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जनमेजय का अम्बायज्ञ और उपसंहार

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राजा जनमेजय का मन अपने पिता की दुर्गति की बात जानकर विषाद से भर गया था। उन्होंने ठान लिया कि पिता के उद्धार के लिए वे भगवती का यज्ञ करेंगे। नवरात्र आने पर उन्होंने धौम्य आदि मुनियों को बुलाया और धन की कोई कृपणता किए बिना शीघ्र ही अम्बायज्ञ आरम्भ कर दिया। भगवती जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए उन्होंने ब्राह्मणों के द्वारा उसी परम उत्तम श्रीमद्देवीभागवत महापुराण का अपने सामने पाठ कराया।

अम्बायज्ञ

इस यज्ञ में राजा ने असंख्य ब्राह्मणों, सुवासिनी स्त्रियों, कुमारी कन्याओं, ब्रह्मचारियों तथा दीन-अनाथों को भोजन कराया और द्रव्य-दान से उन सबको पूर्ण सन्तुष्ट किया। यज्ञ समाप्त कर वे ज्यों ही अपने आसन पर विराजमान हुए, त्यों ही प्रज्वलित अग्नि की शिखा-से तेजवाले देवर्षि नारद अपनी महती नामक वीणा बजाते हुए आकाश से उतरे। उन्हें देखकर विस्मित राजा अपने आसन से उठ खड़े हुए, आसन आदि उपचारों से उनका पूजन किया, और कुशल-क्षेम पूछकर उनके आगमन का कारण जानना चाहा। राजा ने विनय से कहा कि आपके आने से मैं सनाथ और कृतार्थ हो गया; कहिए, मैं आपकी क्या सेवा करूँ।

नारद का शुभ समाचार

नारद बोले कि आज उन्होंने देवलोक में एक आश्चर्यजनक घटना देखी है, और उसी को सुनाने वे विस्मित होकर यहाँ आए हैं। राजा के पिता अपने विपरीत कर्मों के कारण दुर्गति में पड़े हुए थे। वही अब दिव्य शरीर धारण कर, श्रेष्ठ विमान पर चढ़कर, देवताओं और अप्सराओं से चारों ओर स्तुत होते हुए मणिद्वीप को चले गए हैं। इस देवीभागवत के श्रवण से उत्पन्न फल और अम्बायज्ञ के फल से ही उनके पिता उत्तम गति को प्राप्त हुए हैं। हे कुलभूषण, आपने नरक से अपने पिता का उद्धार कर दिया; आज देवलोक में आपकी महान् कीर्ति फैल गई है, आप धन्य और कृतकृत्य हैं।

यह सुनकर राजा जनमेजय का हृदय प्रेम से गद्गद हो उठा और वे व्यासजी के चरणकमलों पर गिर पड़े। वे बोले कि आपकी कृपा से ही मैं कृतार्थ हुआ हूँ; नमस्कार के सिवा मैं आपके लिए और कर ही क्या सकता हूँ। आप मुझ पर यों ही सदा अनुग्रह बनाए रखें।

व्यासजी का उपदेश

भगवान् बादरायण व्यास ने राजा को आशीर्वाद देकर मधुर वाणी में कहा कि सब कुछ त्यागकर आप भगवती के चरणकमलों की उपासना कीजिए और दत्तचित्त होकर नित्य देवीभागवत का पाठ कीजिए; साथ ही आलस्य छोड़कर भक्तिपूर्वक देवीयज्ञ का अनुष्ठान कीजिए, जिसके फलस्वरूप आप भव-बन्धन से अनायास ही छूट जाएँगे। यद्यपि विष्णुपुराण और शिवपुराण आदि अनेक पुराण हैं, किन्तु वे इस देवीभागवत की सोलहवीं कला की भी समता नहीं कर सकते। यह पुराण समस्त वेदों और पुराणों का सारस्वरूप है; जिसमें साक्षात् मूलप्रकृति का ही प्रतिपादन हुआ है, उसके समान दूसरा पुराण भला कैसे हो सकता है। इसके पाठ से वेद-पाठ के समान पुण्य मिलता है। इतना कहकर मुनिराज व्यास चले गए, और धौम्य आदि विमलात्मा मुनि भी देवीभागवत की श्रेष्ठ प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थानों को लौट गए। तदनन्तर सन्तुष्ट मन से जनमेजय देवीभागवत का निरन्तर पाठ और श्रवण करते हुए पृथ्वी का शासन करने लगे।

