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अंग ७९९ · बिलावल

अंग
799
बिलावल
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  1. जपि मन राम नामु रसना ॥
  2. हम मूरख मुगध अगिआन मती सरणागति पुरख अजनमा ॥
  3. हमरा चितु लुभत मोहि बिखिआ बहु दुरमति मैलु भरा ॥
  4. आवहु संत मिलहु मेरे भाई मिलि हरि हरि कथा करहु ॥

जपि मन राम नामु रसना ॥

अंग ७९८ से चला आ रहा अंश

जपि मन राम नामु रसना ॥
मसतकि लिखत लिखे गुरु पाइआ हरि हिरदै हरि बसना ॥1॥ रहाउ ॥
माइआ गिरसति भ्रमतु है प्रानी रखि लेवहु जनु अपना ॥
जिउ प्रहिलादु हरणाखसि ग्रसिओ हरि राखिओ हरि सरना ॥2॥
कवन कवन की गति मिति कहीऐ हरि कीए पतित पवंना ॥
ओहु ढोवै ढोर हाथि चमु चमरे हरि उधरिओ परिओ सरना ॥3॥
प्रभ दीन दइआल भगत भव तारन हम पापी राखु पपना ॥
हरि दासन दास दास हम करीअहु जन नानक दास दासंना ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: हे (मेरे) मन ! जीभ से परमात्मा का नाम जपा कर। जिस मनुष्य के माथे पर लिखे हुए अच्छे भाग्य जाग जाएं।उसे गुरू मिल जाता है।(गुरू की सहायता से उसके) हृदय में प्रभू आ बसता है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! माया के मोह में फसा हुआ जीव भटकता फिरता है।(मुझे) अपने दास को (इस माया के मोह से) बचा ले (उस तरह बचा ले) जैसे। हे हरी ! आपने शरण पड़े प्रहलाद की रक्षा की।जब उसे हणाकश्यप ने दुख दिया। 2। हे भाई ! किस किस की हालत बताई जाए।वह परमात्मा तो बड़े-बड़े विकारियों को पवित्र कर देता है।(देखो।) वह (रविदास।जो) मरे हुए पशू ढोता था।(उस) चमार के हाथ में (नित्य) चमड़ी (पकड़ी होती) थी।पर जब वह प्रभू की शरण पड़ा।प्रभू ने उसको (संसार-समुंद्र से) पार लंघा दिया। 3। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! हे भक्तों को संसार-समुंद्र से पार लंघाने वाले प्रभू ! हम पापी जीवों को पापों से बचा ले। हे दास नानक ! (कह- हे प्रभू !) हमें अपने दासों के दासों का दास बना ले। 4। 1।

हम मूरख मुगध अगिआन मती सरणागति पुरख अजनमा ॥

बिलावलु महला 4 ॥
हम मूरख मुगध अगिआन मती सरणागति पुरख अजनमा ॥
करि किरपा रखि लेवहु मेरे ठाकुर हम पाथर हीन अकरमा ॥1॥
मेरे मन भजु राम नामै रामा ॥
गुरमति हरि रसु पाईऐ होरि तिआगहु निहफल कामा ॥1॥ रहाउ ॥
हरि जन सेवक से हरि तारे हम निरगुन राखु उपमा ॥
तुझ बिनु अवरु न कोई मेरे ठाकुर हरि जपीऐ वडे करंमा ॥2॥
नामहीन ध्रिगु जीवते तिन वड दूख सहंमा ॥
ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि मंदभागी मूड़ अकरमा ॥3॥
हरि जन नामु अधारु है धुरि पूरबि लिखे वड करमा ॥
गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ जन नानक सफलु जनंमा ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 4 ॥ हे सर्व व्यापक प्रभू ! हे जूनियों से रहित प्रभू ! हम जीव मूर्ख हैं।बड़े मूर्ख हैं।बेसमझ हैं (पर) आपकी शरण में पड़े हैं। हे मेरे ठाकुर ! मेहर कर।हमारी रक्षा कर।हम पत्थर (दिल) हैं।हम निमाणे हैं और दुर्भाग्य वाले हैं। 1। हे (मेरे) मन ! सदा परमात्मा का नाम सिमरता रह। (हे भाई !) गुरू की मति पर चलने से ही परमात्मा के नाम का आनंद मिलता है।छोड़ें और कर्मों का मोह।(जिंद को उनसे) कोई लाभ नहीं मिलेगा। 1।रहाउ। हे हरी ! जो मनुष्य आपके (दर के) सेवक बनते हैं आप उनको पार लंघा लेते हैं।(पर) हम गुणहीन हैं।(गुणहीनों की भी) रक्षा कर (इसमें भी आपकी ही) शोभा होगी। हे मेरे ठाकुर ! आपके बिना मेरा कोई (मददगार) नहीं।(हे भाई !) बड़े भाग्यों से ही प्रभू का नाम जपा जा सकता है। 2। (हे भाई !) जो मनुष्य प्रभू के नाम से वंचित रहते हैं।उनका जीना धिक्कारयोग्य होता है।उनको बड़े दुख सहम (चिपके रहते हैं)। वे मनुष्य बार-बार जूनियों में डाले जाते हैं।वे मूर्ख लोग कर्म-हीन ही रहते हैं।भाग्यहीन ही रहते हैं। 3। हे भाई ! परमात्मा के भक्तों के लिए परमात्मा का नाम (ही जीवन का) आसरा है।धुर दरगाह से पूर्बले जन्म में (उनके माथे पर) अहो-भाग्य लिखे समझो। हे दास नानक ! गुरू ने सतिगुरू ने जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम-सिमरन पक्का कर दिया।उसकी जिंदगी कामयाब हो जाती है। 4। 2।

