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अंग 721

अंग
721
राग तिलंग
राग: तिलंग · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु तिलंग महला 1 घरु 1
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
यक अरज गुफतम पेसि तो दर गोस कुन करतार ॥
हका कबीर करीम तू बेऐब परवदगार ॥1॥
दुनीआ मुकामे फानी तहकीक दिल दानी ॥
मम सर मूइ अजराईल गिरफतह दिल हेचि न दानी ॥1॥ रहाउ ॥
जन पिसर पदर बिरादरां कस नेस दसतंगीर ॥
आखिर बिअफतम कस न दारद चूं सवद तकबीर ॥2॥
सब रोज गसतम दर हवा करदेम बदी खिआल ॥
गाहे न नेकी कार करदम मम इंी चिनी अहवाल ॥3॥
बदबखत हम चु बखील गाफिल बेनजर बेबाक ॥
नानक बुगोयद जनु तुरा तेरे चाकरां पा खाक ॥4॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: रागु तिलंग महला 1 घरु 1 ईश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह आदिपुरुष संसार का रचनहार है, सर्वशक्तिमान है, अभय है, वैर भावना से रहित होने के कारण प्रेमस्वरूप है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर्ति सदा अमर है, अतः जन्म-मरण के चक्र से रहित है, स्वजन्मा है अर्थात् स्वयं प्रकाशमान हुआ, जिसे गुरु-कृपा से पाया जाता है। हे करतार ! मैंने आपके आगे एक विनती की है।(मेरी विनती) ध्यान से सुन। आप सदा कायम रहने वाला है। आप (सबसे) बड़ा है।आप बख्शिश करने वाला है।आप पवित्र हस्ती वाला है।आप सबकी पालना करने वाला है।1। हे (मेरे) दिल ! आप सच जान कि ये दुनिया नाशवंत है। हे दिल ! आप कुछ भी नहीं समझता कि (मौत के फरिश्ते) अजराईल ने मेरे सिर के बाल पकड़े हुए हैं। 1।रहाउ। स्त्री।पुत्र।पिता।(सारे) भाई।(इनमें से) कोई भी मदद करने वाला नहीं। (जब) आखिर में मैं गिरूँ (भाव।जब मौत आ गई)।जब मुर्दे को दबाने के वक्त की नमाज़ (तकबीर) पढ़ी जाती है।कोई भी (मुझे यहाँ) रख नहीं सकता। 2। (सारी जिंदगी) मैं रात-दिन लालच में फिरता रहा।मैं बदी के ही ख्याल करता रहा। मैंने कभी कोई नेकी का काम नहीं किया।(हे करतार !) मेरा इस तरह का हाल है। 3। (हे करतार !) मेरे जैसा (दुनिया में) कोई अभागा।निंदक।लापरवाह।ढीठ और निडर नहीं है (पर आपका) दास नानक आपको कहता है कि (मेहर कर।मुझे) आपके सेवकों के चरणों की धूल मिले। 4। 1।
तिलंग महला 1 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भउ तेरा भांग खलड़ी मेरा चीतु ॥
मै देवाना भइआ अतीतु ॥
कर कासा दरसन की भूख ॥
मै दरि मागउ नीता नीत ॥1॥
तउ दरसन की करउ समाइ ॥
मै दरि मागतु भीखिआ पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
केसरि कुसम मिरगमै हरणा सरब सरीरी चड़॑णा ॥
चंदन भगता जोति इनेही सरबे परमलु करणा ॥2॥
घिअ पट भांडा कहै न कोइ ॥
ऐसा भगतु वरन महि होइ ॥
तेरै नामि निवे रहे लिव लाइ ॥
नानक तिन दरि भीखिआ पाइ ॥3॥1॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 1 घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ आपका डर-अदब मेरे लिए भांग (के समान) है।मेरा मन (इस भांग को संभाल के रखने के लिए) गुत्थी है। (आपके डर-अदब की भांग से) मैं नशई व विरक्त हैं गया हूँ। मेरे दोनों हाथ (आपके दर से ख़ैर लेने के लिए) प्याला है।(मेरी आत्मा को आपके) दीदार की भूख (लगी हुई) है। (इस वास्ते) मैं (आपके) दर से सदा (दीदार की ही मांग) माँगता हूँ। 1। (हे प्रभू !) मैं आपके दर का मंगता हूँ। मैं आपके दीदार के लिए सदाअ (आवाज) देता हूँ।मुझे (अपने दीदार की) ख़ैर दे। 1।रहाउ। केसर।फूल। कस्तूरी और सोना (इनको अपवित्र कोई नहीं मानता।ये) सभी के शरीरों पर बरते जाते हैं। चंदन सबको सुगंधि देता है।ऐसा ही स्वभाव (आपके) भक्तों का है। 2। रेशम और घी के बर्तनों के बारे में कोई भी मनुष्य पूछ-ताछ नहीं करता (कि इनको किस-किस का हाथ लग चुका है)। (हे प्रभू ! आपका) भक्त भी ऐसा ही होता है।चाहे वह किसी भी जाति में (पैदा) हुआ हैं। हे नानक ! (प्रभू दर पर अरदास कर और कह, हे प्रभू !) जो बंदे आपके नाम में लीन रहते हैं लिव लगा के रखते हैं। उनके दर पर (रख के मुझे अपने दर्शनों की) ख़ैर डाल। 3। 1। 2।
तिलंग महला 1 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
इहु तनु माइआ पाहिआ पिआरे लीतड़ा लबि रंगाए ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 1 घरु 3 सतिगुर प्रसादि ॥ जिस जीव-स्त्री के इस शरीर को माया (के मोह) की लाग लगी हो।और फिर उसने इसको लालच से रंगा लिया हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु तिलंग महला 1 घरु 1 ईश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह आदिपुरुष संसार का रचनहार है, सर्वशक्तिमान है, अभय है, वैर भावना से रहित होने के कारण प्रेमस्वरूप है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।