अजामल कउ अंत काल महि नाराइन सुधि आई ॥ जां गति कउ जोगीसुर बाछत सो गति छिन महि पाई ॥2॥ नाहिन गुनु नाहिन कछु बिदिआ धरमु कउनु गजि कीना ॥ नानक बिरदु राम का देखहु अभै दानु तिह दीना ॥3॥1॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: (हे मेरे मन ! देख। पुरानी प्रसिद्ध कथा है कि) आखिरी समय में (पापी) अजामल को परमात्मा के नाम की सूझ आ गई। उसने वह ऊँची आत्मिक अवस्था एक पल में हासिल कर ली। जिस आत्मिक अवस्था को बड़े-बड़े जोगी तरसते रहते हैं। 2। हे नानक ! (कह- हे मेरे मन ! गज की कथा भी सुन। गज में) ना कोई गुण था। ना ही उसको कोई विद्या प्राप्त हुई थी। (उस विचारे) हाथी ने कौन सा धार्मिक कर्म करना था। पर देख परमात्मा का बिरद भरा स्वभाव। परमात्मा ने उस गज को निर्भयता की पदवी बख्श दी। 3। 1।
रामकली महला 9 ॥ साधो कउन जुगति अब कीजै ॥ जा ते दुरमति सगल बिनासै राम भगति मनु भीजै ॥1॥ रहाउ ॥ मनु माइआ महि उरझि रहिओ है बूझै नह कछु गिआना ॥ कउनु नामु जगु जा कै सिमरै पावै पदु निरबाना ॥1॥ भए दइआल क्रिपाल संत जन तब इह बात बताई ॥ सरब धरम मानो तिह कीए जिह प्रभ कीरति गाई ॥2॥ राम नामु नरु निसि बासुर महि निमख एक उरि धारै ॥ जम को त्रासु मिटै नानक तिह अपुनो जनमु सवारै ॥3॥2॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 9 ॥ हे संत जनो ! अब (इस मनुष्य जनम में वह) कौन सी तरतीब अपनाई जाए। जिसके करने से (मनुष्य के अंदर की) सारी दुर्मति नाश हो जाए। और (मनुष्य का) मन परमात्मा की भक्ति में रच-मिच जाए। 1। रहाउ। हे संत-जनो ! (आम तौर पर मनुष्य का) मन माया (के मोह) में उलझा रहता है। मनुष्य रक्ती भर भी समझदारी की ये बात नहीं विचारता कि वह कौन सा नाम है जिसका सिमरन करने से जगत वासना-रहित आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। 1। हे भाई ! जब संत जन (किसी भाग्यशाली पर) दयावान होते हैं। कृपा करते हैं। तब वह (उस मनुष्य को) ये बात बताते हैं कि- जिस मनुष्य ने परमात्मा की सिफतसालाह का गीत गाना आरम्भ कर दिया। ऐसे समझ लें कि उसने सारे ही धार्मिक कर्म कर डाले। 2। हे नानक ! (कह- हे भाई ! जो) मनुष्य दिन-रात में एक निमेष मात्र समय के लिए भी परमात्मा का नाम (अपने) हृदय में बसाता है। वह मनुष्य अपना (मानस) जन्म सफल कर लेता है। उस मनुष्य के दिल में से मौत का सहम दूर हो जाता है। 3। 2।
रामकली महला 9 ॥ प्रानी नाराइन सुधि लेहि ॥ छिनु छिनु अउध घटै निसि बासुर ब्रिथा जातु है देह ॥1॥ रहाउ ॥ तरनापो बिखिअन सिउ खोइओ बालपनु अगिआना ॥ बिरधि भइओ अजहू नही समझै कउन कुमति उरझाना ॥1॥ मानस जनमु दीओ जिह ठाकुरि सो तै किउ बिसराइओ ॥ मुकतु होत नर जा कै सिमरै निमख न ता कउ गाइओ ॥2॥ माइआ को मदु कहा करतु है संगि न काहू जाई ॥ नानकु कहतु चेति चिंतामनि होइ है अंति सहाई ॥3॥3॥81॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 9 ॥ हे भाई ! परमात्मा की याद हृदय में बसाए रख। (प्रभू की याद के बिना आपका मनुष्य) शरीर व्यर्थ जा रहा है। दिन-रात एक-एक छिन करके आपकी उम्र घटती जा रही है। 1। रहाउ। (जीव का भी अजब दुर्भाग्य है कि इसने) जवानी (की उम्र) विषौ-विकारों में गवा ली। बाल-उम्र अंजान-पने में (गवा ली। अब) वृद्ध हो गया है। पर अभी भी नहीं समझता। (पता नहीं यह) किस कुमति में फसा पड़ा है। 