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गोंड
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पांडे तुमरा रामचंदु सो भी आवतु देखिआ था ॥
पांडे तुमरा रामचंदु सो भी आवतु देखिआ था ॥
रावन सेती सरबर होई घर की जोइ गवाई थी ॥3॥
हिंदू अंन॑ा तुरकू काणा ॥
दुहां ते गिआनी सिआणा ॥
हिंदू पूजै देहुरा मुसलमाणु मसीति ॥
नामे सोई सेविआ जह देहुरा न मसीति ॥4॥3॥7॥
रावन सेती सरबर होई घर की जोइ गवाई थी ॥3॥
हिंदू अंन॑ा तुरकू काणा ॥
दुहां ते गिआनी सिआणा ॥
हिंदू पूजै देहुरा मुसलमाणु मसीति ॥
नामे सोई सेविआ जह देहुरा न मसीति ॥4॥3॥7॥
हिन्दी अर्थ: हे पांडे ! आपके श्री रामचंद्र जी भी आते हुए देखे हैं (भाव। जिस श्री रामचंद्र जी की आप उपासना करते हैं। उनकी बाबत भी आपसे ऐसा ही कुछ हमने सुना है कि) रावण से उनकी लड़ाई हो गई। क्योंकि वे पत्नी (सीता जी को) गवा बैठे थे। 3। सो हिन्दू दोनों ही आँखें गवा बैठा है। पर मुसलमान की एक आँख ही खराब हुई है। इन दोनों से ज्यादा समझदार वह व्यक्ति है जिसको (प्रभू की हस्ती का सही) ज्ञान हो गया है। (हिन्दू ने एक आँख तो तब गवाई जब वह अपने ईष्ट के बारे में श्रद्धा-हीन कहानियां घड़ने लग पड़ा; और दूसरी गवाई। जब वह परमात्मा को सिर्फ मन्दिर में बैठा समझ के) मन्दिर को पूजने लग पड़ा। मुसलमान (की हज़रत मुहम्मद साहिब में पूरी श्रद्धा होने के कारण एक आँख तो साबत है पर दूसरी गवा बैठा है। क्योंकि रॅब को सिर्फ मस्जिद में ही जान के) मस्जिद को ही खुदा का घर समझ रहा है। मैं नामदेव उस परमात्मा का सिमरन करता हूँ जिसका ना कोई खास मन्दिर है ना ही मस्जिद। 4। 3। 7।
मुकंद मुकंद जपहु संसार ॥
रागु गोंड बाणी रविदास जीउ की घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुकंद मुकंद जपहु संसार ॥
बिनु मुकंद तनु होइ अउहार ॥
सोई मुकंदु मुकति का दाता ॥
सोई मुकंदु हमरा पित माता ॥1॥
जीवत मुकंदे मरत मुकंदे ॥
ता के सेवक कउ सदा अनंदे ॥1॥ रहाउ ॥
मुकंद मुकंद हमारे प्रानं ॥
जपि मुकंद मसतकि नीसानं ॥
सेव मुकंद करै बैरागी ॥
सोई मुकंदु दुरबल धनु लाधी ॥2॥
एकु मुकंदु करै उपकारु ॥
हमरा कहा करै संसारु ॥
मेटी जाति हूए दरबारि ॥
तुही मुकंद जोग जुग तारि ॥3॥
उपजिओ गिआनु हूआ परगास ॥
करि किरपा लीने कीट दास ॥
कहु रविदास अब त्रिसना चूकी ॥
जपि मुकंद सेवा ताहू की ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुकंद मुकंद जपहु संसार ॥
बिनु मुकंद तनु होइ अउहार ॥
सोई मुकंदु मुकति का दाता ॥
सोई मुकंदु हमरा पित माता ॥1॥
जीवत मुकंदे मरत मुकंदे ॥
ता के सेवक कउ सदा अनंदे ॥1॥ रहाउ ॥
मुकंद मुकंद हमारे प्रानं ॥
जपि मुकंद मसतकि नीसानं ॥
सेव मुकंद करै बैरागी ॥
सोई मुकंदु दुरबल धनु लाधी ॥2॥
एकु मुकंदु करै उपकारु ॥
हमरा कहा करै संसारु ॥
मेटी जाति हूए दरबारि ॥
तुही मुकंद जोग जुग तारि ॥3॥
उपजिओ गिआनु हूआ परगास ॥
करि किरपा लीने कीट दास ॥
कहु रविदास अब त्रिसना चूकी ॥
जपि मुकंद सेवा ताहू की ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: रागु गोंड बाणी रविदास जीउ की घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे लोगो ! मुक्ति दाते प्रभू को हमेशा सिमरते रहो। उसके सिमरन के बिना ये शरीर व्यर्थ ही चला जाता है। वही दुनिया के बँधनों से मेरी रक्षा कर सकता है। मेरा तो माता-पिता ही वह प्रभू ही है। 1। (प्रभु का सेवक) जीवित ही प्रभू को सिमरता है और मरते हुए भी उसी को याद करता है (सारी उम्र ही प्रभू को याद रखता है माया के बँधनों से मुक्ति देने वाले प्रभू की बंदगी करने वाले को सदा ही आनंद बना रहता है। 1। रहाउ। प्रभू का सिमरन मेरे प्राणों (का आसरा बन गए) हैं। प्रभू को सिमर के मेरे माथे के भाग्य जाग उठे हैं; प्रभू की भगती (मनुष्य को) वैरागवान कर देती है। मुझ गरीब को प्रभू का नाम ही धन प्राप्त हो गया है। 