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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 658 · सोरठ

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अंग
658
सोरठ
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  1. राज भुइअंग प्रसंग जैसे हहि अब कछु मरमु जनाइआ ॥
  2. जउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बधनि तुम बाधे ॥
  3. दुलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेकै ॥
  4. सुख सागरु सुरतर चिंतामनि कामधेनु बसि जा के ॥

राज भुइअंग प्रसंग जैसे हहि अब कछु मरमु जनाइआ ॥

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राज भुइअंग प्रसंग जैसे हहि अब कछु मरमु जनाइआ ॥
अनिक कटक जैसे भूलि परे अब कहते कहनु न आइआ ॥3॥
सरबे एकु अनेकै सुआमी सभ घट भोुगवै सोई ॥
कहि रविदास हाथ पै नेरै सहजे होइ सु होई ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: जैसे रस्सी और साँप का दृष्टांत है। अब वह पुरानी भेद-भाव वाली बात मुझसे कहीं नहीं जाती (भाव। अब मैं ये नहीं कहता कि जगत आपसे अलग हस्ती है)। जैसे (सोने से बने हुए) अनेकों कड़े देख के भुलेखा पड़ जाए (कि सोना ही कई किस्म का होता है। वैसे ही हमें भुलेखा पड़ा हुआ है कि ये जगत आपसे अलग है)।पर आपने अब मुझे कुछ-कुछ भेद जता दिया है।3। (अब तो) रविदास कहता है कि वह प्रभू-पति अनेकों रूप बना के सभी में एक स्वयं ही है। सभी घटों में खुद ही बैठा जगत के रंग माण रहा है। (दूर नहीं) मेरे हाथ से भी नजदीक है। जो कुछ (जगत में) हो रहा है। उसी की रजा में हो रहा है। 4। 1।

जउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बधनि तुम बाधे ॥

जउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बधनि तुम बाधे ॥
अपने छूटन को जतनु करहु हम छूटे तुम आराधे ॥1॥
माधवे जानत हहु जैसी तैसी ॥
अब कहा करहुगे ऐसी ॥1॥ रहाउ ॥
मीनु पकरि फांकिओ अरु काटिओ रांधि कीओ बहु बानी ॥
खंड खंड करि भोजनु कीनो तऊ न बिसरिओ पानी ॥2॥
आपन बापै नाही किसी को भावन को हरि राजा ॥
मोह पटल सभु जगतु बिआपिओ भगत नही संतापा ॥3॥
कहि रविदास भगति इक बाढी अब इह का सिउ कहीऐ ॥
जा कारनि हम तुम आराधे सो दुखु अजहू सहीऐ ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: (सो। हे माधो !) अगर हम मोह के बँधनों में बँधे हुए थे। तो हमने अब आपको अपने प्यार की रस्सी से बाँध लिया है। हम तो (उस मोह के बँधनों से) आपको सिमर के निकल आए हैं। आप हमारे प्यार की जकड़ में से अब कैसे निकलोगे। हे माधो ! आपके भक्त जैसा प्यार आपके साथ करते हैं वह आपसे छुपा नहीं रह सकता (आप अच्छी तरह जानते हैं)। ऐसी प्रीति के होते हुए आप जरूर उन्हें मोह से बचाए रखते हैं। 1।रहाउ। (हमारा आपके साथ प्यार भी वह है जो मछली को पानी के साथ होता है। हमने तो मर के भी आपकी याद नहीं छोड़नी) मछली (पानी में से) पकड़ के टुकड़े-टुकड़े कर दें। हिस्से कर दें और कई प्रकार से पका लें। फिर रक्ती रक्ती करके खा लें। फिर भी उस मछली को पानी नहीं भूलता (जिस खाने वाले के पेट में जाती है उसको भी पानी की प्यास लगा देती है)। 2। जगत का मालिक हरी किसी के पिता की (जद्दी मल्कियत) नहीं। वह तो प्रेम का बँधा हुआ है। (इस प्रेम से वंचित सारा जगत) मोह के पर्दे में फंसा पड़ा है। पर (प्रभू के साथ प्रेम करने वाले) भक्तों को (इस मोह का) कोई कलेश नहीं होता। 3। रविदास कहता है, (हे माधो !) मैं एक आपकी भक्ति (अपने हृदय में) इतनी दृढ़ की है कि मुझे अब किसी के साथ ये गिला करने की जरूरत नहीं रह गई कि जिस मोह से बचने के लिए मैं आपका सिमरन कर रहा था। उस मोह का दुख मुझे अब तक सहना पड़ रहा है (भाव। उस मोह का तो अब मेरे अंद रनाम-निशान भी नहीं रह गया)। 4। 2।

दुलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेकै ॥

दुलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेकै ॥
राजे इंद्र समसरि ग्रिह आसन बिनु हरि भगति कहहु किह लेखै ॥1॥
न बीचारिओ राजा राम को रसु ॥
जिह रस अन रस बीसरि जाही ॥1॥ रहाउ ॥
जानि अजान भए हम बावर सोच असोच दिवस जाही ॥
इंद्री सबल निबल बिबेक बुधि परमारथ परवेस नही ॥2॥
कहीअत आन अचरीअत अन कछु समझ न परै अपर माइआ ॥
कहि रविदास उदास दास मति परहरि कोपु करहु जीअ दइआ ॥3॥3॥

