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948
रामकली
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- सो सहु सांति न देवई किआ चलै तिसु नालि ॥
- धंधा धावत दिनु गइआ रैणि गवाई सोइ ॥
- इकि आपणी सिफती लाइअनु दे सतिगुर मती ॥
- कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥
- किउ करि इहु मनु मारीऐ किउ करि मिरतकु होइ ॥
- जीवत मरणा सभु को कहै जीवन मुकति किउ होइ ॥
- दूजा भाउ रचाइओनु त्रै गुण वरतारा ॥
- मन का झूठा झूठु कमावै ॥
- सो तपा जि इहु तपु घाले ॥
- राति दिनसु उपाइअनु संसार की वरतणि ॥
· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
सो सहु सांति न देवई किआ चलै तिसु नालि ॥
सो सहु सांति न देवई किआ चलै तिसु नालि ॥
गुर परसादी हरि धिआईऐ अंतरि रखीऐ उर धारि ॥
नानक घरि बैठिआ सहु पाइआ जा किरपा कीती करतारि ॥1॥
गुर परसादी हरि धिआईऐ अंतरि रखीऐ उर धारि ॥
नानक घरि बैठिआ सहु पाइआ जा किरपा कीती करतारि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: (पर इस तरह) वह पति (प्रभू) (हृदय में) शांति नहीं देता। उसके साथ कोई जोर नहीं चल सकता। (पर, हाँ) सतिगुरू की मेहर से प्रभू को सिमरा जा सकता है और हृदय में बसाया जा सकता है। हे नानक! (गुरू की मेहर से) मैंने घर में बैठे ही पति को पा लिया। जब करतार ने (मेरे पर) कृपा की (और गुरू मिलाया)।
· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
धंधा धावत दिनु गइआ रैणि गवाई सोइ ॥
मः 3 ॥
धंधा धावत दिनु गइआ रैणि गवाई सोइ ॥
कूड़ु बोलि बिखु खाइआ मनमुखि चलिआ रोइ ॥
सिरै उपरि जम डंडु है दूजै भाइ पति खोइ ॥
हरि नामु कदे न चेतिओ फिरि आवण जाणा होइ ॥
गुर परसादी हरि मनि वसै जम डंडु न लागै कोइ ॥
नानक सहजे मिलि रहै करमि परापति होइ ॥2॥
धंधा धावत दिनु गइआ रैणि गवाई सोइ ॥
कूड़ु बोलि बिखु खाइआ मनमुखि चलिआ रोइ ॥
सिरै उपरि जम डंडु है दूजै भाइ पति खोइ ॥
हरि नामु कदे न चेतिओ फिरि आवण जाणा होइ ॥
गुर परसादी हरि मनि वसै जम डंडु न लागै कोइ ॥
नानक सहजे मिलि रहै करमि परापति होइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है उसका (सारा) दिन (दुनिया के) धंधों में भटकते हुए बीत जाता है। और रात को वह सो के गवा लेता है। (इन धंधों में पड़ा हुआ) झूठ बोल के जहर खाता है (भाव, दुनिया के पदार्थ भोगता है) और (अंत को यहाँ से) रो के चल पड़ता है। उसके सिर पर मौत का डंडा (तैयार रहता) है। (भाव, हर वक्त मौत से डरता है)। (प्रभू को बिसार के) और में प्यार के कारण (अपनी) इज्जत गवा लेता है; उसने परमात्मा का नाम तो कभी याद नहीं किया होता। (इसलिए) बार-बार जनम-मरण का चक्कर (उसे नसीब) होता है। (पर जिस मनुष्य के) मन में सतिगुरू की मेहर से परमात्मा बसता है उसको कोई मौत का डंडा नहीं लगता (भाव, उसे मौत डरा नहीं सकती)। हे नानक! वह अडोल अवस्था में टिका रहता है (यह अवस्था उसको) परमात्मा की कृपा से मिल जाती है। 2।
· रामकली की वार, पउड़ी · राग रामकली
इकि आपणी सिफती लाइअनु दे सतिगुर मती ॥
पउड़ी ॥
इकि आपणी सिफती लाइअनु दे सतिगुर मती ॥
इकना नो नाउ बखसिओनु असथिरु हरि सती ॥
पउणु पाणी बैसंतरो हुकमि करहि भगती ॥
एना नो भउ अगला पूरी बणत बणती ॥
सभु इको हुकमु वरतदा मंनिऐ सुखु पाई ॥3॥
इकि आपणी सिफती लाइअनु दे सतिगुर मती ॥
इकना नो नाउ बखसिओनु असथिरु हरि सती ॥
पउणु पाणी बैसंतरो हुकमि करहि भगती ॥
एना नो भउ अगला पूरी बणत बणती ॥
