तथा दूध देने वाली गौ भेंट करके उनका सत्कार किया, और कुशल पूछा। सुखद आसन पर बैठे शान्तचित्त शुकदेव से जनक ने पूछा कि हे महाभाग, आप निःस्पृह होकर मेरे यहाँ किस कारण पधारे। शुकदेव ने अपनी सारी कथा सुनायी और अन्त में कहा कि हे राजेन्द्र, मैं मोक्ष का अभिलाषी हूँ; तप, तीर्थ, व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय और ज्ञान में से जो मोक्ष का साक्षात् साधन हो, वही मुझे बताइए।

जनकजी बोले कि मोक्षमार्ग पर चलने वाले विप्र को पहले गुरु के पास रहकर वेद-वेदान्त पढ़ने चाहिए, फिर विवाह करके गृहस्थ में रहना चाहिए; न्याय से धन कमाए, सदा सन्तुष्ट रहे और किसी से कोई आशा न रखे। पुत्र-पौत्र होने पर वानप्रस्थ ले, तप के द्वारा काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मात्सर्य इन छह शत्रुओं पर विजय पाए, और जब हृदय में विशुद्ध वैराग्य उत्पन्न हो तभी चौथे आश्रम संन्यास का आश्रय ले; विरक्त को ही संन्यास का अधिकार है, अन्य को नहीं। वेदों में अड़तालीस संस्कार कहे गए हैं, जिनमें चालीस गृहस्थ के लिए और आठ मुमुक्षु के लिए हैं; एक आश्रम से क्रमशः दूसरे में जाना ही शिष्टजनों का आदेश है।

शुकदेव ने कहा कि जब हृदय में वैराग्य और ज्ञान उत्पन्न हो ही चुके हों, तो सीधे आश्रम या वन में क्यों न रहा जाए। इस पर जनक ने समझाया कि इन्द्रियाँ बड़ी बलवान् होती हैं और अपरिपक्व बुद्धि वाले के मन में अनेक विकार पैदा कर देती हैं; वासनाओं का जाल शीघ्र नहीं मिटता, इसलिए उसे क्रम से त्यागना चाहिए। ऊँचे स्थान पर सोने वाला ही गिरता है, नीचे सोने वाला नहीं; संन्यास लेकर कोई भ्रष्ट हो जाए तो उसे दूसरा मार्ग नहीं मिलता। जैसे चींटी जड़ से चलकर धीरे-धीरे विश्राम लेती हुई फल तक पहुँच जाती है, और तीव्र गति से उड़ने वाला पक्षी थक जाता है, वैसे ही मन को क्रमशः आश्रमों के द्वारा जीतना चाहिए। जो गृहस्थ में रहते हुए भी शान्त और आत्मज्ञानी है, वह न हर्षित होता है न खिन्न, और हानि-लाभ में समान रहता है। जनक ने कहा कि हे अनघ, देखिए, मैं राज्य करता हुआ भी जीवन्मुक्त हूँ; अपनी इच्छा से सब काम करता हूँ, पर मुझे न शोक होता है न हर्ष।

फिर उन्होंने रहस्य खोला कि जो दृश्य जगत् दिखायी देता है, वह अदृश्य आत्मा को भला कैसे बाँध सकता है? पाँच महाभूत और उनके गुण दृश्य हैं, पर निरंजन आत्मा तो अनुमानगम्य है, वह कभी बँधता ही नहीं। बन्धन और मोक्ष का कारण न यह देह है, न जीवात्मा, न इन्द्रियाँ, बल्कि केवल मन है; मन के निर्मल होते ही सब कुछ निर्मल हो जाता है। सब तीर्थों में बार-बार स्नान करने पर भी यदि मन निर्मल न हुआ तो सब व्यर्थ है। शत्रु, मित्र और उदासीन के भेद भी मन में ही रहते हैं; एकात्मभाव में यह भेद नहीं रहता। बन्धन का मुख्य कारण अविद्या है, और उसे दूर करने वाली विद्या; इसलिए ज्ञानी को सदा विद्या का अनुशीलन करना चाहिए। गुणों में गुण, भूतों में भूत और इन्द्रियों में इन्द्रियाँ ही रमण करती हैं; इसमें आत्मा का क्या दोष? सबकी रक्षा के लिए वेदों में मर्यादा बाँधी गयी है, और वेद के बताए मार्ग पर चलने वाले का ही कल्याण होता है।

शुकदेव का सन्देह फिर भी बना रहा। उन्होंने कहा कि वेदधर्म में तो हिंसा की बहुलता है; सोमपान, पशुहिंसा और मांसभक्षण स्पष्ट अनाचार जान पड़ते हैं, फिर वेदोक्त धर्म मुक्ति देने वाला कैसे हो? जनक ने उत्तर दिया कि यज्ञ में जो हिंसा दिखायी देती है, वह वास्तव में अहिंसा ही है; जैसे गीली लकड़ी के संयोग से ही अग्नि में धुआँ दिखता है, वैसे ही रागी जनों के द्वारा की गयी हिंसा ही हिंसा है, किन्तु अनासक्त जनों के लिए वह हिंसा नहीं कही गयी। जो कर्म राग और अहंकार से रहित होकर किया जाए, उसे विद्वान् न किए हुए के समान मानते हैं; जितात्मा मुमुक्षु के लिए वही अहिंसा है।

यही मिथिला के विदेह राजा का उपदेश था, कि बन्धन और मुक्ति बाहरी त्याग में नहीं, मन में हैं; और जो मन को जीत ले, वह राजसिंहासन पर बैठकर भी उतना ही मुक्त है जितना वन में बैठा तपस्वी। इस ज्ञान को हृदय में धारण कर अरणि से जन्मे विरक्त शुकदेव उस जीवन्मुक्ति के रहस्य को समझने लगे, जिसे राजा जनक ने राज्य करते हुए भी जी कर दिखाया था।

आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)