पुराण की महिमा

अब सूतजी ने नैमिषारण्य के तपस्वी मुनियों से इस महापुराण की महिमा कही। परा अम्बा के मुखकमल से वेद-सिद्धान्त का बोध करानेवाला जो आधा श्लोक निकला था, सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्, अर्थात् यह सब मैं ही हूँ, मुझसे भिन्न कोई सनातन नहीं है, उसी का उपदेश भगवती ने वटपत्र पर शयन करनेवाले विष्णु को किया था। पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने उसे सौ करोड़ श्लोकों में विस्तृत कर दिया; फिर व्यासजी ने शुकदेव को पढ़ाने के लिए उसके सारभाग को एकत्र कर अठारह हजार श्लोकों और बारह स्कन्धों वाले श्रीमद्देवीभागवत की रचना की, जो आज भी देवलोक में उसी विस्तृत रूप में विद्यमान है। इसके समान पुण्यदायक और पापनाशक दूसरा कोई पुराण नहीं; इसके एक-एक पद के पाठ से मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है।

इस पुराण को स्वयं अपने हाथ से लिखकर या किसी लेखक से लिखवाकर, वाचन करनेवाले विद्वान् को वस्त्र और आभूषण से पूजकर, व्यासबुद्धि से उसके मुख से इसका श्रवण करना चाहिए। कथा की समाप्ति के दिन इसे स्वर्णसिंहासन पर स्थापित कर उस पौराणिक विद्वान् को इसका दान करना चाहिए, और दक्षिणा में अलंकार, सोने का हार तथा बछड़े से युक्त दूध देनेवाली कपिला गौ देनी चाहिए। जितने अध्याय हैं उतने ही ब्राह्मणों, सुवासिनियों, कुमारियों और बालकों को देवी की भावना से पूजकर उन्हें उत्तम पायसान्न का भोजन कराना चाहिए। जो नित्य भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करता है, उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता; पुत्रहीन को पुत्र, धनार्थी को धन और विद्यार्थी को विद्या मिलती है, और वन्ध्या स्त्री भी अपने दोष से मुक्त हो जाती है। जिस घर में यह पूजित होकर रहता है, उसे लक्ष्मी और सरस्वती नहीं छोड़तीं, और वेताल, डाकिनी तथा राक्षस वहाँ झाँकते तक नहीं। ज्वरग्रस्त मनुष्य को स्पर्श कर एकाग्रचित्त से इसका पाठ किया जाए तो दाहक ज्वर उसका मण्डल छोड़कर भाग जाता है, और सौ आवृत्ति के पाठ से क्षयरोग तक समाप्त हो जाता है।

शारदीय नवरात्र में परम भक्ति से इसका नित्य पाठ करना चाहिए; इससे जगदम्बा प्रसन्न होकर अभिलाषा से भी अधिक फल देती हैं। वैष्णव, शैव, सौर और गाणपत्य अपने-अपने इष्ट की शक्ति की तुष्टि के लिए चारों नवरात्रों में इसका पाठ करें, और वैदिक अपनी गायत्री की प्रसन्नता के लिए; इस पुराण में किसी के प्रति कोई विरोधवचन नहीं है। स्त्रियों और शूद्रों के लिए यही विधान है कि वे इसे स्वयं न पढ़ें, अपितु ब्राह्मण के मुख से इसका नित्य श्रवण करें। यह वेदों का सारस्वरूप है; इसके पढ़ने और सुनने से वेद-पाठ के समान फल मिलता है।

उपसंहार

गायत्री के नाम से प्रतिपादित उन सच्चिदानन्दस्वरूपिणी ह्रींमयी भगवती को सूतजी ने प्रणाम किया, कि वे हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की प्रेरणा दें। पौराणिकों में श्रेष्ठ सूतजी का यह वचन सुनकर नैमिषारण्यवासी तपोधन मुनियों ने बड़े समारोह के साथ उनका सम्मान किया। भगवती के चरणकमलों के वे सभी उपासक मुनि प्रसन्नहृदय हो गए और इस पुराण के प्रभाव से परम शान्ति को प्राप्त हुए। उन्होंने सूतजी को बार-बार नमस्कार और क्षमा-प्रार्थना करके कहा कि इस संसार-सागर से पार उतारने के लिए आप ही निश्चय हमारे नौका-स्वरूप हैं। इस प्रकार समस्त वेदों के गुह्य विषय-रूप, दुर्गा के चरित्र का प्रतिपादन करनेवाले इस श्रीमद्देवीभागवत को विनयी मुनिजनों को सुनाकर और उनके आशीर्वाद से वृद्धि पाकर, भगवती के चरणकमलों के भ्रमर-स्वरूप सूतजी वहाँ से चले गए। यहीं द्वादश स्कन्ध पूर्ण होता है और यहीं यह समस्त श्रीमद्देवीभागवत महापुराण भी सम्पूर्ण होता है।

आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)