सभु इको हुकमु वरतदा मंनिऐ सुखु पाई ॥3॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (इस 'वेकी सृष्टि' में। प्रभू ने) कई जीवों को सतिगुरू की मति दे के अपनी सिफतसालाह में लगाया हुआ है। कई जीवों को सदा कायम रहने वाले हरी ने अपना सदा-स्थिर रहने वाला 'नाम' बख्शा हुआ है। हवा, पानी, आग (आदि तत्व भी) उसके हुकम में चल के उसकी भक्ति कर रहे हैं। इन (तत्वों) को उस मालिक का बड़ा भय रहता है (सो, जगत का क्या आश्चर्य) सम्पूर्ण संरचना बनी हुई है। हर जगह प्रभू का ही हुकम चल रहा है। (प्रभू के हुकम को) मानने (भाव, हुकम में चलने से ही) सुख पाया जा सकता है। 3।
· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥
सलोकु ॥
कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥
राम कसउटी सो सहै जो मरजीवा होइ ॥1॥
कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥
राम कसउटी सो सहै जो मरजीवा होइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे कबीर! परमात्मा की कसवटी (ऐसा निखेड़ा करने वाली है कि इस) पर झूठा मनुष्य पूरा नहीं उतर सकता; परमात्मा की परख पर वही पूरा उतरता है जो दुनिया की तरफ से मर के ईश्वर के लिए जीता है। 1।
· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
किउ करि इहु मनु मारीऐ किउ करि मिरतकु होइ ॥
मः 3 ॥
किउ करि इहु मनु मारीऐ किउ करि मिरतकु होइ ॥
कहिआ सबदु न मानई हउमै छडै न कोइ ॥
गुर परसादी हउमै छुटै जीवन मुकतु सो होइ ॥
नानक जिस नो बखसे तिसु मिलै तिसु बिघनु न लागै कोइ ॥2॥
किउ करि इहु मनु मारीऐ किउ करि मिरतकु होइ ॥
कहिआ सबदु न मानई हउमै छडै न कोइ ॥
गुर परसादी हउमै छुटै जीवन मुकतु सो होइ ॥
नानक जिस नो बखसे तिसु मिलै तिसु बिघनु न लागै कोइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ कैसे इस मन को मारे। कैसे ये मन दुनियावी चस्कों से हटे। कोई भी मनुष्य कहने से (भाव, समझाने से) ना गुरू के शबद को मानता है और ना अहंकार छोड़ता है। सतिगुरू की मेहर से अहंकार दूर होता है। (जिसका अहंकार नाश हो जाता है) वह मनुष्य जगत में रहता हुआ जगत के चस्कों से दूर रहता है। हे नानक! जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर करता है उसको (जीवन मुक्ति का दर्जा) प्राप्त हो जाता है और (उसके जिंदगी के सफर में मायावी रसों के कारण) कोई रुकावट नहीं आती। 2।
· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
जीवत मरणा सभु को कहै जीवन मुकति किउ होइ ॥
मः 3 ॥
जीवत मरणा सभु को कहै जीवन मुकति किउ होइ ॥
भै का संजमु जे करे दारू भाउ लाएइ ॥
अनदिनु गुण गावै सुख सहजे बिखु भवजलु नामि तरेइ ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥3॥
जीवत मरणा सभु को कहै जीवन मुकति किउ होइ ॥
भै का संजमु जे करे दारू भाउ लाएइ ॥
अनदिनु गुण गावै सुख सहजे बिखु भवजलु नामि तरेइ ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (जगत में) जीते हुए (जगत की ओर से) मरने की बातें हर कोई करता है। पर ये 'जीवन मुक्ति' (की अवस्था) प्राप्त कैसे हो। अगर मनुष्य (दुनिया के चस्कों का ये जहर दूर करने के लिए) परमात्मा का प्यार (-रूप) दवा प्रयोग करे और प्रभू का डर परहेज बन जाए (भाव, ज्यों-ज्यों मनुष्य ये डर दिल में रखेगा कि प्रभू हर वक्त अंग-संग है उससे कुछ भी छुप नहीं सकता) और हर रोज नित्य आनंद के साथ अडोलता में टिक के प्रभू के गुण गाए तो प्रभू के नाम से वह इस विष-रूप संसार-समुंद्र को तैर जाता है। हे नानक! जिस पर प्रभू मेहर की नजर करता है उसको ये (जीवन-मुक्ति की अवस्था) सतिगुरू के द्वारा ही मिलती है। 3।
· रामकली की वार, पउड़ी · राग रामकली
दूजा भाउ रचाइओनु त्रै गुण वरतारा ॥
पउड़ी ॥
दूजा भाउ रचाइओनु त्रै गुण वरतारा ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु उपाइअनु हुकमि कमावनि कारा ॥
पंडित पड़दे जोतकी ना बूझहि बीचारा ॥
