आनंद साहिब का हिस्सा। पूरी 40 पउड़ियों की commentary /anand-sahib/ पर है।
आपणी लिव आपे लाए गुरमुखि सदा समालीऐ ॥ कहै नानकु एवडु दाता सो किउ मनहु विसारीऐ ॥28॥ जैसी अगनि उदर महि तैसी बाहरि माइआ ॥ माइआ अगनि सभ इको जेही करतै खेलु रचाइआ ॥ जा तिसु भाणा ता जंमिआ परवारि भला भाइआ ॥ लिव छुड़की लगी त्रिसना माइआ अमरु वरताइआ ॥ एह माइआ जितु हरि विसरै मोहु उपजै भाउ दूजा लाइआ ॥ कहै नानकु गुर परसादी जिना लिव लागी तिनी विचे माइआ पाइआ ॥29॥ हरि आपि अमुलकु है मुलि न पाइआ जाइ ॥ मुलि न पाइआ जाइ किसै विटहु रहे लोक विललाइ ॥ ऐसा सतिगुरु जे मिलै तिस नो सिरु सउपीऐ विचहु आपु जाइ ॥ जिस दा जीउ तिसु मिलि रहै हरि वसै मनि आइ ॥ हरि आपि अमुलकु है भाग तिना के नानका जिन हरि पलै पाइ ॥30॥ हरि रासि मेरी मनु वणजारा ॥ हरि रासि मेरी मनु वणजारा सतिगुर ते रासि जाणी ॥ हरि हरि नित जपिहु जीअहु लाहा खटिहु दिहाड़ी ॥ एहु धनु तिना मिलिआ जिन हरि आपे भाणा ॥ कहै नानकु हरि रासि मेरी मनु होआ वणजारा ॥31॥ ए रसना तू अन रसि राचि रही तेरी पिआस न जाइ ॥ पिआस न जाइ होरतु कितै जिचरु हरि रसु पलै न पाइ ॥ हरि रसु पाइ पलै पीऐ हरि रसु बहुड़ि न त्रिसना लागै आइ ॥ एहु हरि रसु करमी पाईऐ सतिगुरु मिलै जिसु आइ ॥ कहै नानकु होरि अन रस सभि वीसरे जा हरि वसै मनि आइ ॥32॥ ए सरीरा मेरिआ हरि तुम महि जोति रखी ता तू जग महि आइआ ॥ हरि जोति रखी तुधु विचि ता तू जग महि आइआ ॥ हरि आपे माता आपे पिता जिनि जीउ उपाइ जगतु दिखाइआ ॥ गुर परसादी बुझिआ ता चलतु होआ चलतु नदरी आइआ ॥ कहै नानकु स्रिसटि का मूलु रचिआ जोति राखी ता तू जग महि आइआ ॥33॥ मनि चाउ भइआ प्रभ आगमु सुणिआ ॥ हरि मंगलु गाउ सखी ग्रिहु मंदरु बणिआ ॥ हरि गाउ मंगलु नित सखीए सोगु दूखु न विआपए ॥ गुर चरन लागे दिन सभागे आपणा पिरु जापए ॥ अनहत बाणी गुर सबदि जाणी हरि नामु हरि रसु भोगो ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: प्रभू स्वयं ही अपनी प्रीति की दाति बख्शता है। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर उसको सिमरते रहना चाहिए। नानक कहता है- (अगर आत्मिक आनंद की आवश्यक्ता है तो) इतने बड़े दातार प्रभू को कभी भुलाना नहीं चाहिए। 28। जैसे माँ के पेट में आग है वैसे ही बाहर जगत में माया (दुखदाई) है। माया और आग एक जैसी ही हैं। करतार ने ऐसी ही खेल रच दी है। जब परमात्मा की रजा होती है जीव पैदा होता है परिवार में प्यारा लगता है (परिवार के जीव उस नव-जन्मे बच्चे को प्यार करते हैं। इस प्यार में फंस के उसकी प्रभू-चरनों से) प्रीति की तार टूट जाती है। माया की तृष्णा आ चिपकती है। माया (उस पर) अपना जोर डाल लेती है। माया है ही ऐसी कि इसके कारण ईश्वर भूल जाता है। (दुनिया का) मोह पैदा हो जाता है। (ईश्वर के बिना) और किस्म के प्यार उपज पड़ते हैं (फिर ऐसी हालत में आत्मिक आनंद कहाँ मिले।) नानक कहता है- गुरू की कृपा से जिन लोगों की प्रीत की डोर प्रभू-चरनों में जुड़ी रहती है। उनको माया में रहते हुए ही (आत्मिक आनंद) मिल जाता है। (जब तक परमात्मा का मिलाप ना हो तब तक आनंद नहीं पाया जा सकता। पर) प्रभू का मूल्य नहीं पड़ सकता। परमात्मा (धन आदिक) किसी कीमत से नहीं मिल सकता। जीव खप-खप के हार गए। किसी को (धन आदि) कीमत दे के परमात्मा नहीं मिला। (हाँ।) अगर ऐसा गुरू मिल जाए (जिसके मिलने से मनुष्य के) अंदर से स्वै भाव निकल जाए तो उस गुरू के आगे अपना सिर भेट कर देना चाहिए (अपना आप अर्पण कर देना चाहिए)। (और जिस गुरू के मिलने से) जीव उस हरी के चरणों में जुड़ा रहे वह हरी उसके मन में बस जाए जिसका ये पैदा किया हुआ है। हे नानक ! परमात्मा का मूल्य नहीं आँका जा सकता (किसी कीमत पर नहीं मिलता। पर) पर परमात्मा जिनको (गुरू के) लड़ लगा देता है उनके भाग्य जाग उठते हैं (वे आत्मिक आनंद पाते हैं)। 