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मधु-कैटभ और योगनिद्रा देवी

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प्रलय की वह घड़ी थी जब तीनों लोक एक अपार जलराशि में विलीन हो चुके थे। न पृथ्वी शेष थी, न आकाश, न कोई दिशा; बस एक अथाह सागर चुपचाप लहराता रहता था। उसी महासागर के ऊपर शेषनाग की शय्या पर देवाधिदेव भगवान् विष्णु सोए हुए थे। उनके नेत्र मुँदे थे, अंग निस्पन्द थे, और उनके सारे शरीर पर योगनिद्रा देवी की माया छाई हुई थी। यही वे आद्याशक्ति हैं जिनकी इच्छा से यह जगत् रचा जाता, पाला जाता और फिर अपने ही में समेट लिया जाता है।

उसी निस्तब्ध जल में एक विचित्र बात घटी। सोए हुए विष्णु के कानों के मैल से दो दानव जन्म ले बैठे, जिनके नाम पड़े मधु और कैटभ। दोनों महाबली थे, और उस एकार्णव के जल में क्रीड़ा करते हुए दिन-दिन बढ़ने लगे। इधर-उधर विचरते हुए एक दिन उनके मन में यह प्रश्न उठा कि बिना किसी कारण के तो कोई कार्य होता नहीं; फिर यह इतना विस्तृत जल किस आधार पर टिका है, इसे किसने रचा, और हम दोनों कैसे उत्पन्न हुए। कैटभ ने अपने भाई मधु से कहा कि इस जल के भीतर अवश्य ही कोई अचल और महाबली शक्ति है, वही परात्परा देवी हम दोनों की भी स्थिति का कारण हैं।

तप और इच्छामृत्यु का वरदान

इसी चिन्तन में डूबे थे कि आकाश से उन्हें एक अति मनोहर वाग्बीज की ध्वनि सुनायी पड़ी। उसे सुनते ही दोनों ने उसे हृदय में धारण कर लिया और उसका दृढ़ अभ्यास करने लगे। तभी आकाश में कौंधती हुई एक सुन्दर विद्युत् दिखी, तो उन्होंने समझा कि यही मन्त्र है और यही सगुण ध्यान प्रत्यक्ष हुआ है। आहार त्यागकर, इन्द्रियों को वश में करके, उसी विद्युत्-ज्योति में मन लगाये वे एक हजार वर्ष तक कठोर तप में लीन रहे। उनकी इस तपस्या से परात्परा शक्ति प्रसन्न हो उठीं और एक अशरीरी वाणी गूँजी कि हे दैत्यो, आपकी कठोर तपस्या से हम परम प्रसन्न हैं; आप मनचाहा वरदान माँगिए। दोनों ने हाथ जोड़कर कहा कि हमें यही वर दीजिए कि हमारी मृत्यु हमारी ही इच्छा से हो, किसी और के चाहने से नहीं। वाणी ने कहा कि ऐसा ही होगा; अब आप दोनों अपनी इच्छा से ही मृत्यु को प्राप्त होंगे, कोई देव या दानव आप दोनों को पराजित न कर सकेगा।

ऐसा दुर्लभ वरदान पाकर मधु और कैटभ मद से चूर हो उठे और उस महासागर में जलचरों के संग निर्भय क्रीड़ा करने लगे। कुछ काल बीता तो संयोगवश उनकी दृष्टि कमल के आसन पर विराजमान जगत्स्रष्टा ब्रह्माजी पर पड़ी। दोनों दैत्य युद्ध की लालसा से भर उठे और ब्रह्माजी से बोले कि या तो आप हमसे युद्ध कीजिए, या यह कमल का आसन छोड़कर जहाँ चाहें चले जाइए; वीरभोग्य इस आसन पर बैठने का अधिकार दुर्बल को कहाँ। यह सुनकर ब्रह्माजी चिन्ता में पड़ गए और मन-ही-मन सोचने लगे कि इन बलशाली वीरों का सामना मुझ-जैसा तपस्वी कैसे करे।

