नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: (गुरमुखों से) गुणों की सांझ करनी चाहिए।इस तरह (अंदर से) अवगुण त्याग के जीवन-यात्रा पर चला जा सकता है। सबसे प्रेम भरा बर्ताव करके भलाई के सुंदर उद्यम करके विकारों से मुकाबला और जीवन-युद्ध को जीता जा सकता है। (गुरमुखों की संगति की बरकति से फिर) जहाँ भी जा के बैठें भलाई की बात ही की जा सकती है।और बुरी ओर से हट के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीया जा सकता है। (हे भाई !) अगर किसी को गुणों का डब्बा मिल जाए तो वह डब्बा खोल के (डब्बे की) सुगंधि लेनी चाहिए। (जगत में अनेकों ही जीव गुण कमा रहे हैं।अनेकों ही अवगुण कमा रहे हैं।ये परमात्मा की अपनी ही रची हुई खेल है) परमात्मा स्वयं ही (ये सब कुछ) कर रहा है।उसके बिना और कोई नहीं कर सकता। (तभी तो) किसी और के पास (इसके संबंध में) कोई गिला-शिकवा आदि नहीं किया जा सकता।(फिर जो कुछ वह प्रभू करता है ठीक करता है) वह टूटा हुआ नहीं हैं।इस वास्ते (किसी कमी के बारे में) उसे कुछ कहने की आवश्यक्ता ही नहीं पड़ती। अगर वह टूटा हुआ (व भटका हुआ) हो तो जा के कुछ कहें भी।पर स्वयं करतार कोई भूल नहीं कर सकता। वह सब जीवों की अरदासें सुनता है वह सब जीवों के किए कर्मों को देखता है।माँगे बिना ही सबको दान देता है। हे नानक ! वह सृजनहार ही सदा-स्थिर रहने वाला है। वह सब कुछ स्वयं ही करता है।कोई और (उससे आकी हो के) कुछ नहीं कर सकता।किसी और के पास जा के कोई गिला नहीं किया जा सकता। 4। 1। 4।
सूही महला 1 ॥ मेरा मनु राता गुण रवै मनि भावै सोई ॥ गुर की पउड़ी साच की साचा सुखु होई ॥ सुखि सहजि आवै साच भावै साच की मति किउ टलै ॥ इसनानु दानु सुगिआनु मजनु आपि अछलिओ किउ छलै ॥ परपंच मोह बिकार थाके कूड़ु कपटु न दोई ॥ मेरा मनु राता गुण रवै मनि भावै सोई ॥1॥ साहिबु सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥ मैलु लागी मनि मैलिऐ किनै अंम्रितु पीआ ॥ मथि अंम्रितु पीआ इहु मनु दीआ गुर पहि मोलु कराइआ ॥ आपनड़ा प्रभु सहजि पछाता जा मनु साचै लाइआ ॥ तिसु नालि गुण गावा जे तिसु भावा किउ मिलै होइ पराइआ ॥ साहिबु सो सालाहीऐ जिनि जगतु उपाइआ ॥2॥ आइ गइआ की न आइओ किउ आवै जाता ॥ प्रीतम सिउ मनु मानिआ हरि सेती राता ॥ साहिब रंगि राता सच की बाता जिनि बिंब का कोटु उसारिआ ॥ पंच भू नाइको आपि सिरंदा जिनि सच का पिंडु सवारिआ ॥ हम अवगणिआरे तू सुणि पिआरे तुधु भावै सचु सोई ॥ आवण जाणा ना थीऐ साची मति होई ॥3॥ अंजनु तैसा अंजीऐ जैसा पिर भावै ॥ समझै सूझै जाणीऐ जे आपि जाणावै ॥ आपि जाणावै मारगि पावै आपे मनूआ लेवए ॥ करम सुकरम कराए आपे कीमति कउण अभेवए ॥ तंतु मंतु पाखंडु न जाणा रामु रिदै मनु मानिआ ॥ अंजनु नामु तिसै ते सूझै गुर सबदी सचु जानिआ ॥4॥ साजन होवनि आपणे किउ पर घर जाही ॥ साजन राते सच के संगे मन माही ॥ मन माहि साजन करहि रलीआ करम धरम सबाइआ ॥ अठसठि तीरथ पुंन पूजा नामु साचा भाइआ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 ॥ (परमात्मा के प्यार में) रंगा हुआ मेरा मन (ज्यों-ज्यों परमात्मा के) गुण चेते करता है (त्यों-त्यों) मेरे मन में वह परमात्मा ही प्यारा लगता जाता है। परमात्मा के गुण गाने।मानो।एक सीढ़ी है जो गुरू ने दी है और इस सीढ़ी के माध्यम से सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा तक पहुँचा जा सकता है।(इस सीढ़ी पर चढ़ने की बरकति से मेरे अंदर) सदा-स्थिर रहने वाला आनंद बन रहा है। जो मनुष्य (इस सीढ़ी की बरकति से) आत्मिक आनंद में आत्मिक अडोलता में पहुँचता है वह सदा-स्थिर प्रभू को प्यारा लगता है।सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाने वाली उसकी मति अटल हो जाती है।परमात्मा अटल है। (अगर गुण गाने वाली मति नहीं बनी तो) कोई स्नान।कोई दान।कोई ज्ञान की चोंच-चर्चा।और कोई तीर्थ स्नान परमात्मा को खूश नहीं कर सकते। (गुण गाने वाले मनुष्य के मन में से) धोखे-फरेब।मोह के चमत्कार।विकार आदि सब समाप्त हो जाते हैं।