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अंग ९४५ · रामकली

अंग
945
रामकली
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  1. बिनु सबदै रसु न आवै अउधू हउमै पिआस न जाई ॥
  2. गुर परसादी रंगे राता ॥
  3. इहु मनु निहचलु हिरदै वसीअले गुरमुखि मूलु पछाणि रहै ॥

बिनु सबदै रसु न आवै अउधू हउमै पिआस न जाई ॥

अंग ९४४ से चला आ रहा अंश

बिनु सबदै रसु न आवै अउधू हउमै पिआस न जाई ॥
सबदि रते अंम्रित रसु पाइआ साचे रहे अघाई ॥
कवन बुधि जितु असथिरु रहीऐ कितु भोजनि त्रिपतासै ॥
नानक दुखु सुखु सम करि जापै सतिगुर ते कालु न ग्रासै ॥61॥
रंगि न राता रसि नही माता ॥
बिनु गुर सबदै जलि बलि ताता ॥
बिंदु न राखिआ सबदु न भाखिआ ॥
पवनु न साधिआ सचु न अराधिआ ॥
अकथ कथा ले सम करि रहै ॥
तउ नानक आतम राम कउ लहै ॥62॥

हिन्दी अर्थ: (उक्तर।) हे जोगी ! सतिगुरू के शबद के बिना (प्राणों को) रस नहीं आता (भाव। गुरू का शबद ही प्राणों का आसरा है। प्राणों की खुराक़ है)। गुरू-शबद के बिना अहंकार की प्यास नहीं मिटती। जो मनुष्य गुरू के शबद में रंगे जाते हैं। उनको सदा टिके रहने वाला नाम-रस मिल जाता है। वे सच्चे प्रभू में तृप्त रहते हैं (भाव। नाम में जुड़ के संतोषी हो जाते हैं)। (प्रश्न।) वह कौन सी मति है जिसके माध्यम से मन सदा टिका रह सकता है। कौन सी खुराक़ से मन सदा तृप्त रह सके। (उक्तर।) हे नानक ! सतिगुरू से (जो मति मिलती है उससे) दुख और सुख एक-समान प्रतीत होने लगते हैं। सतिगुरू से (जो नाम-भोजन मिलता है। उसके सदका) मौत (का डर) छू भी नहीं सकता। 61। (इस वास्ते उसका मन) प्रभू के प्यार में रंगा नहीं जाता और वह प्रभू के आनंद में मस्त नहीं होता। सतिगुरू के शबद (की कमाई किए) बिना मनुष्य (मायावी धंधों में) जल-बल के खिझता रहता है। जिस मनुष्य ने गुरू-शबद नहीं उचारा। उसने जती बन के कुछ नहीं कमाया। जिसने सच्चे प्रभू को नहीं सिमरा। उसने प्राणायाम करके क्या लिया। हे नानक ! अगर मनुष्य अकॅथ प्रभू के गुण गा के (दुख-सुख को) एक-समान जान के जीवन व्यतीत करे। तो वह सारे संसार की जिंद प्रभू को प्राप्त कर लेता है। 62।

गुर परसादी रंगे राता ॥

गुर परसादी रंगे राता ॥
अंम्रितु पीआ साचे माता ॥
गुर वीचारी अगनि निवारी ॥
अपिउ पीओ आतम सुखु धारी ॥
सचु अराधिआ गुरमुखि तरु तारी ॥
नानक बूझै को वीचारी ॥63॥
इहु मनु मैगलु कहा बसीअले कहा बसै इहु पवना ॥
कहा बसै सु सबदु अउधू ता कउ चूकै मन का भवना ॥
नदरि करे ता सतिगुरु मेले ता निज घरि वासा इहु मनु पाए ॥
आपै आपु खाइ ता निरमलु होवै धावतु वरजि रहाए ॥
किउ मूलु पछाणै आतमु जाणै किउ ससि घरि सूरु समावै ॥
गुरमुखि हउमै विचहु खोवै तउ नानक सहजि समावै ॥64॥

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू की मेहर से जो मनुष्य प्रभू के प्यार में रंगा जाता है। वह नाम-अमृत पी लेता है। और सच्चे प्रभू में मस्त (खीवा) रहता है। जो मनुष्य गुरू- (शबद) के द्वारा विचारवान हो गया है उसने (तृष्णा) अग्नि बुझा ली है। उसने (नाम-) अमृत पी लिया है। उसने आत्मिक सुख पा लिया है। (हे जोगी !) गुरू के राह पर चल के सच्चे प्रभू का सिमरन करके ('दुष्तर सागर' से) पार हो। (पर) हे नानक ! कोई विरला विचारवान (इस बात को) समझता है। 63। (प्रश्न।) मस्त हाथी (जैसा) ये मन कहाँ बसता है। ये प्राण कहाँ बसतें हैं। हे जोगी (नानक !) वह शबद कहाँ बसता है (जिससे आपके मत के अनुसार) मन की भटकना खत्म होती है। (उक्तर।) अगर प्रभू मेहर की निगाह करे तो वह सतिगुरू मिलाता है और (गुरू के मिलने पर) ये मन अपने ही घर में (भाव। अपने आप में) टिक जाता है। (गुरू के हुकम में चल के जब) मन अपने आपको खा जाता है (भाव। अपने संकल्प-विकल्प समाप्त कर देता है। जब मनुष्य अपने मन के पीछे चलने की बजाएगुरू के हुकम में चलता है) तो मन पवित्र हो जाता है (क्योंकि इस तरह गुरू के उपदेशों से मनुष्य) माया की ओर दौड़ते मन को रोके रखता है। (प्रश्न।) मनुष्य (जगत के) आदि (प्रभू) को कैसे पहचाने। अपने आत्मा को कैसे समझे। चंद्रमा के घर में सूरज कैसे टिके। (उक्तर।) जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है वह अपने अंदर से 'अहंकार' दूर करता है। तब हे नानक ! वह सहज अवस्था में टिक जाता है। 64।