1। हे प्राणी ! जिस ठाकुर प्रभू ने (आपको) मानस जनम दिया हुआ है। आप उसको क्यों भुला रहा है। हे नर ! जिस परमात्मा का नाम सिमरने से माया के बँधनों से निजात मिलती है आप एक निमख मात्र भी उस (की सिफतसालाह) को नहीं गाता। 2। हे प्राणी ! आप क्यों माया का इतना गुमान कर रहा है। (ये तो) किसी के साथ भी (आखिर में) नहीं जाती। नानक कहता है- हे भाई ! परमात्मा का सिमरन करता रह आखिर में वह आपका मददगार होंगे। 3। 3। 81।
रामकली महला 1 असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सोई चंदु चड़हि से तारे सोई दिनीअरु तपत रहै ॥ सा धरती सो पउणु झुलारे जुग जीअ खेले थाव कैसे ॥1॥ जीवन तलब निवारि ॥ होवै परवाणा करहि धिङाणा कलि लखण वीचारि ॥1॥ रहाउ ॥ कितै देसि न आइआ सुणीऐ तीरथ पासि न बैठा ॥ दाता दानु करे तह नाही महल उसारि न बैठा ॥2॥ जे को सतु करे सो छीजै तप घरि तपु न होई ॥ जे को नाउ लए बदनावी कलि के लखण एई ॥3॥ जिसु सिकदारी तिसहि खुआरी चाकर केहे डरणा ॥ जा सिकदारै पवै जंजीरी ता चाकर हथहु मरणा ॥4॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 असटपदीआ सतिगुर प्रसादि ॥ (सतियुग त्रेता द्वापर आदि सारे ही समयों में) वही चंद्रमा चढ़ता आया है। वही तारे चढ़ते आ रहे हैं। वही सूरज चमकता । वही धरती है और वही हवा झूलती आ रही है। (जिस असल कलियुग का वर्णन हमने किया है उस) कलियुग का प्रभाव ही जीवों के मनों में (खेलें) खेलता है किसी विशेष जगहों पर नहीं खेल सकता 1। (हे पण्डित ! अपने मन में से) खुद-गर्जी दूर कर (यह स्वार्थ ही कलियुग है। इस खुद-गर्जी के असर तले शक्तिशाली लोग कमजोरों के ऊपर) धक्केशाही करते हैं और (उनकी नजरों में) ये जोर-जबरदस्ती जायज़ समझी जाती है। खुद-गर्जी और दूसरों पर जोर-ज़बर – हे पण्डित ! इनको कलियुग के लक्षण समझ। 1। रहाउ। किसी ने कभी नहीं सुना कि कलियुग किसी खास देश में आया हुआ है। किसी विशेष तीर्थ के पास बैठा हुआ है। जहाँ कोई दानी दान करता है वहाँ भी बैठा हुआ किसी ने सुना नहीं। किसी जगह कलियुग महल बना के नहीं बैठा हुआ। 2। जो कोई मनुष्य अपना आचरण ऊँचा बनाता है तो वह (बल्कि लोगों की नजरों में) गिरता है। अगर कोई तपस्वी होने का दावा करता है तो उसकी इन्द्रियाँ उसके अपने वश में नहीं हैं। अगर कोई परमात्मा का नाम सिमरता है तो (लोगों में बल्कि उसकी) बदनामी होती है। (हे पण्डित ! बुरा आचरण। इन्द्रियों का वश में ना होना। प्रभू के नाम से नफ़रत -) ये हैं कलियुग के लक्षण। 3। (पर। ये खुद-गर्जी और कमजोरों पर जोर-ज़बरदस्ती सुखी जीवन का रास्ता नहीं) जिस मनुष्य को दूसरों पर सरदारी मिलती है (और वह कमजोरों पर धक्का करता है) उसकी ही (इस धक्के-जुल्म के कारण आखिर) दुर्गति होती है। नोकरों को (उस दुर्गति से कोई) खतरा नहीं होता। जब उस सरदार के गले में फंदा पड़ता है। तब वह उन नौकरों के हाथों से ही मरता है। 4।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
तेग बहादुर जी की रचनाएँ ग्रंथ के अंतिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं। वैराग्य, क्षणिकता, और मरण-चेतना उनकी वाणी के केन्द्रीय धागे हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।