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मणिद्वीप का वर्णन

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व्यासजी की वाणी अब उस लोक की ओर मुड़ी जो सब लोकों के सिरे पर टिका है। उन्होंने राजा जनमेजय से कहा कि अब वे उन्हें वह धाम दिखाना चाहते हैं जहाँ से यह सारी सृष्टि चलती है। ब्रह्मलोक से भी ऊपर जो सर्वलोक सुना जाता है, वही मणिद्वीप है, जहाँ भगवती सदा विराजती हैं। सृष्टि के आरम्भ में मूलप्रकृतिस्वरूपिणी परा अम्बा ने अपने निवास के लिए इसे अपनी इच्छा से रचा था। यह कैलास से, वैकुण्ठ से और गोलोक से भी महान् और उत्तम है; तीनों लोकों में इसके समान सुन्दर स्थान कहीं नहीं। यही तीनों जगत् का छत्र है और समस्त ब्रह्माण्डों की छाया-स्वरूप भी यही है।

सुधासागर और पहले दो परकोटे

मणिद्वीप के चारों ओर अमृत का एक अगाध सागर लहराता है, रत्नमयी स्वच्छ बालुका से युक्त, मत्स्य और शंखों से भरा; पवन के आघात से उठी सैकड़ों तरंगें उसके शीतल जल-कणों को चारों ओर बिखेरती रहती हैं, और तट पर रत्नों के वृक्ष खड़े हैं। उस सुधासागर के पार पहला परकोटा लौह धातु का है, सात योजन चौड़ा, आकाश को छूता हुआ। इसमें चार द्वार और सैकड़ों द्वारपाल हैं; भगवती के दर्शन को आनेवाले देवताओं के गण और वाहन यहीं ठहरते हैं। विमानों की घरघराहट और घोड़ों की हिनहिनाहट से यहाँ की दिशाएँ बहरी-सी हो जाती हैं।

उसके आगे कांसे का दूसरा परकोटा है, मण्डलाकार और पहले से सौ गुना अधिक तेजस्वी। इसके चारों ओर हर जाति के वृक्ष सदा फूलों और फलों से लदे रहते हैं, तुलसी और मल्लिका के वन महकते हैं, और कोयल की कूक तथा भौंरों की गुंजार से यह सारा घेरा गूँजता रहता है।

छह ऋतुओं के उपवन

कांसे और ताँबे के परकोटों के बीच कल्पवाटिका है, जिसका स्वामी वसन्त है; मधुश्री और माधवश्री उसकी दो प्रिय भार्याएँ हैं। ताँबे का परकोटा चौकोर और सात योजन ऊँचा है। ताँबे तथा सीसे के बीच सन्तानवाटिका है, जहाँ ग्रीष्म शुक्रश्री और शुचिश्री के साथ राज करता है। सीसे और पीतल के बीच हरिचन्दन की वाटिका है; वहाँ का स्वामी वर्षा ऋतु मेघ पर सवार होकर, बिजली को नेत्र और मेघों को कवच बनाए, गर्जन को मुख और इन्द्रधनुष को धनुष बनाए बरसता रहता है, और नभःश्री आदि बारह शक्तियाँ उसके साथ रहती हैं। पीतल तथा पंचधातु के बीच मन्दारवाटिका में शरद् इषुलक्ष्मी और ऊर्जलक्ष्मी के साथ बसता है; पंचधातु और चाँदी के बीच पारिजात-वन में हेमन्त सहश्री तथा सहस्यश्री के साथ; और चाँदी तथा सोने के बीच कदम्बवाटी में शिशिर तपःश्री और तपस्यश्री के साथ विराजता है, जहाँ कदम्ब-आसव की हजारों धाराएँ निरन्तर बहती रहती हैं।

सोने का परकोटा तप्त स्वर्ण का बना है, और उसके आगे पुष्पराग मणि का परकोटा है, कुमकुम-सा अरुण; वहाँ की भूमि, वृक्ष और जल तक पुष्पराग के ही हैं। यहाँ से भीतर की ओर हर अगला परकोटा पहले से एक लाख गुना अधिक तेजस्वी होता जाता है।

