आनंद साहिब का हिस्सा। पूरी 40 पउड़ियों की commentary /anand-sahib/ पर है।
गुर परसादी जिनी आपु तजिआ हरि वासना समाणी ॥ कहै नानकु चाल भगता जुगहु जुगु निराली ॥14॥ जिउ तू चलाइहि तिव चलह सुआमी होरु किआ जाणा गुण तेरे ॥ जिव तू चलाइहि तिवै चलह जिना मारगि पावहे ॥ करि किरपा जिन नामि लाइहि सि हरि हरि सदा धिआवहे ॥ जिस नो कथा सुणाइहि आपणी सि गुरदुआरै सुखु पावहे ॥ कहै नानकु सचे साहिब जिउ भावै तिवै चलावहे ॥15॥ एहु सोहिला सबदु सुहावा ॥ सबदो सुहावा सदा सोहिला सतिगुरू सुणाइआ ॥ एहु तिन कै मंनि वसिआ जिन धुरहु लिखिआ आइआ ॥ इकि फिरहि घनेरे करहि गला गली किनै न पाइआ ॥ कहै नानकु सबदु सोहिला सतिगुरू सुणाइआ ॥16॥ पवितु होए से जना जिनी हरि धिआइआ ॥ हरि धिआइआ पवितु होए गुरमुखि जिनी धिआइआ ॥ पवितु माता पिता कुटंब सहित सिउ पवितु संगति सबाईआ ॥ कहदे पवितु सुणदे पवितु से पवितु जिनी मंनि वसाइआ ॥ कहै नानकु से पवितु जिनी गुरमुखि हरि हरि धिआइआ ॥17॥ करमी सहजु न ऊपजै विणु सहजै सहसा न जाइ ॥ नह जाइ सहसा कितै संजमि रहे करम कमाए ॥ सहसै जीउ मलीणु है कितु संजमि धोता जाए ॥ मंनु धोवहु सबदि लागहु हरि सिउ रहहु चितु लाइ ॥ कहै नानकु गुर परसादी सहजु उपजै इहु सहसा इव जाइ ॥18॥ जीअहु मैले बाहरहु निरमल ॥ बाहरहु निरमल जीअहु त मैले तिनी जनमु जूऐ हारिआ ॥ एह तिसना वडा रोगु लगा मरणु मनहु विसारिआ ॥ वेदा महि नामु उतमु सो सुणहि नाही फिरहि जिउ बेतालिआ ॥ कहै नानकु जिन सचु तजिआ कूड़े लागे तिनी जनमु जूऐ हारिआ ॥19॥ जीअहु निरमल बाहरहु निरमल ॥ बाहरहु त निरमल जीअहु निरमल सतिगुर ते करणी कमाणी ॥ कूड़ की सोइ पहुचै नाही मनसा सचि समाणी ॥ जनमु रतनु जिनी खटिआ भले से वणजारे ॥ कहै नानकु जिन मंनु निरमलु सदा रहहि गुर नाले ॥20॥ जे को सिखु गुरू सेती सनमुखु होवै ॥ होवै त सनमुखु सिखु कोई जीअहु रहै गुर नाले ॥ गुर के चरन हिरदै धिआए अंतर आतमै समाले ॥ आपु छडि सदा रहै परणै गुर बिनु अवरु न जाणै कोए ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: पर जिन्होंने गुरू की कृपा से स्वै भाव छोड़ दिया है। उनकी (मायावी) वासना हरी-प्रभू की याद में समाप्त हो जाती है। नानक कहता है- (आत्मिक आनंद भोगने वाले) भगत-जनों की जीवन-जुगति सदा से ही (दुनिया से ही) अलग चली आ रही है। 14। हे मालिक प्रभू ! जैसे आप (हम जीवों को जीवन-मार्ग पर) चलाता है। वैसे ही हम चलते हैं (बस ! मुझे इतनी ही समझ पड़ी है)। आपके गुणों का और भेद मैं नहीं जानता। (मैंने यही समझा है कि) जिस राह पर आप हमें चलाना चाहता है। उसी राह पर हम चलते हैं। जिन लोगों को (आत्मिक आनंद भोगने के) रास्ते पर चलाता है। जिन पर मेहर करके अपने नाम में जोड़ता है। वह लोग सदा हरी-नाम सिमरते हैं। जिस जिस मनुष्य को आप अपनी सिफत-सालाह की बाणी सुनाता है (सुनने की ओर प्रेरित करता है)। वे लोग गुरू के दर पर (पहुँच के) आत्मिक आनंद भोगते हैं। नानक कहता है- हे सदा-स्थिर रहने वाले मालिक ! जैसे आपको अच्छा लगता है। उसी तरह आप (हम जीवों को) जीवन-राह पर चलाता है। 15। (सतिगुरू का) ये सोहाना शबद (आत्मिक) आनंद देने वाला गीत है। (यकीन जानो कि) सतिगुरू ने सुंदर शबद सुनाया है वह सदा आत्मिक आनंद देने वाला है। पर ये गुरू-शबद उनके मन में बसता है जिनके माथे पर धुर से लिखे लेख उघड़ते हैं। बहुत सारे अनेकों ऐसे लोग घूम रहे हैं (जिनके मन में गुरू-शबद तो नहीं बसा। पर ज्ञान की) बातें करते हैं। सिर्फ बातें करने से आत्मिक आनंद किसी को नहीं मिला। नानक कहता है- सतिगुरू का सुनाया हुआ शबद ही आत्मिक आनंद-दाता है। 