Lulla Family

अंग 95

अंग
95
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
माझ महला 4 ॥
हरि गुण पड़ीऐ हरि गुण गुणीऐ ॥
हरि हरि नाम कथा नित सुणीऐ ॥
मिलि सतसंगति हरि गुण गाए जगु भउजलु दुतरु तरीऐ जीउ ॥1॥
आउ सखी हरि मेलु करेहा ॥
मेरे प्रीतम का मै देइ सनेहा ॥
मेरा मित्रु सखा सो प्रीतमु भाई मै दसे हरि नरहरीऐ जीउ ॥2॥
मेरी बेदन हरि गुरु पूरा जाणै ॥
हउ रहि न सका बिनु नाम वखाणे ॥
मै अउखधु मंत्रु दीजै गुर पूरे मै हरि हरि नामि उधरीऐ जीउ ॥3॥
हम चात्रिक दीन सतिगुर सरणाई ॥
हरि हरि नामु बूंद मुखि पाई ॥
हरि जलनिधि हम जल के मीने जन नानक जल बिनु मरीऐ जीउ ॥4॥3॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 4 ॥ (हे सत्संगी मित्र, आएँ मिल के हम) परमात्मा के गुणों वाली बाणी पढ़ें और विचारें। परमात्मा के नाम की कथा ही सुनाते व सुनते रहें। साध-संगति में मिल के परमात्मा की (सिफत सलाह) के गुण गा के इस जगत से इस संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। (सिफत सलाह के बिना) इससे पार लांघना बहुत मुश्किल है।1। हे सतसंगी मित्र ! आओ, परमात्मा (की प्राप्ति) वाला सत्संग बनाएं। जो गुरमुख मुझे मेरे प्रीतम का संदेशा दे, मुझे परमात्मा (का पता ठिकाना) बताए वही मेरा मित्र है मेरा साथी है, मेरा सज्जन है मेरा भाई है।2। (हे सत्संगी मित्र !) परमात्मा (का रूप) पूरा गुरू ही मेरी पीड़ा जानता है कि परमात्मा के नाम उच्चारण के बिनां मुझे धैर्य नहीं आ सकता (इस वास्ते मैं गुरू के आगे बिनती करता हूं और कहता हूँ-) हे पूरे सतिगुरू ! मुझे (अपना) उपदेश दे (यही) दवाई (है जो मेरी वेदना दूर कर सकती है)। हे पूरे सतिुगुरू ! मुझे परमात्मा के नाम में (जोड़ के संसार से) पार लंघाऔ हे दास नानक ! (कह) हम अदने से चात्रिक हैं और गुरू की शरण आए हैं। (गुरू की कृपा से हमनें) परमात्मा का नाम मुंह में डाल लिया है (जैसे चात्रिक स्वाति) बूंद (मुंह में पीता है)। परमात्मा पानी का समुंदर है, हम उस पानी की मछलियां हैं। उस नाम जल के बिना आत्मिक मौत आ जाती है (जैसे, मछली पानी के बिना मर जाती है)।4।3।
माझ महला 4 ॥
हरि जन संत मिलहु मेरे भाई ॥
मेरा हरि प्रभु दसहु मै भुख लगाई ॥
मेरी सरधा पूरि जगजीवन दाते मिलि हरि दरसनि मनु भीजै जीउ ॥1॥
मिलि सतसंगि बोली हरि बाणी ॥
हरि हरि कथा मेरै मनि भाणी ॥
हरि हरि अंम्रितु हरि मनि भावै मिलि सतिगुर अंम्रितु पीजै जीउ ॥2॥
वडभागी हरि संगति पावहि ॥
भागहीन भ्रमि चोटा खावहि ॥
बिनु भागा सतसंगु न लभै बिनु संगति मैलु भरीजै जीउ ॥3॥
मै आइ मिलहु जगजीवन पिआरे ॥
हरि हरि नामु दइआ मनि धारे ॥
गुरमति नामु मीठा मनि भाइआ जन नानक नामि मनु भीजै जीउ ॥4॥4॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 4 ॥ हे हरी जनों ! हे संत जनों ! हे मेरे भाईयो ! (मुझे) मिलो। मुझे मेरे हरी प्रभू परमात्मा का पता बताओ। मुझे (उसके दीदार की) भूख लगी हुई है। हे जगत के जीवन प्रभू ! हे दातार ! हे हरी ! मेरी ये श्रद्धा पूरी करो कि आपके दीदार में लीन हैं के मेरा मन (मेरे नाम अंम्रित से) तरो तर हैं जाए।1। (मेरा मन लोचता है कि) साध-संगति में मिल के मैं परमात्मा के सिफत-सालाह की बाणी उचारूँ। परमात्मा के सिफत सलाह की बातें मेरे मन को प्यारी लग रही हैं। आत्मिक जीवन देने वाले प्रभू का नाम-जल मेरे मन में अच्छा लग रहा है। ये नाम जल सतिगुरू को मिल के ही पिया जा सकता है।