ब्रह्मा की पुकार और योगनिद्रा की स्तुति

नीति के सब उपाय मन में तौलकर ब्रह्माजी ने निश्चय किया कि शेषशय्या पर सोए चतुर्भुज भगवान् विष्णु को जगाना ही उचित है। कमलनाल का आश्रय लेकर वे विष्णु के समीप पहुँचे और उन्हें जगाने के लिए स्तुति करने लगे कि हे दीनानाथ, हे हरे, हे वासुदेव, उठिए और मेरी रक्षा कीजिए। किन्तु विष्णु न जागे, क्योंकि वे तो योगनिद्रा के वश में पड़े हुए थे।

तब ब्रह्माजी ने भीतर ही भीतर विचारा कि विष्णु मेरी इतनी स्तुति पर भी नहीं जागते; इसका अर्थ यही है कि निद्रा इनके अधीन नहीं, बल्कि ये ही निद्रा के अधीन हो गए हैं। जो जिसके वश में होता है, वही उसका दास कहलाता है; अतः यह योगनिद्रा ही लक्ष्मीपति विष्णु की भी स्वामिनी हैं। मैं, विष्णु, शंकर, सावित्री, लक्ष्मी और पार्वती, हम सब उन्हीं के अधीन हैं। यह जानकर उन्होंने मन को एकाग्र कर उन्हीं भगवती योगनिद्रा की स्तुति आरम्भ की, जो विष्णु के अंग-अंग में व्याप्त थीं।

हे देवि, इस जगत् का कारण आप ही हैं, यह मैंने वेदवाक्यों से जाना है। आपकी मोहमयी लीला को कौन जान सकता है, जिसमें स्वयं विष्णु भी विवश होकर सो रहे हैं। सांख्य के विद्वान् प्रकृति को अचेतन कहते हैं; किन्तु यदि आप जड़ होतीं तो जगदाधार विष्णु को इस प्रकार चेतनाहीन कैसे कर देतीं। आप ही बुद्धि हैं, आप ही लक्ष्मी, कीर्ति, मति, धृति, कान्ति, श्रद्धा और रति के रूप में समस्त प्राणियों में विद्यमान हैं। मुनिजन तीनों संध्याओं में ‘संध्या’ नाम से आपका ही ध्यान करते हैं। यज्ञ में विद्वान् ‘स्वाहा’ का उच्चारण न करें तो देवता अपना भाग तक न पा सकें; इस प्रकार देवताओं का भरण-पोषण भी आप ही करती हैं। हे भगवति, इन दोनों मदोन्मत्त दानवों को देखकर मैं भयभीत हूँ और आपकी शरण में हूँ। या तो इस समय आप आदिदेव विष्णु को मुक्त कर दीजिए, अथवा इन दोनों महादैत्यों का स्वयं वध कर दीजिए।

इस स्तुति से प्रसन्न होकर तामसी देवी विष्णु के शरीर से निकलकर उनके समीप आ खड़ी हुईं। जैसे ही उन्होंने विष्णु के समस्त अंगों को छोड़ा, अतुलित तेजवाले भगवान् विष्णु बार-बार जँभाई लेते हुए उठ बैठे। भय से काँपते ब्रह्माजी को देखकर उन्होंने पूछा कि आप तप छोड़कर यहाँ क्यों आए और इतने भयभीत क्यों हैं। ब्रह्माजी ने बताया कि आपके कानों के मैल से जन्मे दो महादानव मुझे मारना चाहते हैं। विष्णु ने कहा कि अब आप निर्भय हो जाइए, इनकी मृत्यु निकट है।

पाँच हजार वर्ष का युद्ध

इतने में ब्रह्माजी को ढूँढ़ते हुए वे दोनों मतवाले दैत्य वहाँ आ पहुँचे और विष्णु को ललकारा। विष्णु ने भी उन्हें युद्ध के लिए बुलाया। पहले मधु टूट पड़ा, थका तो कैटभ लड़ने लगा; इस प्रकार बारी-बारी से दोनों दानव मल्लों की भाँति विष्णु से बाहुयुद्ध करते रहे। ब्रह्माजी और आकाश में स्थित आद्याशक्ति देवी इस युद्ध की साक्षी थीं। पाँच हजार वर्ष बीत गए, फिर भी वे दैत्य नहीं थके, पर विष्णु को ग्लानि होने लगी। ध्यान की अवस्था में उन्हें ज्ञात हुआ कि इन दोनों को देवी का इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त है, इसी से ये अजेय बने हुए हैं।