आठ दिशाओं के लोकपाल

इसी घेरे में आठों दिशाओं के अधिपति बसते हैं। पूर्व में अमरावतीपुरी है, जहाँ ऐरावत पर चढ़े इन्द्र शची के साथ शोभा पाते हैं। अग्निकोण में वह्निपुरी है, जहाँ अग्निदेव स्वाहा और स्वधा के साथ विराजते हैं। दक्षिण में यमपुरी है, जहाँ चित्रगुप्त आदि के साथ दण्डधारी यम रहते हैं। नैर्ऋत्यकोण में राक्षसों की पुरी है, जहाँ खड्गधारी निर्ऋति। पश्चिम में वरुण विशाल मत्स्य पर सवार, पाश लिए, वारुणी के साथ रहते हैं। वायुकोण में मृग पर चढ़े ध्वजाधारी वायु। उत्तर में यक्षों का लोक है, जहाँ नौ निधियों और मणिभद्र आदि यक्षसेनानियों के साथ कुबेर विराजते हैं। और ईशानकोण में रुद्रलोक है, जहाँ मुण्डमाला पहने, सर्पों के आभूषण और व्याघ्रचर्म धारण किए, असंख्य रुद्रों, करोड़ों रुद्राणियों तथा भद्रकाली आदि मातृकाओं से घिरे भगवान् रुद्र रहते हैं; यही इस दिशा के अधिपति होने से ईशान कहलाते हैं।

रत्नों के भीतरी परकोटे

पुष्पराग के आगे पद्मराग का परकोटा है, जहाँ चौंसठ कलाएँ रहती हैं। एक-एक कला का अपना लोक है, अपनी सौ अक्षौहिणी सेना है, और एक-एक में लाखों ब्रह्माण्डों को नष्ट कर देने का सामर्थ्य है। उसके आगे गोमेद का परकोटा है, जहाँ बत्तीस महाशक्तियाँ, दस-दस अक्षौहिणी सेना लिए, पिशाच-सी भयंकर मुखवाली, सावधान होकर चारों ओर पहरा देती हैं; ये कुपित हो जाएँ तो ब्रह्माण्ड तत्क्षण नष्ट हो जाए, और इनकी कहीं पराजय सम्भव नहीं। फिर हीरे का परकोटा है, जहाँ भगवती भुवनेश्वरी की परिचारिकाएँ दर्पण, चामर, ताम्बूल और पुष्प लिए खड़ी रहती हैं, और विद्युत्-लता-सी चंचल दूतियाँ, हाथ में बेंत लिए, हर ब्रह्माण्ड का समाचार जानकर लाती हैं।

वैदूर्य के परकोटे में ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और आठवीं महालक्ष्मी, ये आठ मातृकाएँ अपनी-अपनी सेनाओं से घिरी विराजती हैं। इन्द्रनील के परकोटे में सोलह दलों वाला एक दूसरा सुदर्शन-सा कमल है, जिस पर करालि, विकरालि, उमा और सरस्वती आदि सोलह सेनानी शक्तियाँ नीले मेघ-सी, ढाल और तलवार लिए विराजती हैं। मोती के परकोटे में आठ दलों का कमल है, जहाँ अनंगकुसुमा आदि आठ मन्त्रिणी देवियाँ रहती हैं, जो अपनी ज्ञानशक्ति से हर ब्रह्माण्ड का समाचार जान लेती हैं। महामरकत के परकोटे में छह कोनों वाला यन्त्र है: पूर्वकोण में गायत्री-सहित ब्रह्मा और मूर्तिमान् समस्त वेदशास्त्र; नैर्ऋत्यकोण में महाविष्णु-सहित सावित्री; वायुकोण में सरस्वती-सहित महारुद्र; अग्निकोण में महालक्ष्मी-सहित कुबेर; वरुणकोण में रति-सहित कामदेव; और ईशानकोण में पुष्टि-सहित विघ्नेश गणेश विराजते हैं। प्रवाल के परकोटे में पंचभूतों की पाँच स्वामिनियाँ, हल्लेखा, गगना, रक्ता, करालिका और महोच्छुष्मा, निवास करती हैं। और नौ रत्नों के अन्तिम परकोटे में श्रीदेवी के समस्त अवतार, समस्त महाविद्याएँ और सात करोड़ महामन्त्रों के देवता मूर्तिमान् होकर विराजते हैं।