इहु मनु निहचलु हिरदै वसीअले गुरमुखि मूलु पछाणि रहै ॥

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इहु मनु निहचलु हिरदै वसीअले गुरमुखि मूलु पछाणि रहै ॥
नाभि पवनु घरि आसणि बैसै गुरमुखि खोजत ततु लहै ॥
सु सबदु निरंतरि निज घरि आछै त्रिभवण जोति सु सबदि लहै ॥
खावै दूख भूख साचे की साचे ही त्रिपतासि रहै ॥
अनहद बाणी गुरमुखि जाणी बिरलो को अरथावै ॥
नानकु आखै सचु सुभाखै सचि रपै रंगु कबहू न जावै ॥65॥
जा इहु हिरदा देह न होती तउ मनु कैठै रहता ॥
नाभि कमल असथंभु न होतो ता पवनु कवन घरि सहता ॥
रूपु न होतो रेख न काई ता सबदि कहा लिव लाई ॥
रकतु बिंदु की मड़ी न होती मिति कीमति नही पाई ॥
वरनु भेखु असरूपु न जापी किउ करि जापसि साचा ॥
नानक नामि रते बैरागी इब तब साचो साचा ॥66॥
हिरदा देह न होती अउधू तउ मनु सुंनि रहै बैरागी ॥
नाभि कमलु असथंभु न होतो ता निज घरि बसतउ पवनु अनरागी ॥
रूपु न रेखिआ जाति न होती तउ अकुलीणि रहतउ सबदु सु सारु ॥
गउनु गगनु जब तबहि न होतउ त्रिभवण जोति आपे निरंकारु ॥

हिन्दी अर्थ: जब मनुष्य गुरू के हुकम में चल के (जगत के) मूल- (प्रभू) को पहचानता है (प्रभू के साथ सांझ डालता है)। तो यह मन अडोल हो के हृदय में टिकता है। प्राण (भाव। श्वास) नाभि-रूप घर में आसन पर बैठता है (भाव। प्राणों का आरम्भ नाभि से होता है)। गुरू के माध्यम से खोज करके मनुष्य अस्लियत को तलाशता है। वह शबद (जो 'दुश्तर सागर' से पार लंघाता है) एक-रस अपने असल घर में (भाव। शून्य प्रभू में) टिकता है। मनुष्य उस प्रभू के द्वारा (ही) त्रिलोकी में व्यापक प्रभू की ज्योति ढूँढता है। (ज्यों-ज्यों) सच्चे प्रभू को मिलने की तमन्ना बढ़ती है (त्यों-त्यों) मनुष्य दुखों को समाप्त करता जाता है। सच्चे प्रभू में ही तृप्त रहता है। एक-रस व्यापक ईश्वरीय जीवन-रौंअ को किसी विरले गुरमुख ने जाना है किसी विरले ने ये राज़ समझा है। नानक कहता है (जिसने समझा है) वह सच्चे प्रभू को सिमरता है। सच्चे में रंगा रहता है। उसका ये रंग कभी उतरता नहीं। 65। (प्रश्न।) जब ना ये हृदय था ना ही ये शरीर था। तब मन (चेतन सक्ता) कहाँ रहती थी। जब नाभि के चक्र का स्तम्भ नहीं था तो प्राण (श्वास) किस घर में आसरा लेते थे। जब कोई रूप-रेख नहीं था तब शबद ने कहाँ लिव लगाई हुई थी। जब (माँ का) रक्त और (पिता के) वीर्य से बना ये शरीर नहीं था तब जिस प्रभू का अंदाजा और मूल्य नहीं पड़ सकता उसमें ये मन लिव कैसे लगाता था। जिस प्रभू का रंग-भेख और स्वरूप नहीं दिखता। वह सदा कायम रहने वाला प्रभू कैसे देखा जाता है। (उक्तर।) हे नानक ! प्रभू के नाम में रति हुए वैरागवान को हर वक्त सच्चा प्रभू ही (मौजूद) प्रतीत होता है। 66। (उक्तर।) हे जोगी ! जब ना हृदय था ना शरीर था। तब वैरागी का मन निरगुण प्रभू में टिका हुआ था। जब नाभि-चक्र-रूपी-स्तम्भ नहीं था तब प्राण (प्रभू के) प्रेमी हो के अपने असल घर (प्रभू) में बसते थे। जब (जगत का) का कोई रूप-रेख नहीं था तब वह श्रेष्ठ शबद (जो 'दुष्तर सागर' से पार लंघाता है) कुल-रहित प्रभू में रहता था; जब जगत की हस्ती नहीं थी। आकाश नहीं था। तब आकार-रहित त्रिभवणी ज्योति (भाव। अब त्रिलोकी में व्यापक होने वाली ज्योति) स्वयं ही स्वयं थी।

रचयिता और स्रोत

यह गुरु नानक देव जी की सिध गोस्टि का आगे का अंश है, रामकली राग में। पूरा संवाद अंग ९३८ से ९४६ में पढ़ा जा सकता है।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९४५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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