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अंग 946

अंग
946
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
वरनु भेखु असरूपु सु एको एको सबदु विडाणी ॥
साच बिना सूचा को नाही नानक अकथ कहाणी ॥67॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: एक मात्र आश्चर्य शबद-रूप प्रभू ही था। वही (जगत का) रूप-रंग और भेख था। हे नानक ! (ऐसे उस) सदा कायम रहने वाले प्रभू (को मिले) बिना। जिसका कोई सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। कोई मनुष्य सच्चा नहीं। 67।
कितु कितु बिधि जगु उपजै पुरखा कितु कितु दुखि बिनसि जाई ॥
हउमै विचि जगु उपजै पुरखा नामि विसरिऐ दुखु पाई ॥
गुरमुखि होवै सु गिआनु ततु बीचारै हउमै सबदि जलाए ॥
तनु मनु निरमलु निरमल बाणी साचै रहै समाए ॥
नामे नामि रहै बैरागी साचु रखिआ उरि धारे ॥
नानक बिनु नावै जोगु कदे न होवै देखहु रिदै बीचारे ॥68॥
गुरमुखि साचु सबदु बीचारै कोइ ॥
गुरमुखि सचु बाणी परगटु होइ ॥
गुरमुखि मनु भीजै विरला बूझै कोइ ॥
गुरमुखि निज घरि वासा होइ ॥
गुरमुखि जोगी जुगति पछाणै ॥
गुरमुखि नानक एको जाणै ॥69॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (प्रश्न।) हे पुरख ! जगत किस-किस विधि से उपजता है। किस तरह दुख में (पड़ता) है और कैसे नाश हो जाता है। (उक्तर।) हे पुरख ! जगत अहंकार में पैदा होता है। अगर (इसको) प्रभू का नाम बिसर जाए तो दुख पाता है। जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है। वह तत्व-ज्ञान को विचारता है और (अपने) अहंकार को गुरू के शबद द्वारा जलाता है। उसका तन उसका मन और उसकी वाणी पवित्र हो जाते हैं; वह सदा कायम रहने वाले प्रभू में टिका रहता है; वह मनुष्य (प्रभू-चरणों का) मतवाला हो के निरोल प्रभू-नाम में जुड़ा रहता है। सदा प्रभू को हृदय में टिकाए रखता है। हे नानक ! प्रभू के नाम के बिना प्रभू से मिलाप कभी नहीं हो सकता। अपने हृदय में विचार के देख लो (भाव। आपका अपना व्यक्तिगत अनुभव भी यही गवाही देगा)। 68। अगर कोई मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है वह सच्चे शबद को बिचारता है। सतिगुरू की बाणी के माध्यम से सच्चा प्रभू (उसके हृदय में) प्रकट हो जाता है। गुरमुख मनुष्य का मन (नाम-रस में) भीगता है। (पर इस बात को) कोई विरला ही समझता है। गुरू के सन्मुख मनुष्य का निवास अपने असल स्वरूप में बना रहता है। जो मनुष्य सतिगुरू के हुकम में चलता है वह (असल) जोगी है वह (प्रभू से मिलाप की) जुगति पहचानता है। हे नानक ! गुरू के हुकम में चलने वाला मनुष्य एक प्रभू को (हर जगह व्यापक) जानता है। 69।
बिनु सतिगुर सेवे जोगु न होई ॥
बिनु सतिगुर भेटे मुकति न कोई ॥
बिनु सतिगुर भेटे नामु पाइआ न जाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे महा दुखु पाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे महा गरबि गुबारि ॥
नानक बिनु गुर मुआ जनमु हारि ॥70॥
गुरमुखि मनु जीता हउमै मारि ॥
गुरमुखि साचु रखिआ उर धारि ॥
गुरमुखि जगु जीता जमकालु मारि बिदारि ॥
गुरमुखि दरगह न आवै हारि ॥
गुरमुखि मेलि मिलाए सोु जाणै ॥
