मगर पाछै कछु न सूझै एहु पदमु अलोअ ॥2॥ खत्रीआ त धरमु छोडिआ मलेछ भाखिआ गही ॥ स्रिसटि सभ इक वरन होई धरम की गति रही ॥3॥ असट साज साजि पुराण सोधहि करहि बेद अभिआसु ॥ बिनु नाम हरि के मुकति नाही कहै नानकु दासु ॥4॥1॥6॥8॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पर अपनी पीठ के पीछे पड़ी कोई चीज़ इन्हें दिखाई नहीं देती।ये अजीब पद्मासन है। 2। (अपने आप को हिन्दू धर्म के रखवाले समझने वाले) खत्रियों ने (अपना ये) धर्म छोड़ दिया है।जिनको ये अपने मुँह से मलेछ कह रहे हैं (रोजी की खातिर) उनकी बोली ग्रहण कर चुके हैं। (इनके) धर्म की मर्यादा मर चुकी है।सारी सृष्टि एक-वर्ण की हो गई है (एक अधर्म ही अधर्म प्रधान हो गया है)। 3। (ब्राहमण लोग) आष्टाध्याई आदि ग्रंथ रच के (उनके अनुसार) पुराणों को विचारते हैं और वेदों का अभ्यास करते हैं।(बस ! इसी को श्रेष्ठ धर्म-कर्म माने बैठे हैं)।पर। दास नानक कहता है कि परमात्मा का नाम जपे बिना (विकारों से) खलासी नहीं हो सकती (इसलिए सिमरन ही सबसे श्रेष्ठ धर्म-कर्म है)। 4। 1। 6। 8।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 1 आरती ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। सारा आकाश (जैसे) थाल है।सूर्य और चंद्रमा (इस थाल में) दीए बने हुए हैं।तारा मण्डल।(थाल में) मोती रखे हुए हैं। मलय पर्वत से आने वाली (सुगंधित) हवा मानो।धूप (धुख) रही है।हवा चवर कर रही है।सारी बनस्पति ज्योति-रूपी (प्रभू की आरती) के लिए फूल दे रही है (पुष्पार्पण कर रही है)। 1। हे जीवों के जनम-मरण नाश करने वाले ! (प्रकृति में) आपकी कैसी सुंदर आरती हैं रही है ! (सब जीवों में रुमक रही) एक-रस रौंअ।जैसे।आपकी आरती के लिए नगारे बज रहे हैं। 1।रहाउ। (सब जीवों में व्यापक होने के कारण) आपकी हजारों आँखें हैं (पर।निराकार होने के कारण।हे प्रभू !) आपकी कोई आँख नहीं।हजारों ही आपकी सूरतें हैं।पर आपकी कोई सूरति नहीं। हजारों आपके सुंदर पैर हैं।पर (निराकार होने के कारण) आपका एक भी पैर नहीं।हजारों आपके नाक हैं।पर आप बिना नाक के ही है।आपके ऐसे अजीब करिश्मों ने मुझे हैरान किया हुआ है। 2। सारे जीवों में एक उसी परमात्मा की ज्योति बरत रही है। उस ज्योति के प्रकाश से सारे जीवों में रौशनी (सूझ-बूझ) है। पर। इस ज्योति का ज्ञान गुरू की शिक्षा से ही होता है (गुरू के माध्यम से ये समझ पड़ती है कि हरेक अंदर परमात्मा की ज्योति है)। (इस सर्व-व्यापक ज्योति की) आरती ये है कि जो कुछ उसकी रजा में हो रहा है वह जीव को अच्छा लगे (प्रभू की रजा में चलना ही प्रभू की आरती करनी है)। 3। हे हरी ! आपके चरण-रूप कमल-पुष्प के रस के लिए मेरा मन ललचाता है।हर रोज मुझे इसी रस की प्यास लगी हुई है। मुझ नानक पपीहे को अपनी मेहर का जल दे।जिस (की बरकति) से मैं आपके नाम में टिका रहूँ। 4। 1। 7। 9।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 3 घरु 2 चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! ये नाम-खजाना कभी खत्म होने वाला नहीं।ना ही ये (खर्चने से) समाप्त होता है।ना ये गायब होता है। (इस धन की ये महानता मुझे) पूरे गुरू ने दिखा दी है। (हे भाई !) मैं अपने गुरू से सदके जाता हूं। गुरू की कृपा से परमात्मा (का नाम-धन अपने) मन में बसाता हूँ। 1। (हे भाई !) वह मनुष्य परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ के (आत्मिक जीवन के) शाह बन गए। (जिन मनुष्यों के हृदय में) पूरे गुरू ने परमात्मा के नाम का धन प्रगट कर दिया। ये नाम-धन परमात्मा की कृपा से मन में आ के बसता है।रहाउ। (हे भाई ! गुरू की शरण आए मनुष्य के) अवगुण दूर करके परमात्मा की सिफत सालाह (उसके) हृदय में बसा देता है। पूर्ण गुरु के प्रेम द्वारा सहज स्वभाव ही हुआ है। (हे भाई !) पूरे गुरू की (उचारी हुई) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाली बाणी (मनुष्य के) मन में आत्मिक हुलारे पैदा करती है। (इस बाणी की बरकति से)आत्मिक अडोलता में समाई हुई रहती है। 2। हे भाई जनो ! एक हैरान करने वाला तमाशा देखो। (गुरू मनुष्य के अंदर से) तेर-मेर हटा के परमात्मा (का नाम उसके) मन में बसा देता है। हे भाई ! परमात्मा का नाम अमोहक है।(किसी भी दुनियावी कीमत से) नहीं मिल सकता।(हाँ।) गुरू की कृपा से मन में आ बसता है। 3। (हे भाई ! चाहे) परमात्मा खुद ही सबमें बसता है। (पर) गुरू की मति पर चलने से ही (मनुष्य के) हृदय में प्रकट होता है। हे नानक ! आत्मिक अडोलता में टिक के जिस मनुष्य ने प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल के (उसको अपने अंदर बसता) पहचान लिया है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर अपनी पीठ के पीछे पड़ी कोई चीज़ इन्हें दिखाई नहीं देती।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।