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अंग ९४६ · रामकली

अंग
946
रामकली
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  1. वरनु भेखु असरूपु सु एको एको सबदु विडाणी ॥
  2. कितु कितु बिधि जगु उपजै पुरखा कितु कितु दुखि बिनसि जाई ॥
  3. बिनु सतिगुर सेवे जोगु न होई ॥
  4. सबदै का निबेड़ा सुणि तू अउधू बिनु नावै जोगु न होई ॥

वरनु भेखु असरूपु सु एको एको सबदु विडाणी ॥

अंग ९४५ से चला आ रहा अंश

वरनु भेखु असरूपु सु एको एको सबदु विडाणी ॥
साच बिना सूचा को नाही नानक अकथ कहाणी ॥67॥

हिन्दी अर्थ: एक मात्र आश्चर्य शबद-रूप प्रभू ही था। वही (जगत का) रूप-रंग और भेख था। हे नानक ! (ऐसे उस) सदा कायम रहने वाले प्रभू (को मिले) बिना। जिसका कोई सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। कोई मनुष्य सच्चा नहीं। 67।

कितु कितु बिधि जगु उपजै पुरखा कितु कितु दुखि बिनसि जाई ॥

कितु कितु बिधि जगु उपजै पुरखा कितु कितु दुखि बिनसि जाई ॥
हउमै विचि जगु उपजै पुरखा नामि विसरिऐ दुखु पाई ॥
गुरमुखि होवै सु गिआनु ततु बीचारै हउमै सबदि जलाए ॥
तनु मनु निरमलु निरमल बाणी साचै रहै समाए ॥
नामे नामि रहै बैरागी साचु रखिआ उरि धारे ॥
नानक बिनु नावै जोगु कदे न होवै देखहु रिदै बीचारे ॥68॥
गुरमुखि साचु सबदु बीचारै कोइ ॥
गुरमुखि सचु बाणी परगटु होइ ॥
गुरमुखि मनु भीजै विरला बूझै कोइ ॥
गुरमुखि निज घरि वासा होइ ॥
गुरमुखि जोगी जुगति पछाणै ॥
गुरमुखि नानक एको जाणै ॥69॥

हिन्दी अर्थ: (प्रश्न।) हे पुरख ! जगत किस-किस विधि से उपजता है। किस तरह दुख में (पड़ता) है और कैसे नाश हो जाता है। (उक्तर।) हे पुरख ! जगत अहंकार में पैदा होता है। अगर (इसको) प्रभू का नाम बिसर जाए तो दुख पाता है। जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है। वह तत्व-ज्ञान को विचारता है और (अपने) अहंकार को गुरू के शबद द्वारा जलाता है। उसका तन उसका मन और उसकी वाणी पवित्र हो जाते हैं; वह सदा कायम रहने वाले प्रभू में टिका रहता है; वह मनुष्य (प्रभू-चरणों का) मतवाला हो के निरोल प्रभू-नाम में जुड़ा रहता है। सदा प्रभू को हृदय में टिकाए रखता है। हे नानक ! प्रभू के नाम के बिना प्रभू से मिलाप कभी नहीं हो सकता। अपने हृदय में विचार के देख लो (भाव। आपका अपना व्यक्तिगत अनुभव भी यही गवाही देगा)। 68। अगर कोई मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है वह सच्चे शबद को बिचारता है। सतिगुरू की बाणी के माध्यम से सच्चा प्रभू (उसके हृदय में) प्रकट हो जाता है। गुरमुख मनुष्य का मन (नाम-रस में) भीगता है। (पर इस बात को) कोई विरला ही समझता है। गुरू के सन्मुख मनुष्य का निवास अपने असल स्वरूप में बना रहता है। जो मनुष्य सतिगुरू के हुकम में चलता है वह (असल) जोगी है वह (प्रभू से मिलाप की) जुगति पहचानता है। हे नानक ! गुरू के हुकम में चलने वाला मनुष्य एक प्रभू को (हर जगह व्यापक) जानता है। 69।

बिनु सतिगुर सेवे जोगु न होई ॥

बिनु सतिगुर सेवे जोगु न होई ॥
बिनु सतिगुर भेटे मुकति न कोई ॥
बिनु सतिगुर भेटे नामु पाइआ न जाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे महा दुखु पाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे महा गरबि गुबारि ॥
नानक बिनु गुर मुआ जनमु हारि ॥70॥
गुरमुखि मनु जीता हउमै मारि ॥
गुरमुखि साचु रखिआ उर धारि ॥
गुरमुखि जगु जीता जमकालु मारि बिदारि ॥
गुरमुखि दरगह न आवै हारि ॥
गुरमुखि मेलि मिलाए सोु जाणै ॥
नानक गुरमुखि सबदि पछाणै ॥71॥