हमरा चितु लुभत मोहि बिखिआ बहु दुरमति मैलु भरा ॥

बिलावलु महला 4 ॥
हमरा चितु लुभत मोहि बिखिआ बहु दुरमति मैलु भरा ॥
तुम॑री सेवा करि न सकह प्रभ हम किउ करि मुगध तरा ॥1॥
मेरे मन जपि नरहर नामु नरहरा ॥
जन ऊपरि किरपा प्रभि धारी मिलि सतिगुर पारि परा ॥1॥ रहाउ ॥
हमरे पिता ठाकुर प्रभ सुआमी हरि देहु मती जसु करा ॥
तुम॑रै संगि लगे से उधरे जिउ संगि कासट लोह तरा ॥2॥
साकत नर होछी मति मधिम जिन॑ हरि हरि सेव न करा ॥
ते नर भागहीन दुहचारी ओइ जनमि मुए फिरि मरा ॥3॥
जिन कउ तुम॑ हरि मेलहु सुआमी ते न॑ाए संतोख गुर सरा ॥
दुरमति मैलु गई हरि भजिआ जन नानक पारि परा ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 4 ॥ हे प्रभू ! हम जीवों का मन माया के मोह में फसा रहता है।खोटी मति की बहुत सारी मैल से भरा रहता है; इस वास्ते हम आपकी सेवा-भक्ति नहीं कर सकते।हे प्रभू ! हम मूर्ख कैसे संसार-समुंद्र से पार लांघे। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम सदा जपा कर। जिस मनुष्य पर प्रभू ने कृपा की।वह गुरू को मिल के संसार-समुंद्र से पार लांघ गया। 1।रहाउ। हे प्रभू ! हे ठाकुर ! हे हमारे पिता ! हे हमारे मालिक ! हे हरी ! हमें (ऐसी) समझ बख्श कि हम आपकी सिफत सालाह करते रहें। हे प्रभू ! जैसे काठ से लग के लोहा (नदी से) पार लांघ जाता है।वैसे ही जो लोग आपके चरणों में जुड़ते हैं वे विकारों से बच जाते हैं। 2। हे भाई ! जिन लोगों ने कभी परमात्मा की सेवा-भक्ति नहीं की।परमात्मा से टूटे हुए उन लोगों की मति होछी और मलीन होती है। वह मनुष्य बद्-किस्मत रह जाते हैं क्योंकि वह (पवित्रता के श्रोत प्रभू से विछुड़ के) बुरे-कर्मों वाले हो जाते हैं।फिर वे सदा जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। 3। हे मालिक प्रभू ! जिन मनुष्यों को आप अपने चरणों में जोड़ना चाहते हैं।वे संतोख के सरोवर गुरू में स्नान करते रहते हैं (वे गुरू में लीन हो के अपना जीवन पवित्र बना लेते हैं)। हे दास नानक ! जो मनुष्य परमात्मा का भजन करते हैं।(उनके अंदर से) खोटी मति की मैल दूर हो जाती है।वह (वे विकारों की लहरों में से बच के) पार लांघ जाते हैं। 4। 3।

आवहु संत मिलहु मेरे भाई मिलि हरि हरि कथा करहु ॥

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बिलावलु महला 4 ॥
आवहु संत मिलहु मेरे भाई मिलि हरि हरि कथा करहु ॥
हरि हरि नामु बोहिथु है कलजुगि खेवटु गुर सबदि तरहु ॥1॥
मेरे मन हरि गुण हरि उचरहु ॥
मसतकि लिखत लिखे गुन गाए मिलि संगति पारि परहु ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 4 ॥ हे संतजनो ! हे भाईयो ! (साध-संगित में) एक साथ मिल के बैठो।और मिल के सदा प्रभू की सिफत सालाह की बातें करो। इस कलह भरे संसार में परमात्मा का नाम (जैसे) जहाज है।(गुरू इस जहाज का) मल्लाह (है।आप) गुरू के शबद में जुड़ के (संसार-समुंद्र से) पार लांघो। 1। हे मेरे मन ! सदा परमात्मा के गुण याद करता रह। जिस मनुष्य के माथे पर लिखे अच्छे भाग्य जागते हैं वह प्रभू के गुण गाता है।(हे मन ! आप भी) साध-संगति में मिल के (गुण गा और संसार-समुंद्र से) पार लांघ। 1।रहाउ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७९९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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