चिन्तामणि गृह और भगवती का सिंहासन

इन सब परकोटों के भीतर चिन्तामणि का वह महाभवन है जिसकी हर वस्तु चिन्तामणि की बनी है; सूर्य, चन्द्र और विद्युत् से दीप्त हजारों स्तम्भों का तेज ऐसा है कि भीतर की कोई वस्तु आँख में ही नहीं समाती। उसमें हजार-हजार खम्भों के चार मण्डप हैं। शृंगारमण्डप में देवगणों की सभा के बीच भगवती जगदम्बा को देवियाँ नाना स्वरों में गाकर रिझाती हैं; मुक्तिमण्डप में वे भक्तों को मुक्ति देती हैं; ज्ञानमण्डप में ज्ञान का उपदेश करती हैं; और एकान्तमण्डप में अपनी मन्त्रिणियों के साथ जगत् की रक्षा का विचार करती हैं। मण्डपों के चारों ओर केसर, मल्लिका और कुन्द की वाटिकाएँ कस्तूरी-मृगों से भरी हैं, और अमृतरस से पूर्ण महापद्म की एक विशाल अटवी शोभा पाती है।

गृह के मध्य में शक्ति-तत्त्वरूपी दस सोपानों वाला एक मंच सुशोभित है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर उस मंच के चार पाये हैं, और सदाशिव उसका फलक हैं। उस पर भुवनेश महादेव विराजते हैं, पाँच मुख, तीन नेत्र, सदा सोलह वर्ष के-से जान पड़नेवाले, करोड़ों सूर्यों-से दीप्त और करोड़ों चन्द्रमाओं-से शीतल, हाथों में हरिण, परशु, वर और अभय धारण किए। सृष्टि के आदि में अपनी लीला के लिए जो भगवती दो रूपों में बँट गई थीं, ये महेश्वर उन्हीं के अर्धांग हैं।

उनके वाम अंक में श्रीभुवनेश्वरी बैठी हैं, नौ रत्नों की करधनी पहने, श्रीचक्र-सा कर्णफूल धारण किए, बिम्ब-से अधर और शरद्-चन्द्र-सा निष्कलंक मुख लिए। उनकी चारों भुजाओं में वर, पाश, अंकुश और अभयमुद्रा सुशोभित हैं; वे समस्त सौन्दर्य की आधार और निष्कपट करुणा से ओतप्रोत हैं। लज्जा, तुष्टि, पुष्टि, कीर्ति, कान्ति, क्षमा, दया, बुद्धि, मेधा, स्मृति और लक्ष्मी उनकी मूर्तिमती अंगनाएँ हैं, और जया, विजया, अजिता, अपराजिता आदि नौ पीठशक्तियाँ निरन्तर उनकी सेवा करती हैं। उनके दोनों पार्श्व में शंख और पद्म नामक निधियाँ रहती हैं, जिनसे नवरत्न, स्वर्ण और सप्तधातु बहानेवाली नदियाँ निकलकर अन्त में सुधा-सिन्धु में समा जाती हैं। इन्हीं भगवती के सान्निध्य से महेश्वर को सर्वेश्वरत्व प्राप्त है।

वह परम धाम

यह मणिद्वीप बिना किसी आधार के आकाश में टिका है; प्रलय के समय सिमट जाता और सृष्टि के समय फैल जाता है, पर इसका कभी सचमुच नाश नहीं होता। यहाँ घृत, दूध, दही और मधु की नदियाँ बहती हैं, मनोरथ पूरा करनेवाले वृक्ष खड़े हैं और मुँहमाँगा जल देनेवाली बावलियाँ हैं; न यहाँ रोग है, न बुढ़ापा, न चिन्ता, न मात्सर्य, न काम-क्रोध। यहाँ के सब निवासी युवा, सहस्र सूर्यों-से तेजस्वी और निरन्तर श्रीभुवनेश्वरी की उपासना में लीन रहते हैं; कोई सालोक्य, कोई सामीप्य, कोई सारूप्य तो कोई सार्ष्टि मुक्ति पा चुका है। किसी भी लोक में जो भगवती का उपासक है, वह अन्त में इसी धाम को प्राप्त होता है; और जो देवीक्षेत्र में उनकी आराधना करते हुए प्राण छोड़ता है, वह सीधे यहीं आता है। एक राजा के सुख से लेकर ब्रह्मलोक तक के सारे आनन्द इसी एक धाम के आनन्द में समाए हुए हैं। व्यासजी ने कहा कि यही महादेवी का परम स्थान है, सब लोकों से ऊपर; इसका स्मरण मात्र सारे पाप हर लेता है, और मृत्यु के समय जो इसे स्मरण कर ले, वह इसी परम पुरी को प्राप्त होता है।

आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)