तब विष्णु ने सब चिन्ता छोड़कर आकाश में स्थित योगनिद्रा भगवती की शरण ली और हाथ जोड़कर स्तुति की कि हे महामाये, हे सृष्टि-संहारकारिणि, हे भुक्ति-मुक्ति-दायिनि शिवे, आपको नमस्कार है। आपके ही प्रभाव से मैं निद्रा में विलीन होकर अचेत हो गया था, और आपके ही वरदान से ये दानव मदोन्मत्त हैं; अब मेरी सहायता आप ही कीजिए। देवी मुसकराती हुई बोलीं कि हे विष्णो, आप पुनः इनसे युद्ध कीजिए। ये शूरवीर छल से मोहित करके ही मारे जा सकते हैं; मैं अपनी तिरछी चितवन से इन्हें मोहित कर दूँगी, उसी क्षण आप इनका वध कर दीजिएगा।

देवी की चितवन और मेदिनी का जन्म

देवी के प्रीतिभरे वचन सुनकर विष्णु फिर रणभूमि में आ डटे। जब दोनों दैत्य युद्ध पर उतारू हुए, तब अरुण नेत्रोंवाली भगवती ने उनकी ओर देखकर मन्द मुसकान के साथ अपने कटाक्ष उन पर ऐसे चलाए मानो दूसरे कामबाण हों। देवी की उस चितवन से वे पापी मधु-कैटभ अत्यन्त मोहित हो गए और अपने ऊपर देवी की विशेष अनुकम्पा समझकर वहीं ठिठक गए। अवसर पहचानकर विष्णु ने हँसते हुए कहा कि हे वीरो, आप जो चाहें वर माँगिए; आपके अद्भुत युद्ध से मैं परम प्रसन्न हूँ। अभिमान से भरे दोनों दैत्य बोले कि हे विष्णो, हम याचक नहीं, दाता हैं; आप ही अपना मनचाहा वर माँगिए। विष्णु ने तुरन्त कहा कि यदि आप प्रसन्न हैं तो यही वर दीजिए कि आप दोनों भाई अब मेरे ही हाथों मारे जाएँ।

यह सुनकर दोनों चकित रह गए और अपने को ठगा हुआ जानकर शोक में पड़ गए। किन्तु वचन के पक्के वे इधर-उधर जल-ही-जल देखकर बोले कि हे मधुसूदन, हमें किसी निर्जल भूमि पर मारिए, तभी हम मारे जा सकेंगे; अब आप सत्यवादी बनिए। विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र का स्मरण करके हँसते हुए अपनी दोनों जाँघों को फैलाकर जल के ऊपर सूखा स्थल दिखा दिया और कहा कि देखिए, यहाँ जल नहीं, यही पृथ्वी है; अपने सिर यहीं रखिए। दोनों दैत्यों ने अपने शरीर बढ़ाकर हजारों योजन लम्बे-चौड़े कर लिए, तो विष्णु ने अपनी जाँघें उससे भी दुगुनी कर दीं। अपनी बात सच सिद्ध करने के लिए उन्होंने अपने मस्तक उन अद्भुत जाँघों पर रख दिए, और उसी क्षण विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके विशाल सिर धड़ से अलग कर दिए।

मधु और कैटभ के मरते ही उनकी मेद से सारा सागर पट गया। इसी कारण पृथ्वी का नाम ‘मेदिनी’ पड़ा और तभी से मिट्टी अभक्ष्य मानी जाने लगी। सूतजी कहते हैं कि यही परात्परा शक्ति समस्त देव-दानवों की आराध्या हैं; तीनों लोकों में इनसे बढ़कर कोई नहीं। बुद्धिमान् मनुष्य को सगुण अथवा निर्गुण रूप में सदा उसी महामाया महाविद्या की उपासना करनी चाहिए।

आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)