नानक गुरमुखि सबदि पछाणै ॥71॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू की बताई हुई कार किए बिना (प्रभू से) मेल नहीं होता। गुरू को मिले बिना मुक्ति नहीं मिलती। गुरू को मिले बगैर प्रभू का नाम नहीं मिल सकता। मनुष्य बहुत कष्ट उठाता है। गुरू को मिले बग़ैर घोर अंधकार में अहंकार में रहता है। हे नानक ! सतिगुरू के बिना मनुष्य जिंदगी (की बाजी) हार के आत्मिक मौत सहेड़ता है। 70। जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है उसने (अपने) अहंकार को मार के अपना मन जीत लिया है। उसने सदा टिके रहने वाले प्रभू को अपने हृदय में परो लिया है। मौत का डर मार के उसने जगत जीत लिया है। वह (मनुष्य-जीवन की बाज़ी) हार के हजूरी में नहीं जाता (बल्कि। जीत के जाता है)। गुरमुख मनुष्य को प्रभू संजोग बना के (अपने में) मिला लेता है (इस भेद को) वह गुरमुख (ही) समझता है। हे नानक ! गुरू के सनमुख मनुष्य गुरू के शबद के माध्यम से (प्रभू के साथ) जान-पहचान बना लेता है। 71।
सबदै का निबेड़ा सुणि तू अउधू बिनु नावै जोगु न होई ॥
नामे राते अनदिनु माते नामै ते सुखु होई ॥
नामै ही ते सभु परगटु होवै नामे सोझी पाई ॥
बिनु नावै भेख करहि बहुतेरे सचै आपि खुआई ॥
सतिगुर ते नामु पाईऐ अउधू जोग जुगति ता होई ॥
करि बीचारु मनि देखहु नानक बिनु नावै मुकति न होई ॥72॥
तेरी गति मिति तूहै जाणहि किआ को आखि वखाणै ॥
तू आपे गुपता आपे परगटु आपे सभि रंग माणै ॥
साधिक सिध गुरू बहु चेले खोजत फिरहि फुरमाणै ॥
मागहि नामु पाइ इह भिखिआ तेरे दरसन कउ कुरबाणै ॥
अबिनासी प्रभि खेलु रचाइआ गुरमुखि सोझी होई ॥
नानक सभि जुग आपे वरतै दूजा अवरु न कोई ॥73॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: हे जोगी ! सुन। सारे उपदेश का सार (ये है कि) प्रभू के नाम के बिना जोग (प्रभू का मिलाप) नहीं। जो ‘नाम’ में रति हैं वे हर समय मतवाले हैं। ‘नाम’ से ही सुख मिलता है; नाम’ से ही पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। ‘नाम’ से ही सारी सूझ पड़ती है। प्रभू के नाम को छोड़ के जो मनुष्य और बहुत सारे भेख करते हैं उन्हें सच्चे प्रभू ने स्वयं गलत राह पर डाल दिया है। हे जोगी ! सतिगुरू से प्रभू का ‘नाम’ मिलता है (‘नाम’ मिलने से ही) जोग की सुरति सिरे चढ़ती है। हे नानक ! मन में विचार के देख लो। ‘नाम’ के बिना मुक्ति नहीं मिलती (भाव। आपका अपना व्यक्तिगत अनुभव स्पष्ट कर देगा कि नाम सिमरन के बिना अहंकार से निजात नहीं मिलती)। 72। आप कैसा है और कितना बड़ा है। हे प्रभू ! ये बात आप स्वयं ही जानता है। कोई और क्या कह के बता सकता है। आप स्वयं ही छुपा हुआ है आप स्वयं ही प्रकट है (भाव। सूक्षम और स्थूल आप स्वयं ही है)। आप स्वयं ही सारे रंग भोग रहा है। साधना करने वाले और साधना में सिद्ध जोगी। गुरू और उनके कई चेले आपके हुकम में आपको खोजते फिरते हैं। आपसे आपका ‘नाम’ माँगते हैं। आपसे ये भिक्षा ले के आपके दीदार से सदके होते हैं। हे नानक ! अविनाशी प्रभू ने (इस जगत की) खेल रची है गुरमुख मनुष्य को ये समझ आ जाती है। सारे ही युगों में वह स्वयं ही मौजूद है। कोई और दूसरा (उस जैसा) नहीं। 73। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “एक मात्र आश्चर्य शबद-रूप प्रभू ही था।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।