नानक से दरि सोभावंते जो प्रभि अपुनै कीओ ॥1॥ हरिचंदउरी चित भ्रमु सखीए म्रिग त्रिसना द्रुम छाइआ ॥ चंचलि संगि न चालती सखीए अंति तजि जावत माइआ ॥ रसि भोगण अति रूप रस माते इन संगि सूखु न पाइआ ॥ धंनि धंनि हरि साध जन सखीए नानक जिनी नामु धिआइआ ॥2॥ जाइ बसहु वडभागणी सखीए संता संगि समाईऐ ॥ तह दूख न भूख न रोगु बिआपै चरन कमल लिव लाईऐ ॥ तह जनम न मरणु न आवण जाणा निहचलु सरणी पाईऐ ॥ प्रेम बिछोहु न मोहु बिआपै नानक हरि एकु धिआईऐ ॥3॥ द्रिसटि धारि मनु बेधिआ पिआरे रतड़े सहजि सुभाए ॥ सेज सुहावी संगि मिलि प्रीतम अनद मंगल गुण गाए ॥ सखी सहेली राम रंगि राती मन तन इछ पुजाए ॥ नानक अचरजु अचरज सिउ मिलिआ कहणा कछू न जाए ॥4॥2॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! प्रभू के दर पर वह लोग शोभा वाले होते हैं जिनको प्यारे प्रभू ने स्वयं ही शोभा वाले बनाया है। 1। हे सहेलिए ! यह माया (जैसे) हवाई किला है। मन को भटकना में डालने का साधन है। मृग-तृष्णा है। वृक्ष की छाया है। कभी भी एक जगह ना टिक सकने वाली ये माया किसी के साथ नहीं जाती। ये आखिर में (साथ) छोड़ जाती है। स्वाद से दुनिया के पदार्थ भोगने। दुनियाँ के रूपों और रसों में मस्त रहना- हे सखिए ! इनकी संगति में आत्मिक आनंद नहीं मिलता। हे नानक ! (कह-) हे सहेलिए ! भाग्यशाली हैं परमात्मा के भक्त जिन्होंने सदा परमात्मा का नाम सिमरा है। 2। हे भाग्यशाली सहेलिए ! जा के साध-संगति में टिका कर। गुरमुखों की ही संगति में सदा टिकना चाहिए। वहाँ टिकने से दुनिया के दुख। माया की तृष्णा। कोई रोग आदिक- ये कोई भी अपना जोर नहीं डाल सकते। (साध-संगति में जा के) प्रभू के सुंदर चरणों में सुरति जोड़नी चाहिए। साध-संगति में रहने से जनम-मरण का चक्कर नहीं सताता। मन की अडोलता कायम रहती है। सो। प्रभू की शरण में पड़े रहना चाहिए। हे नानक ! (साध-संगति की बरकति से) प्रभू-प्रेम की गैर-मौजूदगी और माया का मोह- ये कोई भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। सत-संगति में सदा परमात्मा का नाम सिमरा जा सकता है। 3। हे प्यारे ! (प्रभू) ! मेहर की निगाह करके तूने जिनका मन अपने चरणों में परो लिया है। वे आत्मिक अडोलता में। प्रेम में। सदा रंगे रहते हैं। हे प्रीतम ! आपके (चरणों) से मिल के उनका हृदय आनंद-भरपूर हैं जाता है। आपके गुण गा-गा के उनके अंदर आनंद बना रहता है। हे नानक ! जो (सत्संगी) सहेलियाँ प्रभू के प्रेम-रंग में रंगी रहती हैं। प्रभू उनके मन की तन की हरेक इच्छा पूरी करता है। उनकी (ऊँची हो चुकी) जिंद आश्चर्य-रूप प्रभू से इस प्रकार मिल जाती है कि (उस अवस्था का) बयान नहीं किया जा सकता। 4। 2। 5।
रागु बिलावलु महला 5 घरु 4 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ एक रूप सगलो पासारा ॥ आपे बनजु आपि बिउहारा ॥1॥ ऐसो गिआनु बिरलो ई पाए ॥ जत जत जाईऐ तत द्रिसटाए ॥1॥ रहाउ ॥ अनिक रंग निरगुन इक रंगा ॥ आपे जलु आप ही तरंगा ॥2॥ आप ही मंदरु आपहि सेवा ॥ आप ही पूजारी आप ही देवा ॥3॥ आपहि जोग आप ही जुगता ॥ नानक के प्रभ सद ही मुकता ॥4॥1॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 घरु 4 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! ये सारा जगत-पसारा उस एक (परमात्मा के ही अनेकों) रूप हैं। (सब जीवों में व्यापक हो के) प्रभू स्वयं ही (जगत का) वणज-व्यवहार कर रहा है। 