Lulla Family

अंग 753

अंग
753
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आपे थापि उथापि सबदि निवाजिआ ॥5॥
देही भसम रुलाइ न जापी कह गइआ ॥
आपे रहिआ समाइ सो विसमादु भइआ ॥6॥
तूं नाही प्रभ दूरि जाणहि सभ तू है ॥
गुरमुखि वेखि हदूरि अंतरि भी तू है ॥7॥
मै दीजै नाम निवासु अंतरि सांति होइ ॥
गुण गावै नानक दासु सतिगुरु मति देइ ॥8॥3॥5॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! तूने ही (सारा जगत) पैदा किया है।आप स्वयं ही र्पदा करता है स्वयं ही नाश करता है। 5। जीवात्मा (अपने शरीर को छोड़ के) शरीर को मिट्टी में मिला के।पता नहीं लगता।कहाँ चली जाती है। आश्चर्यजनक करिश्मा घटित होता है।(पर हे प्रभू !) आप स्वयं ही हर जगह मौजूद है। 6। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं वे जानते हैं कि हे प्रभू ! आप (किसी भी जगह से) दूर नहीं।हर जगह आप ही आप है। अंदर भी आप है (बाहर भी आप ही है) आपको हर जगह हाजिर-नाजिर देखते हैं। 7। हे नानक ! (अरदास कर- हे प्रभू !) मेरे अंदर अपने नाम का निवास बख्श।ताकि मेरे अंदर शांति पैदा हो। (आपकी मेहर से) जिसको सतिगुरू शिक्षा देता है।वह दास (आपके) गुण गाता है। 8। 3। 5।
रागु सूही महला 3 घरु 1 असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नामै ही ते सभु किछु होआ बिनु सतिगुर नामु न जापै ॥
गुर का सबदु महा रसु मीठा बिनु चाखे सादु न जापै ॥
कउडी बदलै जनमु गवाइआ चीनसि नाही आपै ॥
गुरमुखि होवै ता एको जाणै हउमै दुखु न संतापै ॥1॥
बलिहारी गुर अपणे विटहु जिनि साचे सिउ लिव लाई ॥
सबदु चीनि॑ आतमु परगासिआ सहजे रहिआ समाई ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखि गावै गुरमुखि बूझै गुरमुखि सबदु बीचारे ॥
जीउ पिंडु सभु गुर ते उपजै गुरमुखि कारज सवारे ॥
मनमुखि अंधा अंधु कमावै बिखु खटे संसारे ॥
माइआ मोहि सदा दुखु पाए बिनु गुर अति पिआरे ॥2॥
सोई सेवकु जे सतिगुर सेवे चालै सतिगुर भाए ॥
साचा सबदु सिफति है साची साचा मंनि वसाए ॥
सची बाणी गुरमुखि आखै हउमै विचहु जाए ॥
आपे दाता करमु है साचा साचा सबदु सुणाए ॥3॥
गुरमुखि घाले गुरमुखि खटे गुरमुखि नामु जपाए ॥
सदा अलिपतु साचै रंगि राता गुर कै सहजि सुभाए ॥
मनमुखु सद ही कूड़ो बोलै बिखु बीजै बिखु खाए ॥
जमकालि बाधा त्रिसना दाधा बिनु गुर कवणु छडाए ॥4॥
सचा तीरथु जितु सत सरि नावणु गुरमुखि आपि बुझाए ॥
अठसठि तीरथ गुर सबदि दिखाए तितु नातै मलु जाए ॥
सचा सबदु सचा है निरमलु ना मलु लगै न लाए ॥
सची सिफति सची सालाह पूरे गुर ते पाए ॥5॥
तनु मनु सभु किछु हरि तिसु केरा दुरमति कहणु न जाए ॥
हुकमु होवै ता निरमलु होवै हउमै विचहु जाए ॥
गुर की साखी सहजे चाखी त्रिसना अगनि बुझाए ॥
गुर कै सबदि राता सहजे माता सहजे रहिआ समाए ॥6॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 3 घरु 1 असटपदीआ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम से सब कुछ (सारा रौशन आत्मिक जीवन) होता है।पर गुरू की शरण पड़े बिना नाम की कद्र नहीं पड़ती। गुरू का शबद बड़े रस वाला है मीठा है।जब तक इसे चखा ना जाए।स्वाद का पता नहीं चल सकता। जो मनुष्य (गुरू के शबद के द्वारा) अपने आत्मिक जीवन को पहचानता नहीं।वह अपने मानस जन्म को कौड़ी के बदले (व्यर्थ ही) गवा लेता है। जब मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है।तब एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालता है।और।(तब) उसे अहंकार का दुख नहीं सता सकता। 1। हे भाई ! मैं अपने गुरू से सदके जाता हूँ।जिसने (शरण आए मनुष्य की) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के साथ प्रीति जोड़ दी (भाव।जोड़ देता है)। गुरू के शबद से सांझ डाल के मनुष्य का आत्मिक जीवन चमक उठता है।