सगली जोति जाता तू सोई मिलिआ भाइ सुभाए ॥ नानक साजन कउ बलि जाईऐ साचि मिले घरि आए ॥1॥ घरि आइअड़े साजना ता धन खरी सरसी राम ॥ हरि मोहिअड़ी साच सबदि ठाकुर देखि रहंसी राम ॥ गुण संगि रहंसी खरी सरसी जा रावी रंगि रातै ॥ अवगण मारि गुणी घरु छाइआ पूरै पुरखि बिधातै ॥ तसकर मारि वसी पंचाइणि अदलु करे वीचारे ॥ नानक राम नामि निसतारा गुरमति मिलहि पिआरे ॥2॥ वरु पाइअड़ा बालड़ीए आसा मनसा पूरी राम ॥ पिरि राविअड़ी सबदि रली रवि रहिआ नह दूरी राम ॥ प्रभु दूरि न होई घटि घटि सोई तिस की नारि सबाई ॥ आपे रसीआ आपे रावे जिउ तिस दी वडिआई ॥ अमर अडोलु अमोलु अपारा गुरि पूरै सचु पाईऐ ॥ नानक आपे जोग सजोगी नदरि करे लिव लाईऐ ॥3॥ पिरु उचड़ीऐ माड़ड़ीऐ तिहु लोआ सिरताजा राम ॥ हउ बिसम भई देखि गुणा अनहद सबद अगाजा राम ॥ सबदु वीचारी करणी सारी राम नामु नीसाणो ॥ नाम बिना खोटे नही ठाहर नामु रतनु परवाणो ॥ पति मति पूरी पूरा परवाना ना आवै ना जासी ॥ नानक गुरमुखि आपु पछाणै प्रभ जैसे अविनासी ॥4॥1॥3॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: उसने सारे जीवों में आपको ही बसता पहचान लिया।उसके प्रेम (के आर्कषण) के द्वारा आप उसे मिल गया। हे नानक ! सज्जन प्रभू से सदके होना चाहिए।जो जीव-स्त्री उसके सदा-स्थिर नाम में जुड़ती है।उसके हृदय में वह आ प्रगट होता है। 1। जब सज्जन प्रभू जी जीव-स्त्री के हृदय-गृह में प्रकट होते हैं।तो जीव-स्त्री बहुत प्रसन्न-चित्त हो जाती है। जब सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद ने उसको आकर्षित किया।तब ठाकुर जी के दर्शन करके वह अडोल-चित्त हो गई। जब प्रेम-रंग में रंगे हुए परमात्मा ने जीव-स्त्री को अपने चरणों में जोड़ा तो वह प्रभू के गुणों (की याद) में अडोल-आत्मा हो गई और बहुत प्रसन्न-चित्त हो गई। पूरन-पुरख ने। सृजनहार ने (उसके अंदर से) अवगुण दूर करके उसके हृदय को गुणों से भरपूर कर दिया कामादिक चोरों को मार के वह जीव-स्त्री उस परमात्मा (के चरणों) में टिक गई जो सदा पूरी विचार से न्याय करता है। हे नानक ! परमात्मा के नाम में जुड़ने से संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है।गुरू की शिक्षा पर चलने से प्यारे प्रभू जी मिल पड़ते हैं। 2। जिस जीव-स्त्री ने पति-प्रभू को पा लिया।उसकी हरेक आस उसकी हरेक इच्छा पूरी हो जाती है (भाव।उसका मन दुनिया की आशाओं आदि की ओर नहीं दौड़ता भागता)। जिस जीव-स्त्री को प्रभू-पति ने अपने चरणों में जोड़ लिया।जो जीव-स्त्री गुरू के शबद की बरकति से प्रभू में लीन हो गई।उसे प्रभू हर जगह व्यापक दिखाई देता है।उसको अपने से दूर नहीं प्रतीत होता। उसे ये निश्चय हो जाता है कि प्रभू कहीं दूर नहीं हरेक शरीर में वही मौजूद है।सारी जीव-सि्त्रयां उसी की ही हैं। वह स्वयं ही आनंद का श्रोत है।जैसे उसकी रजा होती है वह स्वयं ही अपने मिलाप का आनंद देता है। वह परमात्मा मौत-रहित है।माया में डोलता नहीं उसका मूल्य नहीं पड़ सकता (भाव।कोई पदार्थ भी उसके बराबर का नहीं) वह सदा-स्थिर रहने वाला है।वह बेअंत है।पूरे गुरू के द्वारा ही उसकी प्राप्ति होती है। हे नानक ! प्रभू खुद ही जीवों के अपने साथ मेल के संयोग बनाता है।जब वह मेहर की नजर करता है।तब जीव उसमें सुरति जोड़ता है। 