16। (गुरू के शबद के सदका) जिन लोगों ने परमात्मा का नाम सिमरा (उनके अंदर ऐसा आनंद पैदा हुआ कि माया वाले रसों के प्रति उनमें आकर्षण ही ना रहा। और) वे लोग पवित्र जीवन वाले बन गए। गुरू की शरण पड़ कर जिन-जिन ने हरी का नाम सिमरा वे शुद्ध आचरण वाले हो गए ! (उनकी लाग से) उनके माता-पिता-परिवार के जीव पवित्र जीवन वाले बने। जिस जिस ने उनकी संगति की वह सारे पवित्र हो गए। हरी-नाम (एक ऐसा आनंद का श्रोत है कि इस को) जपने वाले भी पवित्र और सुनने वाले भी पवित्र हो जाते हैं। जो इसको मन में बसाते हैं वे भी पवित्र हो जाते हैं। नानक कहता है- जिन लोगों ने गुरू की शरण पड़ कर हरी-नाम सिमरा है वे शुद्ध-आचरण वाले हो गए हैं। 17। माया के मोह में फंसे रहने से मन में तौख़ला-सहम बना रहता है। (यह) तौखला-सहम आत्मिक आनंद के बिना दूर नहीं होता। (और।) आत्मिक आनंद बाहर से धार्मिक प्रतीत होते कर्म करने से पैदा नहीं हो सकता। अनेकों लोग (ऐसे) कर्म कर-कर के हार गए हैं। पर मन का तौख़ला-सहम ऐसे किसी तरीके से नहीं जाता। (जब तक) मन सहम में (है तब तक) मैला रहता है। मन की यह मैल किसी (बाहरी) जुगति से नहीं धुलती। (हे भाई !) गुरू के शबद में जुड़ो। परमात्मा के चरणों में सदा चित्त जोड़े रखो। (अगर) मन (धोना है तो इस तरह) धोवो। नानक कहता है- गुरू की कृपा से ही (मनुष्य के अंदर) आत्मिक आनंद पैदा होता है। और इस तरह मन का तौख़ला-सहम दूर हो जाता है। 18। (सिर्फ बाहर से धार्मिक दिखते कर्म करने वाले लोग) मन में (विकारों से) मैले रहते हैं और सिर्फ देखने में ही पवित्र लगते हैं। पर। जो बाहर से पवित्र दिखें। वैसे मन में विकार हों। उन्होंने अपना जीवन यूँ व्यर्थ गवा लिया समझो जैसे कोई जुआरी जूए में धन हार के आता है। (उनको अंदर-अंदर से) माया की तृष्णा का भारी रोग खाए जाता है। (माया के लालच में) मौत को उन्होंने भुलाया होता है। (लोगों की नजरों में धार्मिक दिखने के लिए वे बाहर से धार्मिक दिखाई देते कर्मों की महिमा बताने के लिए वेद आदि धार्मिक-पुस्तकों में से हवाले देते हैं। पर) वेद आदिक धर्म-पुस्तकोंमें जो प्रभू का नाम जपने का उक्तम उपदेश है उस तरफ वे ध्यान नहीं करते। और भूतों की तरह ही जगत में विचरते रहते हैं (जीवन-ताल से विछुड़े रहते हैं)। नानक कहता है- जिन्होंने परमात्मा का नाम (-सिमरन) छोड़ा हुआ है। और जो माया के मोह में फसे हुए हैं। उन्होंने अपनी जीवन-खेल जूए में हार ली समझो। जो लोग (आचरण-निर्माण की) वह कमाई करते हैं जिसकी हिदायत गुरू से मिलती है। वे मन से भी पवित्र होते हैं। और बाहर से भी पवित्र होते हैं (भाव। उनका जगत से व्यवहार भी सत्य पर आधारित सुचॅजा होता है)। वे बाहर से भी पवित्र और अंदर से भी स्वच्छ रहते हैं। उनके मन का मायावी विचार सिमरन में समाप्त हो जाता है। (उनके अंदर इतना आत्मिक आनंद बनता है कि) माया के मोह की खबर तक उनके मन तक नहीं पहुँचती। (जीव जगत में आत्मिक आनंद का व्यापार करने आए हैं) वही जीव-व्यापारी बढ़िया कहे जाते हैं जिन्होंने (गुरू के बताए हुए राह पर चल कर नाम-कमाई करके) श्रेष्ठ मानस जन्म को सफल कर लिया। नानक कहता है- जिन लोगों का मन पवित्र हो जाता है (जिनके अंदर आत्मिक आनंद बन जाता है) वह (अंतरात्मे) सदा गुरू के चरणों में रहते हैं। 20। जो कोई सिख गुरू के सामने सुर्खरू होना चाहता है। जो सिख ये चाहता है कि किसी छुपे हुए खोट के कारण उसको गुरू के सामने आँखें ना झुकानी पड़ें (तो रास्ता एक ही है कि) वह सच्चे दिल से गुरू के चरणों में टिके। सिख गुरू के चरणों को अपने हृदय में जगह दे। अपनी अंत आत्मा के अंदर संभाल के रखे। स्वै भाव छोड़ के सदा गुरू के आसरे। गुरू के बिना किसी और को (अपने आत्मिक जीवन का। आत्मिक आनंद की वसीला) ना समझे।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “पर जिन्होंने गुरू की कृपा से स्वै भाव छोड़ दिया है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।