सभु किछु तेरा खेलु है सचु सिरजणहारा ॥
जिसु भावै तिसु बखसि लैहि सचि सबदि समाई ॥4॥
दूजा भाउ रचाइओनु त्रै गुण वरतारा ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु उपाइअनु हुकमि कमावनि कारा ॥
पंडित पड़दे जोतकी ना बूझहि बीचारा ॥
सभु किछु तेरा खेलु है सचु सिरजणहारा ॥
जिसु भावै तिसु बखसि लैहि सचि सबदि समाई ॥4॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (जीवों का) माया से प्यार और माया के तीन गुणों का प्रभाव (वरतारा) भी उस सृजनहार ने (स्वयं ही) पैदा किए हैं। (तीन गुणों से तीनों देवते) ब्रह्मा, विष्णू और शिव उसने (स्वयं ही) पैदा किए हैं। (ये त्रैदेव) उसके हुकम में ही काम कर रहे हैं। ज्योतिषी (आदि) विद्वान लोग (विचार वाली पुस्तकें) पढ़ते हैं पर (प्रभू के इस करिश्मे की) विचार को नहीं समझते। (हे प्रभू!) (यह जगत रचना) सारा ही आपका (एक) खेल है। आप (इस खेल को) बनाने वाले हैं और सदा कायम रहने वाले हैं। जो आपको भाता है उस पर (आप) बख्शिश करते हैं और वह गुरू के शबद के द्वारा आपके सच्चे स्वरूप में टिका रहता है। 4।
· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
मन का झूठा झूठु कमावै ॥
सलोकु मः 3 ॥
मन का झूठा झूठु कमावै ॥
माइआ नो फिरै तपा सदावै ॥
भरमे भूला सभि तीरथ गहै ॥
ओहु तपा कैसे परम गति लहै ॥
गुर परसादी को सचु कमावै ॥
नानक सो तपा मोखंतरु पावै ॥1॥
मन का झूठा झूठु कमावै ॥
माइआ नो फिरै तपा सदावै ॥
भरमे भूला सभि तीरथ गहै ॥
ओहु तपा कैसे परम गति लहै ॥
गुर परसादी को सचु कमावै ॥
नानक सो तपा मोखंतरु पावै ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ मन का झूठा है (भाव, मन में झूठ है। तप के उलट भाव हैं) और झूठ कमाता है (भाव, बाहर से देखने में तपस्वी है पर कर्म उसके उलट हैं)। (जो मनुष्य वैसे तो) माया की खातिर फिरता है (पर अपने आप को) तपा (तपस्वी) कहलवाता है। (अपने आप को तपा समझने के) भुलेखे में भूला हुआ सारे तीथों में भटकता है। ऐसा तपस्वी उच्च आत्मिक अवस्था कैसे प्राप्त करे। हे नानक! जो तपस्वी गुरू की कृपा से सच कमाता है (भाव, प्रभू के अस्तित्व को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाता है) वह अंदरूनी मुक्ति प्राप्त करता है। 1।
· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
सो तपा जि इहु तपु घाले ॥
मः 3 ॥
सो तपा जि इहु तपु घाले ॥
सतिगुर नो मिलै सबदु समाले ॥
सतिगुर की सेवा इहु तपु परवाणु ॥
नानक सो तपा दरगहि पावै माणु ॥2॥
सो तपा जि इहु तपु घाले ॥
सतिगुर नो मिलै सबदु समाले ॥
सतिगुर की सेवा इहु तपु परवाणु ॥
नानक सो तपा दरगहि पावै माणु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य ये तप कमाता है वह (असल) तपस्वी है। जो मनुष्य सतिगुरू को मिलता है (गुरू की शरण पड़ता है) और गुरू का शबद (हृदय में) संभाल के रखता है। सतिगुरू की (बताई हुई) कार करनी, ये तप (प्रभू की नजरों में) कबूल है; हे नानक! ये तप करने वाला तपा प्रभू की हजूरी में आदर पाता है। 2।
· रामकली की वार, पउड़ी · राग रामकली
राति दिनसु उपाइअनु संसार की वरतणि ॥
पउड़ी ॥
राति दिनसु उपाइअनु संसार की वरतणि ॥
राति दिनसु उपाइअनु संसार की वरतणि ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (इस 'वेकी सृष्टि' में) संसार के बर्ताव-व्यवहार के लिए उस (प्रभू ने) रात और दिन पैदा किए हैं;
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 948 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; भगत कबीर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 948 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।