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अंग 918

अंग
918
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आनंद साहिब का हिस्सा। पूरी 40 पउड़ियों की commentary /anand-sahib/ पर है।
बाबा जिसु तू देहि सोई जनु पावै ॥
पावै त सो जनु देहि जिस नो होरि किआ करहि वेचारिआ ॥
इकि भरमि भूले फिरहि दह दिसि इकि नामि लागि सवारिआ ॥
गुर परसादी मनु भइआ निरमलु जिना भाणा भावए ॥
कहै नानकु जिसु देहि पिआरे सोई जनु पावए ॥8॥
आवहु संत पिआरिहो अकथ की करह कहाणी ॥
करह कहाणी अकथ केरी कितु दुआरै पाईऐ ॥
तनु मनु धनु सभु सउपि गुर कउ हुकमि मंनिऐ पाईऐ ॥
हुकमु मंनिहु गुरू केरा गावहु सची बाणी ॥
कहै नानकु सुणहु संतहु कथिहु अकथ कहाणी ॥9॥
ए मन चंचला चतुराई किनै न पाइआ ॥
चतुराई न पाइआ किनै तू सुणि मंन मेरिआ ॥
एह माइआ मोहणी जिनि एतु भरमि भुलाइआ ॥
माइआ त मोहणी तिनै कीती जिनि ठगउली पाईआ ॥
कुरबाणु कीता तिसै विटहु जिनि मोहु मीठा लाइआ ॥
कहै नानकु मन चंचल चतुराई किनै न पाइआ ॥10॥
ए मन पिआरिआ तू सदा सचु समाले ॥
एहु कुटंबु तू जि देखदा चलै नाही तेरै नाले ॥
साथि तेरै चलै नाही तिसु नालि किउ चितु लाईऐ ॥
ऐसा कंमु मूले न कीचै जितु अंति पछोताईऐ ॥
सतिगुरू का उपदेसु सुणि तू होवै तेरै नाले ॥
कहै नानकु मन पिआरे तू सदा सचु समाले ॥11॥
अगम अगोचरा तेरा अंतु न पाइआ ॥
अंतो न पाइआ किनै तेरा आपणा आपु तू जाणहे ॥
जीअ जंत सभि खेलु तेरा किआ को आखि वखाणए ॥
आखहि त वेखहि सभु तूहै जिनि जगतु उपाइआ ॥
कहै नानकु तू सदा अगंमु है तेरा अंतु न पाइआ ॥12॥
सुरि नर मुनि जन अंम्रितु खोजदे सु अंम्रितु गुर ते पाइआ ॥
पाइआ अंम्रितु गुरि क्रिपा कीनी सचा मनि वसाइआ ॥
जीअ जंत सभि तुधु उपाए इकि वेखि परसणि आइआ ॥
लबु लोभु अहंकारु चूका सतिगुरू भला भाइआ ॥
कहै नानकु जिस नो आपि तुठा तिनि अंम्रितु गुर ते पाइआ ॥13॥
भगता की चाल निराली ॥
चाला निराली भगताह केरी बिखम मारगि चलणा ॥
लबु लोभु अहंकारु तजि त्रिसना बहुतु नाही बोलणा ॥
खंनिअहु तिखी वालहु निकी एतु मारगि जाणा ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू जिस मनुष्य को आप (आत्मिक आनंद की दाति) देता है वह प्राप्त करता है। वही मनुष्य (इस दाति को) भोगता है जिसको आप देता है। और बेचारों की (माया के तुफान के आगे) कोई पेश नहीं चलती। कई लोग (माया की) भटकना में (असल रास्ते से) भूले हुए दसों दिशाओं में दौड़ते-फिरते हैं। कई (भाग्यशालियों को) आप अपने नाम में जोड़ के (उनका जनम) सवार देता है। (इस तरह आपकी मेहर से) जिन्हें आपकी रजा प्यारी लग जाती है। गुरू की कृपा से उनका मन पवित्र हैं जाता है (और वह आत्मिक आनंद पाते हैं। पर) नानक कहता है- (हे प्रभू !) जिस को आप (आत्मिक आनंद की दाति) बख्शता है वही इसका आनंद पा सकते हैं। 8। हे प्यारे संत जनो ! आएँ। हम (मिल के) बेअंत गुणों वाले परमात्मा की सिफत सालाह की बातें करें। उस प्रभू की कहानियाँ सुने सुनाएं जिसके गुण बयान से परे हैं। (पर यदि आप पूछो कि) वह प्रभू किस ढंग से मिलता है (तो उक्तर ये है कि अपना आप माया के हवाले करने की बजाए) अपना तन मन धन सब कुछ गुरू के हवाले करो (इस तरह) यदि गुरू का हुकम मीठा लग जाए तो परमात्मा मिल जाता है। (सो। संत जनो !) गुरू के हुकम पर चलो और सदा कायम रहने वाले प्रभू की सिफतसालाह की बाणी गाया करो। नानक कहता है- हे संत जनो सुनो। (उसको मिलने का और आत्मिक आनंद पाने का सही रास्ता यही है कि) उस अकथ प्रभू की कहानियाँ कहा करो। 