3। प्रभू-पति एक सोहाने-ऊँचे महल में बसता है (जहाँ माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता) वह तीनों लोकों का नाथ है। उसके गुण देख के मैं हैरान हो रही हूँ।चारों तरफ (सारे संसार में) उसकी जीवन-रौंअ एक-रस रुमक रही है। जो मनुष्य प्रभू के सिफत सालाह के शबद को विचारता है (भाव।अपने मन में बसाता है) जिसने ये श्रेष्ठ कर्तव्य बना लिया है। जिसके पास परमात्मा के नाम (रूपी) राहदारी है (उसको प्रभू की हजूरी में जगह मिल जाती है।पर) नाम-हीन खोटे मनुष्य को (उसकी दरगाह में) जगह नहीं मिलती। (प्रभू के दर पर) प्रभू का नाम-रत्न ही कबूल होता है। जिस मनुष्य के पास (प्रभू-नाम का) अ-रुक परवाना है।उसको (प्रभू-दर पर) पूरी इज्जत मिलती है उसकी अक्ल त्रुटि-हीन हो जाती है।वह जनम-मरन के चक्कर से बच जाता है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर जो मनुष्य अपने जीवन को पड़तालता है।वह अविनाशी प्रभू का रूप हो जाता है। 4। 1। 3।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही छंत महला 1 घरु 4 ॥ जिस प्रभू ने ये जगत पैदा किया है उसी ने ही इसकी संभाल की हुई है।उसी ने ही इसको माया की दौड़-भाग में लगाया हुआ है।(पर। हे प्रभू !) आपकी बख्शिश से (किसी सौभाग्य भरे) हृदय में आपकी ज्योति का प्रकाश होता है।(किसी सौभाग्यशाली) शरीर में चाँद चमकता है (आपके नाम की शीतलता हिल्लौरे देती है)। प्रभू की बख्शिश से जिस हृदय में (प्रभू नाम की) शीतलता चमक मारती है उस हृदय में से (अज्ञानता का) अंधकार और दुख-कलेश दूर हो जाता है। जैसे बारात दूल्हे के साथ ही फबती है।वैसे ही जीव-स्त्री के गुण (भी) तभी अच्छे लगते हैं जब प्रभू-पति हृदय में बसता हैं। जिस जीव-स्त्री ने अपने जीवन को प्रभू की सिफत सालाह से सुंदर बना लिया है।उस ने इसकी कद्र समझ के प्रभू को अपने हृदय में बसा लिया है।उसका प्रभू-पति से मिलाप हो जाता है।(लोक-परलोक में) उसे शोभा भी मिलती है।एक-रस आत्मिक आनंद का दाता प्रभू उसके हृदय में प्रकट हो जाता है। जिस प्रभू ने ये जगत पैदा किया है वही इसकी संभाल करता है।उसने इसको माया की दौड़-भाग में लगाया हुआ है। 1। मैं उन सज्जनों-मित्रों से सदके जाता हॅूँ जिन पर माया का पर्दा नहीं पड़ा जिनकी संगति करके मैंने उनके साथ दिली सांझ डाली है। जिन गुरमुखों के साथ दिली सांझ पड़ सके वे सज्जन कभी भी भूलने नहीं चाहिए।उनका दर्शन करने से आत्मिक खुशियाँ पैदा होती हैं। वह सज्जन (अपने सत्संगियों को अपनी) जान की तरह रखते हैं (जिंद से भी ज्यादा प्यारा समझते हैं)। उनमें सारे ही गुण होते हें। अवगुण उनके नजदीक नहीं फटकते। मैं सदके हूँ उन सज्जन-मित्रों के जिन पर माया अपना असर ना कर सकी। 2। (अगर किसी मनुष्य के पास सुगंधि देने वाली वस्तुओं से भरा डिब्बा हो।उस डब्बे का लाभ उसे तब ही है जब वह उस डब्बे को खोल के उससे सुगंधि ले।गुरमुखों की संगति गुणों का डब्बा है) यदि किसी को गुणों का डब्बा मिल जाए।तो वह डब्बा खोल के (डब्बे के भीतर की) सुगंधि लेनी चाहिए। (हे भाई !) अगर आप चाहता है कि आपके अंदर (भी) गुण पैदा हों।तो गुरमुखों को मिल के उनके साथ गुणों की सांझ करनी चाहिए।
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसने सारे जीवों में आपको ही बसता पहचान लिया।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।