उसके अंदर ना झूठ रह जाता है।ना ठॅगी रहती है।ना ही मेर-तेर रहती है। (प्रभू के प्यार में) रंगा हुआ मेरा मन (ज्यों-ज्यों प्रभू के) गुण गाता है (त्यों-त्यों) मेरे मन में वह प्रभू ही प्यारा लगता जा रहा है। 1। उस मालिक प्रभू की सिफत-सालाह करनी चाहिए जिसने जगत पैदा किया है। (सिफत-सालाह किए बिना मनुष्य के मन में विकारों की) मैल लगी रहती है।और अगर मन (विकारों से) मैला टिका रहे तो कोई भी नाम-अमृत पी नहीं सकता। (पर इस नाम-अमृत की प्राप्ति के लिए भी मूल्य चुकाना पड़ता है) मैंने गुरू से मूल्य डलवाया (तो उसने बताया कि) जिसने अपना ये मन (गुरू के) हवाले किया उसने बार-बार सिमर के नाम-अमृत पी लिया। (गुरू के बताए हुए राह पर चल कर) जब किसी मनुष्य ने अपना मन (मैल से हटा के) सदा-स्थिर प्रभू में जोड़ा तो उसने आत्मिक अडोलता में टिक के अपने प्रीतम प्रभू से गहरी सांझ डाल ली। (पर) मैं तब ही प्रभू-चरणों से जुड़ के प्रभू के गुण गा सकता हूँ अगर प्रभू की रजा ही हो (यदि मैं उसे अच्छा लगने लगूँ)। प्रभू के साथ ऊपर-ऊपर रहने पर प्रभू के साथ मिलाप नहीं हो सकता।(सो।हे भाई !) उस मालिक प्रभू की (सदा) सिफत सालाह करनी चाहिए जिसने (ये) जगत पैदा किया है। 2। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा आ बसे।उसे किसी और पदार्थ की लालसा नहीं रह जाती।उसका जनम-मरण समाप्त हो जाता है। उसका मन प्रीतम-प्रभू में रीझ जाता है।प्रभू के प्रेम से रंगा जाता है।उसका मन उस मालिक के रंग में रंगा जाता है। वह उस सदा-स्थिर मालिक की सिफत सालाह की बातें करता रहता है जिसने पानी की बूँद से शरीर किले का निर्माण किया है। जो पाँच तत्वों का मालिक है।जो स्वयं ही (शरीर जगत को) पैदा करने वाला है।जिसने अपने रहने के लिए मनुष्य का शरीर सजाया है। हे प्यारे प्रभू ! आप (मेरी विनती) सुन।हम जीव अवगुणों से भरे हुए हैं (आप स्वयं ही अपनी सिफत सालाह की दाति दे के हमें पवित्र करने वाला है) जो जीव (आपकी मेहर से) आपको पसेंद आ जाता है वह आपका ही रूप हैं जाता है। उसके जनम-मरन के चक्कर समाप्त हैं जाते हैं।उसकी बुद्धि अभुल हो जाती है (वह सद्बुद्धि वाला हो जाता है)। 3। स्त्री को ऐसा सुर्मा पहनना चाहिए जैसा उसके पति को अच्छा लगे (जीव-स्त्री को प्रभू-पति के मिलाप के लिए ऐसे उद्यम करने चाहिए जो प्रभू-पति को पसंद आए)। (पर जीव के भी वश में क्या है।) जब परमात्मा खुद समझ बख्शे।तब ही जीव (सही रास्ता) समझ सकता है।तब ही जीव को सूझ आ सकती है।तब ही कुछ जाना जा सकता है। परमात्मा खुद ही समझ देता है।खुद ही सही रास्ते पर डालता है खुद ही जीव के मन को अपनी ओर प्रेरित करता है। साधारण काम और अच्छे काम परमात्मा खुद ही जीव से करवाता है।पर उस प्रभू का भेद नहीं पाया जा सकता।कोई उसकी कीमत नहीं जान सकता। (परमात्मा का प्यार प्राप्त करने के लिए) मैं कोई जादू-टोना कोई मंत्र आदि पाखण्ड करना नहीं जानती।मैंने तो केवल उस प्रभू को अपने हृदय में बसाया है।मेरा मन उसकी याद में भीग गया है। प्रभू-पति को प्रसन्न करने के लिए उसका नाम ही सुर्मा है।इस सुर्मे की सूझ भी उसके पास से ही मिलती है।(जिस जीव को ये सूझ पड़ जाती है वह) गुरू के शबद में जुड़ के उस सदा-स्थिर प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। 4। सज्जन प्रभू जी (जिन सौभाग्यशाली बँदों के) अपने बन जाते हैं।वह लोग फिर पराए घरों में नहीं जाते (भाव।प्रभू का सिमरन छोड़ के और तथाकथित धर्म-कर्म नहीं करते फिरते)। वे आदमी अंतरात्मे सदा-स्थिर सज्जन-प्रभू के साथ रंगे रहते हैं।वे अपने मन में सज्जन-प्रभू जी के मिलाप का आनंद ही लेते हैं। यही उनके वास्ते सारे धार्मिक कर्म हैं। उनको सदा-स्थिर प्रभू का नाम प्यारा लगता है, यही उनके वास्ते अढ़सठ तीर्थों का स्नान है।यही उनके वास्ते पुंन-दान है और यही उनकी देव-पूजा है।
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(गुरमुखों से) गुणों की सांझ करनी चाहिए।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।