9। हे चंचल मन ! चालाकियों से किसी ने भी (आत्मिक आनंद) हासिल नहीं किया। हे मेरे मन ! आप (ध्यान से) सुन ले कि किसी जीव ने भी चतुराई से (परमात्मा के मिलाप का आनंद) प्राप्त नहीं किया। (अंदर से सुंदर माया में भी फसा रहे। और। बाहर से सिर्फ बातों से आत्मिक आनंद चाहे। ये नहीं हो सकता)। ये माया जीवों को अपने मोह-जाल में फसाने के लिए बहुत बलवान है। इसने ये भुलेखा डाला हुआ है कि मोह मीठी चीज है। इस कुमार्ग पर डाले रखती है। (पर। जीव के भी क्या वश।) जिस प्रभू ने माया के मोह की ठॅग-बूटी (जीवों को) चिपका दी है उसी ने ही ये मोहनी माया पैदा की है। (सो। हे मेरे मन ! अपने आप को माया पर कुर्बान करने की बजाए) उस प्रभू पर से कुर्बान कर जिसने मीठा मोह लगाया है (तब जाकर ये मीठा मोह खत्म होता है)। नानक कहता है- हे (मेरे) चंचल मन ! चतुराईयों से किसी ने (परमात्मा के मिलाप का आत्मिक आनंद) नहीं पाया। 10। हे प्यारे मन ! (अगर आप हमेशा आत्मिक आनंद चाहता है तो) सदा सच्चे प्रभू को (अपने अंदर) संभाल के रख ! ये जो परिवार आप देखता है। इसने आपके साथ नहीं निभना। (हे भाई !) इस परिवार के मोह में क्यों फसता है। इसने आपका साथ आखिर तक नहीं निभा सकना। जिस काम को करने से आखिर में हाथ मलने पड़ें। वह काम कभी भी नहीं करना चाहिए। (हे भाई !) सतिगुरू की शिक्षा (ध्यान से) सुन। ये गुरू अपदेश हमेशा याद रखना चाहिए। नानक कहता है- हे प्यारे मन ! (यदि आप आनंद चाहता है तो) सदा स्थिर परमात्मा को हर वक्त (अपने अंदर) संभाल के रख। 11। (हे मेरे प्यारे मन ! सदा प्रभू को अपने अंदर संभाल के रख। और उसके आगे ऐसे अरजोई कर-) हे अपहुँच हरी ! हे इन्द्रियों की पहुँच से परे रहने वाले प्रभू ! (आपके गुणों का) किसी ने अंत नहीं पाया। अपने (असल) स्वरूप को आप स्वयं ही जानता है। और कोई जीव आपके गुणों का अंत नहीं पा सकता। कोई और जीव (आपके गुणों को) कह के बयान करे भी किस तरह। ये सारे जीव (तो) आपके ही रखे हुए एक खेल हैं। हरेक जीव में आप खुद ही बोलता है। हरेक जीव की स्वयं ही संभाल करता है (आप ही करता है) जिसने ये संसार पैदा किया है। नानक कहता है- (हे मेरे प्यारे मन ! प्रभू के आगे अरदास कर-) आप सदा अपहुँच है। (किसी जीव ने आपके गुणों का कभी) अंत नहीं पाया। 12। (आत्मिक आनंद एक ऐसा) अमृत (है जिस) को देवते मनुष्य मुनि लोग तलाशते फिरते हैं। (पर) यह अमृत गुरू से ही मिलता है। जिस मनुष्य पर गुरू ने मेहर की उसने (यह) अमृत प्राप्त कर लिया (क्योंकि) उसने सदा कायम रहने वाला प्रभू अपने मन में टिका लिया। हे प्रभू ! सारे जीव-जंतु तूने ही पैदा किए हैं (आप ही इनको प्रेरित करता है। आपकी प्रेरणा से ही) कई जीव (गुरू के) दीदार करके (उसके) चरण छूने आते हैं। सतिगुरू उनको प्यारा लगता है (सतिगुरू की कृपा से उनका) लब-लोभ व अहंकार दूर हो जाता है। नानक कहता है- प्रभू जिस मनुष्य पर प्रसन्न होता है। उस मनुष्य ने (आत्मिक आनंद रूप) अमृत गुरू से प्राप्त कर लिया है। 13। (जो सौभाग्यशाली लोग आत्मिक आनंद भोगते हैं वही भकत हैं और उन) भक्तों की जीवन-जुगति (दुनियां के लोगों से सदा) अलग होती है। (ये पक्की बात है कि उन) भक्तों की जीवन-जुगति (औरों से) अलग होती है। वह (बड़े) मुश्किल रास्ते पर चलते हैं। वे लब-लोभ-अहंकार और माया की तृष्णा त्यागते हैं और ज्यादा नहीं बोलते (भाव। अपनी शोभा नहीं करते-फिरते)। इस रास्ते पर चलना (बड़ी मुश्किल खेल है क्योंकि ये रास्ता) खंडे की धार से ज्यादा नुकीला है और बाल से भी ज्यादा बारीक है (इस पर से गिरने की संभावना हमेशा बनी रहती है क्योंकि दुनियावी वासना मन की अडोलता को धक्का दे देती है)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “हे प्रभू जिस मनुष्य को आप (आत्मिक आनंद की दाति) देता है वह प्राप्त करता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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