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू की बताई हुई कार किए बिना (प्रभू से) मेल नहीं होता। गुरू को मिले बिना मुक्ति नहीं मिलती। गुरू को मिले बगैर प्रभू का नाम नहीं मिल सकता। मनुष्य बहुत कष्ट उठाता है। गुरू को मिले बग़ैर घोर अंधकार में अहंकार में रहता है। हे नानक ! सतिगुरू के बिना मनुष्य जिंदगी (की बाजी) हार के आत्मिक मौत सहेड़ता है। 70। जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है उसने (अपने) अहंकार को मार के अपना मन जीत लिया है। उसने सदा टिके रहने वाले प्रभू को अपने हृदय में परो लिया है। मौत का डर मार के उसने जगत जीत लिया है। वह (मनुष्य-जीवन की बाज़ी) हार के हजूरी में नहीं जाता (बल्कि। जीत के जाता है)। गुरमुख मनुष्य को प्रभू संजोग बना के (अपने में) मिला लेता है (इस भेद को) वह गुरमुख (ही) समझता है। हे नानक ! गुरू के सनमुख मनुष्य गुरू के शबद के माध्यम से (प्रभू के साथ) जान-पहचान बना लेता है। 71।

सबदै का निबेड़ा सुणि तू अउधू बिनु नावै जोगु न होई ॥

सबदै का निबेड़ा सुणि तू अउधू बिनु नावै जोगु न होई ॥
नामे राते अनदिनु माते नामै ते सुखु होई ॥
नामै ही ते सभु परगटु होवै नामे सोझी पाई ॥
बिनु नावै भेख करहि बहुतेरे सचै आपि खुआई ॥
सतिगुर ते नामु पाईऐ अउधू जोग जुगति ता होई ॥
करि बीचारु मनि देखहु नानक बिनु नावै मुकति न होई ॥72॥
तेरी गति मिति तूहै जाणहि किआ को आखि वखाणै ॥
तू आपे गुपता आपे परगटु आपे सभि रंग माणै ॥
साधिक सिध गुरू बहु चेले खोजत फिरहि फुरमाणै ॥
मागहि नामु पाइ इह भिखिआ तेरे दरसन कउ कुरबाणै ॥
अबिनासी प्रभि खेलु रचाइआ गुरमुखि सोझी होई ॥
नानक सभि जुग आपे वरतै दूजा अवरु न कोई ॥73॥1॥

हिन्दी अर्थ: हे जोगी ! सुन। सारे उपदेश का सार (ये है कि) प्रभू के नाम के बिना जोग (प्रभू का मिलाप) नहीं। जो 'नाम' में रति हैं वे हर समय मतवाले हैं। 'नाम' से ही सुख मिलता है; नाम' से ही पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। 'नाम' से ही सारी सूझ पड़ती है। प्रभू के नाम को छोड़ के जो मनुष्य और बहुत सारे भेख करते हैं उन्हें सच्चे प्रभू ने स्वयं गलत राह पर डाल दिया है। हे जोगी ! सतिगुरू से प्रभू का 'नाम' मिलता है ('नाम' मिलने से ही) जोग की सुरति सिरे चढ़ती है। हे नानक ! मन में विचार के देख लो। 'नाम' के बिना मुक्ति नहीं मिलती (भाव। आपका अपना व्यक्तिगत अनुभव स्पष्ट कर देगा कि नाम सिमरन के बिना अहंकार से निजात नहीं मिलती)। 72। आप कैसे हैं और कितने बड़े हैं। हे प्रभू ! ये बात आप स्वयं ही जानते हैं। कोई और क्या कह के बता सकता है। आप स्वयं ही छुपे हुए हैं आप स्वयं ही प्रकट हैं (भाव। सूक्षम और स्थूल आप स्वयं ही हैं)। आप स्वयं ही सारे रंग भोग रहे हैं। साधना करने वाले और साधना में सिद्ध जोगी। गुरू और उनके कई चेले आपके हुकम में आपको खोजते फिरते हैं। आपसे आपका 'नाम' माँगते हैं। आपसे ये भिक्षा ले के आपके दीदार से सदके होते हैं। हे नानक ! अविनाशी प्रभू ने (इस जगत की) खेल रची है गुरमुख मनुष्य को ये समझ आ जाती है। सारे ही युगों में वह स्वयं ही मौजूद है। कोई और दूसरा (उस जैसा) नहीं। 73। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग पर गुरु नानक देव जी की सिध गोस्टि का समापन है। संवाद का आरम्भ अंग 938 पर है।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९४६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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