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अंग 984

अंग
984
राग माली गउड़ा
राग: माली गउड़ा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु माली गउड़ा महला 4
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
अनिक जतन करि रहे हरि अंतु नाही पाइआ ॥
हरि अगम अगम अगाधि बोधि आदेसु हरि प्रभ राइआ ॥1॥ रहाउ ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु नित झगरते झगराइआ ॥
हम राखु राखु दीन तेरे हरि सरनि हरि प्रभ आइआ ॥1॥
सरणागती प्रभ पालते हरि भगति वछलु नाइआ ॥
प्रहिलादु जनु हरनाखि पकरिआ हरि राखि लीओ तराइआ ॥2॥
हरि चेति रे मन महलु पावण सभ दूख भंजनु राइआ ॥
भउ जनम मरन निवारि ठाकुर हरि गुरमती प्रभु पाइआ ॥3॥
हरि पतित पावन नामु सुआमी भउ भगत भंजनु गाइआ ॥
हरि हारु हरि उरि धारिओ जन नानक नामि समाइआ ॥4॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: रागु माली गउड़ा महला 4 ऑकार केवल एक है, उसका नाम सत्य (शाश्वत) है, वह परमपुरुष संसार का रचयिता है, उसे कोई भय नहीं अर्थात् कर्म दोष से परे है, सब पर समान दृष्टि होने के कारण वह प्रेमस्वरूप है, अतः वैर भावना से रहित है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर्ति अमर है, वह जन्म-मरण से रहित है, स्वयंभू अर्थात् स्वयं ही प्रकाशमान हुआ है और गुरु-कृपा से ही प्राप्त होता है। हे प्रभू पातशाह ! (आपके गुणों का अंत पाने के लिए बेअंत जीव) अनेकों यतन कर कर के थक गए हैं। किसी ने आपका अंत नहीं पाया। हे हरी ! आप अपहुँच है। आप अपहुँच है। आप अथाह है। आपको कोई नहीं समझ सकता। मेरी आपको ही नमस्कार है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! काम-क्रोध-लोभ-मोह (आदि विकार इतने बली हैं कि जीव इनके) उकसाए हुए सदा दुनिया के झगड़ों में पड़े रहते हैं। हे प्रभू ! हम जीव आपके दर पर मंगते हैं। हमें इनसे बचा ले। बचा ले। हम आपकी शरण आए हैं। 1। हे प्रभू ! आप शरण पड़ों की रक्षा करने वाला है। हे हरी ! ‘भक्ति से प्यार करने वाला’ – ये आपका (प्रसिद्ध) नाम है। आपके सेवक प्रहलाद को हरणाक्षस ने पकड़ लिया। हे हरी ! तूने उसकी रक्षा की। तूने उसको संकट से बचाया। 2। हे मन ! उस प्रभू के चरणों में ठिकाना प्राप्त करने के लिए सदा उसको याद किया कर। वह पातशाह सारे दुखों का नाश करने वाला है। हे ठाकुर ! हे हरी ! (हम जीवों का) जनम-मरन का चक्कर दूर कर। हे भाई ! गुरू की मति पर चलने से वह प्रभू मिलता है। 3। हे भाई ! हे स्वामी ! आपका नाम विकारियों को पवित्र करने वाला है। आप (अपने भगतों का) हरेक डर दूर करने वाला है। हे दास नानक ! (कह-) जिन भक्तों ने उसकी सिफत-सालाह की है। जिन्होंने उसके नाम का हार अपने हृदय में संभाला है। वे उसके नाम में ही सदा लीन रहते हैं। 4। 1।
माली गउड़ा महला 4 ॥
जपि मन राम नामु सुखदाता ॥
सतसंगति मिलि हरि सादु आइआ गुरमुखि ब्रहमु पछाता ॥1॥ रहाउ ॥
वडभागी गुर दरसनु पाइआ गुरि मिलिऐ हरि प्रभु जाता ॥
दुरमति मैलु गई सभ नीकरि हरि अंम्रिति हरि सरि नाता ॥1॥
धनु धनु साधु जिन॑ी हरि प्रभु पाइआ तिन॑ पूछउ हरि की बाता ॥
पाइ लगउ नित करउ जुदरीआ हरि मेलहु करमि बिधाता ॥2॥
लिलाट लिखे पाइआ गुरु साधू गुर बचनी मनु तनु राता ॥
हरि प्रभ आइ मिले सुखु पाइआ सभ किलविख पाप गवाता ॥3॥
राम रसाइणु जिन॑ गुरमति पाइआ तिन॑ की ऊतम बाता ॥
तिन की पंक पाईऐ वडभागी जन नानकु चरनि पराता ॥4॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा महला 4॥ हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम जपा कर। परमात्मा सारे सुख देने वाला है। साध-संगति में मिल के जिस मनुष्य ने प्रभू के नाम का आनंद हासिल किया। उसने गुरू के द्वारा परमात्मा के साथ गहरी सांझ पा ली। 1। रहाउ। हे मन ! किसी बड़े भाग्यशाली ने ही गुरू दर्शन प्राप्त किया है। (क्योंकि) अगर गुरू मिल जाए तो परमात्मा के साथ सांझ बन जाती है। जो मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल के सरोवर में (साध-संगति में आत्मिक) स्नान करता है। उसके अंदर से दुमर्ति की सारी मैल निकल जाती है। 1। हे मेरे मन ! भाग्यशाली हैं वे संतजन। जिन्होंने परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया है। मैं भी (अगर प्रभू की मेहर हो तो) उनसे परमात्मा की सिफत-सालाह की बातें पूछूँ। मैं उनके चरणों में लगूँ। मैं नित्य उनके आगे अरजोई करूँ कि मेहर करके मुझे सृजनहार प्रभू का मिलाप करवा दो। 2। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य ने माथे के लिखे लेखों के अनुसार गुरू महापुरुष पा लिया उसका मन उसका तन गुरू के बचनों में रंगा जाता है। (गुरू के द्वारा जिसको) परमात्मा मिल जाता है। उसको आत्मिक आनंद मिल जाता है। उसके सारे पाप विकार दूर हो जाते हैं। 3। हे मन ! गुरू की मति ले के जिन मनुष्यों ने सबसे श्रेष्ठ नाम-रस प्राप्त कर लिया। उनकी (लोक-परलोक में) बहुत शोभा होती है; उनके चरणों की धूड़ बड़े भाग्यों से मिलती है। दास नानक (भी उनके) चरणों पर पड़ता है। 4। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु माली गउड़ा महला 4 ऑकार केवल एक है, उसका नाम सत्य (शाश्वत) है, वह परमपुरुष संसार का रचयिता है, उसे कोई भय नहीं अर्थात् कर्म दोष से परे है, सब पर समान दृष्टि होने के कारण वह प्रे।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।