हिन्दी अर्थ: ये मानस जन्म बड़ी मुश्किल से मिलता है। (पिछले किए) भले कामों के फल के कारण हमें मिल गया। पर हमारे अंजानपने में ये व्यर्थ ही जा रहा है; (हमने कभी सोचा ही नहीं कि) अगर प्रभू की बँदगी से वंचित रहे तो (देवताओं के) राजा इन्द्र के स्वर्ग जैसे महल-माढ़ियां भी किसी काम के नहीं हैं। 1। (हम मायाधरी जीवों ने) जगत-प्रभू परमात्मा के नाम के उस आनंद को कभी नहीं विचारा। जिस आनंद की बरकति से (माया के) और सारे चस्के दूर हो जाते हैं। 1।रहाउ। (हे प्रभू !) जानते-बूझते हुए भी हम कमले और मूर्ख बने हुए हैं। हमारी उम्र के दिन (माया की ही) अच्छी-बुरी विचारों में गुजर रहे हैं। हमारी काम-वासना बढ़ रही है। विचार-शक्ति कम हो रही है। इस बात की हमें कभी सोच ही नहीं आई कि हमारी सबसे बड़ी जरूरत क्या है। 2। हम कहते और हैं और करते कुछ और हैं। माया इतनी बलवान हो रही है कि हमें (अपनी मूर्खता की) समझ ही नहीं पड़ती। (हे प्रभू !) आपका दास रविदास कहता है, मैं अब इस (मूर्खपने से) उपराम हो गया हूँ। (मेरे अंजानपने पर) गुस्सा ना करना और मेरी आत्मा पर मेहर करनी। 3। 3।

सुख सागरु सुरतर चिंतामनि कामधेनु बसि जा के ॥

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सुख सागरु सुरतर चिंतामनि कामधेनु बसि जा के ॥
चारि पदारथ असट दसा सिधि नव निधि कर तल ता के ॥1॥
हरि हरि हरि न जपहि रसना ॥
अवर सभ तिआगि बचन रचना ॥1॥ रहाउ ॥
नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अखर मांही ॥
बिआस बिचारि कहिओ परमारथु राम नाम सरि नाही ॥2॥
सहज समाधि उपाधि रहत फुनि बडै भागि लिव लागी ॥
कहि रविदास प्रगासु रिदै धरि जनम मरन भै भागी ॥3॥4॥
जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा ॥
जउ तुम चंद तउ हम भए है चकोरा ॥1॥
माधवे तुम न तोरहु तउ हम नही तोरहि ॥
तुम सिउ तोरि कवन सिउ जोरहि ॥1॥ रहाउ ॥
जउ तुम दीवरा तउ हम बाती ॥
जउ तुम तीरथ तउ हम जाती ॥2॥

हिन्दी अर्थ: (हे पण्डित !) जो प्रभू सुखों का समुंद्र है। जिस प्रभू के वश में स्वर्ग के पाँचों वृक्ष। चिंतामणि और कामधेनु हैं। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों पदार्थ। अठारहों सिद्धियां और नौ निधियां ये सब उसी के हाथों की तलियों पर हैं। 1। (हे पण्डित !) आप और सारी फोकियां बातें छोड़ के अपनी जीभ से सदा एक परमात्मा का नाम क्यों नहीं सिमरते? 1।रहाउ। (हे पण्डित !) पुराणों के अनेक किस्म के प्रसंग। वेदों की बताई हुई विधियां। ये सब वाक्य-रचना ही हैं (अनुभवी ज्ञान नहीं जो प्रभू के चरणों में जुड़ने से हृदय में पैदा होता है)। (हे पण्डित ! वेदों के खोजी) व्यास ऋषि ने सोच-विचार के यही धर्म-तत्व बताया है कि (इन पुस्तकों के पाठ आदि) परमात्मा के नाम का सिमरन करने की बराबरी नहीं कर सकते। (फिर आप क्यों नाम नहीं सिमरते।)। 2। रविदास कहता है, बड़ी किस्मत से जिस मनुष्य की सुरति प्रभू-चरणों में जुड़ती है उसका मन आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। कोई विकार उसमें नहीं उठता। वह मनुष्य अपने हृदय में रोशनी प्राप्त करता है। और। जनम-मरण (भाव। सारी उम्र) के उसके डर नाश हो जाते हैं। 3। 4। हे मेरे माधो ! अगर आप सुंदर सा पहाड़ बनें। तो मैं (आपका) मोर बनूँगा (आपको देख-देख के मैं नृत्य करूँगा)। अगर आप चाँद बनें तो मैं आपका चकोर बनूँगा (और आपको देख-देख के खुश हो-हो के बोलूँगा)। 1। हे माधो ! अगर आप (मेरे से) प्यार ना तोड़ें। तो मैं भी नहीं तोड़ूंगा; क्योंकि आपसे तोड़ के मैं और किसके साथ जोड़ सकता हूँ। (और कोई। हे माधो ! आपके जैसा है ही नहीं)। 1।रहाउ। हे माधो ! अगर आप सुंदर सा दीया बनें। मैं (आपकी) बाती बन जाऊँ। अगर आप तीर्थ बन जाएँ तो मैं (आपका दीदार करने के लिए) यात्री बन जाऊँगा। 2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत रविदास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 658 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।