मनुष्य आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य गुरू के शबद को गाता रहता है।गुरू के शबद को समझता है।गुरू के शबद को विचारता है। उस मनुष्य की जिंद उसका शरीर गुरू की बरकति से नया आत्मिक जन्म लेता है।गुरू की शरण पड़ कर वह अपने सारे काम सँवार लेता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के मोह में अंधा हुआ रहता है।वह सदैव अंधों वाला काम ही करता रहता है। जगत में वह वही कमाई करता है जो उसके आत्मिक जीवन के लिए जहर बन जाती है।प्यारे गुरू की शरण पड़े बिना वह मनुष्य माया के मोह में फंस के सदा दुख सहता रहता है। 2। जो मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ता है।गुरू की रजा में चलने लग जाता है वह मनुष्य परमात्मा का भक्त बन जाता है। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी।सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह (उसके मन में टिकी रहती है)।वह मनुष्य सदा कायम रहने वाले मनुष्य को अपने मन में बसाए रखता है। गुरू के बताए हुए राह पर चलने वाला मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी उचारता रहता है (जिसकी बरकति से उसके) अंदर से अहंकार दूर हो जाती है। (उसे यकीन बन जाता है कि) परमात्मा स्वयं सब दातें देने वाला है।परमात्मा की बख्शिश अटॅल है।वह मनुष्य (औरों को भी) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह सुनाता रहता है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलता है।वह (नाम सिमरन की) मेहनत करता है।(नाम-धन) कमाता है।और।(औरों को भी) नाम जपवाता है। सदा-स्थिर प्रभू के प्रेम रंग में रंगीज के वह मनुष्य सदैव (माया के मोह से) निर्लिप रहता है।गुरू के दर पर रह के वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिका रहता है।प्रभू के प्रेम में लीन रहता है। पर। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सदा ही झूठ बोलता है।(आत्मिक जीवन के खत्म कर देने वाली माया के मोह का) जहर बीजता है।और वही जहर खाता है (उसी जहर को अपने जीवन का सहारा बनाए रखता है)। वह मनुष्य आत्मिक मौत की फाहियों में बँधा रहता है।तृष्णा की आग में जला रहता है।(इस बिपता में से उसको) गुरू के बिना और कोई नहीं छुड़ा सकता। 4। जो मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ता है उसको प्रभू स्वयं ये सूझ बख्शता है कि जिस सच्चे सरोवर में स्नान करना चाहिए वह सदा कायम रहने वाला तीर्थ (गुरू का शबद ही है) गुरू के शबद में (ही उस प्रभू को) अढ़सठ तीर्थ दिखा देता है (और दिखा देता है कि) उस (गुरू-शबद-तीर्थ) में नहाने से (विकारों की) मैल उतर जाती है। (उस मनुष्य को यकीन बन जाता है कि) गुरू का शबद ही सदा कायम रहने वाला और पवित्र तीर्थ है (उसमें स्नान करने से विकारों की) मैल नहीं लगती।(वह तीर्थ और) मैल नहीं चिपकाता। वह मनुष्य पूरे गुरू के पास से सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा की सिफत-सालाह प्राप्त कर लेता है। 5। पर। जो मनुष्य गुरू की शरण नहीं पड़ता।वह (मनुष्य) खोटी मति के कारण ये नहीं कह सकता कि हमारा ये शरीर हमारा ये मन सब कुछ उस प्रभू का ही दिया हुआ है। जब परमात्मा की रजा होती है (मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है।उसका मन) पवित्र हो जाता है (उसके) अंदर से अहंकार दूर हो जाता है वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के गुरू के उपदेश का आनंद लेता है। (गुरू का उपदेश उसके अंदर से) तृष्णा की आग बुझा देता है। वह मनुष्य गुरू के शबद में रंगा जाता है।आत्मिक अडोलता में मस्त हो जाता है।आत्मिक अडोलता में ही लीन रहता है। 6।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! तूने ही (सारा जगत) पैदा किया है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।