2। यदि एक परमात्मा मुझ पर मेहर करे। तो (मुझे चमार-चमार कहने वाले ये) लोग मेरा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते। हे प्रभू ! (आपकी भक्ति ने) मेरी (नीच) जाति (वाली आत्मिक हीनता भरी अवस्था को मेरे अंदर से) मिटा दिया है। क्योंकि मैं सदा आपके दर पर रहता हूँ; आप ही सदा मुझे (दुनिया के बँधनों व मजबूरियों। मुथाजियों से) पार लंघाने वाला है। 3। (प्रभू की बँदगी से मेरे अंदर) आत्मिक जीवन की सूझ पैदा हो गई है। प्रकाश हो गया है। मेहर करके मुझ निमाने दास को प्रभू ने अपना बना लिया है। हे रविदास ! कह- अब मेरी तृष्णा खत्म हो गई है। मैं अब प्रभू को सिमरता हूँ। नित्य प्रभू की ही भक्ति करता हूँ। 4। 1।
गोंड ॥
गोंड ॥
जे ओहु अठसठि तीरथ न॑ावै ॥
जे ओहु दुआदस सिला पूजावै ॥
जे ओहु कूप तटा देवावै ॥
करै निंद सभ बिरथा जावै ॥1॥
साध का निंदकु कैसे तरै ॥
सरपर जानहु नरक ही परै ॥1॥ रहाउ ॥
जे ओहु ग्रहन करै कुलखेति ॥
अरपै नारि सीगार समेति ॥
सगली सिंम्रिति स्रवनी सुनै ॥
करै निंद कवनै नही गुनै ॥2॥
जे ओहु अनिक प्रसाद करावै ॥
भूमि दान सोभा मंडपि पावै ॥
अपना बिगारि बिरांना सांढै ॥
करै निंद बहु जोनी हांढै ॥3॥
निंदा कहा करहु संसारा ॥
निंदक का परगटि पाहारा ॥
निंदकु सोधि साधि बीचारिआ ॥
कहु रविदास पापी नरकि सिधारिआ ॥4॥2॥11॥7॥2॥49॥ जोड़ु ॥
जे ओहु अठसठि तीरथ न॑ावै ॥
जे ओहु दुआदस सिला पूजावै ॥
जे ओहु कूप तटा देवावै ॥
करै निंद सभ बिरथा जावै ॥1॥
साध का निंदकु कैसे तरै ॥
सरपर जानहु नरक ही परै ॥1॥ रहाउ ॥
जे ओहु ग्रहन करै कुलखेति ॥
अरपै नारि सीगार समेति ॥
सगली सिंम्रिति स्रवनी सुनै ॥
करै निंद कवनै नही गुनै ॥2॥
जे ओहु अनिक प्रसाद करावै ॥
भूमि दान सोभा मंडपि पावै ॥
अपना बिगारि बिरांना सांढै ॥
करै निंद बहु जोनी हांढै ॥3॥
निंदा कहा करहु संसारा ॥
निंदक का परगटि पाहारा ॥
निंदकु सोधि साधि बीचारिआ ॥
कहु रविदास पापी नरकि सिधारिआ ॥4॥2॥11॥7॥2॥49॥ जोड़ु ॥
हिन्दी अर्थ: गोंड ॥ यदि कोई मनुष्य अढ़सठ तीर्थों का स्नान (भी) करे। और बारहों शिवलिंगों की पूजा भी करे। अगर (लोगों के भले के लिए) कूएं तालाब (आदि) बनवाए; पर अगर वह (गुरमुखों की) निंदा करता है। तो उसकी यह सारी मेहनत व्यर्थ जाती है। 1। साधू गुरमुखि की निंदा करने वाला मनुष्य (जगत की गिरावटों में से) पार नहीं लांघ पाता। यकीन जानिए वह सदा नर्क में ही पड़ा रहता है। 1। रहाउ। यदि कोई मनुष्य कुरुक्षेत्र पर (जा के) ग्रहण (का स्नान) करे। गहनों समेत अपनी पत्नी (ब्राहमणों को) दान कर दे। सारी स्मृतियाँ ध्यान से सुने; पर अगर वह भले लोगों की निंदा करता है। तो इन सारे कामों का कोई लाभ नहीं। 2। यदि कोई मनुष्य ठाकुरों को कई तरह के भोग लगाए। भूमि का दान करे (जिसके कारण) जगत में उसकी प्रसिद्धि हो। (और) यदि वह अपना नुकसान करके भी दूसरों के काम सवारे। तो भी अगर वह भले लोगों की निंदा करता है तो वह कई जूनियों में भटकता है। 3। हे दुनिया के लोगो ! आप (संतों की) निंदा क्यों करते हैं। (भले ही बाहर से कई तरह के धार्मिक कर्म करे। पर यदि कोई मनुष्य संत की निंदा करता है तो सारे धार्मिक कर्म एक ठॅगी ही हैं। और) निंदक की ये ठॅगी भरी दुकान की पोल खुल जाती है। हे रविदास ! हमने अच्छी तरह विचार के देख लिया है कि संत का निंदक कुकर्मी रहता है और नर्क में पड़ा रहता है। 4। 2। 11। 7। 2। 49।
रचयिता और स्रोत
यह गोंड राग का अंग है। भगत रविदास जी की रचनाओं के शीर्षक और शबद का क्रम साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत नामदेव जी; भगत रविदास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 875 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।