2। भाग्यशाली मनुष्य प्रभू का मिलाप कराने वाली साध-संगति प्राप्त करते हैं। पर अभागे लोग भटकनों में पड़ कर चोटें खाते हैं (विकारों की चोटें बर्दाश्त करते हैं)। अच्छी किस्मत के बगैर साध-संगति नहीं मिलती। साध-संगति के बिना (मनुष्य का मन विकारों की) मैल के साथ लिबड़ा रहता है।3। हे जगत को जीवन देने वाले प्यारे प्रभू ! आ के मुझे मिल। हे हरी ! अपने मन में दया धार के मुझे अपना नाम दे। हे दास नानक ! (कह) गुरू की मति की बरकति से (जिस मनुष्य के) मन में परमात्मा का नाम मीठा लगने लगता है, प्यारा लगने लगता है, उसका मन (सदा) नाम में ही भीगा रहता है।4।4।
माझ महला 4 ॥
हरि गुर गिआनु हरि रसु हरि पाइआ ॥
मनु हरि रंगि राता हरि रसु पीआइआ ॥
हरि हरि नामु मुखि हरि हरि बोली मनु हरि रसि टुलि टुलि पउदा जीउ ॥1॥
आवहु संत मै गलि मेलाईऐ ॥
मेरे प्रीतम की मै कथा सुणाईऐ ॥
हरि के संत मिलहु मनु देवा जो गुरबाणी मुखि चउदा जीउ ॥2॥
वडभागी हरि संतु मिलाइआ ॥
गुरि पूरै हरि रसु मुखि पाइआ ॥
भागहीन सतिगुरु नही पाइआ मनमुखु गरभ जूनी निति पउदा जीउ ॥3॥
आपि दइआलि दइआ प्रभि धारी ॥
मलु हउमै बिखिआ सभ निवारी ॥
नानक हट पटण विचि कांइआ हरि लैंदे गुरमुखि सउदा जीउ ॥4॥5॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 4 ॥ मैंने गुरू की दी हुई परमात्मा के साथ गहरी सांझ प्राप्त कर ली है। मुझे परमात्मा का नाम रस मिल गया है। मेरा मन परमात्मा के नाम रंग में रंगा गया है। मुझे (गुरू ने) परमात्मा का नाम-रस पिला दिया है। (अब) मै सदा परमात्मा का नाम मुंह से उचारता रहता हूँ। परमात्मा के नाम रस से मेरा मन उछल-उछल पड़ता है।1। हे संत जनों ! आओ, मुझे अपने गले से लगा लो। और मुझे मेरे प्रीतम प्रभू के सिफत सलाह की बातें सुनाओ। हे प्रभू के संत जनों ! मुझे मिलो। जो कोई सतिगुरू की बाणी मुंह से उचारता है (और मुझे सुनाता है) मैं अपना मन उसके हवाले करता हूँ।2। मेरे बड़े भाग्यों से परमात्मा ने मुझे गुरू से मिला दिया, और (उस) पूरे गुरू ने परमात्मा का नाम रस मेरे मुंह में डाल दिया है। अभागे लोगों को ही सतिगुरू नहीं मिलता। जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता रहता है, वह सदा जोनियों के चक्कर में पड़ा रहता है।3। दया के घर प्रभू ने जिस मनुष्य पर मेहर की, उसने (अपने अंदर से) अहंकार की मैल, माया की मैल सारी ही दूर कर ली।? हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होते हैं, वह (अपने) शरीर रूपी दुकान में ही, शरीर-रूपी शहर में ही (टिक के) परमात्मा के नाम का सौदा खरीदते हैं।4।5।
माझ महला 4 ॥
हउ गुण गोविंद हरि नामु धिआई ॥
मिलि संगति मनि नामु वसाई ॥
हरि प्रभ अगम अगोचर सुआमी मिलि सतिगुर हरि रसु कीचै जीउ ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 4 ॥ (मेरी अरदास है कि) मैं गोबिंद के गुण गाऊँ। मैं हरी का नाम सिमरूँ। और साध-संगति में मिल के मैं परमात्मा का नाम अपने मन में बसाऊँ। हे हरी ! हे प्रभू ! हे अपहुँच (प्रभू) ! हे अगोचर (प्रभू) ! हे स्वामी ! (अगर आपकी मेहर हैं तो) सतिगुरू को मिल के आपके नाम का आनंद पाया जा सकता है।1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माझ महला 4 ॥ (हे सत्संगी मित्र, आएँ मिल के हम) परमात्मा के गुणों वाली बाणी पढ़ें और विचारें।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।