30। परमात्मा का नाम मेरी राशि पूँजी है और मेरा मन व्यापारी हो गया है। परमात्मा का नाम ही मेरी राशि-पूँजी (हो सकती है)। अपने गुरू से मुझे समझ आई है कि (आत्मिक आनंद की कमाई कमाने के लिए) मेरा मन (इस वणज का) व्यापारी बन गया है। (हे भाई !) आप भी प्रेम से सदा हरी का नाम जपा करो। और हर रोज (आत्मिक आनंद का) लाभ कमाओ। (हरी-नाम का आत्मिक आनंद का) ये धन उनको ही मिलता है। जिन्हें देना प्रभू को खुद अच्छा लगता है। नानक कहता है- परमात्मा का नाम मेरी पूँजी बन गई है (अब गुरू की कृपा से मैं आत्मिक आनंद की कमाई कमाता हूँ)। 31। हे (मेरी) जीभ ! आप और ही स्वादों में मस्त हैं रही है। (इस तरह) आपके स्वादों का चस्का दूर नहीं हैं सकता। जब तक परमात्मा के सिमरन का आनंद प्राप्त ना हो। (तब तक) किसी और जगह से स्वादों का चस्का मिट नहीं सकता। जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम का आनंद मिल जाए। जो मनुष्य हरी-सिमरन का स्वाद लेने लग पड़े। उसको माया की तृष्णा छू नहीं सकती। पर। यह हरी-नाम का आनंद प्रभू की मेहर से मिलता है (उसको मिलता है) जिसको गुरू मिले। नानक कहता है- जब हरी-सिमरन का आनंद मन में बस जाए। तब और सारे चस्के भूल जाते हैं। 32। मेरे शरीर ! (आप दुनिया के पदार्थों में से आनंद ढूँढता है पर आनंद का श्रोत तो परमात्मा है जो आपके अंदर बसता है) आप जगत में आया ही तब। जब हरी ने अपनी ज्योति आपके अंदर रख दी। (ये यकीन जान कि) जब परमात्मा ने आपके अंदर अपनी ज्योति रखी। तब आप जगत में पैदा हुआ। जो परमात्मा जीव पैदा करके उसको जगत में भेजता है वह खुद ही इसकी माँ है खुद ही इसका पिता है (प्रभू स्वयं ही माता-पिता की तरह जीव को हर तरह का सुख देता है। सुख-आनंद का दाता है ही प्रभू खुद। पर जीव जगत में से मायावी पदार्थों में से आनंद तलाशता है)। जब गुरू की मेहर से जीव को ज्ञान होता है तब इसको समझ आती है कि ये जगत तो एक खेल ही है। फिर जीव को ये जगत (मदारी का) एक तमाशा ही नजर आने लगता है (सदा-स्थिर रहने वाला आत्मिक आनंद इसमें नहीं हो सकता)। नानक कहता है- हे मेरे शरीर ! जब प्रभू ने जगत रचना की नींव रखी। आपके अंदर अपनी ज्योति डाली। तब आप जगत में पैदा हुआ। 33। अपनी हृदय-सेज पर प्रभू-पति का आना मैंने सुन लिया है (मैंने अनुभव कर लिया है कि प्रभू मेरे हृदय में आ के बसा है अब) मेरे मन में आनंद बन गया है। हे मेरी जिंदे ! मेरा ये हृदय-घर प्रभू-पति का निवास-स्थान बन गया है। अब आप प्रभू की सिफत सालाह के गीत गा। हे जीवात्मा ! सदा प्रभू की वडिआई का गीत गाता रह। (इस तरह) कोई फिक्र कोई दुख (अपना) जोर नहीं डाल सकता। वह दिन भाग्यशाली होते हैं जब (माथा) गुरू के चरणों पर टिके। प्यारा पति-प्रभू (हृदय में) दिखाई दे जाता है। गुरू के शबद द्वारा एक-रस सिफतसालाह की रौंअ के साथ सांझ बन जाती है। प्रभू का नाम प्राप्त हो जाता है। प्रभू-मिलाप का आनंद भोगते हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “प्रभू स्वयं ही अपनी प्रीति की दाति बख्शता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।