1। हे भाई ! यह सूझ कोई विरला मनुष्य ही हासिल करता है जगत में जिस-जिस ओर चले जाएं। हर तरफ़ परमात्मा ही नज़र आता है। 1। रहाउ। हे भाई ! सदा एक-रंग रहने वाले और माया के तीन गुणों से निर्लिप परमात्मा के ही (जगत में दिखाई दे रहे) अनेकों रंग-तमाशे हैं। वह प्रभू स्वयं ही पानी है। और। स्वयं ही (पानी में उठ रही) लहरें हैं (जैसे पानी और पानी की लहरें एक ही रूप हैं। वैसे ही परमात्मा से ही जगत के अनेकों रूप-रंग बने हैं)। 2। हे भाई ! प्रभू खुद ही मन्दिर है। खुद ही सेवा-भगती है। खुद ही (मन्दिर में) देवता है। और स्वयं ही (देवते का) पुजारी है। 3। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही जोगी है। स्वयं ही जोग का साधन है। (सब जीवों में व्यापक होता हुआ भी) नानक का परमात्मा सदा ही निर्लिप है। 4। 1। 6।
बिलावलु महला 5 ॥ आपि उपावन आपि सधरना ॥ आपि करावन दोसु न लैना ॥1॥ आपन बचनु आप ही करना ॥ आपन बिभउ आप ही जरना ॥1॥ रहाउ ॥ आप ही मसटि आप ही बुलना ॥ आप ही अछलु न जाई छलना ॥2॥ आप ही गुपत आपि परगटना ॥ आप ही घटि घटि आपि अलिपना ॥3॥ आपे अविगतु आप संगि रचना ॥ कहु नानक प्रभ के सभि जचना ॥4॥2॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (सब जीवों को) पैदा करने वाला है। और स्वयं ही (सबको) सहारा देने वाला है। (सबमें व्यापक हो के) प्रभू स्वयं ही (सब जीवों से) काम करवाने वाला है। पर प्रभू (इन कामों का) दोष अपने ऊपर नहीं लेता। 1। हे भाई ! (हरेक जीव में व्यापक हो के) अपने बोल (प्रभू स्वयं ही बोल रहा है। और) खुद ही (उस बोल के अनुसार) काम कर रहा है । 1। रहाउ। (हरेक में मौजूद है। यदि कोई मौनधारी बैठा है। तो उस में) प्रभू खुद ही मौनधारी है। (अगर कोई बोल रहा है। तो उसमें) प्रभू स्वयं ही बोल रहा है। प्रभू स्वयं ही (किसी में बैठा) माया के प्रभाव से परे है। माया उसे छल नहीं सकती। 2। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (सब जीवों में) छुपा बैठा है। और। (जगत-रचना के रूप में) स्वयं ही प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है। प्रभू स्वयं ही हरेक शरीर में बस रहा है। (हरेक में बसता हुआ) प्रभू स्वयं ही निर्लिप है। 3। हे भाई ! प्रभू खुद ही अदृष्ट है। खुद ही (अपनी रची हुई) सृष्टि के साथ मिला हुआ है। हे नानक ! कह- (जगत में दिखाई दे रहे ये) सारे करिश्मे प्रभू के अपने ही हैं। 4। 2। 7।
बिलावलु महला 5 ॥ भूले मारगु जिनहि बताइआ ॥ ऐसा गुरु वडभागी पाइआ ॥1॥ सिमरि मना राम नामु चितारे ॥ बसि रहे हिरदै गुर चरन पिआरे ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे मन !) जो (जीवन के सही रास्ते से) विचलित होते जा रहे मनुष्य को (जिंदगी का सही) रास्ता बता देता है। ऐसा गुरू बड़े भाग्यों से ही मिलता है। 1। हे (मेरे) मन ! ध्यान जोड़ के परमात्मा का नाम सिमरा कर। (पर वही मनुष्य हरी नाम का सिमरन करता है। जिसके) हृदय में प्यारे सतिगुरू के चरन बसे रहते हैं (इसलिए। हे मन ! आप भी गुरू का आसरा ले)। 1। रहाउ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! प्रभू के दर पर वह लोग शोभा वाले होते हैं जिनको प्यारे प्रभू ने स्वयं ही शोभा वाले बनाया है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।