मसतकि लिखत लिखे गुरु पाइआ हरि हिरदै हरि बसना ॥1॥ रहाउ ॥
माइआ गिरसति भ्रमतु है प्रानी रखि लेवहु जनु अपना ॥
जिउ प्रहिलादु हरणाखसि ग्रसिओ हरि राखिओ हरि सरना ॥2॥
कवन कवन की गति मिति कहीऐ हरि कीए पतित पवंना ॥
ओहु ढोवै ढोर हाथि चमु चमरे हरि उधरिओ परिओ सरना ॥3॥
प्रभ दीन दइआल भगत भव तारन हम पापी राखु पपना ॥
हरि दासन दास दास हम करीअहु जन नानक दास दासंना ॥4॥1॥
हम मूरख मुगध अगिआन मती सरणागति पुरख अजनमा ॥
करि किरपा रखि लेवहु मेरे ठाकुर हम पाथर हीन अकरमा ॥1॥
मेरे मन भजु राम नामै रामा ॥
गुरमति हरि रसु पाईऐ होरि तिआगहु निहफल कामा ॥1॥ रहाउ ॥
हरि जन सेवक से हरि तारे हम निरगुन राखु उपमा ॥
तुझ बिनु अवरु न कोई मेरे ठाकुर हरि जपीऐ वडे करंमा ॥2॥
नामहीन ध्रिगु जीवते तिन वड दूख सहंमा ॥
ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि मंदभागी मूड़ अकरमा ॥3॥
हरि जन नामु अधारु है धुरि पूरबि लिखे वड करमा ॥
गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ जन नानक सफलु जनंमा ॥4॥2॥
हमरा चितु लुभत मोहि बिखिआ बहु दुरमति मैलु भरा ॥
तुम॑री सेवा करि न सकह प्रभ हम किउ करि मुगध तरा ॥1॥
मेरे मन जपि नरहर नामु नरहरा ॥
जन ऊपरि किरपा प्रभि धारी मिलि सतिगुर पारि परा ॥1॥ रहाउ ॥
हमरे पिता ठाकुर प्रभ सुआमी हरि देहु मती जसु करा ॥
तुम॑रै संगि लगे से उधरे जिउ संगि कासट लोह तरा ॥2॥
साकत नर होछी मति मधिम जिन॑ हरि हरि सेव न करा ॥
ते नर भागहीन दुहचारी ओइ जनमि मुए फिरि मरा ॥3॥
जिन कउ तुम॑ हरि मेलहु सुआमी ते न॑ाए संतोख गुर सरा ॥
दुरमति मैलु गई हरि भजिआ जन नानक पारि परा ॥4॥3॥
आवहु संत मिलहु मेरे भाई मिलि हरि हरि कथा करहु ॥
हरि हरि नामु बोहिथु है कलजुगि खेवटु गुर सबदि तरहु ॥1॥
मेरे मन हरि गुण हरि उचरहु ॥
मसतकि लिखत लिखे गुन गाए मिलि संगति पारि परहु ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे (मेरे) मन ! जीभ से परमात्मा का नाम जपा कर।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।